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भगवान श्रीकृष्ण को कहां से मिली थी बांसुरी? भगवान शिव से जुड़ी है यह रहस्यमयी कथा

भारतीय संस्कृति में श्रीकृष्ण (Lord Krishna) को उनके अद्वितीय व्यक्तित्व, बाल लीलाओं और मधुर बांसुरी वादन के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। श्रीकृष्ण की बांसुरी न केवल प्रेम का प्रतीक है, बल्कि यह अध्यात्म, भक्ति और सौंदर्य की चरम अभिव्यक्ति भी मानी जाती है। जब भी भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण होता है, तो उनके अधरों पर सजी बांसुरी का चित्र स्वतः ही मन में उभर आता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि भगवान कृष्ण को यह बांसुरी किसने दी थी। इसके पीछे एक अत्यंत रोचक पौराणिक कथा है जो भगवान शिव से जुड़ी हुई है। श्रीकृष्ण की बांसुरी सिर्फ प्रेम का प्रतीक नहीं, बल्कि एक दिव्य उपहार है जो स्वयं भगवान शिव ने उन्हें भेंट किया था। जानिए इस पौराणिक कथा के माध्यम से कैसे यह बांसुरी श्रीकृष्ण के जीवन का अभिन्न अंग बनी। शिव से मिली थी बांसुरी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, समय-समय पर देवी-देवताओं ने पृथ्वी पर अवतार लिया। द्वापर युग में जब भगवान विष्णु ने अपने आठवें अवतार के रूप में श्रीकृष्ण रूप में जन्म लिया, तब सभी देवता उनसे मिलने पृथ्वी पर आए। इन्हीं में से एक थे देवों के देव महादेव। उन्होंने श्रीकृष्ण से भेंट करने का निश्चय किया और यह सोचने लगे कि ऐसा कौन-सा उपहार दें जो भगवान कृष्ण को अत्यंत प्रिय हो। तभी उन्हें याद आया कि उनके पास महान तपस्वी ऋषि दधीचि की हड्डियां संरक्षित हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, ऋषि दधीचि ने धर्म की रक्षा के लिए अपने शरीर का त्याग कर हड्डियों का दान किया था। महादेव ने उन्हीं पुण्य हड्डियों से एक बांसुरी बनाई और जब वे भगवान श्रीकृष्ण (Lord Krishna) से मिलने पृथ्वी पर आए, तब उन्होंने यह दिव्य बांसुरी उन्हें भेंट की। यही वह क्षण था जब भगवान श्रीकृष्ण को बांसुरी प्राप्त हुई, जो आगे चलकर उनके जीवन का अभिन्न अंग बन गई। मान्यता है कि श्रीकृष्ण का श्रृंगार बिना बांसुरी के अधूरा माना जाता है। यही कारण है कि आज भी श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र में बांसुरी को विशेष स्थान दिया जाता है।  श्रीकृष्ण की बांसुरी सिर्फ प्रेम का प्रतीक नहीं, बल्कि एक दिव्य उपहार है। रुके कार्यों में मिलेगी सफलता यदि आप अपने करियर या व्यवसाय में तरक्की की इच्छा रखते हैं, तो घर में बांसुरी रखना एक शुभ उपाय माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, बांसुरी को घर में रखने से कार्यों में आने वाली रुकावटें दूर होती हैं और बिगड़े हुए काम भी बनते हैं। इससे साधक को जीवन के हर क्षेत्र में सकारात्मक परिणाम मिलने लगते हैं। इसलिए यदि रुके हुए कार्यों को पूर्ण करना है तो घर में बांसुरी जरूर रखें। इसे भी पढ़ें:- हारसिंगार के चमत्कारी उपाय: घर लाएं सुख, शांति और समृद्धि घर में आएंगी खुशियां और शांति यदि आपके घर में कलह या पारिवारिक तनाव का माहौल है, तो बांसुरी को घर के मंदिर में स्थापित करना लाभकारी हो सकता है। ऐसा विश्वास है कि इस उपाय को श्रद्धा और विश्वास के साथ करने से पारिवारिक तनाव कम होता है और जीवन में सुख-शांति का संचार होता है। बांसुरी सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करती है और घर के वातावरण को मधुर बनाती है। घर के मंदिर में स्थापित करने से शांति बनी रहती है।  श्रीकृष्ण के जीवन में बांसुरी का महत्व भगवान श्रीकृष्ण (Lord Krishna) की बांसुरी केवल एक वाद्य यंत्र नहीं थी, वह ब्रजवासियों के लिए मोहित करने वाली ध्वनि थी, जो राधा सहित गोपियों के मन को मंत्रमुग्ध कर देती थी। श्रीमद्भागवत और अन्य पुराणों में वर्णन आता है कि जब श्रीकृष्ण बांसुरी बजाते थे, तो पशु-पक्षी, नदी, वृक्ष, पर्वत – सभी थम जाते थे। राधा और गोपियां उनके उस मधुर स्वरूप की ओर खिंच जाती थीं, जिसमें प्रेम, करुणा और आध्यात्मिक आनंद समाया होता था। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Krishna #lordkrishna #flutestory #lordshiva #krishnabansuri #hinduism #mythologyfacts #spiritualstory #indianmythology

