Yamuna Kalindi meaning

क्यों देवी यमुना कहलाती हैं ‘कालिंदी’? जानिए भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी इस दिव्य कथा

हिंदू धर्म में नदियों को केवल जल की धारा नहीं माना गया, बल्कि उन्हें देवी के रूप में पूजा जाता है। उन्हीं में से एक हैं देवी यमुना (Devi Yamuna), जिन्हें विशेष रूप से यमराज की बहन और भगवान श्रीकृष्ण की परम भक्त के रूप में जाना जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि देवी यमुना को ‘कालिंदी’ क्यों कहा जाता है? यह नाम सिर्फ एक उपनाम नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी है एक अत्यंत रोचक और आध्यात्मिक कथा, जो भगवान श्रीकृष्ण से गहरा संबंध रखती है। ‘कालिंदी’ नाम का अर्थ और प्रतीक ‘कालिंदी’ नाम की उत्पत्ति ‘कलिंद’ पर्वत से मानी जाती है, क्योंकि यमुना नदी का उद्गम स्थल यही पर्वत है। अर्थात जो कलिंद पर्वत से निकलती है, उसे कालिंदी (Kalindi) कहा जाता है। हालांकि इस नाम के पीछे और भी कई पौराणिक मान्यताएं और कथाएं जुड़ी हुई हैं, जो देवी यमुना के महत्व को और भी गहराई से समझाती हैं। भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी कथा हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी यमुना को भगवान सूर्य की बेटी तथा यमराज की बहन के रूप में जाना जाता है। वे भगवान विष्णु की अनन्य भक्त थीं और उन्होंने कई जन्मों तक उन्हें अपने पति के रूप में पाने की तपस्या की। उनकी तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वे द्वापर युग में जब कृष्ण के रूप में अवतरित होंगे, तब वे उन्हें प्राप्त करेंगी। ऐसा कहा जाता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तब उनके पिता वासुदेव उन्हें मथुरा से गोकुल ले जा रहे थे और रास्ते में यमुना नदी पार करनी थी। उस समय यमुना ने अपने जल को शांत कर श्रीकृष्ण के चरणों का स्पर्श किया और उनका स्वागत किया। यही कारण है कि यमुना नदी को विशेष रूप से श्रीकृष्ण (Lord Krishna) की प्रिय मानी जाती है। ब्रजभूमि में बाल कृष्ण की अनेक लीलाएं यमुना के तट पर ही घटित हुईं। एक अन्य लोककथा के अनुसार, जब भगवान कृष्ण (Lord Krishna) अर्जुन के साथ यमुना तट पर आए, तो उन्होंने वहां एक तपस्या में लीन सुंदर कन्या को देखा। वह कन्या और कोई नहीं बल्कि देवी यमुना ही थीं, जो श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने की कामना से तप कर रही थीं। उनकी अटल भक्ति और प्रेम को देखकर श्रीकृष्ण ने उनसे विवाह किया। इसी कारण यमुना को ‘कालिंदी’ (Devi Yamuna) भी कहा जाता है — ‘काली कमली वाले’ श्रीकृष्ण से जुड़े होने के कारण। ‘कालिंदी’ नाम यमुना का एक विशेष नाम है, जो उनके कृष्ण से दिव्य संबंध को दर्शाता है। यह नाम न सिर्फ उनके रंग या प्रवाह की गहराई को दर्शाता है, बल्कि उस पवित्र प्रेम को भी दर्शाता है जो उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के प्रति रखा। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया तीर्थों और मंदिरों में विशेष पूजन भारत में अनेक ऐसे तीर्थस्थल हैं, जहां देवी यमुना (Devi Yamuna) को कालिंदी (Kalindi) रूप में पूजा जाता है। ब्रज भूमि, विशेषकर वृंदावन और मथुरा में यमुना आरती का विशेष महत्व है। माना जाता है कि श्रीकृष्ण ने अपनी बाल लीलाओं में यमुना नदी को साक्षी बनाया। कदंब वन, यमुना घाट और कालिंदी कुंज जैसे स्थानों पर आज भी भक्तजन श्रद्धा से पूजन करते हैं। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Devi Yamuna #Kalindi #YamunaRiver #LordKrishna #HinduMythology #DivineStory #KrishnaMarriage #KalindiMyth #KrishnaLeela #KalindiYamuna #SpiritualIndia

