Sawan 2025

सावन 2025 में लगाएं ये पौधे, मिलेगी भोलेनाथ की कृपा

हिंदू पंचांग के अनुसार, सावन का महीना भगवान शिव की भक्ति और कृपा प्राप्ति के लिए विशेष महत्व रखता है। यह माह पूरे वर्ष में सबसे पवित्र महीनों में एक माना जाता है, जिसमें शिव भक्त पूरे समर्पण और श्रद्धा से उपवास, पूजा, जलाभिषेक और व्रत करते हैं। सावन के महीने में शिवलिंग पर जल चढ़ाने, बेलपत्र अर्पित करने के साथ-साथ कुछ खास पौधे लगाने की भी परंपरा है, जिन्हें धर्म, आयुर्वेद और वास्तु तीनों दृष्टिकोण से बेहद शुभ और कल्याणकारी माना गया है। आइए जानते हैं सावन 2025 (Sawan) में कौन-कौन से पौधे लगाने से न केवल बिगड़े काम बन सकते हैं, बल्कि भगवान शिव की कृपा भी आप पर बनी रहती है। 1. बेल का पौधा (Bel Tree) भगवान शिव (Lord Shiva) को बेल के पत्ते (बिल्व पत्र) अत्यंत प्रिय माने जाते हैं। तीन पत्तियों वाला बेल पत्र शिवलिंग पर अर्पित करने से भोलेनाथ शीघ्र प्रसन्न होते हैं। सावन माह (Sawan) में घर के आंगन या बगीचे में बेल का पौधा लगाना अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है कि इसे लगाने से घर से दरिद्रता दूर होती है और सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। वास्तु शास्त्र भी इसे शुभ मानता है, क्योंकि यह घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ाता है। 2. तुलसी का पौधा (Tulsi Plant) हिंदू धर्म में तुलसी को अत्यंत पवित्र और देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। भले ही तुलसी के पत्ते सीधे भगवान शिव को अर्पित नहीं किए जाते, लेकिन घर में तुलसी का पौधा लगाने से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। सावन के महीने में तुलसी का पौधा लगाकर नियमित रूप से उसकी पूजा करने से घर में सुख-शांति और धन-समृद्धि का वास होता है। 3. धतूरे का पौधा धतूरा उन प्रिय पुष्पों में से एक है जिन्हें भगवान शिव को अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, सावन के पावन महीने में शिवलिंग पर धतूरा चढ़ाने से भगवान भोलेनाथ अत्यंत प्रसन्न होते हैं। यदि आप अपने घर में धतूरे का पौधा लगाते हैं, तो यह शिव कृपा का प्रतीक माना जाता है। यह पौधा न केवल आर्थिक समृद्धि लाता है, बल्कि शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने में भी सहायक होता है। 4. आक का पौधा (मदार) भगवान शिव को आक का पौधा विशेष रूप से प्रिय है, विशेषकर इसके सफेद फूल। सावन के महीने में आक का पौधा रोपण करना शुभ माना जाता है। इसे घर में लगाने से महादेव की कृपा बनी रहती है, जिससे परिवार में धन-धान्य में वृद्धि होती है। आक के फूल और पत्ते शिवलिंग पर चढ़ाने से शिवजी प्रसन्न होते हैं और भक्त की इच्छाएं पूर्ण करते हैं। 5. शमी का पौधा (Shami Tree) शमी का पौधा भगवान शिव (Lord Shiva) के साथ-साथ शनिदेव को भी अत्यंत प्रिय है। इसे घर में लगाने से नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं और वातावरण में शांति बनी रहती है। सावन के पावन महीने में शमी का पौधा लगाने से शिवजी की कृपा तो मिलती ही है, साथ ही शनिदेव का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है। मान्यता है कि इससे धन से जुड़ी समस्याएं दूर होती हैं और आर्थिक स्थिति में सुधार आता है। इसे भी पढ़ें:- मुखाग्नि से पहले क्यों किया जाता है सुहागिन स्त्री का सोलह श्रृंगार? घर में सकारात्मकता लाने वाला पौधा भगवान शिव को बेलपत्र अत्यंत प्रिय हैं। यदि आप महादेव की विशेष कृपा पाना चाहते हैं, तो सावन के महीने में अपने घर में बेलपत्र का पौधा अवश्य लगाएं और नियमित रूप से उसकी पूजा करें। इसके बाद शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बेलपत्र का पौधा लगाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और शिवजी को अर्पित करने पर भक्त को उत्तम फल प्राप्त होते हैं। इस पौधे को घर की उत्तर या दक्षिण दिशा में लगाना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। हर इच्छा होगी पूरी सनातन धर्म में शमी के पौधे को अत्यंत पावन और फलदायी माना गया है। सावन (Sawan) के पवित्र माह में यदि इस पौधे को घर में लगाया जाए, तो परिवार के सभी सदस्यों पर भगवान शिव की विशेष कृपा बनी रहती है। इससे घर में सुख-शांति बनी रहती है और नकारात्मकता दूर होती है। पूजा के समय महादेव को शमी की पत्तियां अर्पित करने से वे प्रसन्न होते हैं और भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Shiva #sawan2025 #lordshiva #sacredplants #shivbhakti #hindufestivals #plantforpositivity #shivpooja

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Discover how Lord Krishna received his magical flute

भगवान श्रीकृष्ण को कहां से मिली थी बांसुरी? भगवान शिव से जुड़ी है यह रहस्यमयी कथा

