Patal Bhuvaneshwar

पाताल भूवनेश्वर गुफा मंदिर: कलियुग के अंत का रहस्यमय संकेत और ब्रह्मांड की गुप्त शक्ति

भारत अपनी आध्यात्मिक विरासत और अनगिनत रहस्यमय स्थलों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित पाताल भूवनेश्वर गुफा मंदिर भी ऐसा ही एक अद्भुत धार्मिक स्थल है, जो न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि इसे कलियुग के अंत का संकेतक भी माना जाता है। यह मंदिर अपने अंदर ब्रह्मांड के गहरे रहस्यों को समेटे हुए है और भक्तों के लिए एक अनोखी आध्यात्मिक अनुभूति का माध्यम है।  पाताल भूवनेश्वर गुफा मंदिर का परिचय पाताल भुवनेश्वर मंदिर उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित है, जो गंगोलीहाट से करीब 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक प्राचीन और रहस्यमयी भूमिगत गुफा मंदिर है। यह मंदिर अपनी रहस्यमयी बनावट और पौराणिक मान्यताओं के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। गुफा की लंबाई लगभग 160 मीटर और गहराई करीब 90 फीट है, जिसमें प्रवेश करने के लिए एक तंग और संकरा रास्ता पार करना होता है। कलियुग के अंत का संकेत पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पाताल भूवनेश्वर मंदिर (Patal Bhuvaneshwar Temple) में छिपे प्रतीक और संरचनाएं कलियुग के अंत का संकेत देती हैं। मंदिर में प्रवेश करते ही प्रवेश द्वार पर शेषनाग की विशाल आकृति नजर आती है, जिनके बारे में स्थानीय मान्यता है कि उनके फन पर ही पूरी पृथ्वी टिकी हुई है। यहाँ एक प्रचलित धारणा यह भी है कि यह स्थान स्वयं भगवान शिव का निवास स्थान रहा है। गुफा के अंदर प्राकृतिक रूप से निर्मित चट्टानी संरचनाएँ और रहस्यमय आकृतियाँ सनातन धर्म की प्राचीन मान्यताओं और पौराणिक कथाओं को साकार करती प्रतीत होती हैं, जो इस स्थान को और भी रहस्यमय बना देती हैं। गुफा के अंदर की अनोखी विशेषताएं गुफा के भीतर बनी प्राकृतिक आकृतियों को भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक रूप में माना जाता है। जनश्रुति है कि इसी स्थान पर भगवान शिव ने भगवान गणेश का सिर काटा था और यहीं सप्तऋषियों ने कठोर तपस्या की थी। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि इस गुफा में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास है, जिनकी आकृतियाँ चट्टानों में स्पष्ट रूप से नजर आती हैं। गुफा के एक हिस्से को यमराज के न्याय दरबार के रूप में जाना जाता है, जहाँ आत्माओं के पाप और पुण्य का लेखा-जोखा किया जाता है। इसके अलावा, एक विशेष चट्टान पर कल्पवृक्ष की आकृति भी उकेरी हुई है, जिसे सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग का प्रतीक माना जाता है। रहस्यमय और अद्भुत कथाएं पाताल भुवनेश्वर मंदिर (Patal Bhuvaneshwar Temple) से जुड़ी कुछ रहस्य ऐसी हैं, जिन्हें विज्ञान भी नहीं समझा सका। मान्यता है कि इस गुफा में स्वर्ग, नरक, मोक्ष और पाप के चार द्वार स्थित हैं। यहां शेषनाग की एक विशाल प्राकृतिक आकृति भी दिखाई देती है, जिसके फनों पर पृथ्वी टिकी हुई मानी जाती है। इस मंदिर की खासियत यह है कि यहां एक साथ 33 देवी-देवताओं के दर्शन होते हैं। गुफा के भीतर भगवान गणेश का सिर भी मौजूद है, जिस पर ब्रह्म कमल की पवित्र बूंदें टपकती रहती हैं। साथ ही यहां एक शिवलिंग भी स्थापित है, जो निरंतर आकार में बढ़ रहा है। ऐसी मान्यता है कि जिस दिन यह शिवलिंग गुफा की छत से टकरा जाएगा, उस दिन दुनिया का अंत हो जाएगा। इसे भी पढ़ें:- शिव-शनि की पूजा से कटते हैं सारे ग्रहदोष कैसे पहुंचें पाताल भूवनेश्वर मंदिर? अगर आप पाताल भुवनेश्वर मंदिर (Patal Bhuvaneshwar Temple) के दर्शन करने की योजना बना रहे हैं तो जान लें कि वहां तक पहुंचने का रास्ता काफी कठिन है। गुफा में आसानी से प्रवेश करने के लिए दोनों ओर लोहे की चैन लगाई गई है। लेकिन श्रद्धालुओं का कहना है कि जिस तरह गुफा में प्रवेश करना चुनौतीपूर्ण है, उसी तरह बाहर निकलना भी उतना ही मुश्किल होता है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित यह मंदिर पर्वतीय क्षेत्र में है। नजदीकी रेलवे स्टेशन काठगोदाम है, जबकि हवाई मार्ग से सबसे नजदीकी हवाई अड्डा पिथौरागढ़ है। मंदिर तक पहुंचने के लिए पहाड़ी रास्तों से होकर जाना होता है, जो प्राकृतिक दृश्यों से भरे हुए हैं। Latest News in Hindi Today Hindi Patal Bhuvaneshwar Temple #patalbhuvaneshwar #kaliyugaend #mysterytemple #hindumythology #cosmicpower #hiddenindia #cavetemple #spiritualindia