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Manimahesh Kailash

मणिमहेश कैलाश: भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है यह पर्वत

हमारे देश में ऐसे कई धार्मिक स्थान हैं, जहां हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु जाते हैं। ऐसा ही एक स्थान है मणिमहेश (Manimahesh)। मणिमहेश कैलाश (Manimahesh Kailash) भगवान शिव को समर्पित है और पंच कैलाशों में से एक है। यह स्थान है हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले में। यहां पहुंचना आसान नहीं लेकिन यह एक पवित्र स्थान है जो भगवान शिव और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है। कैलाश पर्वत के नीचे मौजूद मानसरोवर झील की तरह यहां भी एक झील है। आइए जानें मणिमहेश कैलाश (Manimahesh Kailash) के बारे में विस्तार से। यह भी जानें कि मणिमहेश (Manimahesh) की यात्रा कब की जा सकती है? मणिमहेश (Manimahesh) की कथा  मणिमहेश कैलाश (Manimahesh Kailash) वो महत्वपूर्ण धार्मिक स्थान है, जो भगवान शिव जी के प्रेम और शक्ति का संकेत है। ऐसा माना गया है कि भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के बाद इस पर्वत को बनाया गया था। कुछ पौराणिक कथाओं के अनुसार इसी पर्वत पर भगवन शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था।यही नहीं इस पर्वत को उनका निवास स्थान भी माना गया है। मणिमहेश  (Manimahesh) पर्वत की चोटी तक कोई भी चढ़ाई नहीं कर पाया है। ऐसा भी माना गया है कि आज तक कई लोगों ने इसकी चोटी तक पहुंचने की कोशिश की है, लेकिन वो सफल नहीं हो पाएं हैं। एक चरवाहें ने भी अपनी बकरियों के साथ यहां चढ़ने की कोशिश की थी लेकिन वो पत्थर की बन गई थी। इस पर्वत पर एक झील है जिसका पानी बेहद पवित्र माना गया है और लोग इसे अपने साथ ले जाते हैं। मणिमहेश झील (Manimahesh Lake) तक इस पर्वत की यात्रा की जाती है। मणिमहेश कैलाश (Manimahesh Kailash) के मणि का क्या है अर्थ  यह तो हम सभी जानते हैं कि मणिमहेश कैलाश (Manimahesh Kailash) में मणि का अर्थ है भगवन शिव की मणि। इसके पीछे भी एक कथा है। ऐसा माना गया है कि पूर्णिमा (Purnima) की रात को मणिमहेश झील  (Manimahesh Lake) में इस पर्वत में मौजूद मणि की किरणों से परिवर्तित होती हैं और उसके बाद लोगों को दिखती हैं। लेकिन, यह दृश्य सभी को नहीं दिखाई देता है। हालांकि वैज्ञानिकों का इसके बारे में अलग मत है। उनके अनुसार यह किरणें ग्लेशियर से परावर्तित होकर आती हैं न की मणि से। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया कैसे पहुंचा जा सकता है मणिमहेश कैलाश (Manimahesh Kailash)? मणिमहेश कैलाश (Manimahesh Kailash) पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को लगभग 13 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। इस साल यह यात्रा 26 अगस्त से शुरू हो रही है। आप जिस भी शहर से आ रहे हैं, वहां से आपको सबसे पहले चम्बा पहुंचना होगा। इस स्थान पर अगर आप वायुमार्ग या रेलमार्ग से आ रहे हैं, तो सबसे नजदीक एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशन आपको पड़ेगा पठानकोट। चम्बा पहुंचने के बाद आपको भरमौर पहुंचना होगा जो यहां से लगभग 70 किलोमीटर दूर है। यहां आप बस या टैक्सी से पहुंच सकते हैं। भरमौर से आपको हड़सर पहुंचना होगा, जहां आप बस या टैक्सी से जा सकते हैं। हड़सर से ट्रैक शुरू हो जाता है। ट्रैक कर के आप मणिमहेश झील (Manimahesh Lake) तक पहुंच सकते हैं। Latest News in Hindi Today Hindi News Manimahesh Kailash #ManimaheshKailash #Manimahesh #ManimaheshLake #Chamba #LordShiva #MataParvati

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Importance of Shani Puja

शनि जयंती 2025: जानिए शनि देव की पूजा का महत्व और इस वर्ष कब मनाई जाएगी शनि जयंती

ज्येष्ठ अमावस्या के दिन मनाई जाने वाली शनि जयंती इस बार 27 मई को पड़ रही है। इस दिन विशेष पूजा, व्रत और दान से शनि देव की कृपा प्राप्त की जाती है और जीवन में सुख-शांति आती है। शनि जयंती, भगवान शनि के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। हिंदू पंचांग के अनुसार, यह पर्व ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है।  शनि जयंती 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त वर्ष 2025 में शनि जयंती (Shani Jayanti) का पर्व 27 मई, मंगलवार को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार, अमावस्या तिथि 26 मई को दोपहर 12:11 बजे से शुरू होकर 27 मई को सुबह 8:31 बजे तक रहेगी। ज्येष्ठ महीने की अमावस्या तिथि को शनि देव का प्राकट्य दिवस माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शनि देव सूर्य भगवान और उनकी पत्नी छाया के पुत्र हैं। शनि जयंती पर पूजा विधि शनि जयंती के लाभ शनि जयंती (Shani Jayanti) के दिन पूजा-पाठ और दान करने से शनि की अशुभ दृष्टि और दशाओं का प्रभाव काफी हद तक शांत हो जाता है। इस दिन श्रद्धा से की गई उपासना आर्थिक समस्याओं से राहत दिलाने में सहायक होती है और करियर में स्थिरता एवं प्रगति लाने का मार्ग प्रशस्त करती है।शनि देव (Shani Dev) की कृपा से पुराने और लंबे समय से चले आ रहे रोगों से भी छुटकारा मिल सकता है। यह दिन मानसिक शांति प्राप्त करने और आध्यात्मिक रूप से स्वयं को विकसित करने के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है। साथ ही, शत्रुओं की बाधा और नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा भी प्राप्त होती है। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया शनि देव: कर्म और न्याय के देवता नवग्रहों में शनि देव (Shani Dev) को न्याय का प्रतिनिधि और कर्मों के अनुसार फल देने वाला ग्रह माना गया है। वे व्यक्ति के अच्छे या बुरे दोनों ही कर्मों का उचित परिणाम देने के लिए जाने जाते हैं। उनकी दृष्टि को जहां एक ओर कठोर दंड देने वाली कहा जाता है, वहीं दूसरी ओर यदि कोई व्यक्ति धर्म और सद्कर्म के मार्ग पर हो, तो शनि की कृपा से उसे उन्नति और प्रतिष्ठा भी प्राप्त हो सकती है।शनि  जयंती का ज्योतिषीय महत्व शनि जयंती (Shani Jayanti) को शनि दोष, साढ़ेसाती, ढैया और शनि की अशुभ दृष्टि से मुक्ति पाने का एक महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। इस दिन श्रद्धालु उपवास रखते हैं, शनि मंदिरों में दर्शन कर विशेष पूजन करते हैं और तिल, तेल, काले कपड़े, काले चने, लोहे के बर्तन जैसी वस्तुओं का दान करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन की पूजा से ग्रह दोष शांत होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और स्थिरता का आगमन होता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Shani Jayanti #ShaniJayanti2025 #ShaniDev #ShaniPuja #ShaniJayanti #ShaniWorship #ShaniSignificance #ShaniRemedies #ShaniVrat #ShaniDevPuja #HinduFestivals

