Nidhi Sinha

CM Yogi Adityanath approves 'UPCOS'

उत्तर प्रदेश में आउटसोर्स भर्ती के लिए नया नियम: मुख्यमंत्री योगी ने दिया ‘UPCOS’ को मंजूरी

उत्तर प्रदेश सरकार ने आउटसोर्स कर्मचारियों की नियुक्तियों और उनके हितों की रक्षा को लेकर एक बड़ा कदम उठाते हुए एक अहम फैसला लिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Chief Minister Yogi Adityanath) की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक (Cabinet Meeting) में उत्तर प्रदेश आउटसोर्स सेवा निगम (Universal Pharma-Coding System {UPCOS}) के गठन को मंजूरी दे दी गई है। यह निगम कंपनी एक्ट के तहत गठित किया जाएगा और इसका उद्देश्य न केवल आउटसोर्स भर्ती में पारदर्शिता लाना है, बल्कि कर्मचारियों के अधिकारों और सुरक्षा को भी सुनिश्चित करना है। क्या है यूपीकॉस (UPCOS)? UPCOS यानी Uttar Pradesh Corporation for Outsourced Services राज्य का एक नया सरकारी निकाय होगा, जो अब राज्य में होने वाली सभी आउटसोर्स भर्तियों की निगरानी और काम-काज की देखभाल करेगा। यह निगम कंपनी एक्ट के अंतर्गत रजिस्टरकिया जाएगा और एक स्वतंत्र नियामक संस्था (Independent Regulatory Body) की तरह काम करेगा। इसकी स्थापना से पहले आउटसोर्स भर्तियाँ निजी एजेंसियों के माध्यम से की जाती थीं, जिन पर कई बार पारदर्शिता और शोषण के आरोप लगे हैं। भर्ती प्रक्रिया में आएगा बदलाव अब यूपी में आउटसोर्स के ज़रिए की जाने वाली सभी नियुक्तियाँ UPCOS के माध्यम से ही होंगी। इसमें खास बात यह है कि भर्ती में SC, ST, OBC, EWS, महिलाओं, दिव्यांगजनों और पूर्व सैनिकों को आरक्षण का लाभ मिलेगा। इतना ही नहीं तलाकशुदा महिलाओं को भी प्राथमिकता दी जाएगी, जिससे सामाजिक रूप से पिछड़े और हाशिए पर खड़े वर्गों को समान अवसर मिल सके। मुख्य सचिव होंगे अध्यक्ष UPCOS की प्रशासनिक संरचना भी काफी स्पष्ट है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार निगम के अध्यक्ष उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव होंगे। इसके साथ ही एक बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स और एक डायरेक्टर की नियुक्ति की जाएगी। राज्य स्तर पर ही नहीं, मंडल और जिला स्तर पर भी भर्ती समितियों का गठन किया जाएगा, ताकि स्थानीय स्तर पर भर्ती की प्रक्रिया सुचारु रूप से हो सके। भर्ती के लिए निजी एजेंसियों का चयन GeM (Government e-Marketplace) पोर्टल के जरिए किया जाएगा और ये एजेंसियाँ 3 साल की अवधि के लिए नियुक्त की जाएंगी। भर्ती में अनुभव को भी प्राथमिकता दी जाएगी। UPCOS की एक खास भूमिका यह भी होगी कि यह रेगुलेटरी बॉडी की तरह काम करेगा। इसका मतलब है कि यह निगम केवल भर्ती ही नहीं करेगा, बल्कि भर्ती एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी नजर रखेगा। यदि कोई एजेंसी नियमों का उल्लंघन करती है, तो निगम उन्हें ब्लैकलिस्ट, डिबार या दंडित कर सकेगा। इस कदम से एजेंसियों की जवाबदेही सुनिश्चित होगी और कर्मचारियों के साथ शोषण या भेदभाव की घटनाओं पर अंकुश लगेगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यह भी स्पष्ट निर्देश दिया है कि नियमित पदों पर आउटसोर्स कर्मचारियों की नियुक्ति नहीं की जाएगी, ताकि सरकारी ढांचे की स्थिरता बनी रहे और नियमित नियुक्तियाँ बाधित न हों। इसे भी पढ़ें:-  क्या बिहार चुनाव में ओवैसी को गठंबंधन का हिस्सा न बनाना लालू को पड़ सकता है भारी? क्यों जरूरी था UPCOS का गठन? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Chief Minister Yogi Adityanath) ने बताया कि पिछले काफी समय से आउटसोर्स कर्मियों की शिकायतें सामने आ रही थीं। वेतन कटौती, EPF/ESI का लाभ न मिलना, ओवरटाइम के बावजूद भुगतान न होना और अनुचित कार्य-घंटों जैसी समस्याएं आम थीं। इन समस्याओं के पीछे मुख्य रूप से भर्ती एजेंसियों की लापरवाही और मनमानी थी। इन समस्याओं को ध्यान में रखते हुए सरकार ने यह निर्णय लिया कि एक केंद्रीकृत और पारदर्शी प्रणाली बनाई जाए जो कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा कर सके।  सामाजिक न्याय की दिशा में कदम UPCOS सामाजिक न्याय की दिशा में एक बेहतर निर्णय माना जा रहा है । इसमें वंचित वर्गों को न केवल भागीदारी दी गई है, बल्कि उन्हें प्राथमिकता भी दी गई है। इस तरह राज्य सरकार यह संदेश देना चाहती है कि विकास और अवसर सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध होने चाहिए। उत्तर प्रदेश में UPCOS का गठन आउटसोर्स भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी, निष्पक्ष और जवाबदेह बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। इससे न केवल आउटसोर्स कर्मियों को अधिकार मिलेगा, बल्कि भर्ती प्रणाली में अनुशासन और स्थिरता भी आएगी। यह योजना सामाजिक समानताऔर श्रमिक हितों की रक्षा का एक संतुलित मॉडल पेश करती है, जो अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणा बन सकती है।  Latest News in Hindi Today Hindi news Yogi Adityanath #UPCOS #YogiAdityanath #UttarPradeshJobs #OutsourcingRecruitment #UPJobs #UPNews #GovernmentJobs

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SSC JE 2025

SSC Junior Engineer Recruitment 2025: इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स के लिए सुनहरा अवसर