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Yamuna Kalindi meaning

क्यों देवी यमुना कहलाती हैं ‘कालिंदी’? जानिए भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी इस दिव्य कथा

हिंदू धर्म में नदियों को केवल जल की धारा नहीं माना गया, बल्कि उन्हें देवी के रूप में पूजा जाता है। उन्हीं में से एक हैं देवी यमुना (Devi Yamuna), जिन्हें विशेष रूप से यमराज की बहन और भगवान श्रीकृष्ण की परम भक्त के रूप में जाना जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि देवी यमुना को ‘कालिंदी’ क्यों कहा जाता है? यह नाम सिर्फ एक उपनाम नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी है एक अत्यंत रोचक और आध्यात्मिक कथा, जो भगवान श्रीकृष्ण से गहरा संबंध रखती है। ‘कालिंदी’ नाम का अर्थ और प्रतीक ‘कालिंदी’ नाम की उत्पत्ति ‘कलिंद’ पर्वत से मानी जाती है, क्योंकि यमुना नदी का उद्गम स्थल यही पर्वत है। अर्थात जो कलिंद पर्वत से निकलती है, उसे कालिंदी (Kalindi) कहा जाता है। हालांकि इस नाम के पीछे और भी कई पौराणिक मान्यताएं और कथाएं जुड़ी हुई हैं, जो देवी यमुना के महत्व को और भी गहराई से समझाती हैं। भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी कथा हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी यमुना को भगवान सूर्य की बेटी तथा यमराज की बहन के रूप में जाना जाता है। वे भगवान विष्णु की अनन्य भक्त थीं और उन्होंने कई जन्मों तक उन्हें अपने पति के रूप में पाने की तपस्या की। उनकी तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वे द्वापर युग में जब कृष्ण के रूप में अवतरित होंगे, तब वे उन्हें प्राप्त करेंगी। ऐसा कहा जाता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तब उनके पिता वासुदेव उन्हें मथुरा से गोकुल ले जा रहे थे और रास्ते में यमुना नदी पार करनी थी। उस समय यमुना ने अपने जल को शांत कर श्रीकृष्ण के चरणों का स्पर्श किया और उनका स्वागत किया। यही कारण है कि यमुना नदी को विशेष रूप से श्रीकृष्ण (Lord Krishna) की प्रिय मानी जाती है। ब्रजभूमि में बाल कृष्ण की अनेक लीलाएं यमुना के तट पर ही घटित हुईं। एक अन्य लोककथा के अनुसार, जब भगवान कृष्ण (Lord Krishna) अर्जुन के साथ यमुना तट पर आए, तो उन्होंने वहां एक तपस्या में लीन सुंदर कन्या को देखा। वह कन्या और कोई नहीं बल्कि देवी यमुना ही थीं, जो श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने की कामना से तप कर रही थीं। उनकी अटल भक्ति और प्रेम को देखकर श्रीकृष्ण ने उनसे विवाह किया। इसी कारण यमुना को ‘कालिंदी’ (Devi Yamuna) भी कहा जाता है — ‘काली कमली वाले’ श्रीकृष्ण से जुड़े होने के कारण। ‘कालिंदी’ नाम यमुना का एक विशेष नाम है, जो उनके कृष्ण से दिव्य संबंध को दर्शाता है। यह नाम न सिर्फ उनके रंग या प्रवाह की गहराई को दर्शाता है, बल्कि उस पवित्र प्रेम को भी दर्शाता है जो उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के प्रति रखा। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया तीर्थों और मंदिरों में विशेष पूजन भारत में अनेक ऐसे तीर्थस्थल हैं, जहां देवी यमुना (Devi Yamuna) को कालिंदी (Kalindi) रूप में पूजा जाता है। ब्रज भूमि, विशेषकर वृंदावन और मथुरा में यमुना आरती का विशेष महत्व है। माना जाता है कि श्रीकृष्ण ने अपनी बाल लीलाओं में यमुना नदी को साक्षी बनाया। कदंब वन, यमुना घाट और कालिंदी कुंज जैसे स्थानों पर आज भी भक्तजन श्रद्धा से पूजन करते हैं। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Devi Yamuna #Kalindi #YamunaRiver #LordKrishna #HinduMythology #DivineStory #KrishnaMarriage #KalindiMyth #KrishnaLeela #KalindiYamuna #SpiritualIndia