आगे और पढ़ें
Ashok Sundari,

भगवान शिव की पुत्री अशोक सुंदरी: एक अनसुनी देवी की कथा

भारतीय पौराणिक कथाओं में भगवान शिव और माता पार्वती की कहानियां अत्यंत प्रसिद्ध हैं। परंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि उनके पुत्र कार्तिकेय और गणेश के अलावा उनकी एक पुत्री भी थीं — जिनका नाम था अशोक सुंदरी। देवी अशोक सुंदरी (Ashoka Sundari) की कथा ‘पद्म पुराण’ में वर्णित है, जो न केवल रहस्यमय है बल्कि यह स्त्री शक्ति और मातृत्व के अद्भुत पहलुओं को भी दर्शाती है। जन्म की कथा हिंदू कथाओं के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती कैलाश पर्वत से बाहर घूमते हुए एक इच्छापूर्ति वृक्ष कल्पवृक्ष के पास पहुंचे। चूंकि शिव अक्सर राक्षसों से युद्ध के लिए बाहर रहते थे, पार्वती को अकेलापन महसूस होता था। ऐसे में उन्होंने कल्पवृक्ष से एक बेटी की कामना की, और उसी से अशोक सुंदरी (Ashoka Sundari) का जन्म हुआ। ‘अशोक’ का अर्थ होता है ‘शोक रहित’, क्योंकि उसने पार्वती के दुख को दूर किया, और ‘सुंदरी’ का अर्थ होता है सुंदर, जो उसकी सुंदरता के अनुरूप था।  अशोक सुंदरी को मिला वरदान देवी अशोक सुंदरी (Ashoka Sundari) ने न केवल माता पार्वती के दुख को दूर किया, बल्कि आगे चलकर उन्होंने अद्भुत महत्ता और प्रतिष्ठा भी प्राप्त की। जब वह बड़ी हुईं, तो उन्हें वरदान मिला कि वह भविष्य में नहुष नामक महान राजा से विवाह करेंगी। नहुष कोई साधारण पुरुष नहीं, बल्कि वह वही राजा थे जो बाद में इंद्र के पद पर आसीन हुए थे। हुंड दैत्य का आगमन और अशोक सुंदरी का अटल संकल्प एक बार दानवराज विप्रचिति का पुत्र हुंड, जो अत्यंत क्रूर और स्वेच्छाचारी था, उस वन में आया जहाँ अशोक सुंदरी भ्रमण कर रही थीं। उसे देखते ही वह मोहित हो गया और विवाह का प्रस्ताव रख दिया। अशोक सुंदरी (Ashoka Sundari) ने गर्व से उत्तर दिया कि वह भगवान शिव और माता पार्वती की पुत्री हैं, और उनका विवाह भविष्य में धर्मात्मा नहुष से तय है, जो सोमवंश में जन्म लेकर महान पराक्रमी और भगवान विष्णु के समान होंगे। हुंड ने उनकी बात को ठुकराते हुए कहा कि नहुष तो अभी बालक है और उम्र में छोटे हैं, ऐसे में अशोक सुंदरी की जवानी व्यर्थ जाएगी। उसने उनसे प्रेम और साथ रहने का आग्रह किया। लेकिन शिवपुत्री अशोक सुंदरी अपने निश्चय में अडिग रहीं। उन्होंने हुंड को चेताया कि वह पतिव्रता हैं और उसका मन विचलित नहीं किया जा सकता। यदि वह नहीं गया, तो वे उसे भस्म कर देंगी। इसे भी पढ़ें:- अहमदाबाद से लंदन जा रही एयर इंडिया की फ्लाइट हुई क्रैश, पूर्व मुख्यमंत्री समेत 242 यात्री थे सवार नहुष से विवाह दानव हुंड ने माया रचते हुए कन्या का रूप धारण किया और अशोक सुंदरी को बहला-फुसलाकर अपने महल में ले गया। जब अशोक सुंदरी को यह सच्चाई ज्ञात हुई कि वह कन्या नहीं बल्कि वही दुष्ट हुंड है, तो वह क्रोधित हो उठीं और उसे डांटते हुए स्पष्ट कहा कि वह उसे कभी भी प्राप्त नहीं कर सकता। अशोक सुंदरी ने हुंड को श्राप देते हुए कहा कि वह ही उसके विनाश का कारण बनेगी और उसके वंश का अंत होगा। वह गंगा तट पर बैठकर प्रतिज्ञा करती है कि जब तक हुंड को नहुष युद्ध में पराजित कर नहीं मार देता, वह विवाह नहीं करेगी। नहुष का जन्म और शिक्षा हुंड ने नहुष के जन्म को रोकने के कई प्रयास किए, लेकिन ऋषि दत्तात्रेय की कृपा से वह असफल रहा। नहुष का जन्म हुआ और वशिष्ठ मुनि के आश्रम में वह वेद, अस्त्र-शस्त्र और नीति की शिक्षा लेकर महान योद्धा बना। वशिष्ठ ने नहुष को बताया कि अशोक सुंदरी उसकी पत्नी है, जो उसके लिए तपस्या कर रही है और उसे हुंड के चंगुल से मुक्त करना उसका धर्म है। बाद में अशोक सुंदरी और राजा नहुष का विवाह संपन्न हुआ। नहुष को अत्यंत धर्मपरायण, तेजस्वी और वीर राजा माना गया।  Latest News in Hindi Today Hindi Ashoka Sundari #AshokSundari #LordShiva #HinduMythology #Parvati #DivineDaughter #UntoldStories #IndianGods

आगे और पढ़ें
Lord Vishnu Sheshnag

शांत मुद्रा में शेषनाग पर क्यों विराजते हैं भगवान विष्णु? जानिए क्षीर सागर से जुड़े गहरे रहस्य