भारतीय संस्कृति में श्रीकृष्ण (Lord Krishna) को उनके अद्वितीय व्यक्तित्व, बाल लीलाओं और मधुर बांसुरी वादन के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। श्रीकृष्ण की बांसुरी न केवल प्रेम का प्रतीक है, बल्कि यह अध्यात्म, भक्ति और सौंदर्य की चरम अभिव्यक्ति भी मानी जाती है। जब भी भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण होता है, तो उनके अधरों पर सजी बांसुरी का चित्र स्वतः ही मन में उभर आता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि भगवान कृष्ण को यह बांसुरी किसने दी थी। इसके पीछे एक अत्यंत रोचक पौराणिक कथा है जो भगवान शिव से जुड़ी हुई है। श्रीकृष्ण की बांसुरी सिर्फ प्रेम का प्रतीक नहीं, बल्कि एक दिव्य उपहार है जो स्वयं भगवान शिव ने उन्हें भेंट किया था। जानिए इस पौराणिक कथा के माध्यम से कैसे यह बांसुरी श्रीकृष्ण के जीवन का अभिन्न अंग बनी। शिव से मिली थी बांसुरी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, समय-समय पर देवी-देवताओं ने पृथ्वी पर अवतार लिया। द्वापर युग में जब भगवान विष्णु ने अपने आठवें अवतार के रूप में श्रीकृष्ण रूप में जन्म लिया, तब सभी देवता उनसे मिलने पृथ्वी पर आए। इन्हीं में से एक थे देवों के देव महादेव। उन्होंने श्रीकृष्ण से भेंट करने का निश्चय किया और यह सोचने लगे कि ऐसा कौन-सा उपहार दें जो भगवान कृष्ण को अत्यंत प्रिय हो। तभी उन्हें याद आया कि उनके पास महान तपस्वी ऋषि दधीचि की हड्डियां संरक्षित हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, ऋषि दधीचि ने धर्म की रक्षा के लिए अपने शरीर का त्याग कर हड्डियों का दान किया था। महादेव ने उन्हीं पुण्य हड्डियों से एक बांसुरी बनाई और जब वे भगवान श्रीकृष्ण (Lord Krishna) से मिलने पृथ्वी पर आए, तब उन्होंने यह दिव्य बांसुरी उन्हें भेंट की। यही वह क्षण था जब भगवान श्रीकृष्ण को बांसुरी प्राप्त हुई, जो आगे चलकर उनके जीवन का अभिन्न अंग बन गई। मान्यता है कि श्रीकृष्ण का श्रृंगार बिना बांसुरी के अधूरा माना जाता है। यही कारण है कि आज भी श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र में बांसुरी को विशेष स्थान दिया जाता है।  श्रीकृष्ण की बांसुरी सिर्फ प्रेम का प्रतीक नहीं, बल्कि एक दिव्य उपहार है। रुके कार्यों में मिलेगी सफलता यदि आप अपने करियर या व्यवसाय में तरक्की की इच्छा रखते हैं, तो घर में बांसुरी रखना एक शुभ उपाय माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, बांसुरी को घर में रखने से कार्यों में आने वाली रुकावटें दूर होती हैं और बिगड़े हुए काम भी बनते हैं। इससे साधक को जीवन के हर क्षेत्र में सकारात्मक परिणाम मिलने लगते हैं। इसलिए यदि रुके हुए कार्यों को पूर्ण करना है तो घर में बांसुरी जरूर रखें। इसे भी पढ़ें:- हारसिंगार के चमत्कारी उपाय: घर लाएं सुख, शांति और समृद्धि घर में आएंगी खुशियां और शांति यदि आपके घर में कलह या पारिवारिक तनाव का माहौल है, तो बांसुरी को घर के मंदिर में स्थापित करना लाभकारी हो सकता है। ऐसा विश्वास है कि इस उपाय को श्रद्धा और विश्वास के साथ करने से पारिवारिक तनाव कम होता है और जीवन में सुख-शांति का संचार होता है। बांसुरी सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करती है और घर के वातावरण को मधुर बनाती है। घर के मंदिर में स्थापित करने से शांति बनी रहती है।  श्रीकृष्ण के जीवन में बांसुरी का महत्व भगवान श्रीकृष्ण (Lord Krishna) की बांसुरी केवल एक वाद्य यंत्र नहीं थी, वह ब्रजवासियों के लिए मोहित करने वाली ध्वनि थी, जो राधा सहित गोपियों के मन को मंत्रमुग्ध कर देती थी। श्रीमद्भागवत और अन्य पुराणों में वर्णन आता है कि जब श्रीकृष्ण बांसुरी बजाते थे, तो पशु-पक्षी, नदी, वृक्ष, पर्वत – सभी थम जाते थे। राधा और गोपियां उनके उस मधुर स्वरूप की ओर खिंच जाती थीं, जिसमें प्रेम, करुणा और आध्यात्मिक आनंद समाया होता था। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Krishna #lordkrishna #flutestory #lordshiva #krishnabansuri #hinduism #mythologyfacts #spiritualstory #indianmythology

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Baba Barfani Appears from Ice

बर्फ से प्रकट हुए भोलेनाथ: किस भाग्यशाली को सबसे पहले हुए बाबा बर्फानी के दर्शन?

