Kalimath Temple

कालीमठ मंदिर: जहाँ रक्तबीज का वध करके अंतर्ध्यान हुईं थीं माँ काली, नवरात्रि में दर्शन से पूरी होती हैं मनोकामनाएँ

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित कालीमठ मंदिर (Kalimath Temple) एक प्राचीन और रहस्यमयी शक्तिपीठ है। नवरात्रि के पावन अवसर पर इस मंदिर में दर्शन करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं तथा जीवन से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। कालीमठ सिद्ध शक्तिपीठ को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं, जिनका उल्लेख स्कंद पुराण सहित अन्य ग्रंथों में भी मिलता है। मान्यता है कि जब धरती पर रक्तबीज और शुंभ-निशुंभ का अत्याचार बढ़ गया था, तब इंद्र सहित सभी देवताओं ने मां शक्ति की आराधना की। देवताओं की तपस्या से प्रसन्न होकर माता प्रकट हुईं। जब उन्होंने दैत्यों के उत्पात के बारे में सुना, तो उनका क्रोध इतना प्रबल हुआ कि उनका स्वरूप काला पड़ गया। इसके बाद माता ने रक्तबीज और शुंभ-निशुंभ का संहार करने के लिए कालीशिला में 12 वर्ष की कन्या के रूप में अवतार लिया। कालीशिला कालीमठ मंदिर से लगभग 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। मान्यता है कि इस पवित्र शिला पर माता के चरणों के निशान आज भी विद्यमान हैं, जिनकी श्रद्धालु भक्त आस्था के साथ पूजा-अर्चना करते हैं। माँ काली और रक्तबीज वध की पौराणिक कथा माता काली के कालीशिला में प्रकट होने के बाद उनका रक्तबीज के साथ भयंकर युद्ध हुआ। पौराणिक कथाओं के अनुसार, रक्तबीज (Raktabija) को यह वरदान प्राप्त था कि उसकी रक्त की हर बूंद से एक नया रक्तबीज उत्पन्न होगा। इसे रोकने के लिए माता काली ने उसकी रक्त बूंदों को धरती पर गिरने से पहले ही पान करना शुरू कर दिया। अंततः माता काली ने जिस स्थान पर रक्तबीज का संहार किया, वह स्थान रक्तबीज शिला के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह पवित्र शिला कालीमठ से कुछ दूरी पर स्थित है और श्रद्धालु यहां आकर देवी की शक्ति का स्मरण करते हुए पूजा-अर्चना करते हैं। कालीमठ में अंतर्ध्यान हुई देवी मां “रक्त बीज वधे देवि चण्ड मुण्ड विनाशिनि।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।।” पौराणिक कथाओं के अनुसार, रक्तबीज (Raktabija) का वध करने के बाद माता काली ने शुंभ-निशुंभ का भी संहार किया, जिससे देवताओं को भय से मुक्ति मिली। हालांकि, इन दैत्यों का वध करने के बाद भी माता काली का क्रोध शांत नहीं हुआ। उनका रौद्र रूप देखकर देवता भयभीत हो गए और उन्होंने भगवान शिव से सहायता की प्रार्थना की। भगवान शिव, देवी के क्रोध को शांत करने के लिए उनके मार्ग में लेट गए। जैसे ही माता काली ने शिव को अपने चरणों के नीचे देखा, उनका क्रोध शांत हो गया और वे तुरंत अंतर्ध्यान हो गईं। मान्यता है कि देवी काली जिस स्थान पर अंतर्ध्यान हुईं, वही कालीमठ मंदिर (Kalimath Temple) के रूप में प्रसिद्ध हुआ। यहां देवी की कोई मूर्ति स्थापित नहीं है। इसके बजाय, देवी की ऊर्जा और शक्ति का पूजन एक पवित्र कुंड में यंत्र रूप में किया जाता है। श्रद्धालु इस दिव्य स्थान पर आकर देवी की कृपा प्राप्त करने के लिए श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजा-अर्चना करते हैं। इसे भी पढ़ें:- प्रेमानंद जी महाराज: गुरु दक्षिणा का सही अर्थ और महत्व नवरात्रि (Navratri) में करें कालीमठ के दर्शन नवरात्रि (Navratri) के पावन अवसर पर कालीमठ मंदिर (Kalimath Temple) के दर्शन करना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। मां काली अपने भक्तों की हर सच्ची मनोकामना पूरी करती हैं। यह स्थान उन साधकों के लिए भी अत्यंत पवित्र है, जो तंत्र-मंत्र या ध्यान साधना के माध्यम से आध्यात्मिक उन्नति की कामना करते हैं। नवरात्रि के दौरान यहां दर्शन करने से आत्मिक शुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। कालीमठ कैसे पहुंचें? नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Kalimath Temple #KalimathTemple #MaaKali #NavratriDarshan #KalimathUttarakhand #ShaktiPeeth #KaliMata #HinduTemple #SpiritualJourney #DivineBlessings #ReligiousTourism

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