हिंदू धर्म में भगवान विष्णु (Lord Vishnu) को संहार नहीं, बल्कि सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में पूजा जाता है। उन्हें ‘श्री हरि’ कहा जाता है, जो संसार की रक्षा करते हैं, अधर्म का विनाश करते हैं और धर्म की स्थापना करते हैं। लेकिन एक बात जो हमेशा लोगों को आकर्षित करती है, वह है भगवान विष्णु की क्षीर सागर में शेषनाग पर विश्राम मुद्रा में स्थिति। आखिर भगवान विष्णु सदैव एक शांत मुद्रा में शेषनाग की शैय्या पर क्यों विराजमान रहते हैं? और उन्हें श्री हरि (Shree Hari) क्यों कहा जाता है? इन सवालों के उत्तर हमें पौराणिक कथाओं और शास्त्रों में मिलते हैं।  क्षीर सागर और शेषनाग का प्रतीकात्मक अर्थ आपने कई बार भगवान विष्णु (Shree Hari) को चित्रों या मूर्तियों में शेषनाग की शैय्या पर अत्यंत शांत और सहज मुद्रा में विश्राम करते हुए देखा होगा। यह दृश्य मन में यह प्रश्न जरूर उत्पन्न करता है कि आखिर भगवान विष्णु ने विश्राम के लिए शेषनाग जैसे भयंकर नाग को ही क्यों चुना? इसके पीछे एक गहन प्रतीकात्मक अर्थ छिपा है। दरअसल, भगवान विष्णु सृष्टि के पालनकर्ता हैं और शेषनाग को ‘काल’ यानी समय का प्रतीक माना जाता है। विष्णु जी का शेषनाग पर विश्राम करना इस बात का संकेत है कि उन्होंने काल यानी समय पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया है। यह दृश्य सृष्टि के सभी प्राणियों को यह संदेश देता है कि यदि व्यक्ति संतुलन, धैर्य और आत्मबल के साथ जीवन को जिए, तो वह समय और परिस्थितियों पर विजय प्राप्त कर सकता है। नारायण क्यों करते हैं शेषनाग पर विश्राम? जानिए इसका आध्यात्मिक अर्थ भगवान विष्णु (Lord Vishnu) को अक्सर शेषनाग की शैय्या पर क्षीर सागर में विश्राम करते हुए दर्शाया जाता है। उनका यह शांत रूप गहरी आध्यात्मिक सीख देता है। यह चित्र हमें कठिन समय में धैर्य, संतुलन और आत्म-नियंत्रण बनाए रखने की प्रेरणा देता है। क्षीर सागर को सुख और शांति का प्रतीक माना गया है, जबकि शेषनाग ‘काल’ का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में विष्णु का यह रूप यह संदेश देता है कि चाहे जीवन में कितनी भी समस्याएं, पीड़ा या भय हो, एक व्यक्ति को समय और परिस्थितियों से ऊपर उठकर संतुलित और शांत रहना चाहिए। इसे भी पढ़ें: सत्तू शरबत: शरीर को मजबूत और स्वस्थ बनाने में फायदेमंद है यह देसी टॉनिक  इंसान को धैर्य और आत्मबल के साथ हर मुश्किल का करना चाहिए सामना  जिस प्रकार भगवान विष्णु पर सृष्टि के पालन की जिम्मेदारी है, उसी प्रकार हर मनुष्य भी अपने कर्तव्यों और दायित्वों से जुड़ा होता है। जीवन में उतार-चढ़ाव, समस्याएं और संघर्ष आना स्वाभाविक है, लेकिन इनसे टूटना नहीं चाहिए। भगवान विष्णु की तरह, जो विषम परिस्थितियों में भी शेषनाग की विषैली शैय्या पर स्थिर और शांत रहते हैं, उसी प्रकार एक इंसान को भी धैर्य और आत्मबल के साथ हर मुश्किल का सामना करना चाहिए। श्री हरि (Shree Hari) का यह रूप हमें यह सिखाता है कि विषम स्थितियों में घबराने या विचलित होने की बजाय, शांत चित्त और सकारात्मक दृष्टिकोण से परिस्थितियों का सामना करना ही सच्चा धर्म है। उनका यह दिव्य स्वरूप हर व्यक्ति के लिए एक प्रेरणा है कि जीवन की जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी मन को स्थिर और शांत रखा जा सकता है। भगवान विष्णु को ‘श्री हरि’ क्यों कहा जाता है? ‘हरि’ (Shree Hari) शब्द का अर्थ होता है हर लेने वाला – विशेषतः दुख, भय और अज्ञान को हरने वाला। भगवान विष्णु को ‘श्री हरि’ कहने के पीछे यह मान्यता है कि वे अपने भक्तों के पापों को हर लेते हैं और उन्हें मोक्ष की ओर ले जाते हैं। साथ ही ‘श्री’ शब्द माता लक्ष्मी का सूचक है, जो भगवान विष्णु की पत्नी हैं। अतः ‘श्री हरि’ नाम यह दर्शाता है कि वे लक्ष्मीपति हैं और संसार की सुख-समृद्धि के दाता भी। Latest News in Hindi Today Hindi news Shree Hari #LordVishnu #Sheshnag #KshiraSagar #HinduMythology #SpiritualSecrets #DivinePose