हिंदू धर्म में भगवान शिव (Lord Shiva) के रूप को लेकर कई रहस्यमयी और चमत्कारी कथाएं प्रचलित हैं। उन्हीं में से एक है बाबा बर्फानी, यानी अमरनाथ धाम में स्थित बर्फ से निर्मित स्वयंभू शिवलिंग की अद्भुत महिमा। हर साल लाखों श्रद्धालु कठिन पर्वतीय मार्गों को पार कर इस चमत्कारी गुफा तक पहुंचते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस गुफा के बारे में सबसे पहले किसने जाना था? किस भाग्यशाली को भगवान शिव के बर्फ से बने इस अद्भुत रूप के सबसे पहले दर्शन हुए थे? इस सवाल का जवाब जितना रहस्यमय है, उतनी ही प्रेरणादायक है उससे जुड़ी प्राचीन कथा। सदियों पुरानी यह कथा बताती है कि कैसे एक साधारण गड़रिये को अमरनाथ की रहस्यमयी गुफा और स्वयंभू शिवलिंग के पहले दर्शन हुए। जानिए उस अद्भुत खोज की पूरी कहानी, जिसने एक तीर्थस्थल को जन्म दिया। अमरनाथ यात्रा का महत्व​ अमरनाथ यात्रा (AmarnathYatra) के दौरान श्रद्धालु हर साल लाखों श्रद्धालु कठिन पर्वतीय मार्गों को पार कर इस चमत्कारी गुफा तक पहुंचते हैं और बाबा बर्फानी के दर्शन करते हैं। बड़ी बात यह कि जहां यह पवित्र शिवलिंग प्राकृतिक रूप से हिम से स्वयं उत्पन्न होता है। यह शिवलिंग अमरनाथ गुफा के भीतर स्थित है। गौर करने वाली बात यह कि इसकी आकृति चंद्रमा के घटने-बढ़ने के अनुसार बदलती रहती है। आपको बता दें कि अमरनाथ गुफा को ‘अमरेश्वर’ भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि यहां दर्शन करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस गुफा में हिम से केवल शिवलिंग ही नहीं, बल्कि माता पार्वती और भगवान गणेश की आकृति भी बनती है, जिससे यह स्थान हिंदू आस्था का अत्यंत पावन और विशिष्ट तीर्थ बन जाता है। कारण यही लोग देश के कोने कोने से लाखों श्रद्धालु दर्शन करने हेतु यहाँ पहुँचते हैं।   सबसे पहले दर्शन किसे हुए थे? ऐसे में बड़ा सवाल यह कि इस गुफा सबसे पहले दर्शन किसे हुए थे? तो पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अमरनाथ गुफा के सबसे पहले दर्शन महर्षि भृगु ने किए थे। एक कथा के अनुसार जब कभी कश्मीर की घाटी पूरी तरह जलमग्न होने वाली थी, तब महर्षि कश्यप ने नदियों और झीलों के माध्यम से पानी को बाहर निकालने का प्रयास किया। उसी समय महर्षि भृगु हिमालय क्षेत्र की यात्रा पर निकले हुए थे और उन्हें एक शांत स्थान की तलाश थी जहां वे ध्यान और तपस्या कर सकें। इस खोज में वे अमरनाथ (AmarnathYatra) की गुफा तक पहुंचे, जहां उन्हें हिम से निर्मित भगवान शिव (Lord Shiva) के स्वरूप बाबा बर्फानी के दर्शन हुए। तभी से यह गुफा एक पवित्र तीर्थ स्थल के रूप में प्रसिद्ध हो गई और आज भी हर वर्ष हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं। इसे भी पढ़ें:- रुद्राक्ष पहनने पर भी नहीं मिल रहा लाभ? हो सकती हैं ये आम गलतियां अन्य लोककथा  एक अन्य लोककथा के मुताबिक, अमरनाथ गुफा का पहला दर्शन लगभग 15वीं सदी में बूटा मलिक नाम के एक चरवाहे ने किया था। मान्यता है कि एक दिन बूटा मलिक को एक साधु मिला, जिसने उसे कोयलों से भरा एक थैला दिया। जब वह अपने घर पहुंचा और थैला खोला, तो कोयलों की जगह उसमें सोने के सिक्के निकले। यह देखकर वह आश्चर्यचकित हो गया और उस साधु की खोज में वापस गया। उसी दौरान वह अमरनाथ की गुफा तक पहुंचा, जहां उसे हिम से निर्मित शिवलिंग के दर्शन हुए। ऐसा माना जाता है कि तभी से अमरनाथ यात्रा (AmarnathYatra) की परंपरा शुरू हुई। इसके अलावा, ‘राजतरंगिणी’ जैसे प्राचीन ग्रंथों में भी अमरेश्वर शिवलिंग का उल्लेख मिलता है। इन उल्लेखों के अनुसार, 11वीं शताब्दी में कश्मीर की रानी सूर्यमती ने अमरनाथ मंदिर में त्रिशूल और अन्य पवित्र चिह्न अर्पित किए थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि अमरनाथ गुफा का धार्मिक महत्व प्राचीन काल से ही रहा है। अमरनाथ गुफा के दर्शन कर भक्तगण खुद को धन्य समझते हैं।  Latest News in Hindi Today Hindi news AmarnathYatra #bababarfani, #amarnathyatra2025, #lordshiva, #icelingam, #divinedarshan, #amarnathcave, #shivlingappearance