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Effects of Ketu Mahadasha

केतु महादशा: सात वर्षों की रहस्यमयी यात्रा

केतु महादशा वैदिक ज्योतिष में एक रहस्यमयी और प्रभावशाली अवधि मानी जाती है, जो व्यक्ति के जीवन में गहरे बदलाव और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है। हालांकि, इस महादशा में यदि व्यक्ति सत्कर्म करता है और भगवान शिव की उपासना करता है, तो उसे सकारात्मक फल प्राप्त होते हैं। शिव पूजा से मानसिक शांति, आध्यात्मिक बल और जीवन में स्थिरता आने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। केतु महादशा की अवधि और महत्व ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, केतु की महादशा लगभग सात वर्षों तक प्रभाव डालती है। इस दौरान शुरुआत में केतु की ही अंतर्दशा और प्रत्यंतर दशा होती है। यदि कुंडली में केतु उच्च राशि में स्थित हो, तो व्यक्ति को इस समय सकारात्मक और शुभ फल प्राप्त होते हैं। लेकिन यदि केतु नीच स्थिति में हो, तो यह जातक को मानसिक भ्रम, गलत निर्णय और करियर या व्यापार में असफलता की ओर धकेल सकता है। ऐसे समय में प्रयासों के बावजूद सफलता मिलना कठिन हो जाता है। केतु की महादशा (Ketu Mahadasha) के दौरान सूर्य, चंद्रमा और गुरु की अंतर्दशाएं शुभ फल नहीं देतीं, बल्कि चुनौतियां बढ़ा सकती हैं। इसके बाद क्रम से शुक्र और सूर्य की अंतर्दशा आती है, जिनमें भी सावधानी बरतनी चाहिए। केतु की अपनी अंतर्दशा लगभग पांच महीनों तक चलती है, उसके बाद शुक्र की बारी आती है। केतु की महादशा और गंडमूल नक्षत्र का प्रभाव ज्योतिष के अनुसार, जिन लोगों का जन्म छह विशेष नक्षत्रों में होता है, उन्हें गंडमूल नक्षत्र का जातक माना जाता है। इनमें अश्विनी, मघा और मूल नक्षत्र विशेष रूप से केतु के प्रभाव वाले माने गए हैं। माना जाता है कि ये नक्षत्र जातक के लिए नहीं, बल्कि उसके माता-पिता के लिए कठिनाइयां ला सकते हैं। इसलिए ज्योतिषाचार्यों की सलाह होती है कि ऐसे बच्चों के जन्म के 27 दिनों के भीतर गंडमूल नक्षत्र शांति पूजा अवश्य करानी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में केतु लग्न में स्थित हो, तो उसका स्वभाव आमतौर पर चिड़चिड़ा और उग्र हो सकता है। वहीं, यदि केतु के स्वामित्व वाले नक्षत्र में कई अन्य ग्रह भी मौजूद हों, तो ऐसा जातक अत्यधिक महत्वाकांक्षी और लक्ष्य को लेकर जुनूनी स्वभाव का हो सकता है। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया केतु की महादशा में राहत पाने के उपाय नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Ketu Mahadasha #KetuMahadasha #VedicAstrology #PlanetKetu #MahadashaEffects #SpiritualJourney #KarmicCycle #KetuTransit #MysticAstrology #KetuRemedies #AstrologyInsights