अगर आपने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है और सरकारी नौकरी की तलाश कर रहे हैं, तो आपके लिए यह खबर बेहद महत्वपूर्ण है। स्टाफ सिलेक्शन कमीशन (SSC) ने जूनियर इंजीनियर (JE) के पदों पर भर्ती के लिए नोटिफिकेशन जारी किया है। SSC जूनियर इंजीनियर रिक्रूटमेंट 2025 (SSC Junior Engineer Recruitment 2025) भर्ती सिविल, मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के डिप्लोमा या डिग्री होल्डर्स के लिए सुनहरा मौका लेकर आई है। इच्छुक और योग्य उम्मीदवार SSC की आधिकारिक वेबसाइट ssc.gov.in पर जाकर आवेदन कर सकते हैं। आवेदन की अंतिम तिथि 21 जुलाई 2025 निर्धारित की गई है, इसलिए उम्मीदवारों को सलाह दी जाती है कि वे समय रहते आवेदन प्रक्रिया पूरी कर लें। पदों की संख्या SSC की इस भर्ती प्रक्रिया (SSC Recruitment Process) के तहत कुल 1340 पदों के लिए वैकेंसी आई है। ये सभी पद जूनियर इंजीनियर (Junior Engineer) के हैं और इनका वर्गीकरण सिविल, मैकेनिकल तथा इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के अनुसार किया गया है। यह संख्या अस्थायी है और आवश्यकता के अनुसार इसमें बदलाव भी किये जा सकते हैं।  कौन कर सकता है आवेदन? इस भर्ती के लिए वे सभी उम्मीदवार आवेदन कर सकते हैं जिन्होंने किसी मान्यता प्राप्त संस्थान से सिविल, मैकेनिकल या इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा या डिग्री प्राप्त की हो। इसके साथ ही उम्मीदवारों की आयु सीमा और अन्य पात्रता मापदंडों की विस्तृत जानकारी के लिए आयोग द्वारा जारी आधिकारिक नोटिफिकेशन को ध्यानपूर्वक पढ़ना आवश्यक है। आवेदन प्रक्रिया – स्टेप बाय स्टेप गाइड SSC JE भर्ती के लिए आवेदन ऑनलाइन मोड में किया जा सकता है। यहां नीचे बताए गए स्टेप्स को फॉलो करके उम्मीदवार आसानी से आवेदन कर सकते हैं: आवेदन शुल्क चयन प्रक्रिया SSC JE भर्ती की चयन प्रक्रिया में मुख्यतः दो चरण होते हैं: इसे भी पढ़ें:- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस स्पेशलिस्ट कैसे बनें? क्यों है SSC JE एक बेहतर करियर विकल्प? SSC JE सरकारी क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित पद है। इसमें न सिर्फ स्थिरता मिलती है, बल्कि अच्छी सैलरी, प्रमोशन की संभावना, और विभिन्न भत्तों का भी लाभ मिलता है। यह पद तकनीकी पृष्ठभूमि से आने वाले युवाओं को देश की आधारभूत संरचना के विकास में योगदान देने का अवसर प्रदान करता है। सरकारी नौकरी (Government Jobs) की तैयारी कर रहे इंजीनियरिंग स्नातकों के लिए SSC JE 2025 भर्ती (SSC Junior Engineer Recruitment 2025) एक सुनहरा अवसर है। भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी और मेरिट-आधारित होती है, जिससे योग्य उम्मीदवारों को उनकी मेहनत का पूरा फल मिलता है। इच्छुक उम्मीदवारों को सलाह दी जाती है कि वे आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर पूरी जानकारी प्राप्त करें और अंतिम तिथि से पहले आवेदन कर दें। Latest News in Hindi Today Hindi SSC Junior Engineer Recruitment 2025 #SSCJE2025 #SSCRecruitment #JuniorEngineer #EngineeringJobs #GovernmentJobs #SSCJEVacancy #JE2025

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National Career Service Portal

National Career Service: इस वेबसाइट पर है लाखों में है जॉब वैकेंसी, आपको भी मिल सकती है नौकरी यहां? 

भारत में नौकरी की तलाश करना अब पहले से कहीं ज्यादा आसान हो गया है। देशभर में लाखों लोग हर साल नौकरी की तलाश में रहते हैं, चाहे वो कॉलेज से पासआउट हुए फ्रेशर हों या फिर अनुभवी प्रोफेशनल्स, जो करियर में बदलाव चाहते हैं। ऐसे ही लोगों के लिए भारत सरकार ने एक बड़ी और उपयोगी पहल की है। श्रम एवं रोजगार मंत्रालय द्वारा लॉन्च किया गया नेशनल कैरियर सर्विस पोर्टल (National Career Service Portal) अब देशभर में नौकरी तलाशने वालों के लिए एक भरोसेमंद और प्रभावशाली मंच बन चुका है। क्या है NCS पोर्टल? NCS पोर्टल (National Career Service Portal) एक सरकारी प्लेटफ़ॉर्म है जिसे श्रम और रोजगार मंत्रालय द्वारा विकसित और संचालित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य देश में बेरोजगारी (Unemployment) को कम करना और युवाओं को उचित अवसर प्रदान करना है। यह पोर्टल एक ऐसा माध्यम है जहां सरकारी और निजी क्षेत्र की 33 लाख से ज्यादा नौकरियों की जानकारी एक ही स्थान पर उपलब्ध है। इस पोर्टल पर जॉब सीकर्स (नौकरी ढूंढने वाले), एंप्लॉयर्स, ट्रेनिंग प्रोवाइडर्स और करियर काउंसलर (Career Counselor) जैसी सभी के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। यह पोर्टल पारदर्शिता, पहुंच और सुविधा के तीन प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित है। National Career Service Portal पर कैसे करें रजिस्ट्रेशन? इस पोर्टल का इस्तेमाल करने के लिए आपको सबसे पहले ncs.gov.in पर जाकर खुद को रजिस्टर करना होगा। रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया काफी आसान है: कैसे खोजें और अप्लाई करें नौकरी? रजिस्ट्रेशन के बाद यूजर अपनी प्रोफाइल में जाकर अपनी योग्यताओं और रुचियों के आधार पर नौकरियाँ खोज सकते हैं। पोर्टल में विभिन्न फ़िल्टर विकल्प उपलब्ध हैं जैसे: जब कोई उपयुक्त जॉब (Job vacancies) मिल जाती है, तो बस एक क्लिक में आप “Apply Now” बटन दबाकर उस नौकरी के लिए आवेदन कर सकते हैं। आपको रिज्यूमे भी पोर्टल पर अपलोड करना होता है, जिससे नियोक्ता आपसे संपर्क कर सकें। View this post on Instagram A post shared by JaiRashtra_News (@jairashtranews) NCS पोर्टल की प्रमुख सुविधाएँ: इसे भी पढ़ें:- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस स्पेशलिस्ट कैसे बनें? किन्हें होगा सबसे ज्यादा फायदा? नेशनल कैरियर सर्विस पोर्टल (National Career Service Portal) नौकरी की तलाश में लगे लाखों युवाओं के लिए एक क्रांतिकारी पहल है। इसके माध्यम से देशभर में फैली लाखों नौकरियों की जानकारी एक ही स्थान पर मिल जाती है। यह पोर्टल न सिर्फ जॉब सर्च को आसान बनाता है, बल्कि युवाओं को सही दिशा में करियर गाइडेंस (Career Guidance) भी देता है। अगर आप भी नौकरी की तलाश में हैं या करियर में नया मुकाम पाना चाहते हैं, तो अभी ncs.gov.in पर जाकर रजिस्टर करें और अपने सपनों की नौकरी की ओर पहला कदम बढ़ाएं। Latest News in Hindi Today Hindi National Career Service #NationalCareerServicePortal #NCS #Jobs #Governmentjob #Privatejob

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AAP to Contest Bihar Election 2025 Alone

Bihar Assembly Election 2025: आम आदमी पार्टी अकेले लड़ेगी चुनाव, अरविंद केजरीवाल ने किया बड़ा ऐलान

