Powerful goddess Baglamukhi

बगलामुखी जयंती 2025: शत्रुनाशिनी देवी की आराधना से मिलती है विजय और सुरक्षा

हिंदू धर्म में दस महाविद्याओं का विशेष महत्व है, जिनमें से एक हैं मां बगलामुखी। इन्हें तंत्र साधना की देवी भी कहा जाता है। मां बगलामुखी की उपासना विशेष रूप से शत्रु नाश, वाद-विवाद में विजय, मुकदमे में सफलता और जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए की जाती है। हर वर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को बगलामुखी जयंती मनाई जाती है। यह तिथि 2025 में कब पड़ रही है और मां की उपासना का क्या महत्व है, आइए विस्तार से जानते हैं। बगलामुखी जयंती 2025 में कब है? मां बगलामुखी दस महाविद्याओं में आठवें स्थान पर आती हैं। इन्हें ‘पीताम्बरा देवी’ भी कहा जाता है क्योंकि इनका वस्त्र, श्रृंगार और आसन पीले रंग का होता है। पीला रंग मां का प्रिय रंग है, और यही रंग तंत्र साधना में भी अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। मां का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और रौद्र है। उनके हाथ में एक गदा होती है, जिससे वे शत्रुओं का संहार करती हैं। देवी पार्वती के उग्र रूप के रूप में पूजित मां बगलामुखी की जयंती (Baglamukhi Jayanti 2025) हर साल वैशाख शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है। इस वर्ष यह पर्व 5 मई को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि की शुरुआत 4 मई को सुबह 7:18 बजे होगी और इसका समापन 5 मई को सुबह 7:35 बजे होगा। चूंकि हिंदू धर्म में उदया तिथि को मान्यता दी जाती है, इसलिए बगलामुखी जयंती 5 मई को मनाई जाएगी और इसी दिन मां की पूजा और विशेष साधना की जाएगी। पीले रंग का महत्वमां बगलामुखी का स्वरूप सुनहरे पीले रंग का होता है, इसलिए उनकी पूजा में पीले वस्त्र धारण किए जाते हैं और पूजा सामग्री भी अधिकतर पीले रंग की होती है। साधना शुरू करने से पहले हरिद्रा गणपति की पूजा और उनका आह्वान किया जाता है। साधना का ज्ञान ब्रह्माजी ने दिया थापौराणिक कथाओं के अनुसार, बगलामुखी साधना का प्रथम उपदेश ब्रह्माजी ने सनकादि ऋषियों को दिया था। उनसे प्रेरित होकर देवराज नारद ने मां बगलामुखी की उपासना की। आगे चलकर भगवान विष्णु ने यह दिव्य विद्या भगवान परशुराम को प्रदान की थी। बगलामुखी जयंती पर क्या करें पूजा विधि? बगलामुखी जयंती के दिन विशेष पूजा और अनुष्ठान करने से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आता है। इस दिन पीले वस्त्र पहनें और पीले फूल, हल्दी, चना दाल, बेसन के लड्डू आदि का उपयोग कर पूजन करें। पूजन विधि: इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया युद्ध से पहले पांडवों ने की थी आराधना पांडवों ने भी मां बगलामुखी की आराधना की थी। ऐसा कहा जाता है कि महाभारत युद्ध से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों को रात के समय मां बगलामुखी की साधना करने का सुझाव दिया था, जिससे उन्हें विशेष सिद्धि प्राप्त हो सके। मां बगलामुखी के तीन प्रमुख ऐतिहासिक मंदिर भारत में स्थित हैं—मध्य प्रदेश के दतिया और नलखेड़ा (आगर मालवा) में दो, और तीसरा हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News  #BaglamukhiJayanti2025 #ShatruNashiniDevi #BaglamukhiPuja #GoddessBaglamukhi #VictoryWithPuja #HinduFestivals2025 #DeviBhakti #TantricWorship #SpiritualProtection #BaglamukhiMantra