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Ashok Sundari,

भगवान शिव की पुत्री अशोक सुंदरी: एक अनसुनी देवी की कथा

भारतीय पौराणिक कथाओं में भगवान शिव और माता पार्वती की कहानियां अत्यंत प्रसिद्ध हैं। परंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि उनके पुत्र कार्तिकेय और गणेश के अलावा उनकी एक पुत्री भी थीं — जिनका नाम था अशोक सुंदरी। देवी अशोक सुंदरी (Ashoka Sundari) की कथा ‘पद्म पुराण’ में वर्णित है, जो न केवल रहस्यमय है बल्कि यह स्त्री शक्ति और मातृत्व के अद्भुत पहलुओं को भी दर्शाती है। जन्म की कथा हिंदू कथाओं के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती कैलाश पर्वत से बाहर घूमते हुए एक इच्छापूर्ति वृक्ष कल्पवृक्ष के पास पहुंचे। चूंकि शिव अक्सर राक्षसों से युद्ध के लिए बाहर रहते थे, पार्वती को अकेलापन महसूस होता था। ऐसे में उन्होंने कल्पवृक्ष से एक बेटी की कामना की, और उसी से अशोक सुंदरी (Ashoka Sundari) का जन्म हुआ। ‘अशोक’ का अर्थ होता है ‘शोक रहित’, क्योंकि उसने पार्वती के दुख को दूर किया, और ‘सुंदरी’ का अर्थ होता है सुंदर, जो उसकी सुंदरता के अनुरूप था।  अशोक सुंदरी को मिला वरदान देवी अशोक सुंदरी (Ashoka Sundari) ने न केवल माता पार्वती के दुख को दूर किया, बल्कि आगे चलकर उन्होंने अद्भुत महत्ता और प्रतिष्ठा भी प्राप्त की। जब वह बड़ी हुईं, तो उन्हें वरदान मिला कि वह भविष्य में नहुष नामक महान राजा से विवाह करेंगी। नहुष कोई साधारण पुरुष नहीं, बल्कि वह वही राजा थे जो बाद में इंद्र के पद पर आसीन हुए थे। हुंड दैत्य का आगमन और अशोक सुंदरी का अटल संकल्प एक बार दानवराज विप्रचिति का पुत्र हुंड, जो अत्यंत क्रूर और स्वेच्छाचारी था, उस वन में आया जहाँ अशोक सुंदरी भ्रमण कर रही थीं। उसे देखते ही वह मोहित हो गया और विवाह का प्रस्ताव रख दिया। अशोक सुंदरी (Ashoka Sundari) ने गर्व से उत्तर दिया कि वह भगवान शिव और माता पार्वती की पुत्री हैं, और उनका विवाह भविष्य में धर्मात्मा नहुष से तय है, जो सोमवंश में जन्म लेकर महान पराक्रमी और भगवान विष्णु के समान होंगे। हुंड ने उनकी बात को ठुकराते हुए कहा कि नहुष तो अभी बालक है और उम्र में छोटे हैं, ऐसे में अशोक सुंदरी की जवानी व्यर्थ जाएगी। उसने उनसे प्रेम और साथ रहने का आग्रह किया। लेकिन शिवपुत्री अशोक सुंदरी अपने निश्चय में अडिग रहीं। उन्होंने हुंड को चेताया कि वह पतिव्रता हैं और उसका मन विचलित नहीं किया जा सकता। यदि वह नहीं गया, तो वे उसे भस्म कर देंगी। इसे भी पढ़ें:- अहमदाबाद से लंदन जा रही एयर इंडिया की फ्लाइट हुई क्रैश, पूर्व मुख्यमंत्री समेत 242 यात्री थे सवार नहुष से विवाह दानव हुंड ने माया रचते हुए कन्या का रूप धारण किया और अशोक सुंदरी को बहला-फुसलाकर अपने महल में ले गया। जब अशोक सुंदरी को यह सच्चाई ज्ञात हुई कि वह कन्या नहीं बल्कि वही दुष्ट हुंड है, तो वह क्रोधित हो उठीं और उसे डांटते हुए स्पष्ट कहा कि वह उसे कभी भी प्राप्त नहीं कर सकता। अशोक सुंदरी ने हुंड को श्राप देते हुए कहा कि वह ही उसके विनाश का कारण बनेगी और उसके वंश का अंत होगा। वह गंगा तट पर बैठकर प्रतिज्ञा करती है कि जब तक हुंड को नहुष युद्ध में पराजित कर नहीं मार देता, वह विवाह नहीं करेगी। नहुष का जन्म और शिक्षा हुंड ने नहुष के जन्म को रोकने के कई प्रयास किए, लेकिन ऋषि दत्तात्रेय की कृपा से वह असफल रहा। नहुष का जन्म हुआ और वशिष्ठ मुनि के आश्रम में वह वेद, अस्त्र-शस्त्र और नीति की शिक्षा लेकर महान योद्धा बना। वशिष्ठ ने नहुष को बताया कि अशोक सुंदरी उसकी पत्नी है, जो उसके लिए तपस्या कर रही है और उसे हुंड के चंगुल से मुक्त करना उसका धर्म है। बाद में अशोक सुंदरी और राजा नहुष का विवाह संपन्न हुआ। नहुष को अत्यंत धर्मपरायण, तेजस्वी और वीर राजा माना गया।  Latest News in Hindi Today Hindi Ashoka Sundari #AshokSundari #LordShiva #HinduMythology #Parvati #DivineDaughter #UntoldStories #IndianGods