बिहार में इस साल के अंत तक विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election) होने वाला है। और चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज़ हो चुकी हैं। सभी राजनीतिक दल अपनी रणनीतियां बना चुकी हैं और चुनाव में विजय होने के लिए अपनी-अपनी स्ट्रेटजी पर काम भी कर रही है। इस बीच आम आदमी पार्टी (AAP) के संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) ने बिहार की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। गुरुवार को दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में केजरीवाल ने साफ ऐलान किया कि उनकी पार्टी बिहार विधानसभा चुनाव 2025 (Bihar Assembly Election 2025) में सभी 243 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी यानी किसी भी दूसरी पार्टी के साथ कोई गठबंधन नहीं होगा। AAP लड़ेगी बिना किसी गठबंधन के चुनाव अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा है कि आम आदमी पार्टी (AAP) अब किसी भी गठबंधन का हिस्सा नहीं है। उन्होंने कहा है कि INDIA गठबंधन सिर्फ लोकसभा चुनाव तक सीमित था। बिहार विधानसभा चुनाव अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) में हम किसी दल से गठबंधन नहीं करेंगे और अपने दम पर मैदान में उतरेंगे। अब इससे ये साफ हो गया है कि आम आदमी पार्टी बिहार की राजनीति में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने की तैयारी में है। दिल्ली और पंजाब में सत्ता में रह चुकी AAP अब दूसरे राज्यों में भी अपने पांव जमाने की कोशिश कर रही है। भाजपा नेता अजय आलोक ने कसा तंज AAP के इस फैसले पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। BJP नेता अजय आलोक (Ajay Alok) ने अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) पर तंज कस्ते हुए कहा है कि कपटीवाल जी बिहार में 243 सीटों पर लड़ने की बात कर रहे हैं, जबकि दिल्ली में ही जनता ने उन्हें नकार दिया। दिल्ली और पंजाब की जनता केजरीवाल की सच्चाई जान चुकी है। अब बिहार में भी उन्हें अपनी औकात का अंदाजा हो जाएगा। अजय आलोक ने AAP की पंजाब सरकार पर भी निशाना साधते हुए कहा कि तीन साल में पंजाब पर डेढ़ लाख करोड़ रुपये का कर्ज चढ़ चुका है और केजरीवाल सरकार वहां की संपत्ति को ATM की तरह इस्तेमाल कर रही है। उन्होंने चुनौती देते हुए कहा है कि आइए बिहार में चुनाव (Bihar Election) लड़िए, आपको आपकी राजनीतिक हैसियत का अंदाजा खुद ही हो जाएगा। बिहार चुनाव: सियासी जमीन तैयार बिहार में इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election) को लेकर राज्य की राजनीति बेहद गर्म है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD), जनता दल (JDU), भाजपा (BJP) और कांग्रेस (Congress) के साथ-साथ अब आम आदमी पार्टी और जन सुराज जैसे नए दल भी चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में हैं। चुनाव आयोग ने हाल ही में जन सुराज पार्टी को स्कूल बैग (School Bag) चुनाव चिन्ह आवंटित किया है। यह प्रतीक शिक्षा और प्रगति का प्रतिनिधित्व करता है, जो पार्टी की विचारधारा के अनुरूप है। जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर (Prashant Kishor), जिन्हें देश के प्रमुख चुनावी रणनीतिकारों में गिना जाता है, अब स्वयं सक्रिय राजनीति में उतर चुके हैं और बिहार की सियासत में नई ऊर्जा लाने का दावा कर रहे हैं। इसे भी पढ़ें:- कांवड़ यात्रा में दुकानों के लाइसेंस मुद्दे पर बोले ओवैसी, कहा- “क्‍या पैंट उतरवा देंगे” आम आदमी पार्टी (AAP) की चुनौती और रणनीति दिल्ली और पंजाब में अपने प्रदर्शन के दम पर AAP अब बिहार में भी बदलाव की राजनीति का संदेश देना चाहती है। पार्टी शिक्षा, स्वास्थ्य और भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी नीति को बिहार में भी दोहराने की तैयारी में है। हालांकि राज्य की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां दिल्ली या पंजाब से अलग हैं, जहां जातीय समीकरण और क्षेत्रीय मुद्दे निर्णायक भूमिका निभाते हैं। AAP के लिए सबसे बड़ी चुनौती जमीनी स्तर पर संगठन खड़ा करना और विश्वसनीय स्थानीय नेतृत्व तैयार करना होगी। फिलहाल बिहार में AAP की कोई मजबूत उपस्थिति नहीं रही है, लेकिन पार्टी नेतृत्व को उम्मीद है कि दिल्ली मॉडल और केजरीवाल की लोकप्रियता के दम पर वो जनता को आकर्षित कर सकते हैं। अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) का बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election) में अकेले उतरने का फैसला राज्य की राजनीति को एक नया मोड़ दे सकता है। जहां एक ओर यह फैसला विपक्षी एकता को झटका दे सकता है, वहीं दूसरी ओर AAP के लिए यह एक बड़ा जोखिम भी है। पार्टी को बिहार जैसे राज्य में अपना आधार बनाने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी, क्योंकि यहां की राजनीति पुराने और गहरे जमीनी समीकरणों पर आधारित है। आने वाले महीनों में AAP की रणनीति, उम्मीदवार चयन और प्रचार अभियान यह तय करेंगे कि क्या पार्टी बिहार की राजनीति में कोई निर्णायक भूमिका निभा सकती है या नहीं। फिलहाल इतना तय है कि केजरीवाल के इस ऐलान ने बिहार चुनाव (Bihar Election) की बहस को और गर्म कर दिया है। Latest News in Hindi Today Hindi news AAP #biharelection2025 #aap #arvindkejriwal #biharpolitics #aapbihar

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90 करोड़ का कर्ज और 2000 करोड़ की संपत्ति: नेशनल हेराल्ड केस में सोनिया-राहुल गांधी पर ED के गंभीर आरोप