आगे और पढ़ें
Lord Kuber

कैसे बने भगवान कुबेर धन के देवता? जानिए शिव से मिले अद्भुत वरदान की कथा

भगवान कुबेर न केवल देवताओं के कोषाध्यक्ष हैं बल्कि वे समृद्धि, वैभव और धन के प्रतीक भी माने जाते हैं। जानिए कैसे घोर तपस्या के बाद शिवजी से उन्हें यह दिव्य पद और सम्मान प्राप्त हुआ। हिंदू धर्म में धन, वैभव और समृद्धि के प्रतीक माने जाने वाले भगवान कुबेर न केवल देवताओं के कोषाध्यक्ष हैं, बल्कि स्वर्ग के खजाने के रक्षक भी हैं। उन्हें लोकसभा और वैश्विक स्तर पर भी “गॉड ऑफ वेल्थ” (धन के देवता) के रूप में पूजा जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि वे कैसे धन के देवता बने और उन्हें यह पद कैसे प्राप्त हुआ? इस लेख में हम जानेंगे भगवान कुबेर की पौराणिक कथा, उनका जन्म, शिव से प्राप्त वरदान और धार्मिक महत्ता। कुबेर का जन्म और वंश भगवान कुबेर (Lord Kuber) का उल्लेख स्कंद पुराण में मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उनका जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। हालांकि उनमें एक दोष था, उन्हें चोरी करने की आदत थी, और उस वजह से उनके पिता को इस बात का पता चला, तो उन्होंने कुबेर को घर से निकाल दिया। कुबेर भटकते हुए एक शिव मंदिर पहुंचे, जहां उन्होंने एक पुजारी को सोते देखा और प्रसाद चुराने का निश्चय किया। चोरी करते समय पुजारी को न जगाने और दीपक को बुझने से बचाने के लिए उन्होंने दीपक के सामने अपना अंगोछा फैला दिया। फिर भी वह पकड़े गए, हाथापाई हुई और उनकी मृत्यु हो गई। मृत्यु के पश्चात यमदूत उन्हें ले जा रहे थे, लेकिन मार्ग में भगवान शिव के गण भी पहुंच गए। उन्होंने कुबेर को शिवजी के समक्ष प्रस्तुत किया। भगवान शिव को यह प्रतीत हुआ कि कुबेर ने चोरी करते हुए भी दीपक की लौ को बचाने का प्रयास किया था, जिससे उनकी भक्ति झलकती थी। महादेव इस भाव से प्रसन्न हुए और उन्होंने कुबेर को ‘धन के देवता’ का पद प्रदान किया। तभी से भगवान कुबेर को समृद्धि और धन के अधिपति के रूप में पूजा जाता है। रामायण में उल्लिखित रामायण में वर्णित एक कथा के अनुसार, भगवान कुबेर (Lord Kuber) ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए हिमालय में कठोर तपस्या की थी। इस तप के दौरान शिवजी के साथ माता पार्वती भी प्रकट हुईं। जब कुबेर ने पार्वती जी को अपनी बाईं आंख से देखा, तो उनके दिव्य तेज के प्रभाव से उनकी वह आंख जलकर पीली हो गई। इसके बाद कुबेर ने एक अन्य स्थान पर जाकर पुनः तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा कि तुम्हारी तपस्या ने मुझे अत्यंत प्रसन्न किया है। इसलिए अब से तुम एकाक्षी पिंगल के नाम से प्रसिद्ध होगे, जिसका अर्थ है, एक आंख वाला और पीले नेत्रों वाला। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय धार्मिक महत्ता और पूजा हिंदू धर्म में भगवान कुबेर (Lord Kuber) की पूजा विशेष रूप से धनतेरस, दीपावली, अक्षय तृतीया, और नववर्ष जैसे अवसरों पर की जाती है। विशेष रूप से व्यापारी वर्ग और धन-संपत्ति की इच्छा रखने वाले लोग कुबेर की आराधना करते हैं। वास्तु शास्त्र के अनुसार, धन के देवता कुबेर की प्रतिमा को घर की उत्तर दिशा में स्थापित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसा करने से न केवल भगवान कुबेर की कृपा प्राप्त होती है, बल्कि मां लक्ष्मी का आशीर्वाद भी घर में बना रहता है और समृद्धि में वृद्धि होती है। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Kuber #lordkuber #godofwealth #shivablessing #hindumythology #wealthgod #kuberstory #divineboon #spiritualstory

आगे और पढ़ें
Lord Shiva Third Eye

भगवान शिव की तीसरी आंख: चेतना, संहार और सृजन का रहस्य

हिंदू धर्म में भगवान शिव को संहारक के रूप में जाना जाता है, लेकिन उनका संहार केवल विनाश नहीं बल्कि सृजन का भी मार्ग है। शिव की सबसे रहस्यमयी और शक्तिशाली पहचान उनके तीसरे नेत्र से जुड़ी है, जिसे “त्रिनेत्रधारी” स्वरूप कहा जाता है। यह तीसरी आंख न केवल उनकी दिव्य चेतना का प्रतीक है, बल्कि ज्ञान, विवेक, और समय आने पर सर्वनाश की शक्ति का भी प्रतिनिधित्व करती है। तीसरी आंख का रहस्य क्या है? धार्मिक कथाओं के अनुसार, एक बार भगवान शिव हिमालय पर्वत पर देवताओं की एक सभा में व्यस्त थे। उसी समय मां पार्वती अचानक वहां पहुंचीं और प्रेमवश उन्होंने भगवान शिव की दोनों आंखों को अपने हाथों से ढक लिया। जैसे ही शिव की आंखें ढकीं, संपूर्ण सृष्टि अंधकार में डूब गई। चारों ओर हाहाकार मच गया। पशु-पक्षी भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगे। यह दृश्य भगवान शिव (Lord Shiva) से देखा नहीं गया। तभी उनके ललाट से एक तेजस्वी ज्योति फूटी, जो आगे चलकर उनका तीसरा नेत्र बना। इस नेत्र के प्रकट होते ही पूरे ब्रह्मांड में पुनः प्रकाश फैल गया। जब पार्वती जी ने शिव से इस तीसरे नेत्र के बारे में पूछा, तो उन्होंने बताया कि यह नेत्र संसार की रक्षा के लिए है। यदि यह नेत्र न प्रकट होता, तो संपूर्ण सृष्टि का विनाश निश्चित था। यह तीसरा नेत्र (Third Eye) न केवल चेतना और जागरूकता का प्रतीक है, बल्कि सृष्टि के संतुलन और संचालन का भी आधार है। तीनों कालों की दृष्टा है शिव की तीसरी आंख भगवान शिव (Lord Shiva) की तीसरी आंख (Third Eye) को अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है। मान्यता है कि इस दिव्य नेत्र के माध्यम से वे भूतकाल, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालों को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। यही कारण है कि शिव की तीसरी आंख को उनकी सामान्य दोनों आंखों से अधिक प्रभावशाली और विशिष्ट माना गया है। कहा जाता है कि यह नेत्र वह सब देख सकता है, जो सामान्य दृष्टि की पकड़ से बाहर होता है।  इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय कब खोलते हैं, भगवान शिव अपनी तीसरी आंख भगवान शिव (Lord Shiva) अपनी तीसरी आंख (Third Eye)  तब खोलते हैं जब उन्हें भौतिक जगत की परतों को हटाकर केवल शुद्ध सत्य को देखना होता है। यह नेत्र माया, भ्रम और संसार की बाहरी परतों को भस्म कर देता है, इसलिए इसे विनाश का प्रतीक माना जाता है। लेकिन असल में यह विनाश सत्य की स्थापना के लिए होता है। शिव की तीसरी आंख उस चेतना का प्रतिनिधित्व करती है जो भौतिक सीमाओं से परे जाकर वास्तविकता को समझती है। माना जाता है कि यह आंख कर्म और स्मृतियों के प्रभाव से काम करती है। जहां सामान्य आंखें समय के साथ भ्रमित हो सकती हैं, वहीं तीसरी आंख हमारे अस्तित्व की गहरी और स्पष्ट तस्वीर प्रस्तुत करती है। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Shiva #lordshiva #thirdeye #hindumythology #shivapower #spiritualawakening #divinecreation #shivasecrets 