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Lord Shiva Third Eye

भगवान शिव की तीसरी आंख: चेतना, संहार और सृजन का रहस्य

हिंदू धर्म में भगवान शिव को संहारक के रूप में जाना जाता है, लेकिन उनका संहार केवल विनाश नहीं बल्कि सृजन का भी मार्ग है। शिव की सबसे रहस्यमयी और शक्तिशाली पहचान उनके तीसरे नेत्र से जुड़ी है, जिसे “त्रिनेत्रधारी” स्वरूप कहा जाता है। यह तीसरी आंख न केवल उनकी दिव्य चेतना का प्रतीक है, बल्कि ज्ञान, विवेक, और समय आने पर सर्वनाश की शक्ति का भी प्रतिनिधित्व करती है। तीसरी आंख का रहस्य क्या है? धार्मिक कथाओं के अनुसार, एक बार भगवान शिव हिमालय पर्वत पर देवताओं की एक सभा में व्यस्त थे। उसी समय मां पार्वती अचानक वहां पहुंचीं और प्रेमवश उन्होंने भगवान शिव की दोनों आंखों को अपने हाथों से ढक लिया। जैसे ही शिव की आंखें ढकीं, संपूर्ण सृष्टि अंधकार में डूब गई। चारों ओर हाहाकार मच गया। पशु-पक्षी भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगे। यह दृश्य भगवान शिव (Lord Shiva) से देखा नहीं गया। तभी उनके ललाट से एक तेजस्वी ज्योति फूटी, जो आगे चलकर उनका तीसरा नेत्र बना। इस नेत्र के प्रकट होते ही पूरे ब्रह्मांड में पुनः प्रकाश फैल गया। जब पार्वती जी ने शिव से इस तीसरे नेत्र के बारे में पूछा, तो उन्होंने बताया कि यह नेत्र संसार की रक्षा के लिए है। यदि यह नेत्र न प्रकट होता, तो संपूर्ण सृष्टि का विनाश निश्चित था। यह तीसरा नेत्र (Third Eye) न केवल चेतना और जागरूकता का प्रतीक है, बल्कि सृष्टि के संतुलन और संचालन का भी आधार है। तीनों कालों की दृष्टा है शिव की तीसरी आंख भगवान शिव (Lord Shiva) की तीसरी आंख (Third Eye) को अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है। मान्यता है कि इस दिव्य नेत्र के माध्यम से वे भूतकाल, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालों को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। यही कारण है कि शिव की तीसरी आंख को उनकी सामान्य दोनों आंखों से अधिक प्रभावशाली और विशिष्ट माना गया है। कहा जाता है कि यह नेत्र वह सब देख सकता है, जो सामान्य दृष्टि की पकड़ से बाहर होता है।  इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय कब खोलते हैं, भगवान शिव अपनी तीसरी आंख भगवान शिव (Lord Shiva) अपनी तीसरी आंख (Third Eye)  तब खोलते हैं जब उन्हें भौतिक जगत की परतों को हटाकर केवल शुद्ध सत्य को देखना होता है। यह नेत्र माया, भ्रम और संसार की बाहरी परतों को भस्म कर देता है, इसलिए इसे विनाश का प्रतीक माना जाता है। लेकिन असल में यह विनाश सत्य की स्थापना के लिए होता है। शिव की तीसरी आंख उस चेतना का प्रतिनिधित्व करती है जो भौतिक सीमाओं से परे जाकर वास्तविकता को समझती है। माना जाता है कि यह आंख कर्म और स्मृतियों के प्रभाव से काम करती है। जहां सामान्य आंखें समय के साथ भ्रमित हो सकती हैं, वहीं तीसरी आंख हमारे अस्तित्व की गहरी और स्पष्ट तस्वीर प्रस्तुत करती है। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Shiva #lordshiva #thirdeye #hindumythology #shivapower #spiritualawakening #divinecreation #shivasecrets 