नेशनल हेराल्ड मामले में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट में इस बहुचर्चित केस की सुनवाई बुधवार को शुरू हुई। प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एसवी राजू ने कोर्ट में जो दलीलें रखीं, उन्होंने राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर हलचल पैदा कर दी है। नेशनल हेराल्ड केस (National Herald case) में कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और सांसद राहुल गांधी (Sonia Gandhi and Rahul Gandhi) समेत कई वरिष्ठ नेताओं को आरोपी बनाया गया है। क्या है नेशनल हेराल्ड मामला? नेशनल हेराल्ड अखबार (National Herald Newspaper) की स्थापना पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1938 में की थी। इसका प्रकाशन एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL) के जरिए होता था। समय के साथ अखबार का संचालन बंद हो गया, लेकिन AJL के पास देशभर में करीब 2000 करोड़ रुपये की संपत्तियां थीं। आरोप है कि कांग्रेस पार्टी (Congress Party) ने AJL को 90 करोड़ रुपये का कर्ज दिया, जो बाद में वापस नहीं लिया गया। इसके बाद 2010 में यंग इंडिया (Young India) नाम की कंपनी बनाई गई, जिसमें सोनिया गांधी और राहुल गांधी (Sonia Gandhi and Rahul Gandhi) की 76 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इसी यंग इंडिया को AJL के सारे शेयर ट्रांसफर कर दिए गए, जिससे संपत्ति का मालिकाना हक कांग्रेस नेताओं के पास चला गया। ईडी का आरोप: कर्ज के बहाने संपत्ति पर कब्जा ASG एसवी राजू ने कोर्ट में कहा कि यह पूरा मामला एक योजनाबद्ध साजिश का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि AJL घाटे में चल रही कंपनी थी, लेकिन संपत्ति थी। कांग्रेस पार्टी (Congress Party) ने उसे 90 करोड़ रुपये का कर्ज दिया और बाद में ‘यंग इंडिया’ कंपनी के जरिए इस कर्ज के नाम पर 2000 करोड़ की संपत्ति अपने नियंत्रण में ले ली। ईडी (ED) के अनुसार यह पूरा लेनदेन कागजों पर ही हुआ और असल में न कर्ज की वसूली हुई, न कोई वाणिज्यिक उद्देश्य था। सिर्फ राजनीतिक और निजी लाभ के लिए इसे अंजाम दिया गया। किराया और चंदे में फर्जीवाड़े के आरोप ED ने यह भी दावा किया कि AJL को कई सालों तक फर्जी किराया और चंदा मिलता रहा, जिसे कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के निर्देश पर ट्रांसफर किया गया। एजेंसी ने कहा कि ये पैसे भी एक प्रकार से अपराध की आय (Proceeds of crime) हैं। तफ्तीश के दौरान यह बात भी सामने आई कि कुछ नामी नेताओं जैसे डीके शिवकुमार, रेवंत रेड्डी और दिवंगत नेता ऑस्कर फर्नांडिस और मोतीलाल वोरा ने भी इस मामले में चंदा या शेयर ट्रांसफर के रूप में भूमिका निभाई थी। कोर्ट में क्या हुआ? सुनवाई के दौरान जब कोर्ट ने पूछा कि क्या यह मामला अभी केवल अपराध के संज्ञान तक सीमित है, तो ASG राजू ने कहा कि हां, इस चरण पर सिर्फ संज्ञान लिया जाना चाहिए। समन की प्रक्रिया बाद में डिस्चार्ज एप्लिकेशन पर निर्भर करेगी। उन्होंने कोर्ट को यह भी बताया कि वे जल्द ही अपनी बहस पूरी करेंगे, जिसके बाद अगली प्रक्रिया शुरू की जाएगी। कांग्रेस का पक्ष कांग्रेस पार्टी (Congress Party) इन आरोपों को पहले से ही राजनीतिक बदले की कार्रवाई बता रही है। पार्टी का कहना है कि यह मामला 2012 से ही राजनीतिक प्रतिशोध का प्रतीक बन चुका है, और यह केवल विपक्षी नेताओं को दबाने की एक रणनीति है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी (Congress Leader Rahul Gandhi) ने पहले भी संसद और सार्वजनिक मंचों से यह बात कही है कि बीजेपी उनके और उनके परिवार के खिलाफ झूठे मामलों का सहारा ले रही है, ताकि वे जनता के असली मुद्दों से ध्यान भटका सकें। इसे भी पढ़ें:- विजय दिवस के पहले नारायण राणे ने राज को याद दिलाया उद्धव का किया अपमान, कही यह बात  मामला कैसे शुरू हुआ? यह केस सबसे पहले बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी (BJP Leader Subramanian Swamy) की शिकायत पर 2012 में सामने आया था। उन्होंने आरोप लगाया कि यंग इंडिया के जरिए गांधी परिवार ने 2000 करोड़ रुपये की संपत्ति पर अवैध रूप से कब्जा किया है। इसके बाद मामला कोर्ट और ईडी (ED) के पास गया और अब सालों बाद इसकी सुनवाई एक निर्णायक मोड़ पर पहुंची है। आगे क्या हो सकता है? कोर्ट में अभी केवल प्रारंभिक बहस हो रही है, लेकिन अगर मामले में अपराध का संज्ञान लिया जाता है और समन जारी होता है, तो सोनिया गांधी और राहुल गांधी (Sonia Gandhi and Rahul Gandhi) को अदालत में पेश होना पड़ सकता है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या अदालत इस पूरे प्रकरण को केवल वित्तीय लेनदेन मानेगी या इसके पीछे राजनीतिक साजिश की परतें भी खोलेगी? नेशनल हेराल्ड मामला (National Herald case) एक बार फिर सुर्खियों में है और यह देखना दिलचस्प होगा कि कानूनी प्रक्रिया आगे क्या मोड़ लेती है। क्या गांधी परिवार निर्दोष साबित होंगे या यह मामला उनके राजनीतिक करियर पर एक और बोझ बन जाएगा? इस केस की हर सुनवाई अब राजनीतिक और कानूनी दृष्टिकोण से अहम होती जा रही है। Latest News in Hindi Today Hindi news  Rahul Gandhi #SoniaGandhi #RahulGandhi #NationalHeraldCase #EDInvestigation #Congress #2000CroreAssets #90CroreDebt #BreakingNews #IndianPolitics

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app-based cab services

App-based Cab Services अब होगी महंगी: क्या है केंद्र सरकार की नई गाइडलाइन्स? 