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Why Sindoor is Offered to Hanuman

क्यों चढ़ाया जाता है हनुमान जी को सिंदूर? जानिए त्रेता युग से जुड़ी यह अद्भुत कथा

हिंदू धर्म में भगवान हनुमान जी (Lord Hanuman) को बल, बुद्धि, भक्ति और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। वे कलियुग के सबसे जाग्रत और शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता माने जाते हैं। भक्तजन मंगलवार और शनिवार को विशेष रूप से हनुमान जी की पूजा करते हैं और उनके विग्रह पर सिंदूर चढ़ाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हनुमान जी को सिंदूर क्यों चढ़ाया जाता है? यह परंपरा केवल श्रद्धा का विषय नहीं, बल्कि इसके पीछे एक बेहद रोचक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है, जो त्रेता युग के समय की बताई जाती है। हनुमान जी और सिंदूर की कथा धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान श्रीराम (Lord Shri Ram) वनवास समाप्त कर अयोध्या लौटे और राजपाट संभाल रहे थे, उस समय एक दिन माता सीता किसी कार्य में व्यस्त थीं। तभी हनुमान जी ने जिज्ञासावश उनसे पूछा कि भगवान श्रीराम को कौन-सी चीज़ सबसे अधिक प्रिय है। माता सीता ने उत्तर दिया कि भगवान राम (Lord Rama) को किसी वस्तु से विशेष मोह नहीं है, वे सभी चीजों को समान दृष्टि से देखते हैं और सब चीज़ों से प्रसन्न हो जाते हैं। तभी हनुमान जी की दृष्टि सीता माता के मांग में लगे सिंदूर पर पड़ी। उन्होंने उत्सुकता से पूछा, “माते, आप यह सिंदूर क्यों लगाती हैं?” तब माता सीता ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, “यह सिंदूर मेरे सुहाग की निशानी है और इसे लगाने से प्रभु श्रीराम प्रसन्न रहते हैं।” तभी हनुमान जी (Lord Hanuman) के मन में एक विचार आया। उन्होंने अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लिया और प्रभु श्रीराम के दरबार में उपस्थित हुए। उन्हें इस रूप में देखकर वहां मौजूद लोग हँसने लगे। जब भगवान राम ने इसका कारण पूछा, तो हनुमान जी ने भावुकता से उत्तर दिया—“जब माता सीता की मांग में थोड़ा-सा सिंदूर (Sindoor) देखकर आप प्रसन्न होते हैं, तो मैंने सोचा कि यदि मैं पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लूं, तो आपको अत्यधिक प्रसन्नता होगी।” हनुमान जी की यह मासूम और भक्ति से भरी भावना सुनकर भगवान श्रीराम (Lord Shri Ram) अत्यंत प्रसन्न हुए। हनुमान जी ने इस माध्यम से अपने प्रभु के प्रति अटूट प्रेम और समर्पण प्रकट किया। तभी से हनुमान जी (Lord Hanuman) को सिंदूर चढ़ाने की परंपरा आरंभ हुई, जो आज भी श्रद्धा और भक्ति के प्रतीक रूप में निभाई जाती है। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया हनुमान जी पर सिंदूर चढ़ाने का महत्व सिंदूर मुख्य रूप से दो रंगों में उपलब्ध होता है—लाल और नारंगी। हिंदू परंपराओं में लाल सिंदूर को सुहाग का प्रतीक माना जाता है, जिसे विवाहित महिलाएं अपने माथे पर लगाती हैं। वहीं नारंगी सिंदूर त्याग, भक्ति और समर्पण का प्रतीक माना गया है। हनुमान जी के व्यक्तित्व में प्रभु श्रीराम के प्रति अटूट समर्पण और निष्ठा प्रमुख रूप से दिखाई देती है, इसलिए उन्हें नारंगी सिंदूर अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से हनुमान जी पर सिंदूर (Sindoor) चढ़ाता है, उसकी सभी परेशानियाँ और कष्ट संकटमोचन हनुमान दूर कर देते हैं। यह परंपरा न केवल भक्ति भाव का प्रतीक है, बल्कि यह दर्शाती है कि समर्पण और सेवा के माध्यम से प्रभु की कृपा प्राप्त की जा सकती है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Lord Hanuman #HanumanSindoor #TretayugStory #HanumanDevotion #HinduBeliefs #SindoorSignificance #RamayanTales #HanumanBhakti #SpiritualIndia #MythologyFacts #DivineStories