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Manimahesh Kailash

मणिमहेश कैलाश: भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है यह पर्वत

हमारे देश में ऐसे कई धार्मिक स्थान हैं, जहां हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु जाते हैं। ऐसा ही एक स्थान है मणिमहेश (Manimahesh)। मणिमहेश कैलाश (Manimahesh Kailash) भगवान शिव को समर्पित है और पंच कैलाशों में से एक है। यह स्थान है हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले में। यहां पहुंचना आसान नहीं लेकिन यह एक पवित्र स्थान है जो भगवान शिव और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है। कैलाश पर्वत के नीचे मौजूद मानसरोवर झील की तरह यहां भी एक झील है। आइए जानें मणिमहेश कैलाश (Manimahesh Kailash) के बारे में विस्तार से। यह भी जानें कि मणिमहेश (Manimahesh) की यात्रा कब की जा सकती है? मणिमहेश (Manimahesh) की कथा  मणिमहेश कैलाश (Manimahesh Kailash) वो महत्वपूर्ण धार्मिक स्थान है, जो भगवान शिव जी के प्रेम और शक्ति का संकेत है। ऐसा माना गया है कि भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के बाद इस पर्वत को बनाया गया था। कुछ पौराणिक कथाओं के अनुसार इसी पर्वत पर भगवन शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था।यही नहीं इस पर्वत को उनका निवास स्थान भी माना गया है। मणिमहेश  (Manimahesh) पर्वत की चोटी तक कोई भी चढ़ाई नहीं कर पाया है। ऐसा भी माना गया है कि आज तक कई लोगों ने इसकी चोटी तक पहुंचने की कोशिश की है, लेकिन वो सफल नहीं हो पाएं हैं। एक चरवाहें ने भी अपनी बकरियों के साथ यहां चढ़ने की कोशिश की थी लेकिन वो पत्थर की बन गई थी। इस पर्वत पर एक झील है जिसका पानी बेहद पवित्र माना गया है और लोग इसे अपने साथ ले जाते हैं। मणिमहेश झील (Manimahesh Lake) तक इस पर्वत की यात्रा की जाती है। मणिमहेश कैलाश (Manimahesh Kailash) के मणि का क्या है अर्थ  यह तो हम सभी जानते हैं कि मणिमहेश कैलाश (Manimahesh Kailash) में मणि का अर्थ है भगवन शिव की मणि। इसके पीछे भी एक कथा है। ऐसा माना गया है कि पूर्णिमा (Purnima) की रात को मणिमहेश झील  (Manimahesh Lake) में इस पर्वत में मौजूद मणि की किरणों से परिवर्तित होती हैं और उसके बाद लोगों को दिखती हैं। लेकिन, यह दृश्य सभी को नहीं दिखाई देता है। हालांकि वैज्ञानिकों का इसके बारे में अलग मत है। उनके अनुसार यह किरणें ग्लेशियर से परावर्तित होकर आती हैं न की मणि से। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया कैसे पहुंचा जा सकता है मणिमहेश कैलाश (Manimahesh Kailash)? मणिमहेश कैलाश (Manimahesh Kailash) पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को लगभग 13 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। इस साल यह यात्रा 26 अगस्त से शुरू हो रही है। आप जिस भी शहर से आ रहे हैं, वहां से आपको सबसे पहले चम्बा पहुंचना होगा। इस स्थान पर अगर आप वायुमार्ग या रेलमार्ग से आ रहे हैं, तो सबसे नजदीक एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशन आपको पड़ेगा पठानकोट। चम्बा पहुंचने के बाद आपको भरमौर पहुंचना होगा जो यहां से लगभग 70 किलोमीटर दूर है। यहां आप बस या टैक्सी से पहुंच सकते हैं। भरमौर से आपको हड़सर पहुंचना होगा, जहां आप बस या टैक्सी से जा सकते हैं। हड़सर से ट्रैक शुरू हो जाता है। ट्रैक कर के आप मणिमहेश झील (Manimahesh Lake) तक पहुंच सकते हैं। Latest News in Hindi Today Hindi News Manimahesh Kailash #ManimaheshKailash #Manimahesh #ManimaheshLake #Chamba #LordShiva #MataParvati

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Mamleshwar Temple Pahalgam

ममलेश्वर मंदिर: पहलगाम का ऐतिहासिक शिव मंदिर जहां भगवान शिव ने काटा था गणेश का शीश

कश्मीर घाटी के सुरम्य नगर पहलगाम में स्थित ममलेश्वर मंदिर (Mamaleshwar Temple) न केवल अपनी प्राचीनता और वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह हिन्दू धर्म के एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल के रूप में भी जाना जाता है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और यह वह पवित्र स्थल है जहाँ कथानुसार भगवान शिव (Lord Shiva) ने अपने पुत्र गणेश का शीश काटा था।​ ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व ममलेश्वर मंदिर (Mamaleshwar Temple) की स्थापना लगभग चौथी शताब्दी में हुई थी, जो इसे कश्मीर घाटी के प्राचीनतम मंदिरों में से एक बनाती है। यह मंदिर ममलाका गांव में स्थित है, जो पहलगाम से लगभग एक मील की दूरी पर है। मंदिर का नाम ‘ममलेश्वर’ या ‘ममल’ शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘जाओ मत’, जो इस स्थान की पवित्रता और महत्व को दर्शाता है।​ पौराणिक कथा ममलेश्वर मंदिर (Mamaleshwar Temple) से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा है, जिसके अनुसार एक बार देवी पार्वती स्नान करने जा रही थीं। उन्होंने अपने पुत्र गणेश जी (Ganesh Ji) को द्वार पर बैठा दिया और निर्देश दिया कि जब तक वे न लौटें, तब तक किसी को भी अंदर प्रवेश न करने दिया जाए। माता की आज्ञा का पालन करते हुए गणेश जी (Ganesh Ji) बाहर पहरा देने लगे। उसी समय भगवान शिव (Lord Shiva) वहां पहुंचे और पार्वती जी से मिलने के लिए भीतर जाने लगे। लेकिन द्वार पर विराजमान गणेश जी ने उन्हें रोक दिया। शिव जी ने कई बार समझाने की कोशिश की, लेकिन गणेश जी माता की आज्ञा का पालन करते हुए डटे रहे। इससे क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया। जब माता पार्वती बाहर आईं और ये दृश्य देखा, तो वे अत्यंत दुखी और क्रोधित हो गईं। उन्होंने शिव जी को सारी बात समझाई और अपने पुत्र को पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की। शिव जी को अपनी गलती का अहसास हुआ। इसके बाद उन्होंने एक हाथी का सिर लाकर गणेश जी के शरीर से जोड़ा और उन्हें नया जीवन प्रदान किया। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया वास्तुकला और संरचना पहलगाम, जो कश्मीर घाटी का एक बेहद मनमोहक स्थल है, अक्सर ‘धरती का स्वर्ग’ कहा जाता है। लेकिन यह स्थान केवल अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी धार्मिक और आध्यात्मिक महत्ता के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां भगवान शिव (Lord Shiva) और उनके परिवार से जुड़े कई पूजनीय मंदिर और तीर्थस्थल स्थित हैं। इन्हीं में एक प्रमुख मंदिर है ममलेश्वर मंदिर, जिसे स्थानीय लोग ‘मम्मल मंदिर’ के नाम से भी जानते हैं। यह मंदिर पहलगाम गांव में स्थित है और कश्मीर घाटी के प्राचीनतम और प्रमुख शिव मंदिरों में गिना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में लोहरा वंश के राजा जयसिंह द्वारा कराया गया था। उन्होंने मंदिर की छत को एक स्वर्ण कलश से सुशोभित करवाया था। भगवान शिव को समर्पित यह पवित्र स्थल हर वर्ष हजारों भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करता है, जो यहां आकर शिवजी के दर्शन कर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं। इस प्राचीन मंदिर के गर्भगृह में दो सुंदर नंदी की प्रतिमाएं स्थित हैं, और इनके समीप एक शिवलिंग स्थापित है। शिवलिंग के पास ही एक प्राकृतिक जल स्रोत से पानी निकलता है, जो एक छोटे से कुंड में एकत्र होता है, जिससे यह स्थान और भी पवित्र हो जाता है। यह मंदिर ‘मम्मल मंदिर’ नाम से भी प्रसिद्ध है। इस नाम के पीछे एक रोचक पौराणिक कथा है। ‘मम’ का अर्थ होता है ‘मत’ और ‘मल’ का अर्थ होता है ‘जाना’, यानी ‘मत जाओ’। यह नाम प्रतीक है सुरक्षा और संरक्षण का। Latest News in Hindi Today Hindi News Mamaleshwar Temple #MamleshwarTemple #Pahalgam #ShivaTemple #LordShiva #GaneshStory #AncientTemples #PilgrimageIndia #SpiritualTravel #HinduMythology #HistoricTemples