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Bada Mangal

बड़ा मंगल 2025: हनुमान जी की कृपा पाने के लिए इस दिन जरूर लाएं ये शुभ वस्तुएं

लखनऊ सहित उत्तर भारत में बड़े मंगल का पर्व हनुमान जी (Hanuman Ji) की कृपा प्राप्ति का विशेष अवसर माना जाता है। इस दिन बजरंगबली की पूजा और व्रत करने से संकट कटते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। आइए जानें, बड़े मंगल 2025 की तिथि, महत्व और इस दिन क्या विशेष चीजें घर लाना शुभ होता है। कब है बड़ा मंगल 2025? हिंदू पंचांग के अनुसार, बड़ा मंगल (Bada Mangal) ज्येष्ठ माह के हर मंगलवार को मनाया जाता है। साल 2025 में ज्येष्ठ माह की शुरुआत 13 मई से हो रही है। ऐसे में बड़ा मंगल की पहली तिथि 13 मई 2025 को पड़ेगी।  पहला बड़ा मंगल: 13 मई 2025दूसरा बड़ा मंगल: 20 मई 2025तीसरा बड़ा मंगल: 27 मई 2025चौथा बड़ा मंगल: 3 जून 2025पांचवां बड़ा मंगल: 10 जून 2025 लखनऊ और उत्तर भारत में इस पर्व को बड़े श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है। इस दिन हनुमान मंदिरों में विशेष पूजन और भंडारों का आयोजन किया जाता है। बड़ा मंगल का महत्व बड़े मंगल (Bada Mangal) का दिन हनुमान जी को समर्पित होता है। माना जाता है कि इस दिन उनकी पूजा करने से जीवन में हर प्रकार की बाधाएं समाप्त होती हैं और संकटों से रक्षा होती है। विशेषकर उत्तर भारत में यह पर्व बेहद लोकप्रिय है और लाखों श्रद्धालु इस दिन व्रत रखकर हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं। ऐसा विश्वास है कि बड़े मंगल पर हनुमान जी का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है और भक्तों के कष्टों का निवारण होता है। बड़ा मंगल पर घर में लाएं ये चीजें हनुमान जी (Hanuman Ji) के प्रति श्रद्धा को व्यक्त करने के लिए सिंदूर अर्पित करना हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है। इसलिए, बड़े मंगल या बुढ़वा मंगल के दिन आप घर में नारंगी रंग का सिंदूर ला सकते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बजरंगबली को बूंदी और बेसन के लड्डू अत्यधिक प्रिय होते हैं। इस कारण, बड़े मंगल की पूजा के समय आप इन स्वादिष्ट पकवानों को हनुमान जी को भोग के रूप में अर्पित कर सकते हैं। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया बड़ा मंगल पर हनुमान जी की पूजा कैसे करें? बड़ा मंगल (Bada Mangal) के दिन हनुमान जी (Hanuman Ji)  को प्रसन्न करने के लिए प्रात: काल स्नान करके लाल रंग के स्वच्छ वस्त्र पहनें और मंदिर में या घर पर पूजा का आयोजन करें। सबसे पहले एक स्वच्छ स्थान पर हनुमान जी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। फिर उन्हें फूल, सिंदूर, चोला और चमेली का तेल अर्पित करें। हनुमान चालीसा का पाठ करें और “ॐ हं हनुमते नमः” मंत्र का 108 बार जप करें। भोग में गुड़-चना या बूंदी का प्रसाद चढ़ाएं और अंत में भक्तिपूर्वक आरती करें। आरती के बाद प्रसाद सभी भक्तों में वितरित करें। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Bada Mangal #BadaMangal2025 #HanumanJayanti #HanumanBlessings #BadaMangalPuja #AuspiciousItems #TuesdayPuja #HanumanDevotion #BadaMangalRituals #PujaEssentials #SpiritualOfferings

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Adi Shankaracharya

Adi Shankaracharya: सनातन धर्म के पुनरुत्थान के प्रतीक हैं ‘आदि शंकराचार्य’