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Sita Navami Celebration Tips

सीता नवमी 2025: घर में सुख-समृद्धि के लिए मां जानकी को अर्पित करें ये भोग

सीता नवमी (Sita Navami) हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे माता सीता (Goddess Sita) के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इसे जानकी जयंती भी कहा जाता है। इस दिन श्रद्धालु माता सीता की विशेष पूजा-अर्चना कर उनके जीवन से सीख लेते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन मां जानकी को विशेष भोग अर्पित करने से घर में कभी भी अन्न-धन की कमी नहीं होती। आइए जानते हैं सीता नवमी 2025 की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और भोग के महत्व। सीता नवमी 2025 कब है? (Sita Navami 2025 Date & Time) सीता नवमी (Sita Navami) का पर्व वर्ष 2025 में सोमवार, 5 मई को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार, नवमी तिथि 5 मई को सुबह 7 बजकर 35 मिनट से आरंभ होकर 6 मई को सुबह 8 बजकर 38 मिनट तक रहेगी। इस पावन अवसर पर महिलाएं सुखमय वैवाहिक जीवन और घर-परिवार में समृद्धि की कामना से व्रत रखती हैं। सीता नवमी पर माता जानकी (Goddess Sita) की पूजा से दांपत्य जीवन में प्रेम, सौहार्द और सुख-शांति बनी रहती है। मां सीता को लगाएं ये दिव्य भोग (Sita Navami Bhog & Offerings)   चावल की खीर: सीता नवमी के शुभ पर्व पर केसर मिलाकर चावल की खीर तैयार कर माता सीता को भोग लगाना अत्यंत फलदायी माना गया है। ऐसी मान्यता है कि इस दिव्य भोग से घर में सुख, समृद्धि और शांति बनी रहती है।   मखाने की खीर: व्रत करने वाले भक्तों के लिए मखाने की खीर एक आदर्श भोग है। इस दिन माता सीता को इसका नैवेद्य चढ़ाने से घर में अन्न और धन की वृद्धि होती है।   नारियल के लड्डू: नारियल शुभता और पवित्रता का प्रतीक माना गया है। सीता माता को नारियल के लड्डू अत्यंत प्रिय हैं। इनका भोग लगाने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है और सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है।   पंजीरी: पारंपरिक प्रसाद के रूप में पंजीरी सीता नवमी पर अर्पित करना अत्यंत फलदायी होता है। इससे घर में संपन्नता और सौभाग्य बना रहता है।   ऋतु फल और मेवे: सीता नवमी के अवसर पर माता सीता को ताजे मौसम के फल जैसे केला, सेब, अनार और विभिन्न प्रकार के सूखे मेवे अर्पित किए जाते हैं। यह सात्विक और पवित्र भोग न केवल मन को शांति प्रदान करता है, बल्कि भक्त को पुण्य भी प्राप्त होता है। सीता नवमी पर करें ये शुभ उपाय, मिलेगा माता सीता का आशीर्वाद इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया सीता नवमी की पूजा विधि: कैसे करें मां जानकी की आराधना सीता नवमी (Sita Navami) के दिन प्रातः स्नान करके स्वच्छ और सात्विक वस्त्र धारण करें। फिर पूजा स्थान की सफाई कर माता सीता की प्रतिमा या चित्र को स्थापित करें। उन्हें पुष्प, अक्षत, कुमकुम और सोलह श्रृंगार की वस्तुएं समर्पित करें। इसके पश्चात श्रद्धा से तैयार किया गया दिव्य भोग माता को अर्पित करें और भक्तिभाव से प्रार्थना करें। पूजा उपरांत यह प्रसाद अपने परिवारजनों व आस-पास के लोगों में वितरित करें। यह दिन माता जानकी की विशेष कृपा प्राप्त करने का शुभ अवसर माना जाता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Sita Navami #SitaNavami2025, #SitaNavamiBhog, #MaaSitaBlessings, #JankiPuja, #HappinessAndProsperity, #NavamiCelebrations, #RamayanFestival, #DivineOfferings, #FestiveRituals, #HinduFestivals2025