आज के डिजिटल दौर में ओला (Ola), उबर (Uber) और रैपिडो (Rapido) जैसी ऐप-आधारित कैब सेवाएं (App-based Cab Services) आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुकी हैं। ऑफिस जाना हो, स्टेशन पहुंचना हो या किसी भी जगह जाने के लिए कैब चाहिए तो इन अलग-अलग कैब सेवाओं (Cab Service) की मदद से कहीं भी आना-जानाआसान बना दिया है। लेकिन अब इन सेवाओं का उपयोग आपकी जेब पर पहले से ज्यादा बोझ डाल सकता है। हाल ही में केंद्र सरकार (Central Government)  द्वारा जारी की गई नई गाइडलाइन्स से यह साफ होता है कि आने वाले दिनों में कैब और बाइक, टैक्सी की सवारी महंगी हो सकती है। App-based Cab Services: क्या हैं नई गाइडलाइन्स? सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) ने राज्यों को निर्देश दिया है कि वे आगामी तीन महीनों में नई कैब एग्रीगेटर पॉलिसी (Cab Aggregator Policy) को लागू करें। इसके तहत ऐप-आधारित टैक्सी कंपनियों (App-based Cab Services) को पीक ऑवर्स (Peak Hours) के दौरान बेस फेयर का दो गुना तक किराया वसूलने की अनुमति दी गई है। इसे सर्ज प्राइजिंग कहा जाता है। अब तक यह सीमा 1.5 थी यानी अगर किसी शहर में बेस फेयर 100 रुपये है, तो कंपनियां 150 रुपये तक चार्ज कर सकती थीं। लेकिन अब यह सीमा 200 रुपये तक बढ़ सकती है, जिससे उपभोक्ताओं को अधिक भुगतान करना पड़ सकता है। क्यों लिया गया यह फैसला? सरकार का कहना है कि यह फैसला कैब एग्रीगेटर्स को पीक ऑवर्स में ज्यादा ड्राइवर उपलब्ध कराने के लिए प्रोत्साहित करेगा, जिससे यात्रियों को लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। साथ ही कंपनियों को अधिक लचीलापन (Flexibility) मिलेगा ताकि वे मांग के अनुसार सेवाएं दे सकें। बाइक टैक्सी सेवा को मिली मंजूरी नई गाइडलाइन में एक और अहम फैसला लिया गया है। अब नॉन-ट्रांसपोर्ट व्हीकल्स (Non-Transport Vehicle) यानी सफेद नंबर प्लेट वाली निजी बाइक्स को भी शेयर्ड मोबिलिटी सर्विस देने की अनुमति दे दी गई है। पहले केवल येलो नंबर प्लेट वाली कमर्शियल बाइक्स (Commercial bike) ही टैक्सी सेवा (Taxi Service) दे सकती थीं, जिसके लिए भारी-भरकम टैक्स और रजिस्ट्रेशन की जरूरत होती थी। इस फैसले के तहत कोई भी आम नागरिक, जिसके पास निजी बाइक है अब वे ओला (Ola), उबर (Uber) या रैपिडो (Rapido) जैसे प्लेटफॉर्म पर ट्रेवलर्स को लिफ्ट दे सकते हैं जिससे उनकी अर्निंग भी हो सकती है। इससे रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। राज्य सरकारें अब इन सेवाओं पर रोजाना, एक सप्ताह या फिर 15 दिनों पर फीस लगा सकती है, जिससे राजस्व भी बढ़ेगा। राइड कैंसिलेशन पर कड़ा जुर्माना नई गाइडलाइन में एक और बड़ा बदलाव यह है कि बिना वजह राइड कैंसिल (Ride Cancellation) करने पर ड्राइवर या यूज़र, दोनों पर 10% या ज्यादा से ज्यादा 100 रुपये तक का जुर्माना लगाया जाएगा। इससे यात्रियों और ड्राइवरों दोनों की जिम्मेदारी तय होगी और सेवा की गुणवत्ता में सुधार आएगा। ड्राइवरों के लिए इंश्योरेंस और ट्रेनिंग जरूरी ड्राइवरों की सुरक्षा और कल्याण को ध्यान में रखते हुए सरकार ने सभी कैब ड्राइवरों के लिए अनिवार्य कर दिया है कि: उन्हें 5 रुपये लाख का हेल्थ इंश्योरेंस (Health Insurance) और 10 लाख रुपये का टर्म लाइफ इंश्योरेंस (Term Life Insurance) मिलेगा। इसके साथ ही उन्हें हर साल ट्रेनिंग लेना भी अनिवार्य होगा, जिससे न सिर्फ ड्राइवरों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि सर्विस भी बेहतर होगी। क्या कहना है सर्विस प्रोवाइडर का?  मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार रैपिडो (Rapido) ने इन गाइडलाइन्स को विकसित भारत की दिशा में मील का पत्थर कहा है और दावा किया है कि इससे कनेक्टिविटी बेहतर होगी। वहीं उबर ने भी इस फैसले का स्वागत किया है और उम्मीद जताई है कि सभी राज्य समय पर इस गाइडलाइन को लागू करेंगे। इसे भी पढ़ें:- कौन सा रिचार्ज प्लान आपके लिए हो सकता है बेस्ट? क्या होगा आम जनता पर असर? इन गाइडलाइन्स का मिला-जुला असर देखा जा सकता है: सरकार द्वारा लागू की गई यह नई कैब पॉलिसी उपभोक्ताओं, ड्राइवरों और कंपनियों के लिए कई तरह के बदलाव लेकर आई है। हालांकि इससे तत्काल प्रभाव में यात्रा महंगी हो सकती है, लेकिन क्या यह नीतियां स्मार्ट मोबिलिटी, पर्यावरण संरक्षण और रोजगार सृजन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती हैं या नहीं ये तो आने वाले समय में पता चलेगा।  Latest News in Hindi Today Hindi Rapido #cabfarehike2025 #appbasedcabs #govtrules #cabservicesindia #ridenews #taxihike #centralgovt #cabguidelines