आगे और पढ़ें
Radha and Rukmini

राधा और रुक्मिणी: प्रेम और धर्म के दो दिव्य रूप

हिंदू धर्म में भगवान श्रीकृष्ण (Lord Krishna) की दो प्रमुख स्त्रियाँ सर्वाधिक श्रद्धा और प्रेम की प्रतीक मानी जाती हैं—एक हैं श्री राधारानी और दूसरी श्री रुक्मिणी देवी। जहां राधा आत्मिक प्रेम और भक्ति की प्रतीक हैं, वहीं रुक्मिणी वैवाहिक निष्ठा और कर्तव्यपरायणता की मिसाल हैं। श्रीकृष्ण से जुड़ी इन दोनों महान स्त्रियों का जीवन हमें प्रेम और धर्म के दो अलग-अलग लेकिन पूज्य मार्गों की ओर प्रेरित करता है। श्रीकृष्ण की लीलाओं में राधा और रुक्मिणी दोनों का विशेष स्थान है, लेकिन इन दोनों देवी स्वरूपों में कई स्पष्ट अंतर भी दिखाई देते हैं। दोनों के प्रेम, समर्पण और संबंध की प्रकृति अलग-अलग है। आइए जानते हैं उनके प्रमुख अंतर: 1. शहर और गाँव की संस्कृति का प्रतिनिधित्व रुक्मिणी देवी (Rukmini Devi) का जन्म एक राजघराने में हुआ था। वे विदर्भ देश की राजकुमारी थीं, जिन्होंने एक समृद्ध और शास्त्रीय परंपरा में जीवन व्यतीत किया। दूसरी ओर, श्री राधा (Radha) एक साधारण ग्रामीण परिवेश की गोपी थीं, जो ब्रज की धरती पर पली-बढ़ीं। इस प्रकार, रुक्मिणी एक शहरी राजकन्या थीं, जबकि राधा ग्रामीण संस्कृति की जीवंत प्रतीक थीं। 2. राधा को ‘रानी’, रुक्मिणी को ‘माता’ के रूप में सम्मान श्रद्धा और भक्ति की परंपरा में राधा जी को ‘रानी’ के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है — रासलीला की अधिष्ठात्री और कृष्ण (Lord Krishna) के दिव्य प्रेम की प्रतीक। वहीं, रुक्मिणी को भक्तगण ‘माता’ के रूप में पूजते हैं — एक आदर्श पत्नी और गृहस्थ जीवन की मर्यादा निभाने वाली देवी। 3. प्रेमिका और पत्नी के रूप में भिन्न भाव श्री राधा का श्रीकृष्ण से संबंध प्रेमिका के रूप में है — निश्छल, निष्काम और समर्पण से भरा हुआ रूहानी प्रेम। वहीं रुक्मिणी देवी श्रीकृष्ण की अर्धांगिनी हैं — पत्नी और सेविका दोनों रूपों में उन्होंने अपने धर्म का पालन किया। जहाँ राधा का प्रेम माधुर्य भाव में लीन है, वहीं रुक्मिणी का समर्पण दाम्पत्य और सेवा की भावना से ओतप्रोत है। 4. विवाह की पौराणिक व्याख्याएं भिन्न श्री रुक्मिणी (Shri Rukmini) का विवाह श्रीकृष्ण से तब हुआ जब उन्होंने उनका हरण कर लिया था, जैसा कि भागवत पुराण में वर्णन मिलता है। वहीं ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, राधा और श्रीकृष्ण (Lord Krishna) का विवाह स्वयं ब्रह्माजी ने संपन्न कराया था — यह विवाह लौकिक नहीं, बल्कि दिव्य भावनात्मक स्तर पर हुआ था। 5. जीवन के अलग-अलग चरणों की साक्षी राधा श्रीकृष्ण के बाल्यकाल की साक्षी थीं। वे कृष्ण की बाल लीलाओं की सहभागी रहीं। दूसरी ओर, रुक्मिणी उनके युवावस्था और गृहस्थ जीवन की साक्षी हैं — वे श्रीकृष्ण के राजकीय जीवन में शामिल रहीं। 6. वियोग में समर्पण की गहराई राधा (Radha) ने श्रीकृष्ण के रहते-रहते अपने प्राण त्याग दिए थे, उनके प्रेम में पूर्ण समर्पण का उदाहरण बनते हुए। वहीं रुक्मिणी ने कृष्ण के पृथ्वी से विदा लेने के बाद अपने जीवन का त्याग किया — उन्होंने पत्नी धर्म का आदर्श निभाया। 7. भावाभिव्यक्ति में भिन्नता राधा प्रेम में डूबी गोपी थीं, जो कृष्ण के लिए नृत्य करतीं, गीत गातीं और रास रचाती थीं। रुक्मिणी देवी अधिक गंभीर, संयमित और शांत स्वभाव की थीं। वे राजमहल की मर्यादा में रहकर भक्ति करती थीं। 8. दर्शन की दृष्टि से कृष्ण तत्व-दर्शन में राधा को आत्मा और रुक्मिणी (Rukmini) को शरीर के रूप में प्रतीकात्मक माना गया है। राधा का प्रेम आत्मिक स्तर पर था, जबकि रुक्मिणी का संबंध व्यवहारिक और लौकिक रूप से जुड़ा था। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय 9. राधा — आदिशक्ति, रुक्मिणी — लक्ष्मी अवतार धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, राधा को आदिशक्ति का स्वरूप माना गया है — प्रेम, शक्ति और चेतना की प्रतीक। वहीं रुक्मिणी को श्री लक्ष्मी का अवतार कहा गया है, जो ऐश्वर्य, सौंदर्य और समृद्धि की देवी हैं। 10. अस्तित्व में विलय का अंतर कहा जाता है कि श्रीकृष्ण राधा में समाए हुए हैं, उनका स्वरूप राधा के बिना अधूरा है। वहीं रुक्मिणी अपने समर्पण से स्वयं श्रीकृष्ण में समाहित हो गई हैं — जैसे जल में गिरी बूंद सागर का ही अंश बन जाती है। 11. महाभारत में भी उल्लेखित अंतर महाभारत के अनुशासन पर्व में युधिष्ठिर द्वारा पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में भीष्म पितामह ने बताया कि देवी लक्ष्मी ने स्वयं रुक्मिणी से कहा था — “मेरा वास तुममें है, जबकि राधा का निवास गोकुल के गोलोक धाम में है।” इससे स्पष्ट होता है कि रुक्मिणी लौकिक ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री हैं और राधा आध्यात्मिक प्रेम की। Latest News in Hindi Today Hindi news Rukmini #radha #rukmini #krishna #hindumythology #divinelove #spirituallove #dharmicpath #radhaandrukmini

आगे और पढ़ें
Shani Dev under feet

रावण ने शनिदेव को क्यों रखा था अपने चरणों तले?