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Surdas poems in praise of Krishna

सूरदास जयंती 2025: भक्ति और काव्य के सच्चे साधक को श्रद्धांजलि

संत सूरदास (Surdas Jayanti), भक्ति काल के प्रमुख कवि और भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त माने जाते हैं। उनकी जयंती हर वर्ष वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है। हर वर्ष वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को श्रद्धा और भक्ति के साथ सूरदास जयंती मनाई जाती है। इस विशेष अवसर पर देशभर के मंदिरों में भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की जाती है, और भगवान श्रीकृष्ण (Shri Krishna) के महान भक्त संत सूरदास को श्रद्धांजलि दी जाती है। ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण के सच्चे भक्तों को जीवन में सुख, सम्मान और प्रसिद्धि निश्चित रूप से प्राप्त होती है। सूरदास जी वैष्णव परंपरा के महान संत थे, जिन्होंने भक्ति, गीत और संगीत के माध्यम से श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति की। अपने जीवन में सूरदास जी ने कई भावपूर्ण रचनाएं कीं, जिनमें श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, रास लीला और वात्सल्य भाव का सुंदर चित्रण है। आज भी उनके दोहे और पद लोगों के दिलों में बसे हैं और भक्ति संगीत में नियमित रूप से गाए जाते हैं। इस जयंती पर आइए जानते हैं सूरदास जयंती 2025 की तिथि, शुभ मुहूर्त, बन रहे योग और उनके अमर दोहे जो आज भी हमारे जीवन को प्रकाश देते हैं। सूरदास का जीवन परिचय संत सूरदास का जन्म 15वीं शताब्दी के अंत में माना जाता है। उनका जन्मस्थान हरियाणा के फरीदाबाद जिले के सीही गांव या आगरा के पास स्थित रुनकता गांव में हुआ था। जन्म से ही दृष्टिहीन होने के बावजूद, सूरदास ने अपनी आध्यात्मिक दृष्टि से भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का अद्भुत वर्णन किया। उन्होंने श्री वल्लभाचार्य से दीक्षा ली और पुष्टिमार्ग के अनुयायी बने।​ सूरदास जयंती 2025 (Surdas Jayanti 2052): तिथि और शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग के अनुसार वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि इस वर्ष 1 मई को सुबह 11:23 बजे शुरू होकर 2 मई को सुबह 9:13 बजे समाप्त होगी। ऐसे में सूरदास जयंती 2 मई 2025 को मनाई जाएगी। उल्लेखनीय है कि 1 मई को विनायक चतुर्थी का पर्व भी रहेगा। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया सूरदास जयंती पर बन रहे शुभ योगज्योतिष गणनाओं के अनुसार इस बार सूरदास जयंती के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग का विशेष संयोग बन रहा है। इसके अलावा रवि योग और दुर्लभ शिववास योग का भी निर्माण हो रहा है। इन तीनों योगों में भगवान श्रीकृष्ण की आराधना विशेष फलदायक मानी जाती है। कहा जाता है कि इस दिन सूरदास जी के आराध्य श्रीकृष्ण (Shri Krishna) की पूजा करने से साधक की सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।  सूरदास के प्रसिद्ध दोहे नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Surdas Jayanti #SurdasJayanti2025 #SurdasPoetry #BhaktiMovement #IndianSaints #DevotionalPoet #KrishnaBhakti #SantSurdas #HinduFestivals2025 #IndianLiterature #SpiritualLegends