वैशाख शुक्ल पंचमी (Vaishakh Shukla Panchami) तिथि को आदि शंकराचार्य की जयंती मनाई जाती है। यह दिन भारतीय आध्यात्मिक विरासत के सबसे महान विचारकों और संतों में से एक, आदि शंकराचार्य (Adi Shankaracharya) को समर्पित होता है।  उनका जन्म लगभग 788 ईस्वी में केरल के कालड़ी नामक गांव में हुआ था। उन्होंने मात्र 32 वर्ष की आयु में भारत में धर्म, दर्शन और संस्कृति की ऐसी नींव रखी, जो आज भी अडिग है। आदि शंकराचार्य का जीवन परिचय आदि शंकराचार्य (Adi Shankaracharya) का जीवन अत्यंत तपस्वी और विचारशील रहा। वे एक अद्वैतवादी (Advait Vedanta) संत थे, जिन्होंने यह प्रतिपादित किया कि “अहम् ब्रह्मास्मि” अर्थात आत्मा और परमात्मा अलग नहीं, बल्कि एक ही हैं। उनके विचारों ने उस समय समाज में फैली धार्मिक कुरीतियों और अंधविश्वास को चुनौती दी और सनातन धर्म की आत्मा को फिर से जीवित किया। धर्म की रक्षा हेतु लिए गए साहसी निर्णय शंकराचार्य ने मात्र आठ वर्ष की अवस्था में संन्यास धारण किया और भारत की धार्मिक एकता के लिए चारों दिशाओं में यात्रा की। उन्होंने उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में श्रृंगेरी, पूर्व में पुरी और पश्चिम में द्वारका में चार मठों की स्थापना की। इन चार मठों के माध्यम से उन्होंने भारत के कोने-कोने में वेदांत दर्शन का प्रचार-प्रसार किया। उनका उद्देश्य केवल धार्मिक उपदेश देना नहीं था, बल्कि उन्होंने बौद्ध धर्म के अंधानुकरण और ब्राह्मणवाद के अतिवाद के बीच एक संतुलन प्रस्तुत किया। उन्होंने कर्मकांड की जटिलता के बजाय आस्था, आत्मज्ञान और सरल भक्ति को महत्व दिया। आदि शंकराचार्य (Adi Shankaracharya) ने धार्मिक ग्रंथों को सरल बनाने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने उपनिषदों, ब्रह्मसूत्रों, और वेदों पर भाष्य लिखे, जिससे इन जटिल ग्रंथों का अध्ययन सरल हो गया। उनके लिखे गए भाष्यों ने धर्म और ज्ञान को लोगों तक पहुंचाने में मदद की। इसके अलावा, शंकराचार्य ने दशनामी संन्यासी अखाड़ों की स्थापना भी की थी। इसके साथ ही माना जाता है कि कुंभ मेले जैसे बड़े धार्मिक आयोजनों की शुरुआत में भी उनका अहम योगदान था। केवल 32 वर्षों में किए असाधारण कार्य इतिहास में ऐसे बहुत कम उदाहरण मिलते हैं जब किसी संत ने इतनी अल्पायु में इतना विशाल कार्य किया हो। मात्र 32 वर्षों के जीवनकाल में शंकराचार्य ने 72 से अधिक धार्मिक ग्रंथों की रचना की। इनमें ब्रह्मसूत्र भाष्य, भगवद्गीता पर टीका और उपनिषदों की व्याख्या प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने समाज में फैले धार्मिक भ्रमों को दूर करने के लिए जनसंवाद और शास्त्रार्थ की परंपरा को अपनाया। काशी, प्रयाग, मथुरा और अन्य तीर्थस्थलों पर उन्होंने विभिन्न मतों से शास्त्रार्थ किया और अद्वैत वेदांत को प्रतिष्ठित किया। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया आदि शंकराचार्य जन्म कथा कई वर्षों तक संतान न होने के कारण एक ब्राह्मण दंपति ने भगवान शंकर की आराधना की। उनकी कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। ब्राह्मण दंपति ने भगवान शिव (Vaishakh Shukla Panchami) से ऐसी संतान की कामना की जो दीर्घायु हो और उसकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैले। भगवान शिव (Lord Shiva)  ने उन्हें बताया कि वे या तो दीर्घायु संतान प्राप्त कर सकते हैं, जो सर्वज्ञ नहीं होगी, या फिर सर्वज्ञ संतान, जो दीर्घायु नहीं होगी। दंपति ने दीर्घायु की बजाय सर्वज्ञ संतान का वरदान मांगा। भगवान शिव (Lord Shiva) ने उनके वरदान के अनुसार संतान रूप में जन्म लिया। दंपति ने अपने पुत्र का नाम शंकर रखा। शंकराचार्य बचपन से ही अत्यंत प्रतिभाशाली थे। जब वह तीन साल के थे, उनके पिता का निधन हो गया, लेकिन इस छोटी सी उम्र में ही उन्होंने मलयालम भाषा का ज्ञान प्राप्त कर लिया। आठ साल की उम्र में वे वेदों के ज्ञाता बन गए और 12 साल की उम्र में शास्त्रों का अध्ययन पूरा किया। 16 वर्ष की उम्र में उन्होंने 100 से अधिक ग्रंथों की रचना की। इसके बाद, माता की आज्ञा से उन्होंने वैराग्य धारण किया और सन्यास जीवन को स्वीकार किया। केवल 32 साल की उम्र में उनका निधन हुआ, और वे धर्म की रक्षा के लिए किए गए अपने कार्यों के लिए हमेशा याद किए जाते हैं। Latest News in Hindi Today Hindi News Vaishakh Shukla Panchami #AdiShankaracharya #SanatanDharma #Vedanta #Advaita #Jagadguru #Hinduism #SpiritualReformer #Shankaracharya #VedicWisdom #HinduPhilosophy