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Indore digital city

इंदौर बनेगा देश का पहली डिजिटल सिटी: हर घर को मिलेगा यूनिक डिजिटल एड्रेस

भारत के सबसे स्वच्छ शहर के रूप में प्रसिद्ध इंदौर अब एक और बड़ी उपलब्धि की ओर अग्रसर है। मध्य प्रदेश का यह शहर देश की पहली डिजिटल सिटी (Digital City) बनने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है। स्वच्छता में छह बार नंबर वन रह चुके इंदौर ने अब टेक्नोलॉजी और स्मार्ट गवर्नेंस को मिलाकर नागरिक सुविधाओं को पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी बनाने की योजना शुरू कर दी है। यह परियोजना न केवल प्रशासनिक व्यवस्था को आधुनिक बनाएगी, बल्कि प्रत्येक नागरिक को डिजिटल पहचान देने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। क्या है डिजिटल सिटी प्रोजेक्ट? इस परियोजना के तहत इंदौर के हर घर को एक यूनिक डिजिटल एड्रेस (Digital Address) दिया जाएगा, जो GPS आधारित होगा। इस यूनिक एड्रेस (Unique Address) को एक QR कोड (QR Code) के माध्यम से घर के बाहर लगाया जाएगा। इस क्यूआर कोड (QR Code) को कोई भी व्यक्ति अपने स्मार्टफोन से स्कैन (Scan) करेगा तो संबंधित संपत्ति की विस्तृत जानकारी तुरंत मोबाइल स्क्रीन (Mobile Screen) पर दिखेगी। इस डिजिटल पते में शामिल होगी: यह सभी जानकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म (Digital Platform) पर उपलब्ध होगी, जिससे नागरिकों को सेवाएं पाने में सुविधा होगी और नगर निगम की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता आएगी। वार्ड 82 से शुरुआत, पूरे शहर को कवर करने की तैयारी इंदौर में इस डिजिटल सिटी प्रोजेक्ट (Digital City Project) की शुरुआत वार्ड 82 से की गई है। पहले दिन इस योजना के तहत 20 घरों को जोड़ा गया और इसकी शुरुआत सुदामा नगर में साहित्यकार सदाशिव कौतुक के घर से की गई। महापौर पुष्यमित्र भार्गव के अनुसार अगले 20 दिनों में पूरे वार्ड के लगभग 7,000 घरों को इस योजना के तहत शामिल कर लिया जाएगा। इसके बाद इंदौर के बाकी 81 वार्डों में यह योजना एक साथ लागू की जाएगी, जिससे अगले दो महीनों में इंदौर पूरी तरह डिजिटल सिटी (Digital City Indore) बन जाएगा। दावा-आपत्ति और नागरिक शिकायतों के लिए भी तय समय सीमा के भीतर समाधान का प्रावधान रखा जाएगा, जिससे जनता की सहभागिता सुनिश्चित हो सके। डिजिटल एड्रेस (Digital Address) का क्या होगा फायदा? स्मार्ट गवर्नेंस (Smart Governance): नगर निगम को अब घर-घर जाकर जानकारी जुटाने की ज़रूरत नहीं होगी। QR कोड स्कैन (QR Code Scan) कर अधिकारी सीधे डिजिटल डेटा देख सकेंगे। नागरिकों को सुविधा: लोगों को अब सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। पानी-बिजली के बिल, टैक्स की स्थिति, अस्पताल से संबंधित सेवाएं एक क्लिक पर मिलेंगी। ट्रांसपरेंसी: डिजिटल रिकॉर्ड (Digital Record) होने से टैक्स चोरी पर रोक लगेगी और शहरी विकास में वास्तविक आंकड़ों के आधार पर निर्णय लिए जा सकेंगे। आपातकालीन सेवाएं तेज़: किसी भी मकान की सही लोकेशन को क्यूआर कोड (QR Code) के ज़रिए तत्काल साझा किया जा सकेगा, जिससे एम्बुलेंस या फायर सर्विस जैसी सेवाएं जल्दी पहुंच सकेंगी। डिजिपिन से कनेक्टिविटी: यह पूरा प्रोजेक्ट केंद्र सरकार के डिजिपिन प्लेटफॉर्म (Digipin Platform) से जुड़ा है। डिजिपिन यानी डिजिटल पिन (Digital Pin) के ज़रिए नागरिकों की पहचान और लोकेशन को एक साथ जोड़ दिया जाएगा। इसे भी पढ़ें:- विजय दिवस के पहले नारायण राणे ने राज को याद दिलाया उद्धव का किया अपमान, कही यह बात  डिजिटल भारत की दिशा में अहम कदम इंदौर का यह प्रयास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) की डिजिटल इंडिया मुहिम (Digital India campaign) के तहत एक बड़ा मॉडल बन सकता है। जहां देशभर के शहर डिजिटल गवर्नेंस को लेकर योजनाएं बना रहे हैं, वहीं इंदौर इस पर वास्तविक काम कर रहा है और उदाहरण पेश कर रहा है। इससे पहले इंदौर ने स्मार्ट वेस्ट मैनेजमेंट, सफाई ऐप्स और डिजिटल बिलिंग जैसी कई योजनाओं को सफलतापूर्वक लागू किया है। अब डिजिटल एड्रेसिंग प्रणाली से यह शहर न सिर्फ स्मार्ट बनेगा, बल्कि यह भारत के अन्य शहरों को भी नई दिशा दिखाएगा। इंदौर का डिजिटल सिटी (Digital City) बनने का यह प्रयास सिर्फ एक तकनीकी पहल नहीं है, बल्कि यह सिटी गवर्नेंस और नागरिक सुविधा का आधुनिक मॉडल बन रहा है। हर घर का डिजिटल एड्रेस (Digital Address) न केवल प्रशासनिक प्रक्रियाओं को आसान बनाएगा, बल्कि नागरिकों के लिए भी जीवन अधिक सुगम और सुविधाजनक होगा। अगर यह मॉडल सफल रहता है, तो आने वाले समय में देश के अन्य शहर भी इस दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। डिजिटल युग में इंदौर एक बार फिर देश को रास्ता दिखा रहा है और इस बार स्वच्छता नहीं, स्मार्ट नागरिक सेवाओं के जरिए। Latest News in Hindi Today Hindi news  Prime Minister Narendra Modi #indoredigitalcity #firstdigitalcity #smartcityindia #digitaladdress #indorenews

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Priyank Kharge Vows RSS Ban if Govt

केंद्र की सत्ता में आने के बाद RSS को बैन किया जाएगा: प्रियांक खड़गे

कर्नाटक के कैबिनेट मंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के बेटे प्रियांक खड़गे (Priyank Kharge) ने हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को लेकर जो टिप्पणी की है, उसने देश की सियासत में एक बार फिर तीखा मोड़ ला दिया है। प्रियांक ने RSS को राष्ट्रविरोधी मशीनरी बताते हुए कहा कि अगर उन्हें मौका मिला तो वे इस संगठन पर प्रतिबंध लगाएंगे और इसे खत्म करने के लिए हर तरीका अपनाएंगे। यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में राजनीतिक ध्रुवीकरण तेजी से बढ़ रहा है और चुनावी माहौल में तमाम पार्टियां अपनी विचारधारा को मजबूती से जनता के सामने रखने की कोशिश कर रही हैं। प्रियांक खड़गे का बयान: राजनैतिक रणनीति या वैचारिक विरोध? प्रियांक खड़गे (Priyank Kharge) ने साफ तौर पर कहा कि RSS पर कभी कोई गंभीर जांच नहीं हुई है और अगर उन्हें सत्ता में आने का अवसर मिला, तो वे इसकी जांच कराएंगे और कार्रवाई भी करेंगे। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि यह संगठन भारत के लोकतांत्रिक ढांचे के खिलाफ काम करता है और सांप्रदायिकता फैलाने का काम करता है। हालांकि कांग्रेस पार्टी की ओर से अभी तक इस बयान को लेकर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन प्रियांक का यह रुख कांग्रेस की लंबे समय से चली आ रही आरएसएस-विरोधी विचारधारा से मेल खाता है। विशेष रूप से इंदिरा गांधी के दौर में, जब RSS पर आपातकाल के दौरान प्रतिबंध लगाया गया था, तब कांग्रेस और संघ के रिश्ते और भी कटु हो गए थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना 27 सितंबर 1925 को नागपुर में डॉ. केशव बलराम हेडगेवार ने की थी। दशहरे के दिन शुरू हुआ यह संगठन आज भारत के सबसे बड़े गैर-सरकारी संगठनों में शामिल है। इसका प्रमुख उद्देश्य हिंदू समाज में एकता और अनुशासन लाना रहा है। वर्तमान में मोहन भागवत इसके सरसंघचालक हैं, जो 2009 से इस पद पर कार्यरत हैं। संघ की कार्यप्रणाली पूरी तरह से स्वयंसेवकों पर आधारित है। इसके स्वयंसेवक शिक्षा, सेवा, समाज सुधार और राष्ट्र निर्माण जैसे क्षेत्रों में सक्रिय रहते हैं। हालांकि, आलोचकों का आरोप है कि आरएसएस एक सांप्रदायिक एजेंडा चलाता है और इसका अंतिम लक्ष्य “हिंदू राष्ट्र” की स्थापना है, जो भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान के खिलाफ माना जाता है। पहले भी संघ पर लग चुका है प्रतिबंध RSS पर भारत सरकार ने अब तक तीन बार प्रतिबंध लगाया है: हालांकि हर बार संघ पर लगे प्रतिबंध को बाद में हटा लिया गया और संघ ने अपने संगठनात्मक ढांचे को और अधिक मजबूत कर लिया। कौन हैं प्रियांक खड़गे? प्रियांक खड़गे  (Priyank Kharge) का राजनीतिक करियर कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI से शुरू हुआ। उन्होंने 1998 में राजनीति में कदम रखा और धीरे-धीरे प्रदेश युवा कांग्रेस से होते हुए विधानसभा चुनावों (Assembly Elections) तक पहुंचे। वे कर्नाटक के कलबुर्गी जिले की चित्तपुर सीट से तीन बार विधायक रह चुके हैं और वर्तमान में सिद्धारमैया सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। उनके बयानों को न केवल एक युवा नेता की मुखरता के रूप में देखा जा रहा है, बल्कि कांग्रेस (Congress) की उस पुरानी लाइन के तौर पर भी देखा जा रहा है जो संघ के विचारधारा से टकराव रखती है। इसे भी पढ़ें:- विजय दिवस के पहले नारायण राणे ने राज को याद दिलाया उद्धव का किया अपमान, कही यह बात  राजनीतिक नतीजे  प्रियांक खड़गे (Priyank Kharge) का बयान निश्चित रूप से कांग्रेस और भाजपा (Congress and BJP) समर्थकों के बीच एक नई बहस को जन्म देगा। जहां एक पक्ष इसे अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतंत्र की रक्षा के रूप में देखेगा, वहीं दूसरा पक्ष इसे ‘हिंदू विरोधी’ एजेंडा बताएगा। खासकर चुनावी मौसम में इस तरह के बयान मतदाताओं को प्रभावित कर सकते हैं। आरएसएस (RSS) का समर्थक वर्ग काफी बड़ा है और यह संगठन भाजपा (BJP) के लिए वैचारिक रीढ़ की हड्डी के समान है। ऐसे में किसी भी नेता द्वारा संघ को खत्म करने या उस पर प्रतिबंध लगाने की बात करना गंभीर राजनीतिक नतीजे ला सकता है। प्रियांक खड़गे  (Priyank Kharge) का RSS को लेकर बयान सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि भारत की राजनीति में विचारधारा की उस जंग का हिस्सा है जो दशकों से चली आ रही है। एक ओर जहां RSS खुद को राष्ट्र सेवा में समर्पित मानता है, वहीं विरोधी उसे सांप्रदायिक और विभाजनकारी ताकत बताते हैं। इस बहस का अंत फिलहाल कहीं नजर नहीं आता, लेकिन इससे देश की लोकतांत्रिक चर्चा और विचार विमर्श और भी गंभीर रूप लेता जा रहा है। Latest News in Hindi Today Hindi news  Priyank Kharge #PriyankKharge #RSSBan #CongressStatement #PoliticalNews #BreakingNews #IndianPolitics #BJPvsCongress