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Sawan 2025 start date

हर-हर महादेव! जानिए कब से शुरू हो रहा है सावन 2025 का पावन महीना

हिंदू पंचांग के अनुसार सावन का महीना (Sawan Month) भगवान शिव (Lord Shiva) की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। यह महीना भक्तों के लिए भक्ति, उपवास और पूजा का विशेष समय होता है। सावन में विशेष रूप से सोमवार  (Monday) और मंगलवार को व्रत रखे जाते हैं, जिन्हें क्रमशः सावन सोमवार व्रत और मंगला गौरी व्रत कहा जाता है।​ सावन 2025 (Sawan 2025) की शुरुआत और समाप्ति ज्योतिष गणनाओं के अनुसार आषाढ़ पूर्णिमा इस वर्ष 10 जुलाई को है। इसके अगले दिन यानी 11 जुलाई से पवित्र सावन मास की शुरुआत होगी। इस महीने की पहली सावन सोमवारी का व्रत 14 जुलाई 2025 को रखा जाएगा। इसके बाद दूसरी सोमवारी 21 जुलाई, तीसरी सोमवारी 28 जुलाई और चौथी व अंतिम सोमवारी 4 अगस्त को होगी। वहीं, 9 अगस्त को सावन पूर्णिमा है, जिस दिन रक्षाबंधन का पर्व भी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। सावन सोमवार व्रत की तिथियां सावन 2025 (Sawan 2025) की शुभ शुरुआत वैदिक पंचांग के अनुसार इस बार आषाढ़ पूर्णिमा गुरुवार, 10 जुलाई को पड़ेगी। इसके बाद, सावन मास (Sawan Month) की शुरुआत अगले दिन यानी 11 जुलाई से मानी जाएगी। यदि इसे आसान भाषा में समझें, तो इस साल सावन महीना 11 जुलाई 2025, शुक्रवार से आरंभ होगा। आषाढ़ पूर्णिमा की तारीख 11 जुलाई की रात 2 बजकर 6 मिनट से प्रारंभ होकर 12 जुलाई की रात 2 बजकर 8 मिनट तक रहेगी। सनातन परंपरा में “उदयातिथि” को मान्यता दी जाती है, इसी कारण सावन की शुरुआत 11 जुलाई से होगी। सावन सोमवार व्रत 2025 की तिथियां मंगला गौरी व्रत की तिथियां इन व्रतों के दौरान महिलाएं विशेष पूजा करती हैं और देवी पार्वती (Devi Parvati) का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए व्रत रखती हैं। ​ इसे भी पढ़ें:-  विष्णु भक्ति से मिलेगा अक्षय पुण्य, जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और भोग का महत्व सावन महीने का महत्व सावन का महीना (Sawan Month) भगवान शिव (Lord Shiva) को समर्पित होता है। सावन माह में शिव भक्त व्रत रखते हैं, शिवलिंग (Shivling) की पूजा करते है। और शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र आदि अर्पित करते हैं और शिव मंत्रों का जाप करते हैं। ऐसा माना जाता है कि सावन में की गई पूजा और व्रत से भगवान शिव (Lord Shiva) शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।​ नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Sawan Month #Sawan2025 #ShravanMonth #SawanStartDate2025 #HarHarMahadev #LordShiva #SawanSomwar #SawanFestival #ShivaBhakti #HinduFestivals #SpiritualMonth

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Jyeshtha Purnima 2025

ज्येष्ठ पूर्णिमा 2025: जानिए व्रत की तिथि, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

