भगवान कुबेर न केवल देवताओं के कोषाध्यक्ष हैं बल्कि वे समृद्धि, वैभव और धन के प्रतीक भी माने जाते हैं। जानिए कैसे घोर तपस्या के बाद शिवजी से उन्हें यह दिव्य पद और सम्मान प्राप्त हुआ। हिंदू धर्म में धन, वैभव और समृद्धि के प्रतीक माने जाने वाले भगवान कुबेर न केवल देवताओं के कोषाध्यक्ष हैं, बल्कि स्वर्ग के खजाने के रक्षक भी हैं। उन्हें लोकसभा और वैश्विक स्तर पर भी “गॉड ऑफ वेल्थ” (धन के देवता) के रूप में पूजा जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि वे कैसे धन के देवता बने और उन्हें यह पद कैसे प्राप्त हुआ? इस लेख में हम जानेंगे भगवान कुबेर की पौराणिक कथा, उनका जन्म, शिव से प्राप्त वरदान और धार्मिक महत्ता।
कुबेर का जन्म और वंश
भगवान कुबेर (Lord Kuber) का उल्लेख स्कंद पुराण में मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उनका जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। हालांकि उनमें एक दोष था, उन्हें चोरी करने की आदत थी, और उस वजह से उनके पिता को इस बात का पता चला, तो उन्होंने कुबेर को घर से निकाल दिया। कुबेर भटकते हुए एक शिव मंदिर पहुंचे, जहां उन्होंने एक पुजारी को सोते देखा और प्रसाद चुराने का निश्चय किया। चोरी करते समय पुजारी को न जगाने और दीपक को बुझने से बचाने के लिए उन्होंने दीपक के सामने अपना अंगोछा फैला दिया। फिर भी वह पकड़े गए, हाथापाई हुई और उनकी मृत्यु हो गई। मृत्यु के पश्चात यमदूत उन्हें ले जा रहे थे, लेकिन मार्ग में भगवान शिव के गण भी पहुंच गए। उन्होंने कुबेर को शिवजी के समक्ष प्रस्तुत किया। भगवान शिव को यह प्रतीत हुआ कि कुबेर ने चोरी करते हुए भी दीपक की लौ को बचाने का प्रयास किया था, जिससे उनकी भक्ति झलकती थी।
महादेव इस भाव से प्रसन्न हुए और उन्होंने कुबेर को ‘धन के देवता’ का पद प्रदान किया। तभी से भगवान कुबेर को समृद्धि और धन के अधिपति के रूप में पूजा जाता है।
रामायण में उल्लिखित
रामायण में वर्णित एक कथा के अनुसार, भगवान कुबेर (Lord Kuber) ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए हिमालय में कठोर तपस्या की थी। इस तप के दौरान शिवजी के साथ माता पार्वती भी प्रकट हुईं। जब कुबेर ने पार्वती जी को अपनी बाईं आंख से देखा, तो उनके दिव्य तेज के प्रभाव से उनकी वह आंख जलकर पीली हो गई। इसके बाद कुबेर ने एक अन्य स्थान पर जाकर पुनः तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा कि तुम्हारी तपस्या ने मुझे अत्यंत प्रसन्न किया है। इसलिए अब से तुम एकाक्षी पिंगल के नाम से प्रसिद्ध होगे, जिसका अर्थ है, एक आंख वाला और पीले नेत्रों वाला।
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धार्मिक महत्ता और पूजा
हिंदू धर्म में भगवान कुबेर (Lord Kuber) की पूजा विशेष रूप से धनतेरस, दीपावली, अक्षय तृतीया, और नववर्ष जैसे अवसरों पर की जाती है। विशेष रूप से व्यापारी वर्ग और धन-संपत्ति की इच्छा रखने वाले लोग कुबेर की आराधना करते हैं। वास्तु शास्त्र के अनुसार, धन के देवता कुबेर की प्रतिमा को घर की उत्तर दिशा में स्थापित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसा करने से न केवल भगवान कुबेर की कृपा प्राप्त होती है, बल्कि मां लक्ष्मी का आशीर्वाद भी घर में बना रहता है और समृद्धि में वृद्धि होती है।
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