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Kalashtami

कलााष्टमी 2025: भगवान शिव की पूजा से पाएं जीवन में सुख और शांति

प्रत्येक माह की कृष्ण पक्ष की आठवीं तिथि को कालाष्टमी (Kalashtami) का पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यह दिन खासकर भगवान शिव (Lord Shiv) और उनके रौद्र रूप की पूजा अर्चना के लिए समर्पित होता है। इस दिन विशेष रूप से रात्रि को उपवास और शिव पूजा (Shiv Puja) की जाती है, क्योंकि इसे भगवान शिव (Lord Shiv) के नाथ रूप से जोड़कर देखा जाता है।  कालाष्टमी पूजा का शुभ समय  वैदिक पंचांग के अनुसार 20 अप्रैल को शाम 7 बजे से वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत होगी, जो 21 अप्रैल को शाम 06:58 बजे समाप्त होगी। काल भैरव देव की पूजा विशेष रूप से रात के समय की जाती है, जिसे निशा काल कहा जाता है। इस वर्ष वैशाख माह की कालाष्टमी (Kalashtami) 20 अप्रैल को मनाई जाएगी, और निशा काल में पूजा का समय रात 11:58 बजे से 12:42 बजे तक रहेगा। कालाष्टमी (Kalashtami) का महत्व कालाष्टमी (Kalashtami) का पर्व विशेष रूप से भगवान शिव के रौद्र रूप की पूजा के लिए जाना जाता है। यह तिथि उन भक्तों के लिए बेहद शुभ मानी जाती है, जो अपने जीवन में हर तरह के दुखों और परेशानियों से मुक्ति चाहते हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव के रौद्र रूप की पूजा करने से व्यक्ति के जीवन से सारे नकारात्मक प्रभाव समाप्त हो जाते हैं और वह भगवान शिव की विशेष कृपा का पात्र बनता है। साथ ही, इस दिन भगवान शिव के साथ ही उनके वाहन नंदी और उनके पार्थिव रूप, कालभैरव की भी पूजा की जाती है। इसे भी पढ़ें:-  विष्णु भक्ति से मिलेगा अक्षय पुण्य, जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और भोग का महत्व कालाष्टमी पूजा विधि नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Kalashtami #Kalashtami2025 #LordShiva #Kalabhairav #ShivaWorship #HinduFestival #SpiritualPeace #PujaBenefits #KalashtamiPuja #Bhakti #IndianTradition

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Mystery of the Split Shivling – Ancient Mythological Story