भारतीय पंचांग में पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व होता है। हर माह की पूर्णिमा को धार्मिक दृष्टि से शुभ और पुण्यदायी माना गया है, लेकिन ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा का स्थान और भी विशिष्ट है। यह दिन न केवल व्रत और पूजा के लिए उत्तम माना जाता है, बल्कि कई महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठानों के आयोजन के लिए भी शुभ होता है। आइए जानते हैं, ज्येष्ठ पूर्णिमा 2025 (Jyeshtha Purnima 2025) में कब मनाई जाएगी, इसका शुभ मुहूर्त क्या रहेगा और इसका धार्मिक महत्व क्या है। ज्येष्ठ पूर्णिमा 2025 की तिथि और समय वैदिक पंचांग के अनुसार, पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 10 जून को प्रातः 11:35 बजे होगी और यह 11 जून को दोपहर 1:13 बजे समाप्त होगी। ऐसे में ज्येष्ठ पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima) का पावन पर्व 11 जून 2025 को धूमधाम से मनाया जाएगा। ज्येष्ठ पूर्णिमा का धार्मिक महत्व ज्येष्ठ पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima) के दिन व्रत रखकर चंद्रदेव का पूजन करने से कुंडली में मौजूद चंद्र दोष का निवारण होता है। यदि जन्म पत्रिका में चंद्रमा कमजोर स्थिति में हो या उसकी दशा का प्रभाव चल रहा हो, तो इस दिन की पूजा से उसके नकारात्मक प्रभावों में भी कमी आती है। इस पावन अवसर पर श्रद्धा और क्षमता के अनुसार अन्न, वस्त्र और धन का दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। मान्यता है कि ज्येष्ठ पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima) के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और घर में सुख और समृद्धि का आगमन होता है। साथ ही, इस दिन गंगा स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। ज्येष्ठ पूर्णिमा को धार्मिक और आध्यात्मिक अनुष्ठानों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। ज्येष्ठ पूर्णिमा 2025: करें और न करें ये विशेष बातें ज्येष्ठ पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima 2025) के दिन घर में अंधेरा नहीं रखना चाहिए, विशेष रूप से संध्या के समय। मान्यता है कि इस शुभ अवसर पर देवी लक्ष्मी घर में आगमन करती हैं, और वे अंधेरे स्थानों में प्रवेश नहीं करतीं।इस दिन काले वस्त्र पहनने से भी बचना चाहिए, क्योंकि काला रंग नकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित कर सकता है, जिससे जीवन, कार्य और व्यवसाय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।दान और पूजा के समय भी काले रंग से जुड़े वस्तुओं का उपयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे चंद्रमा की शुभ स्थिति प्रभावित हो सकती है और राहु के दुष्प्रभाव बढ़ सकते हैं। इसलिए इस दिन हल्के और शुभ रंगों का प्रयोग करना और शुद्ध भाव से पूजा-अर्चना करना अत्यंत लाभकारी माना गया है। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया ज्येष्ठ पूर्णिमा : करें ये शुभ कार्य इस पावन दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। यदि संभव हो तो किसी पवित्र नदी में स्नान करें या स्नान के जल में गंगा जल मिलाकर स्नान करें। स्नान करते समय मन में गंगा, यमुना, सरस्वती जैसी पवित्र नदियों का स्मरण करना अत्यंत शुभ होता है।स्नान के उपरांत घर के मंदिर में दीपक जलाएं और यदि संभव हो तो पूरे दिन व्रत का संकल्प लें।घर के देवालय में सभी देवी-देवताओं का गंगा जल से अभिषेक करें। इस दिन भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है। उनके साथ माता लक्ष्मी की भी विधिपूर्वक आराधना करें।भगवान विष्णु को भोग अर्पित करते समय ध्यान रखें कि भोग में तुलसी पत्र अवश्य हो, क्योंकि बिना तुलसी के भगवान विष्णु (Lord Vishnu) भोग स्वीकार नहीं करते। केवल सात्विक भोजन का ही भोग लगाना चाहिए।पूजन के पश्चात भगवान विष्णु (Lord Vishnu) और माता लक्ष्मी की आरती करें और उनका ध्यान तथा नाम-स्मरण अधिक से अधिक करें। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा का पूजन भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य अर्पित करें, जिससे चंद्र दोष और अन्य ग्रहदोषों से मुक्ति प्राप्त होती है।इस पुण्य अवसर पर जरूरतमंदों को दान देना अत्यंत शुभ माना गया है। साथ ही यदि आपके आसपास गाय हो, तो उसे भोजन कराना भी अत्यंत पुण्यदायी होता है, जिससे कई प्रकार के दोषों का निवारण होता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Jyeshtha Purnima 2025 #JyeshthaPurnima2025 #PurnimaVrat #HinduFestival #FullMoon2025 #PurnimaSignificance #VratDates2025 #SpiritualIndia #HinduRituals #PurnimaCelebration #ReligiousFestival