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Chhinnamasta Jayanti 2025

छिन्नमस्ता जयंती 2025: आत्मबलिदान और शक्ति की आराधना का पर्व

हिंदू धर्म में दस महाविद्याओं का विशेष स्थान है। ये दस रूप आदिशक्ति देवी के अत्यंत शक्तिशाली और रहस्यमयी स्वरूप हैं, जिनकी साधना तंत्र और अध्यात्म दोनों में की जाती है। इन्हीं दस महाविद्याओं में एक अत्यंत चमत्कारी और अद्भुत स्वरूप है — देवी छिन्नमस्ता। उनका नाम सुनते ही मन में एक रहस्यमयी छवि उभरती है, क्योंकि देवी छिन्नमस्ता (Devi Chinnamasta) का स्वरूप अन्य देवी रूपों से बिल्कुल अलग और शक्तिशाली है। वह स्वयं अपना सिर काटकर उसे हाथ में पकड़े रहती हैं, और उनके कंठ से तीन धाराओं में रक्त प्रवाहित होता है। यही कारण है कि उनकी उपासना को अत्यंत गूढ़ और सिद्धिदायक माना गया है। छिन्नमस्ता जयंती 2025 में कब है? पंचांग के अनुसार वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को यानी 10 मई शाम 5 बजकर 29 मिनट पर शुरू होगी और 11 मई को शाम 8:01 बजे समाप्त होगी। चूंकि सनातन धर्म में तिथि की गणना सूर्योदय के आधार पर की जाती है, इसलिए छिन्नमस्ता जयंती (Chinnamasta Jayanti) 11 मई 2025 को मनाई जाएगी। इस पावन अवसर पर श्रद्धालु देवी छिन्नमस्ता की पूजा-अर्चना और भक्ति भाव से साधना करेंगे। छिन्नमस्ता जयंती के शुभ योग (Chinnamasta Jayanti Shubh Yoga) वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर इस वर्ष रवियोग और भद्रावास सहित कई शुभ और फलदायी योग बन रहे हैं। इन विशेष योगों में मां छिन्नमस्ता की आराधना करने से साधकों की सभी इच्छाएं पूर्ण होने की संभावना रहती है। साथ ही, वे शारीरिक और मानसिक कष्टों से भी मुक्ति पा सकते हैं। श्रद्धालु इस दिन व्रत रखकर देवी को प्रसन्न करने के लिए पूजा-अर्चना कर सकते हैं और मनचाहा फल प्राप्त कर सकते हैं। छिन्नमस्तिका जयंती से जुड़ी मान्यताएं देवी छिन्नमस्तिका (Devi Chinnamasta) को प्रचंड चंडिका भी कहा जाता है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब देवी ने चंडी रूप धारण कर राक्षसों का संहार किया, तो उनकी सहायिका योगिनी अजया और विजया की रक्त पिपासा शांत नहीं हुई। इसे शांत करने के लिए देवी ने अपना सिर काट दिया, और उनके रक्त की धाराओं से दोनों ने अपनी प्यास बुझाई। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया एक अन्य कथा में देवी पार्वती अपनी सहचरियों के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान करने गईं। स्नान के बाद, सहचरियों ने भूख से तंग आकर देवी से भोजन की प्रार्थना की। देवी ने अपनी क्षुधा शांत करने के लिए खड़ग से अपना सिर काट दिया, और रक्त की तीन धाराएं बहने लगीं। दोनों सहचरियों ने एक-एक धारा का पान किया, और तीसरी धारा देवी ने स्वयं पी ली। तभी से देवी छिन्नमस्तिका के रूप में प्रसिद्ध हुईं। छिन्नमस्ता जयंती का महत्व हिंदू धर्म में देवी छिन्नमस्तिका (Devi Chinnamasta) को मां काली का एक उग्र और रहस्यमयी स्वरूप माना गया है। वे न केवल संहार की शक्ति हैं, बल्कि पुनर्जन्म और जीवनदायिनी शक्ति की प्रतीक भी हैं। ऐसी मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा और नियमपूर्वक देवी छिन्नमस्तिका की पूजा करते हैं, उन्हें जीवन की जटिल समस्याओं से मुक्ति मिलती है। छिन्नमस्ता जयंती के दिन मां की विशेष उपासना करने से संतान की दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है और व्यक्ति को कर्ज जैसी परेशानियों से छुटकारा मिल सकता है। इस दिन देवी की आराधना से भक्त को आर्थिक समृद्धि प्राप्त होती है और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की शक्ति भी मिलती है। छिन्नमस्ता जयंती साधना और आराधना के माध्यम से आत्मबल, निर्भयता और मानसिक स्थिरता पाने का सशक्त अवसर होता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News  Devi Chinnamasta #ChhinnamastaJayanti2025 #GoddessChhinnamasta #SelfSacrifice #ShaktiWorship #TantricFestival #DivineFeminine #ChhinnamastaVrat #HinduFestivals2025 #FearlessGoddess #PowerOfShakti

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Mohini Ekadashi 2025

मोहिनी एकादशी 2025: व्रत में भूलकर भी न करें इन चीजों का सेवन, नहीं मिलेगी पुण्य की प्राप्ति

मोहिनी एकादशी (Mohini Ekadashi) व्रत वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है, जो इस वर्ष गुरुवार 8 मई 2025 को पड़ रही है। यह व्रत भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरूप की स्मृति में रखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन उपवास करने से सभी पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति संभव होती है। मोहिनी एकादशी व्रत 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्तवैदिक पंचांग के अनुसार, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि, जिसे मोहिनी एकादशी कहा जाता है, इस वर्ष 8 मई को मनाई जाएगी। यह तिथि 7 मई को सुबह 10:19 बजे शुरू होगी और 8 मई को दोपहर 12:29 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि को मान्यता मिलने के कारण मोहिनी एकादशी (Mohini Ekadashi) का व्रत 8 मई को रखा जाएगा। व्रत के दौरान क्या खाएं मोहिनी एकादशी का उपवास रखने वाले श्रद्धालु व्रत के दौरान दूध, दही, फल, शरबत, साबुदाना, बादाम, नारियल, शकरकंदी, आलू, हरी मिर्च, सेंधा नमक और राजगिरा के आटे से बने व्यंजनों का सेवन कर सकते हैं। ध्यान रखें कि भोजन या फलाहार भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना के बाद ही करें। साथ ही, प्रसाद तैयार करते समय स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें। व्रत के दौरान इन चीजों से करें परहेज मोहिनी एकादशी (Mohini Ekadashi)के दिन तामसिक भोजन जैसे मांस, शराब, प्याज, लहसुन, अधिक मसाले और तेल का सेवन नहीं करना चाहिए। साथ ही इस व्रत में चावल और सामान्य नमक का उपयोग भी वर्जित माना गया है। यदि आप इस व्रत का पालन कर रहे हैं, तो इन सभी नियमों का विशेष रूप से ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है।  पूजा विधि मोहिनी एकादशी (Mohini Ekadashi) के दिन प्रातःकाल स्नान करके साफ वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु की पूजा करें और तुलसी के पत्ते अर्पित करें। ध्यान रखें कि इस दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना वर्जित है, इसलिए पूर्व में तोड़े गए पत्तों का ही उपयोग करें। मोहिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु को भोग अर्पित करते समय इस मंत्र का उच्चारण करें—“त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।गृहाण सम्मुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर।।” इस मंत्र का जाप करते हुए श्रद्धा से भोग अर्पित करने पर भगवान विष्णु प्रसन्न होकर भोग स्वीकार कर लेते हैं। ऐसा करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है। इसे भी पढ़ें:-  क्यों चढ़ाया जाता है हनुमान जी को सिंदूर? जानिए त्रेता युग से जुड़ी यह अद्भुत कथा व्रत का पारण मोहिनी एकादशी व्रत का पारण 9 मई 2025 को सुबह 5:34 से 8:16 बजे के बीच किया जाएगा। इस दौरान भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत खोलना चाहिए। व्रत के नियमों का विधिपूर्वक पालन करने से भक्तों को श्रीहरि की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Mohini Ekadashi #MohiniEkadashi2025 #EkadashiFasting #HinduFestivals #VratRules #FastingDosAndDonts #SpiritualIndia #EkadashiTips #VratFoodGuide #MohiniVrat #HinduRituals