दो भागों में विभाजित शिवलिंग की बड़ी अद्भुत है पौराणिक कहानी

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित काठगढ़ महादेव मंदिर अपनी विशिष्टता के लिए प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि यहां स्थापित शिवलिंग दुनिया में सबसे प्राचीन शिवलिंगों में से एक है। इस मंदिर की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि यहां का शिवलिंग दो भागों में विभाजित है, जिसमें एक हिस्सा मां पार्वती का प्रतीक माना जाता है और दूसरा भगवान शिव (Lord Shiva) का। आइए, जानते हैं इस मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा। युद्ध की शुरुआत की पौराणिक कथा शिव पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, एक बार भगवान ब्रह्मा (Lord Brahma) और भगवान विष्णु (Lord Vishnu) के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हो गया। दोनों स्वयं को सर्वोच्च मानते हुए एक-दूसरे का अपमान करने लगे। जब यह विवाद बढ़ने लगा और युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई, तब दोनों ने अपने दिव्यास्त्र निकाल लिए। यदि ये अस्त्र चलाए जाते, तो संपूर्ण सृष्टि प्रलय में समा जाती। इस संकट से जगत की रक्षा करने के लिए भगवान शिव (Lord Shiva) ने अपनी माया रची। अचानक दोनों देवताओं के बीच एक अग्निमय लिंग प्रकट हुआ, जिसकी ज्वालाएं आकाश तक फैल गईं। इस दृश्य को देखकर ब्रह्मा और विष्णु आश्चर्यचकित रह गए और उस लिंग के रहस्य को जानने का प्रयास करने लगे। भगवान ब्रह्मा (Lord Brahma) ने उस लिंग का ऊपरी सिरा खोजने के लिए आकाश की ओर उड़ान भरी, जबकि भगवान विष्णु (Lord Vishnu) ने उसका आधार खोजने के लिए धरती के नीचे जाना शुरू किया। लाखों वर्षों तक प्रयास करने के बाद भी दोनों देवता लिंग का आदि या अंत नहीं खोज पाए। थक-हारकर वे वापस उसी स्थान पर लौट आए, जहां उन्होंने इस दिव्य लिंग को देखा था। वहां उन्हें अचानक “ॐ” की पावन ध्वनि सुनाई देने लगी। इस दिव्य ध्वनि को सुनकर वे समझ गए कि यह कोई अलौकिक शक्ति है। तब दोनों ने इस शक्ति की आराधना करनी शुरू कर दी। भगवान शिव (Lord Shiva) उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर लिंग से प्रकट हुए और कहा कि वे दोनों ही समान रूप से पूज्यनीय हैं, इसलिए व्यर्थ में श्रेष्ठता का विवाद न करें। उन्होंने दोनों देवताओं को सद्बुद्धि का आशीर्वाद दिया और पुनः शिवलिंग के रूप में उसी स्थान पर स्थापित हो गए। इसी कारण शिवलिंग की पूजा का महत्व बढ़ गया। इसे भी पढ़ें:- 22 या 23 मार्च, कब है यह शुभ तिथि? जानें पूजा विधि और महत्व काठगढ़ महादेव शिवलिंग की अनोखी मान्यता कालांतर में यह दिव्य शिवलिंग काठगढ़ महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसकी अनोखी विशेषता यह है कि इसके दो भागों के बीच की दूरी समय के साथ घटती-बढ़ती रहती है। गर्मियों के दौरान यह दो अलग भागों में विभक्त हो जाता है, जबकि सर्दियों में पुनः जुड़कर एकाकार रूप धारण कर लेता है। ईशान संहिता के अनुसार, यह शिवलिंग फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात प्रकट हुआ था। चूंकि भगवान शिव का यह दिव्य लिंग शिवरात्रि के दिन प्रकट हुआ था, इसलिए यह मान्यता प्रचलित है कि इसकी संरचना चंद्रमा की कलाओं के अनुसार प्रभावित होती है। जैसे-जैसे चंद्रमा घटता-बढ़ता है, वैसे ही शिवलिंग के दो भाग भी एक-दूसरे के करीब आते और दूर जाते हैं। शिवरात्रि के पावन दिन यह दोनों भाग एकाकार हो जाते हैं, जिसे शुभ संकेत माना जाता है। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Shiva #ShivlingMystery #ShivlingHistory #MythologicalStory #LordShiva #AncientLegends #HinduMythology #DivineMiracle #ShivaTemple #SacredStories #SpiritualHeritage

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Masik Shivratri 2025

Masik Shivratri: भगवान शिव-पार्वती की कृपा पाने का खास दिन है ‘मसिकशिवरात्रि’

हिंदू धर्म में शिवरात्रि का विशेष महत्व है। यह पर्व भगवान शिव (Lord Shiva) की आराधना और उनकी कृपा प्राप्त करने का अवसर प्रदान करता है। शिवरात्रि दो प्रकार की होती है – एक महाशिवरात्रि और दूसरी मासिक शिवरात्रि (Masik Shivratri) । महाशिवरात्रि साल में एक बार मनाई जाती है, जबकि मासिक शिवरात्रि हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। आइए जानते हैं कि मासिक शिवरात्रि का क्या महत्व है, इसकी पूजा विधि क्या है और इससे जुड़ी कथा क्या है। मासिक शिवरात्रि का शुभ मुहूर्त (Masik Shivratri Puja Muhurat) पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 27 मार्च को रात 11:03 बजे से आरंभ होकर 28 मार्च को शाम 07:55 बजे समाप्त होगी। इस आधार पर, चैत्र माह की मासिक शिवरात्रि (Masik Shivratri) का व्रत गुरुवार, 27 मार्च 2025 को रखा जाएगा। मासिक शिवरात्रि पर भगवान शिव (Lord Shiva) की पूजा मध्य रात्रि में की जाती है।  मासिक शिवरात्रि का महत्व मासिक शिवरात्रि (Masik Shivratri) का हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यह व्रत भगवान शिव (Lord Shiva) और माता पार्वती की पूजा के लिए किया जाता है। मासिक शिवरात्रि के दिन भगवान शिव की विशेष पूजा की जाती है और उनकी कृपा प्राप्त की जाती है। इस व्रत को करने से भक्तों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। मासिक शिवरात्रि का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह व्रत भगवान शिव के प्रति भक्ति और समर्पण का प्रतीक है। इस व्रत को करने से भक्तों को आध्यात्मिक शांति और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। मासिक शिवरात्रि की पूजा विधि इसे भी पढ़ें:- कब और कहां लेंगे भगवान विष्णु कल्कि का अवतार? मासिक शिवरात्रि के लाभ नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Masik Shivratri #MasikShivratri #ShivParvati #LordShiva #ShivratriVrat #ShivPuja #Spirituality #Devotion #HinduFestivals #ShivaBlessings #ShivaBhakti

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