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Budhwar

बुधवार को भूलकर भी न करें ये 4 काम, वरना बर्बाद हो सकता है घर-परिवार

हिंदू धर्म में सप्ताह के हर दिन का अपना विशेष महत्व है और हर दिन से जुड़ी कुछ खास मान्यताएं तथा नियम भी हैं। बुधवार (Budhwar) को विशेष रूप से भगवान गणेश को समर्पित माना जाता है। इस दिन बुद्धि, व्यापार, संतान सुख और जीवन में स्थिरता बनाए रखने के लिए पूजा-अर्चना की जाती है।लेकिन शास्त्रों में कुछ ऐसे कार्य बताए गए हैं जिन्हें बुधवार के दिन विवाहित महिलाओं को भूलकर भी नहीं करना चाहिए। यदि इन नियमों का पालन न किया जाए, तो घर की सुख-शांति और समृद्धि पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। यहां जानिए वे चार कार्य जिन्हें बुधवार के दिन करने से बचना चाहिए। 1. हरे रंग का अपमान या त्याग करना बुधवार का रंग हरा होता है, जो समृद्धि, शांति और उन्नति का प्रतीक है। ऐसे में इस दिन हरे रंग का तिरस्कार करना या जानबूझकर हरे रंग के वस्त्र या वस्तुएं त्यागना अशुभ फल देता है।विशेषकर विवाहित महिलाओं को बुधवार के दिन हरे रंग के वस्त्र पहनने की सलाह दी जाती है, ताकि दांपत्य जीवन में प्रेम और सामंजस्य बना रहे।अगर इस दिन हरे रंग का अपमान किया जाए, तो घर में कलह, आर्थिक तंगी और वैवाहिक जीवन में दरार आ सकती है। 2. उधार देना या लेना बुधवार को उधार का लेन-देन करना वर्जित माना गया है। विशेषकर विवाहित महिलाओं को इस दिन न तो किसी को पैसा उधार देना चाहिए और न ही किसी से उधार लेना चाहिए।अगर बुधवार को उधार दिया या लिया जाए, तो पूरे सप्ताह या लंबे समय तक आर्थिक संकट बना रह सकता है। घर में पैसों की किल्लत हो सकती है और एक-एक पैसे के लिए तरसना पड़ सकता है।इसलिए इस दिन आर्थिक लेन-देन से बचना अत्यंत आवश्यक है। 3. झूठ बोलना और वाद-विवाद करना बुधवार का संबंध बुध ग्रह से है, जो वाणी और बुद्धि का कारक है। इस दिन वाणी में संयम रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है।अगर विवाहित महिलाएं बुधवार को झूठ बोलती हैं या बेवजह वाद-विवाद करती हैं, तो उनके वैवाहिक जीवन में गलतफहमियां और तनाव बढ़ सकते हैं।यह गृह क्लेश का कारण बन सकता है और धीरे-धीरे बसा-बसाया घर भी बिखर सकता है।इसलिए इस दिन विशेष रूप से मधुर वाणी का प्रयोग करें और घर के वातावरण को शांत और सकारात्मक बनाए रखें। 4. घर की साफ-सफाई को नजरअंदाज करना बुधवार के दिन घर को साफ-सुथरा रखना अत्यंत आवश्यक है। गंदगी, बिखरा हुआ सामान या अव्यवस्था लक्ष्मी का अपमान माना जाता है, जिससे घर की समृद्धि धीरे-धीरे खत्म हो सकती है।विशेष रूप से पूजा स्थल, रसोईघर और मुख्य द्वार को स्वच्छ रखना चाहिए।विवाहित महिलाओं को बुधवार के दिन विशेष ध्यान देना चाहिए कि घर में साफ-सफाई बनी रहे ताकि सकारात्मक ऊर्जा का वास हो और घर में खुशहाली बनी रहे। बुधवार को करें ये शुभ कार्य नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Budhwar #WednesdayTips #HinduBeliefs #VastuWednesday #SpiritualMistakes #WednesdayRituals #FamilyWellbeing #AvoidOnWednesday #IndianCulture #SuperstitionFacts #AstrologyTips