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Lord Krishna’s Lost City Submerged in the Sea

द्वारका नगरी की कहानी: श्रीकृष्ण का भव्य साम्राज्य जिसे समुद्र ने निगल लिया

भारत की पौराणिक कथाओं में कई नगरों का वर्णन मिलता है, लेकिन कुछ नगर ऐसे हैं जो इतिहास और रहस्य के धुंध में लुप्त हो गए। इन्हीं में से एक है द्वारका नगरी, जिसे स्वयं भगवान श्रीकृष्ण (Lord Shri Krishna) ने बसाया था। यह नगर अपने वैभव, उन्नति और धार्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध था, लेकिन एक दिन समुद्र की लहरों ने इसे अपने भीतर समा लिया। द्वारका के डूबने के पीछे क्या कारण था? क्या यह प्राकृतिक आपदा थी, या फिर यह किसी श्राप का परिणाम था? श्रीकृष्ण के द्वारका जाने की कथा धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, श्रीकृष्ण (Shri Krishna) को द्वारका जाने की आवश्यकता तब पड़ी जब उन्होंने अपने अत्याचारी मामा और मथुरा के राजा कंस का वध किया। कंस के ससुर और मगध के राजा जरासंध ने इस घटना का प्रतिशोध लेने का संकल्प लिया और मथुरा पर बार-बार आक्रमण करने लगा। वह 17 बार आक्रमण कर चुका था, लेकिन श्रीकृष्ण को पराजित नहीं कर सका। हालांकि, निरंतर युद्धों से न केवल आर्थिक हानि हो रही थी, बल्कि यादवों की सुरक्षा भी संकट में थी। इसे देखते हुए, श्रीकृष्ण (Shri Krishna) ने मथुरा छोड़कर यादवों के लिए एक नए सुरक्षित स्थान की स्थापना का निर्णय लिया। उन्होंने भगवान विश्वकर्मा को भव्य नगर द्वारका के निर्माण का आदेश दिया। विश्वकर्मा ने समुद्र के ऊपर केवल एक रात में इस अद्भुत नगरी का निर्माण कर दिया, जहां यादवों को बसाया गया। इसके बाद श्रीकृष्ण “द्वारकाधीश” के नाम से प्रसिद्ध हुए। कैसी थी द्वारका नगरी? द्वारका (Dwarka), जिसका अर्थ है ‘द्वारों का नगर’, भगवान श्रीकृष्ण (Shri Krishna) की राजधानी थी। द्वारका एक भव्य और अद्भुत नगरी थी, जिसमें छह विशाल दरवाजे और भव्य प्रासाद थे। इसकी गलियां मोतियों और बहुमूल्य पत्थरों से सजी हुई थीं, जिससे यह एक स्वर्गीय नगर जैसी प्रतीत होती थी। इस अद्वितीय नगरी का निर्माण मय दानव की असाधारण वास्तुकला से हुआ था, जिसने इसे अद्भुत स्वरूप प्रदान किया। महाभारत में द्वारका का वर्णन ‘सोने से बनी नगरी’ के रूप में किया गया है, जो इसकी विलक्षण सुंदरता और समृद्धि को दर्शाता है। यह नगर सात टीलों पर स्थित था और एक मजबूत किलेबंदी से सुरक्षित था, जिससे यह बाहरी आक्रमणों से संरक्षित रह सके। 4000 साल पहले किसने दिया द्वारका को डूबने का श्राप? शास्त्रों में द्वारका (Dwarka) को कुशस्थली के रूप में वर्णित किया गया है, जो एक समृद्ध और खुशहाल नगरी थी। यहां के लोग प्रेम और भाईचारे के साथ रहते थे, और स्वयं श्रीकृष्ण इस नगर का संचालन कर रहे थे। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब सबकुछ इतना सुंदर और अद्भुत था, तो फिर द्वारका डूबी कैसे? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, द्वारका के डूबने के पीछे दो श्रापों का बड़ा योगदान था। यह पवित्र नगरी, जो आज हिंदुओं के चारधाम और सप्तपुरी में शामिल है, कठोर श्रापों का शिकार हुई। आइए जानते हैं, कौन-कौन से श्रापों ने इस दिव्य नगरी को जलमग्न कर दिया। इसे भी पढ़ें:- कब और कहां लेंगे भगवान विष्णु कल्कि का अवतार? द्वारका के जलमग्न होने का सबसे प्रसिद्ध श्राप ऋषि दुर्वासा और स्वयं श्रीकृष्ण के वचन से जुड़ा है। महाभारत का युद्ध विनाशकारी था, जिसमें कौरवों का अंत हो गया और पांडवों ने विजय प्राप्त की। युद्ध के बाद युधिष्ठिर का हस्तिनापुर में राजतिलक हुआ, जहां श्रीकृष्ण (Lord Shri Krishna) भी मौजूद थे। इसी दौरान, कौरवों की माता गांधारी ने श्रीकृष्ण को इस युद्ध का सबसे बड़ा दोषी मानते हुए श्राप दिया कि जैसे उनके कुल का विनाश हुआ, वैसे ही श्रीकृष्ण के सामने ही उनके वंश का नाश होगा। ऐसा माना जाता है कि द्वारका के डूबने का एक प्रमुख कारण यही श्राप था। महाभारत युद्ध के 36 साल बाद, समुद्र में पूरी द्वारका नगरी समा गई। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि विश्वामित्र, देव ऋषि नारद और कण्व ऋषि द्वारका नगरी पहुंचे थे। वहीं, कुछ यादव बालकों ने उनके साथ उपहास करने की योजना बनाई, जिसमें श्रीकृष्ण के पुत्र सांब भी शामिल थे। उन्होंने सांब को स्त्री वेश में ऋषियों के सामने प्रस्तुत किया और मज़ाक में कहा कि यह स्त्री गर्भवती है, कृपया बताएं कि इसके गर्भ में पलने वाला शिशु कौन होगा।  यह अपमान ऋषियों को सहन नहीं हुआ, और उन्होंने श्राप दिया कि इस गर्भ से एक मुसल (गदा जैसा हथियार) जन्म लेगा, जो पूरे यदुवंश के नाश का कारण बनेगा। इसके बाद यादवों के बीच कलह और संघर्ष बढ़ने लगे, और अंततः वे आपस में लड़-लड़कर खत्म हो गए। बलराम ने भी अपने शरीर का त्याग कर दिया, और श्रीकृष्ण को एक शिकारी के तीर से अनजाने में चोट लग गई, जिसके बाद वे अपने दिव्य लोक में चले गए। जब पांडवों को द्वारका (Dwarka) की स्थिति का पता चला, तो अर्जुन वहां पहुंचे और श्रीकृष्ण के बचे हुए परिजनों को इंद्रप्रस्थ ले आए। इसके बाद द्वारका नगरी धीरे-धीरे समुद्र में डूब गई और हमेशा के लिए विलुप्त हो गई। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Dwarka #DwarkaMystery #LordKrishna #LostCityDwarka #AncientIndia #Mythology #HinduHistory #KrishnaLegend #SubmergedCity #IndianHeritage #HistoricalMystery

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