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Marathi vs Hindi Row Heats Up

भाषा पर राजनीति: महाराष्ट्र में मराठी बनाम हिंदी विवाद फिर गरमाया

महाराष्ट्र में भाषा को लेकर एक बार फिर सियासत गर्मा (Language controversy) गई है। बीती रात मुंबई के मीरा रोड इलाके में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के कार्यकर्ताओं ने कथित तौर पर एक नॉर्थ इंडियन फेरीवाले की पिटाई कर दी वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि वह मराठी बोलने से इनकार कर रहा था। यह घटना मीरा रोड (Mira Road) के बालाजी होटल के सामने हुई, जहां पीड़ित मसाला डोसा बेचने का काम करता है। इस घटना ने ना सिर्फ भाषा की अस्मिता पर बहस छेड़ दी है, बल्कि राज्य की राजनीति को भी एक बार फिर उबाल पर ला दिया है। मनसे की सख्त प्रतिक्रिया मनसे प्रमुख राज ठाकरे (Raj Thakre) ने इस मामले पर खुलकर बयान दिया और हिंदी के बढ़ते प्रभाव पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि हिंदी एक बड़ी भाषा ज़रूर है, लेकिन उसे राष्ट्रीय भाषा (National Language) के रूप में जबरन थोपना स्वीकार नहीं किया जाएगा। राज ठाकरे ने जोर देकर कहा कि मराठी का इतिहास 3,000 वर्षों से भी पुराना है, जबकि हिंदी एक अपेक्षाकृत नई भाषा है। उनका यह बयान स्पष्ट रूप से यह संकेत देता है कि मनसे राज्य में मराठी (Marathi) को सर्वोपरि रखने की नीति पर अडिग है। राज ठाकरे (Raj Thakre) ने यह भी कहा कि कुछ लोग हिंदी को मराठी से श्रेष्ठ दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, जो उन्हें किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं है। उनके अनुसार यह मराठी अस्मिता पर सीधा हमला है। हिंदी अनिवार्यता का फैसला रद्द भाषा विवाद (Language controversy) के इसी बढ़ते दबाव के बीच राज्य सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (Chief Minister Devendra Fadnavis) ने रविवार को घोषणा की कि पहली कक्षा से हिंदी को अनिवार्य करने का जो निर्णय लिया गया था, उसे वापस लिया जा रहा है। इस फैसले का विरोध शिवसेना (UBT) और मनसे दोनों ने ही किया था। 5 जुलाई को इन दोनों दलों ने मिलकर “महामोर्चा” निकालने की घोषणा की थी, जिसे अब सरकार के फैसले के बाद रद्द किया जा सकता है। फडणवीस सरकार के इस कदम को विपक्ष ने सरकार की कमजोरी और दबाव में लिया गया फैसला बताया है। वहीं, मराठी समर्थकों का कहना है कि यह फैसला राज्य की सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने की दिशा में सही कदम है। उद्धव ठाकरे का तीखा हमला शिवसेना (UBT) के प्रमुख उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) ने भी इस पूरे मसले पर सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार यह मानती है कि जो भी भाजपा या सरकार की नीतियों का विरोध करता है, वह देशद्रोही है। ठाकरे ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार को स्वतंत्रता संग्राम की भावना का कोई ज्ञान नहीं है। उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) ने दावा किया कि त्रिभाषा फार्मूले के तहत हिंदी (Hindi) को थोपने के विरोध में जो एकजुटता दिख रही थी, उसे देखते हुए ही सरकार को अपना फैसला वापस लेना पड़ा। यह विपक्ष की एकजुटता और जन भावना की जीत है। इसे भी पढ़ें:- विजय दिवस के पहले नारायण राणे ने राज को याद दिलाया उद्धव का किया अपमान, कही यह बात  मराठी अस्मिता बनाम राष्ट्रीय एकता? यह पहला मौका नहीं है जब महाराष्ट्र में भाषा को लेकर विवाद हुआ है। मनसे और शिवसेना (UBT) (MNS and Shiv Sena UBT) वर्षों से राज्य में मराठी भाषा (Marathi Language) और संस्कृति को लेकर सख्त रुख अपनाते आए हैं। हालांकि, हर बार यह बहस इस सवाल पर खत्म होती है कि क्या किसी राज्य में एक विशेष भाषा को थोपना जायज़ है, और क्या ऐसा करना देश की बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक पहचान के खिलाफ नहीं है? वहीं, दूसरी ओर यह भी जरूरी है कि देश की राजभाषा के रूप में हिंदी का सम्मान किया जाए, लेकिन जबरदस्ती नहीं। संविधान के अनुच्छेद 343 और 351 के अनुसार, हिंदी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, लेकिन अन्य भाषाओं के अधिकारों का उल्लंघन किए बिना। महाराष्ट्र में भाषा को लेकर चल रहा यह विवाद (Language controversy) सिर्फ शब्दों की लड़ाई नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी है राज्य की सांस्कृतिक अस्मिता और राजनीतिक समीकरण। जहां एक ओर राजनीतिक दल अपने-अपने हितों को साधने में जुटे हैं, वहीं आम नागरिकों को ऐसी घटनाओं में नुकसान उठाना पड़ता है। जरूरत इस बात की है कि भाषा को विभाजन का नहीं, एकता का माध्यम बनाया जाए। सम्मान सभी भाषाओं को मिले और यही सच्चे लोकतंत्र की पहचान है। Latest News in Hindi Today Hindi news  Language #marathi #hindi #maharashtra #languagepolitics #marathivsHindi #marathipride #hindipolitics #maharashtranews