भारतीय पौराणिक कथाओं में रावण एक ऐसा पात्र है जिसे उसके बल, बुद्धि और अहंकार के लिए जाना जाता है। लंका का राजा रावण केवल एक शक्तिशाली योद्धा ही नहीं, बल्कि महान ज्योतिषाचार्य, तांत्रिक और शिवभक्त भी था। रामायण के अनुसार, रावण ने अपने पुत्र मेघनाद के जन्म के समय ग्रहों की स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की थी। लेकिन इसी प्रसंग में शनिदेव (ShaniDev) से उसका टकराव हो गया। यह कथा आज भी धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। ग्रहों को किया था नियंत्रित कहते हैं कि जब रावण के पुत्र मेघनाद का जन्म होने वाला था, तब रावण (Ravana) चाहता था कि वह अमर और अजेय योद्धा बने। इसके लिए रावण ने नवग्रहों को एक-एक कर बंदी बना लिया और उन्हें अपने दरबार में एक विशेष स्थान पर उल्टी दिशा में बैठा दिया। उसका उद्देश्य यह था कि ग्रहों की चाल उसके अनुसार चले और किसी भी तरह से मेघनाद के जीवन में कोई बाधा न आए। रावण ने शनि, बृहस्पति, मंगल, बुध, शुक्र, राहु, केतु, सूर्य और चंद्रमा – सभी ग्रहों को नियंत्रण में ले लिया। उसने प्रत्येक ग्रह को आदेश दिया कि वे अपनी-अपनी ऊंची स्थिति में रहें, ताकि मेघनाद की कुंडली श्रेष्ठतम बन सके। शनिदेव से हुआ विरोध रावण (Ravana) ज्योतिष शास्त्र का गहरा जानकार था और चाहता था कि उसका पुत्र अत्यंत शक्तिशाली और दीर्घायु हो। इसी उद्देश्य से जब उसकी पत्नी मंदोदरी गर्भवती थी, तो रावण ने सभी ग्रहों को आदेश दिया कि वे मेघनाद के जन्म के समय उच्च और शुभ स्थिति में रहें ताकि उसके पुत्र को उत्तम ग्रहों का आशीर्वाद मिल सके। रावण (Ravana) के भय से सभी ग्रह उसकी आज्ञा का पालन करने लगे, लेकिन शनिदेव को यह अन्यायपूर्ण लगा। चूंकि शनि आयु और कर्मों का न्याय करते हैं, वे स्वेच्छा से रावण के आदेश का पालन नहीं करना चाहते थे। यह भांपते हुए रावण ने बलपूर्वक शनिदेव को उस स्थिति में स्थापित कर दिया जो मेघनाद के दीर्घायु होने के लिए आवश्यक थी। हालांकि शनिदेव (ShaniDev) ने ऊपर से रावण की बात मान ली, लेकिन जैसे ही मेघनाद के जन्म का समय आया, उन्होंने अपनी दृष्टि वक्री कर ली, जिससे मेघनाद अल्पायु हो गया। जब रावण को इस बात का पता चला, तो वह अत्यंत क्रोधित हुआ और गुस्से में आकर अपनी तलवार से शनि के पैर पर वार कर दिया, जिससे उनका एक पैर कट गया। कहा जाता है कि तभी से शनि देव लंगड़ाकर चलते हैं और उनकी गति धीमी मानी जाती है। यही कारण है कि शनि को धीमी चाल वाला ग्रह कहा जाता है और उनका प्रभाव लंबे समय तक रहता है। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां हनुमान जी ने किया शनिदेव को मुक्त हनुमान जी (Hanuman Ji) ने जब शनि देव को रावण की कैद से मुक्त कराया था, तब शनि महाराज (ShaniDev) ने उनसे प्रसन्न होकर वचन दिया कि जो भी व्यक्ति श्रद्धा से हनुमान जी की पूजा करेगा, मैं उसे अपने प्रकोप से नहीं सताऊंगा। इसी कारण माना जाता है कि शनि दोष, साढ़े साती या ढैय्या से बचाव के लिए हनुमान जी (Hanuman ji) की उपासना सबसे प्रभावी उपाय है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news ShaniDev #Ravana #ShaniDev #HinduMythology #Ramayan #ShaniDosha #MythologicalFacts

आगे और पढ़ें
Yamuna Kalindi meaning

क्यों देवी यमुना कहलाती हैं ‘कालिंदी’? जानिए भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी इस दिव्य कथा