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Baglamukhi Jayanti 2025

बगलामुखी जयंती 2025: वृद्धि योग और शुभ संयोग से होंगे बिगड़े काम बन

हिन्दू धर्म में देवी बगलामुखी  (Devi Baglamukhi)  की पूजा का विशेष महत्व है। बगलामुखी जयंती पर देवी की उपासना करने से ना केवल व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक परेशानियाँ दूर होती हैं, बल्कि उसे जीवन में प्रगति और समृद्धि भी मिलती है। इस वर्ष बगलामुखी जयंती 5 मई 2025 को मनाई जाएगी और इस दिन वृद्धि योग सहित कई शुभ संयोग बन रहे हैं, जो जीवन के अटके कार्यों को सफल बनाने में सहायक सिद्ध होंगे। बगलामुखी का महत्व देवी बगलामुखी (Devi Baglamukhi) को “पीताम्बर देवी” भी कहा जाता है। वे शक्ति की देवी हैं और शत्रुओं पर विजय दिलाने वाली मानी जाती हैं। बगलामुखी की पूजा से व्यक्ति के सारे विघ्न दूर होते हैं और उसे हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है। खासकर यह देवी उन लोगों के लिए बेहद लाभकारी मानी जाती हैं जो किसी मुश्किल स्थिति में फंसे हों या जिनकी किस्मत प्रतिकूल हो। देवी की पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में स्थिरता आती है और जीवन के बिगड़े हुए काम भी सुधर जाते हैं। इस वर्ष बगलामुखी जयंती पर बनेगा विशेष योग वैदिक पंचांग के अनुसार, बगलामुखी जयंती (Baglamukhi Jayanti) 5 मई 2025 को मनाई जाएगी। इस विशेष दिन मां बगलामुखी की पूजा के साथ-साथ वृद्धि योग और अन्य शुभ योग भी बन रहे हैं, जो इस तिथि को और भी महत्वपूर्ण बना देते हैं। वृद्धि योग एक ऐसा योग है, जब किसी शुभ कार्य या पूजा का फल त्वरित रूप से मिलता है। यह योग व्यक्ति की सफलता में चार चाँद लगाता है और उसके सभी बिगड़े काम को सुधारने में मदद करता है। इस दिन देवी बगलामुखी (Devi Baglamukhi) की पूजा से न केवल शत्रुओं पर विजय मिलती है, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और मानसिक दृष्टिकोण से भी उन्नति होती है। वृद्धि योगज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, इस वर्ष बगलामुखी जयंती पर वृद्धि योग का संयोग बन रहा है, जो रात 12:20 बजे तक प्रभावी रहेगा। इस शुभ योग में देवी बगलामुखी की आराधना करने से आर्थिक उन्नति, भाग्य में वृद्धि और सफलता के प्रबल संकेत मिलते हैं। साथ ही देवी की कृपा से जीवन के तमाम संकट दूर हो सकते हैं। रवि योगइस विशेष दिन पर रवि योग भी बन रहा है, जो दोपहर 2:01 बजे से शाम 5:36 बजे तक रहेगा। मान्यता है कि रवि योग में मां बगलामुखी की आराधना करने से साधकों की मनोकामनाएं शीघ्र पूरी होती हैं और इच्छित सफलता प्राप्त होती है। शिववास योगबगलामुखी जयंती (Baglamukhi Jayanti) पर शिववास योग का भी संयोग बन रहा है, जो सुबह 7:35 बजे से आरंभ होगा। इस योग में भगवान शिव कैलाश पर देवी पार्वती के साथ विराजमान रहते हैं। इस पावन समय में की गई पूजा से घर में सुख, शांति, समृद्धि और सौभाग्य का वास होता है। इसे भी पढ़ें:-  क्यों चढ़ाया जाता है हनुमान जी को सिंदूर? जानिए त्रेता युग से जुड़ी यह अद्भुत कथा बगलामुखी जयंती (Baglamukhi Jayanti) पर पूजा विधि इस दिन देवी बगलामुखी की पूजा का विशेष महत्व है। पूजा के दौरान श्रद्धालु पीले कपड़े, पीले फूल, और पीली वस्तुएं चढ़ाते हैं, क्योंकि देवी बगलामुखी का रंग पीला है। पूजा में विशेष रूप से नवग्रह शांति, वशीकरण, और शत्रुनाशक मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। सबसे प्रभावशाली मंत्रों में से एक है: “ॐ बगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिव्हां कीलय बुद्धिं विनाशय ॐ स्वाहा।” इस मंत्र का जप करने से न केवल शारीरिक कष्टों से मुक्ति मिलती है, बल्कि मानसिक शांति भी प्राप्त होती है। बगलामुखी जयंती के दिन देवी बगलामुखी (Devi Baglamukhi) के हवन और यज्ञ का आयोजन भी अत्यंत फलदायक माना जाता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Devi Baglamukhi #BaglamukhiJayanti2025 #VridhiYoga #BaglamukhiMata #HinduFestivals2025 #JayantiPuja #SpiritualRituals #AuspiciousDay #TurnSetbacksIntoSuccess #BaglamukhiMantra #DivineBlessings

