‘चीनी’ कहकर पुकारा, भारतीय होने का प्रमाण मांगा: सिर्फ दिखने में अलग होने की कीमत चुकानी पड़ी एंजेल चकमा को – यह खबर नहीं, राष्ट्रीय शर्म है

जयराष्ट्र न्यूज, देहरादून/अगरतला, 31 दिसंबर 2025

एक युवा की जिंदगी सिर्फ इसलिए छीन ली गई क्योंकि वह ‘दिखने में अलग’ था। त्रिपुरा के 24 वर्षीय एमबीए छात्र एंजेल चकमा को देहरादून में 9 दिसंबर को कुछ नशे में धुत युवकों ने ‘चीनी’, ‘चिंकी’ और ‘मोमो’ जैसे नस्लीय अपमानजनक शब्दों से पुकारा। जब एंजेल और उनके छोटे भाई माइकल ने इसका विरोध किया और कहा कि “हम भारतीय हैं, हम चीनी नहीं हैं”, तो बात हिंसा पर उतर आई। एंजेल को चाकू से कई बार वार किया गया – गर्दन, पीठ और पेट पर। 17 दिनों तक जीवन के लिए संघर्ष करने के बाद 26 दिसंबर को उन्होंने अस्पताल में दम तोड़ दिया।

यह कोई साधारण झगड़ा नहीं था। यह नस्लवाद की उस गहरी जड़ का प्रमाण है जो उत्तर-पूर्वी भारतीयों को ‘अन्य’ मानकर उन्हें रोजाना अपमान और खतरे का शिकार बनाती है। एंजेल के आखिरी शब्द थे – “हम भारतीय हैं। हमें कौन सा प्रमाण-पत्र दिखाना पड़ेगा?” यह सवाल आज पूरे देश से पूछा जा रहा है। क्या उत्तर-पूर्व के लोग भारतीय होने का प्रमाण रोजाना देना पड़ेंगे?

घटना देहरादून के सेलाकुई इलाके में हुई, जब अंजेल और माइकल किराने की दुकान से सामान खरीद रहे थे। आरोपी छह युवक एक बच्चे के जन्मदिन का जश्न मना रहे थे। हंसते-बोलते उन्होंने भाइयों पर नस्लीय टिप्पणियां कीं। विरोध करने पर हमला हुआ। माइकल के सिर पर लोहे की कड़ा से वार किया गया, जबकि एंजेल पर फल के ठेले से चाकू उठाकर वार किए गए। हमले के बाद आरोपी शराब खरीदकर पार्टी करते रहे।

एंजेल के पिता तरुण प्रसाद चकमा बीएसएफ के हेड कांस्टेबल हैं। वे मणिपुर में तैनात हैं। परिवार का कहना है कि पुलिस ने शुरू में एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया, इसे ‘छोटी बात’ बताया। दबाव के बाद 12 दिसंबर को केस दर्ज हुआ। अब तक पांच आरोपी गिरफ्तार हैं, दो नाबालिग सुधार गृह में हैं। मुख्य आरोपी यज्ञ अवस्थी नेपाल भाग गया है, पुलिस टीम वहां भेजी गई है।

यह घटना कोई अकेली नहीं है। उत्तर-पूर्व के लोग दिल्ली, बेंगलुरु, मुंबई जैसे शहरों में रोजाना ऐसे अपमान झेलते हैं। कोविड काल में उन्हें ‘कोरोना वाहक’ कहा गया। निडो तनियम की 2014 में हत्या के बाद बेजबरुआ कमिटी बनी, लेकिन सिफारिशें धूल फांक रही हैं। अब फिर मांग उठ रही है – नस्लवाद विरोधी कानून की।

त्रिपुरा में गुस्सा फूट पड़ा है। छात्र संगठन सड़कों पर हैं। मेघालय के सीएम कोनराड संगमा, नागालैंड के मंत्री टेमजेन इमना अलॉंग और अन्य नेताओं ने इसे ‘अस्वीकार्य’ बताया। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल केंद्र से कानून बनाने की मांग कर रहे हैं।

एंजेल प्लेसमेंट पा चुके थे। वे पिता को वीआरएस लेने को कह रहे थे ताकि परिवार की जिम्मेदारी उठा सकें। लेकिन एक नस्लीय हमले ने सब छीन लिया।

यह खबर नहीं है। यह राष्ट्रीय शर्म है। हम रोजाना ऐसे हमलों को होने देते हैं। कब तक उत्तर-पूर्व के लोग ‘भारतीय’ साबित करते रहेंगे? कब तक हम चुप रहेंगे?

जयराष्ट्र न्यूज की अपील: नस्लवाद के खिलाफ आवाज उठाएं। एंजेल चकमा को न्याय दो। उत्तर-पूर्व भारत का अभिन्न अंग है – उन्हें ‘चीनी’ कहना बंद करो।

Translate »