हिंदू धर्म में नदियों को केवल जल की धारा नहीं माना गया, बल्कि उन्हें देवी के रूप में पूजा जाता है। उन्हीं में से एक हैं देवी यमुना (Devi Yamuna), जिन्हें विशेष रूप से यमराज की बहन और भगवान श्रीकृष्ण की परम भक्त के रूप में जाना जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि देवी यमुना को ‘कालिंदी’ क्यों कहा जाता है? यह नाम सिर्फ एक उपनाम नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी है एक अत्यंत रोचक और आध्यात्मिक कथा, जो भगवान श्रीकृष्ण से गहरा संबंध रखती है। ‘कालिंदी’ नाम का अर्थ और प्रतीक ‘कालिंदी’ नाम की उत्पत्ति ‘कलिंद’ पर्वत से मानी जाती है, क्योंकि यमुना नदी का उद्गम स्थल यही पर्वत है। अर्थात जो कलिंद पर्वत से निकलती है, उसे कालिंदी (Kalindi) कहा जाता है। हालांकि इस नाम के पीछे और भी कई पौराणिक मान्यताएं और कथाएं जुड़ी हुई हैं, जो देवी यमुना के महत्व को और भी गहराई से समझाती हैं। भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी कथा हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी यमुना को भगवान सूर्य की बेटी तथा यमराज की बहन के रूप में जाना जाता है। वे भगवान विष्णु की अनन्य भक्त थीं और उन्होंने कई जन्मों तक उन्हें अपने पति के रूप में पाने की तपस्या की। उनकी तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वे द्वापर युग में जब कृष्ण के रूप में अवतरित होंगे, तब वे उन्हें प्राप्त करेंगी। ऐसा कहा जाता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तब उनके पिता वासुदेव उन्हें मथुरा से गोकुल ले जा रहे थे और रास्ते में यमुना नदी पार करनी थी। उस समय यमुना ने अपने जल को शांत कर श्रीकृष्ण के चरणों का स्पर्श किया और उनका स्वागत किया। यही कारण है कि यमुना नदी को विशेष रूप से श्रीकृष्ण (Lord Krishna) की प्रिय मानी जाती है। ब्रजभूमि में बाल कृष्ण की अनेक लीलाएं यमुना के तट पर ही घटित हुईं। एक अन्य लोककथा के अनुसार, जब भगवान कृष्ण (Lord Krishna) अर्जुन के साथ यमुना तट पर आए, तो उन्होंने वहां एक तपस्या में लीन सुंदर कन्या को देखा। वह कन्या और कोई नहीं बल्कि देवी यमुना ही थीं, जो श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने की कामना से तप कर रही थीं। उनकी अटल भक्ति और प्रेम को देखकर श्रीकृष्ण ने उनसे विवाह किया। इसी कारण यमुना को ‘कालिंदी’ (Devi Yamuna) भी कहा जाता है — ‘काली कमली वाले’ श्रीकृष्ण से जुड़े होने के कारण। ‘कालिंदी’ नाम यमुना का एक विशेष नाम है, जो उनके कृष्ण से दिव्य संबंध को दर्शाता है। यह नाम न सिर्फ उनके रंग या प्रवाह की गहराई को दर्शाता है, बल्कि उस पवित्र प्रेम को भी दर्शाता है जो उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के प्रति रखा। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया तीर्थों और मंदिरों में विशेष पूजन भारत में अनेक ऐसे तीर्थस्थल हैं, जहां देवी यमुना (Devi Yamuna) को कालिंदी (Kalindi) रूप में पूजा जाता है। ब्रज भूमि, विशेषकर वृंदावन और मथुरा में यमुना आरती का विशेष महत्व है। माना जाता है कि श्रीकृष्ण ने अपनी बाल लीलाओं में यमुना नदी को साक्षी बनाया। कदंब वन, यमुना घाट और कालिंदी कुंज जैसे स्थानों पर आज भी भक्तजन श्रद्धा से पूजन करते हैं। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Devi Yamuna #Kalindi #YamunaRiver #LordKrishna #HinduMythology #DivineStory #KrishnaMarriage #KalindiMyth #KrishnaLeela #KalindiYamuna #SpiritualIndia

आगे और पढ़ें
Hanuman Ji

जब हनुमान जी ने सूर्य को समझा फल, निगल गए पूरे ब्रह्मांड का उजाला

हनुमान जी (Hanuman Ji) को बल, बुद्धि और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। वे बालपन से ही असाधारण शक्तियों से संपन्न थे और यही कारण है कि उनकी बाल लीलाएं भी उतनी ही अद्भुत और चमत्कारी हैं, जितनी उनकी युवावस्था की वीरता। ऐसी ही एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा है, जब बालक हनुमान ने सूर्य देव (Lord Sun) को लाल फल समझकर निगल लिया था। इस घटना से न केवल धरती बल्कि पूरे ब्रह्मांड में अंधकार छा गया और देवताओं में हाहाकार मच गया था। बाल हनुमान की भूख और सूर्य को फल समझने की कथा पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा केसरी और माता अंजनी के घर एक विलक्षण बालक का जन्म हुआ, जिसे मारुति नाम दिया गया। यह बालक साधारण नहीं था, उसमें देवताओं द्वारा प्रदान की गई दिव्य शक्तियां विद्यमान थीं। बचपन से ही मारुति बेहद चंचल, बलवान और बुद्धिमान थे। एक दिन उन्होंने आकाश में चमकते हुए सूर्य को देखा, जो उन्हें एक लाल और दमकते हुए पके आम की तरह प्रतीत हुआ। उसे देखकर उनके भीतर उसे खाने की इच्छा जाग उठी। वे तुरंत आकाश की ओर उड़ चले और इतनी तेजी से बढ़े कि देवता भी अचंभित रह गए। हनुमान जी (Hanuman Ji) ने सूर्य को पकड़ने की कोशिश की और अंत में उसे निगल लिया। जैसे ही उन्होंने सूर्य को निगला, समस्त पृथ्वी पर अंधकार छा गया और दिन में ही रात जैसा माहौल बन गया। इससे सभी जीव-जंतु भयभीत हो उठे। देवताओं की चिंता और इंद्र का हस्तक्षेप इसके बाद सभी देवता चिंतित होकर ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। ब्रह्मा जी ने इंद्र देव को निर्देश दिया कि वे उस बालक को रोकें। इंद्र देव ने अपने वज्र से मारुति यानी हनुमान जी पर प्रहार किया, जिससे वे सीधे धरती पर गिर पड़े। यह देखकर ब्रह्मा जी ने हनुमान जी (Hanuman Ji) को उठाया और कहा, “यह बालक असाधारण है, इसे कोई भी क्षति नहीं पहुंचा सकता।” इसके बाद ब्रह्मा जी ने उन्हें अमरता और विजय का वरदान दिया। अन्य देवताओं ने भी हनुमान जी को अनेक शक्तियां प्रदान कीं—जैसे अग्नि से रक्षा, जल में न डूबने की क्षमता, हवा में उड़ने की कला और अनेकों दिव्य वरदान। परंतु, बाल्यावस्था में हनुमान जी जब अपनी शक्तियों का अनुचित प्रयोग करने लगे और ऋषियों की तपस्या में विघ्न डालने लगे, तो ऋषियों ने उन्हें श्राप दिया कि वे अपनी शक्तियों को भूल जाएंगे और तब तक नहीं याद कर पाएंगे, जब तक कोई उन्हें स्मरण न कराए। इसी कारण जब आगे चलकर हनुमान जी (Hanuman Ji) की भेंट श्रीराम से हुई, तभी उन्हें अपनी सभी दिव्य शक्तियों का पुनः स्मरण हुआ और वे भगवान राम के अनन्य भक्त व शक्तिशाली बजरंगबली के रूप में प्रतिष्ठित हुए इसे भी पढ़ें:-  क्यों चढ़ाया जाता है हनुमान जी को सिंदूर? जानिए त्रेता युग से जुड़ी यह अद्भुत कथा देवताओं का समाधान और हनुमान को वरदान समस्त देवताओं ने वायुदेव को शांत करने और हनुमान जी (Hanuman Ji) की क्षमा याचना हेतु मिलकर उन्हें अनेक वरदान दिए। ब्रह्मा जी, इंद्र देव, वरुण देव, यमराज आदि ने बालक हनुमान को अमरता, अजेयता, बल, बुद्धि, वेदों का ज्ञान और हर प्रकार के दैवीय वरदान दिए। इस प्रकार हनुमान जी त्रेतायुग के सबसे बलशाली और बुद्धिमान देवता बने। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Hanuman Ji #Hanuman #HanumanStory #HinduMythology #SuryaDev #IndianLegends #HanumanJayanti #MythologicalTales #LordHanuman #SpiritualIndia #DivineStories