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AIMIM- Asaduddin owaisi and Akhtarul Iman

Bihar Assembly Election 2025: क्या है AIMIM की नई रणनीति और तीसरे मोर्चे की तैयारी?

जैसे-जैसे बिहार में विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election) का समय करीब आ रहा है, राज्य का सियासी पारा बढ़ता जा रहा है। सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी  तैयारी में जुट गए हैं और इसी कड़ी में अब असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने एक नई सियासी चाल चली है। AIMIM ने बिहार में फिर से राजनीतिक समीकरण बदलने की कोशिशें शुरू कर दी हैं और यह साफ कर दिया है कि पार्टी इस बार कोई बड़ा दांव खेलने को तैयार है। महागठबंधन को दिया प्रस्ताव AIMIM के बिहार प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान (Akhtarul Iman) ने मीडिया से बातचीत की और बताया कि उन्होंने करीब 15 दिन पहले राष्ट्रीय जनता दल (RJD), कांग्रेस (Congress) और वाम दलों (Wam Dal) को एक प्रस्ताव भेजा था। इस प्रस्ताव में AIMIM ने महागठबंधन में शामिल होने की इच्छा जताई थी। उन्होंने कहा कि बिहार के हित में खासकर युवाओं और सामाजिक दृष्ट्रिकों से यह कदम उठाया गया है। अख्तरुल ईमान ने कहा है कि सीटों के बंटवारे को लेकर अभी कोई बातचीत नहीं हुई है, लेकिन 2020 के चुनाव में हासिल सीटों और प्रदर्शन के आधार पर कोई फॉर्मूला तय किया जा सकता है। गौरतलब है कि 2020 के विधानसभा चुनाव (2020 Assembly Election) में महागठबंधन ने कुल 112 सीटें जीती थीं, जबकि AIMIM ने 20 में से 5 सीटें अपने नाम की थीं। तीसरे मोर्चे की अटकलें तेज हालांकि AIMIM की ओर से महागठबंधन में शामिल होने का प्रस्ताव भेजा गया है, लेकिन पार्टी ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि अगर गठबंधन में उन्हें जगह नहीं मिली, तो वे तीसरे मोर्चे का विकल्प भी तलाश सकते हैं। अख्तरुल ईमान (Akhtarul Iman) ने बताया कि कुछ अन्य दलों से बातचीत चल रही है, हालांकि उन्होंने इन दलों के नामों का खुलासा नहीं किया। यह संकेत इशारा करता है कि बिहार की राजनीति में एक नया मोर्चा उभर सकता है जो न तो एनडीए (NDA) का हिस्सा होगा और न ही महागठबंधन (UPA) का। AIMIM का यह रुख संभावित सहयोगी दलों के साथ एक अलग सेक्युलर फ्रंट खड़ा करने की मंशा दर्शाता है। वोटर लिस्ट पर सवाल और NRC का डर AIMIM ने चुनाव आयोग (Election Commission) द्वारा की जा रही वोटर लिस्ट पुनरीक्षण प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े किए हैं। अख्तरुल ईमान ने आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया NRC जैसी है, जिसके जरिए दलित, महादलित और अल्पसंख्यकों को सूची से हटाने की कोशिश हो रही है। उन्होंने कहा कि AIMIM का प्रतिनिधिमंडल जल्द ही चुनाव आयोग से मुलाकात करेगा और इस मुद्दे पर अपना विरोध दर्ज कराएगा। AIMIM का बिहार में राजनीतिक दखल 2020 के विधानसभा चुनाव (2020 Assembly Election) से खासा बढ़ा है। उस चुनाव में पार्टी ने ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट के तहत 20 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 5 सीटों पर जीत हासिल की थी। यह सीटें बिहार के सीमांचल क्षेत्र से थीं, जहाँ मुस्लिम आबादी अधिक है। पार्टी को कुल 5.23 लाख वोट मिले थे और उसका वोट शेयर लगभग 1.3% रहा था। हालांकि चुनाव के बाद AIMIM के चार विधायक RJD में शामिल हो गए थे, जिससे पार्टी को झटका लगा था। लेकिन इस बार पार्टी फिर से सीमांचल को केंद्र में रखकर चुनावी रणनीति बना रही है। AIMIM और पुराने सहयोगी दल 2020 में AIMIM ने जिन दलों के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा था, उनमें उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी, बहुजन समाज पार्टी (BSP), समाजवादी जनता दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और जनवादी पार्टी (सोशलिस्ट) शामिल थे। आज इनमें से कई दल एनडीए का हिस्सा बन चुके हैं, जबकि कुछ ने खुद को नए राजनीतिक स्वरूप में ढाल लिया है। उदाहरण के तौर पर उपेंद्र कुशवाहा अब राष्ट्रीय लोक मंच बनाकर एनडीए में शामिल हैं, जबकि ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी भी एनडीए के साथ है। इसे भी पढ़ें:- गुजरात और पंजाब में आम आदमी पार्टी की जीत और 2027 के तूफान की आहट? बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election) में AIMIM की सक्रियता और उसकी रणनीतिक पहल यह दर्शाती है कि पार्टी इस बार निर्णायक भूमिका निभाने की मंशा रखती है। महागठबंधन से प्रस्ताव स्वीकार नहीं होने की स्थिति में तीसरा मोर्चा बनाना AIMIM के लिए एक बड़ा राजनीतिक कदम हो सकता है, जिससे बिहार की चुनावी तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है। जहां एक ओर AIMIM भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए विपक्षी दलों से हाथ मिलाने को तैयार है, वहीं दूसरी ओर वह अपने सीमांचल प्रभाव का इस्तेमाल कर एक स्वतंत्र शक्ति बनकर उभरना चाहती है। आने वाले हफ्ते और महीने यह तय करेंगे कि यह रणनीति AIMIM को चुनावी फायदे दिलाएगी या फिर सियासी नुकसान। लेकिन एक बात तो तय है कि इस बार बिहार की राजनीति में AIMIM एक बार फिर से सुर्खियों में है। Latest News in Hindi Today Hindi news AIMIM- Asaduddin owaisi and Akhtarul Iman #BiharAssemblyElection2025 #AssemblyElection #AIMIM #AsaduddinOwaisi #AkhtarulIman

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