कांवड़ क्यों रखा जाता है कंधे पर? जानिए रावण और शिवभक्ति से जुड़ी पौराणिक कथा
सावन माह में उत्तर भारत की सड़कें उस भक्ति और श्रद्धा की दौड़ से गूंजती हैं, जब लाखों शिवभक्त कांवड़ यात्रा पर निकलते हैं। हाथ में नहीं, बल्कि कंधे पर कांवड़ उठाए हुए। इस यात्रा की धार्मिक परंपरा तो स्पष्ट है—गंगा जल लेकर शिवलिंग पर अर्पित करना—लेकिन कांवड़ कंधे पर क्यों रखी जाती है? क्या इसमें कोई खास रहस्य छिपा है? रोचक रूप से, इसका संबंध मिलता है महर्षि अगस्त्य और लंकापति रावण से जुड़ी एक पौराणिक कथा से। आइये जानते हैं इस रहस्य की गहराई। कांवड़ यात्रा क्या है? कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) एक ऐसी पवित्र परंपरा है, जो सीधे भगवान शिव (Lord Shiva) की भक्ति से जुड़ी हुई है। यह यात्रा उन्हें प्रसन्न करने के उद्देश्य से की जाती है। यह केवल श्रद्धा की नहीं, बल्कि संयम, सहनशीलता और सामूहिक एकता की भी यात्रा है। कांवड़ यात्रा के माध्यम से व्यक्ति न केवल शारीरिक रूप से, बल्कि मानसिक और आत्मिक रूप से भी शुद्ध होता है। इस दौरान कांवड़िए मांस-मदिरा से पूरी तरह दूर रहते हैं और सात्विक जीवनशैली अपनाते हैं। तामसिक भोजन का त्याग किया जाता है और हर गतिविधि में अनुशासन का पालन होता है। कांवड़ यात्रा के ये 10 दिन किसी तपस्या से कम नहीं होते, जो न केवल भक्ति का मार्ग दिखाते हैं, बल्कि जीवन में संयम और साधना का महत्व भी सिखाते हैं। कांवड़ कौन और क्यों कंधे पर रखी जाती है? कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) भगवान शिव के प्रति गहरी आस्था और समर्पण का प्रतीक मानी जाती है। कांवड़ को कंधे पर उठाकर चलना भक्तों के लिए एक प्रकार की तपस्या और आत्मानुशासन का रूप है। इस दौरान वे तमाम शारीरिक कष्टों और थकावट को सहते हैं, लेकिन उनकी भक्ति में कोई कमी नहीं आती। यह प्रतीक है उस दृढ़ निष्ठा का, जो यह दर्शाता है कि शिवभक्त अपने ईष्टदेव के लिए हर प्रकार की चुनौती और कठिनाई का साहसपूर्वक सामना कर सकते हैं। पौराणिक रहस्य: रावण, अगस्त्य और कांवड़ कांवड़ यात्रा की उत्पत्ति से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं हैं, जिनमें सबसे प्रसिद्ध कथा लंकाधिपति रावण की मानी जाती है। रावण को भगवान शिव का अत्यंत भक्त बताया गया है। एक बार उसने शिव को प्रभावित करने के लिए कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास किया, जिससे शिवजी कुपित हो गए। अपनी भूल का एहसास होने पर रावण ने उन्हें प्रसन्न करने के लिए गंगाजल से अभिषेक करने का संकल्प लिया। ऐसा कहा जाता है कि रावण ही वह पहला भक्त था, जिसने गंगाजल को एक विशेष विधि से कांवड़ में भरकर लाया था और उसे कंधे पर उठाकर शिवजी तक पहुंचाया था। उसी परंपरा को निभाते हुए आज भी लाखों श्रद्धालु सावन मास में कांवड़ अपने कंधे पर लेकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। धार्मिक महत्व: ऐसा विश्वास किया जाता है कि कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) से जीवन के सभी पाप समाप्त हो जाते हैं। जब भक्त पवित्र गंगाजल को कांवड़ में भरकर अपने कंधों पर उठाकर चलते हैं, इसलिए कांवड़ यात्रा को एक आध्यात्मिक तपस्या का रूप माना जाता है, जिसके माध्यम से व्यक्ति अपने पापों का प्रायश्चित करता है। इस यात्रा से शिवभक्तों को भगवान शिव की विशेष अनुकंपा प्राप्त होती है। साथ ही उनके जीवन में सकारात्मकता, मानसिक शांति और आत्मिक विकास की अनुभूति होती है। यह पावन यात्रा मोक्ष की ओर अग्रसर होने का भी एक साधन मानी जाती है। इसे भी पढ़ें:- मुखाग्नि से पहले क्यों किया जाता है सुहागिन स्त्री का सोलह श्रृंगार? संकल्प और सेवा — कांवड़ यात्रा का सार कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) सिर्फ धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि स्वेच्छा के अनुसार किए गए तप, संयमित जीवन और दया-भावयुक्त सेवा का प्रतीक है: नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news #KanwarYatra2025 #Sawan2025 #BolBam #HarHarMahadev #LordShiva #ShivBhakti #GangaJal