आगे और पढ़ें
Mystery of the Split Shivling – Ancient Mythological Story

दो भागों में विभाजित शिवलिंग की बड़ी अद्भुत है पौराणिक कहानी

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित काठगढ़ महादेव मंदिर अपनी विशिष्टता के लिए प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि यहां स्थापित शिवलिंग दुनिया में सबसे प्राचीन शिवलिंगों में से एक है। इस मंदिर की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि यहां का शिवलिंग दो भागों में विभाजित है, जिसमें एक हिस्सा मां पार्वती का प्रतीक माना जाता है और दूसरा भगवान शिव (Lord Shiva) का। आइए, जानते हैं इस मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा। युद्ध की शुरुआत की पौराणिक कथा शिव पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, एक बार भगवान ब्रह्मा (Lord Brahma) और भगवान विष्णु (Lord Vishnu) के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हो गया। दोनों स्वयं को सर्वोच्च मानते हुए एक-दूसरे का अपमान करने लगे। जब यह विवाद बढ़ने लगा और युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई, तब दोनों ने अपने दिव्यास्त्र निकाल लिए। यदि ये अस्त्र चलाए जाते, तो संपूर्ण सृष्टि प्रलय में समा जाती। इस संकट से जगत की रक्षा करने के लिए भगवान शिव (Lord Shiva) ने अपनी माया रची। अचानक दोनों देवताओं के बीच एक अग्निमय लिंग प्रकट हुआ, जिसकी ज्वालाएं आकाश तक फैल गईं। इस दृश्य को देखकर ब्रह्मा और विष्णु आश्चर्यचकित रह गए और उस लिंग के रहस्य को जानने का प्रयास करने लगे। भगवान ब्रह्मा (Lord Brahma) ने उस लिंग का ऊपरी सिरा खोजने के लिए आकाश की ओर उड़ान भरी, जबकि भगवान विष्णु (Lord Vishnu) ने उसका आधार खोजने के लिए धरती के नीचे जाना शुरू किया। लाखों वर्षों तक प्रयास करने के बाद भी दोनों देवता लिंग का आदि या अंत नहीं खोज पाए। थक-हारकर वे वापस उसी स्थान पर लौट आए, जहां उन्होंने इस दिव्य लिंग को देखा था। वहां उन्हें अचानक “ॐ” की पावन ध्वनि सुनाई देने लगी। इस दिव्य ध्वनि को सुनकर वे समझ गए कि यह कोई अलौकिक शक्ति है। तब दोनों ने इस शक्ति की आराधना करनी शुरू कर दी। भगवान शिव (Lord Shiva) उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर लिंग से प्रकट हुए और कहा कि वे दोनों ही समान रूप से पूज्यनीय हैं, इसलिए व्यर्थ में श्रेष्ठता का विवाद न करें। उन्होंने दोनों देवताओं को सद्बुद्धि का आशीर्वाद दिया और पुनः शिवलिंग के रूप में उसी स्थान पर स्थापित हो गए। इसी कारण शिवलिंग की पूजा का महत्व बढ़ गया। इसे भी पढ़ें:- 22 या 23 मार्च, कब है यह शुभ तिथि? जानें पूजा विधि और महत्व काठगढ़ महादेव शिवलिंग की अनोखी मान्यता कालांतर में यह दिव्य शिवलिंग काठगढ़ महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसकी अनोखी विशेषता यह है कि इसके दो भागों के बीच की दूरी समय के साथ घटती-बढ़ती रहती है। गर्मियों के दौरान यह दो अलग भागों में विभक्त हो जाता है, जबकि सर्दियों में पुनः जुड़कर एकाकार रूप धारण कर लेता है। ईशान संहिता के अनुसार, यह शिवलिंग फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात प्रकट हुआ था। चूंकि भगवान शिव का यह दिव्य लिंग शिवरात्रि के दिन प्रकट हुआ था, इसलिए यह मान्यता प्रचलित है कि इसकी संरचना चंद्रमा की कलाओं के अनुसार प्रभावित होती है। जैसे-जैसे चंद्रमा घटता-बढ़ता है, वैसे ही शिवलिंग के दो भाग भी एक-दूसरे के करीब आते और दूर जाते हैं। शिवरात्रि के पावन दिन यह दोनों भाग एकाकार हो जाते हैं, जिसे शुभ संकेत माना जाता है। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Shiva #ShivlingMystery #ShivlingHistory #MythologicalStory #LordShiva #AncientLegends #HinduMythology #DivineMiracle #ShivaTemple #SacredStories #SpiritualHeritage

आगे और पढ़ें
Translate »