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Hanuman Ji

जब हनुमान जी ने सूर्य को समझा फल, निगल गए पूरे ब्रह्मांड का उजाला

हनुमान जी (Hanuman Ji) को बल, बुद्धि और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। वे बालपन से ही असाधारण शक्तियों से संपन्न थे और यही कारण है कि उनकी बाल लीलाएं भी उतनी ही अद्भुत और चमत्कारी हैं, जितनी उनकी युवावस्था की वीरता। ऐसी ही एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा है, जब बालक हनुमान ने सूर्य देव (Lord Sun) को लाल फल समझकर निगल लिया था। इस घटना से न केवल धरती बल्कि पूरे ब्रह्मांड में अंधकार छा गया और देवताओं में हाहाकार मच गया था। बाल हनुमान की भूख और सूर्य को फल समझने की कथा पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा केसरी और माता अंजनी के घर एक विलक्षण बालक का जन्म हुआ, जिसे मारुति नाम दिया गया। यह बालक साधारण नहीं था, उसमें देवताओं द्वारा प्रदान की गई दिव्य शक्तियां विद्यमान थीं। बचपन से ही मारुति बेहद चंचल, बलवान और बुद्धिमान थे। एक दिन उन्होंने आकाश में चमकते हुए सूर्य को देखा, जो उन्हें एक लाल और दमकते हुए पके आम की तरह प्रतीत हुआ। उसे देखकर उनके भीतर उसे खाने की इच्छा जाग उठी। वे तुरंत आकाश की ओर उड़ चले और इतनी तेजी से बढ़े कि देवता भी अचंभित रह गए। हनुमान जी (Hanuman Ji) ने सूर्य को पकड़ने की कोशिश की और अंत में उसे निगल लिया। जैसे ही उन्होंने सूर्य को निगला, समस्त पृथ्वी पर अंधकार छा गया और दिन में ही रात जैसा माहौल बन गया। इससे सभी जीव-जंतु भयभीत हो उठे। देवताओं की चिंता और इंद्र का हस्तक्षेप इसके बाद सभी देवता चिंतित होकर ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। ब्रह्मा जी ने इंद्र देव को निर्देश दिया कि वे उस बालक को रोकें। इंद्र देव ने अपने वज्र से मारुति यानी हनुमान जी पर प्रहार किया, जिससे वे सीधे धरती पर गिर पड़े। यह देखकर ब्रह्मा जी ने हनुमान जी (Hanuman Ji) को उठाया और कहा, “यह बालक असाधारण है, इसे कोई भी क्षति नहीं पहुंचा सकता।” इसके बाद ब्रह्मा जी ने उन्हें अमरता और विजय का वरदान दिया। अन्य देवताओं ने भी हनुमान जी को अनेक शक्तियां प्रदान कीं—जैसे अग्नि से रक्षा, जल में न डूबने की क्षमता, हवा में उड़ने की कला और अनेकों दिव्य वरदान। परंतु, बाल्यावस्था में हनुमान जी जब अपनी शक्तियों का अनुचित प्रयोग करने लगे और ऋषियों की तपस्या में विघ्न डालने लगे, तो ऋषियों ने उन्हें श्राप दिया कि वे अपनी शक्तियों को भूल जाएंगे और तब तक नहीं याद कर पाएंगे, जब तक कोई उन्हें स्मरण न कराए। इसी कारण जब आगे चलकर हनुमान जी (Hanuman Ji) की भेंट श्रीराम से हुई, तभी उन्हें अपनी सभी दिव्य शक्तियों का पुनः स्मरण हुआ और वे भगवान राम के अनन्य भक्त व शक्तिशाली बजरंगबली के रूप में प्रतिष्ठित हुए इसे भी पढ़ें:-  क्यों चढ़ाया जाता है हनुमान जी को सिंदूर? जानिए त्रेता युग से जुड़ी यह अद्भुत कथा देवताओं का समाधान और हनुमान को वरदान समस्त देवताओं ने वायुदेव को शांत करने और हनुमान जी (Hanuman Ji) की क्षमा याचना हेतु मिलकर उन्हें अनेक वरदान दिए। ब्रह्मा जी, इंद्र देव, वरुण देव, यमराज आदि ने बालक हनुमान को अमरता, अजेयता, बल, बुद्धि, वेदों का ज्ञान और हर प्रकार के दैवीय वरदान दिए। इस प्रकार हनुमान जी त्रेतायुग के सबसे बलशाली और बुद्धिमान देवता बने। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Hanuman Ji #Hanuman #HanumanStory #HinduMythology #SuryaDev #IndianLegends #HanumanJayanti #MythologicalTales #LordHanuman #SpiritualIndia #DivineStories

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