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Akshaya Tritiya 2025 What to Buy If Not Buying Gold

Akshaya Tritiya 2025: अक्षय तृतीया पर क्या खरीदें अगर सोना खरीदना संभव न हो तो?

अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya) हिन्दू धर्म में अत्यंत शुभ और पुण्यदायी पर्व माना जाता है। यह तिथि वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को आती है और इसे ‘अविनाशी सौभाग्य’ का प्रतीक माना गया है। अक्षय तृतीया का शाब्दिक अर्थ है – अक्षय, अर्थात कभी न क्षय होने वाला, और तृतीया, यानी तीसरा दिन। इस दिन किए गए दान, पूजन, स्नान, जप-तप और नए कार्यों का फल अक्षय रहता है, इसलिए इसे किसी भी शुभ कार्य के लिए श्रेष्ठ माना गया है। खास बात यह है कि अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya) पर किसी कार्य के लिए मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि यह स्वयं सिद्ध मुहूर्त होता है। परंपरागत रूप से इस दिन सोने के आभूषण (Gold Jewellery) या धातु खरीदने की परंपरा है। ऐसा माना जाता है कि अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya) के दिन खरीदा गया सोना समृद्धि और सौभाग्य को बढ़ाता है। लेकिन हर कोई सोना (Gold) खरीदने में सक्षम नहीं होता, ऐसे में प्रश्न उठता है कि अगर सोना नहीं खरीद सकते, तो क्या खरीदें? सोने की जगह ये 5 वस्तुएं खरीदना होता है शुभ 1. मिट्टी के बर्तन – मिट्टी का संबंध मंगल ग्रह से होता है। इसे खरीदने से घर में शांति और स्थिरता आती है। साथ ही, यह कर्ज से मुक्ति दिलाने में भी सहायक माना जाता है। 2. हल्दी की गांठ – गुरु ग्रह से संबंधित यह वस्तु ज्ञान, स्वास्थ्य और समृद्धि को बढ़ावा देती है। इसे खरीदने और पूजा स्थान पर रखने से गृह कलह दूर होती है और वैवाहिक जीवन (Married Life) में मिठास आती है। 3 . रूई – रूई का संबंध शुक्र ग्रह से है, जो भौतिक सुख-सुविधाओं और लक्ष्मी कृपा का प्रतीक है। इसे इस दिन खरीदकर घर में रखने से आर्थिक समृद्धि आती है। 4. पीली सरसों – यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने वाली वस्तु है। पीली सरसों को अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya) के दिन खरीदकर दरवाजे या पूजा स्थल पर रखने से दरिद्रता दूर होती है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। 5. पीली कौड़ी – यह धन और समृद्धि की प्रतीक मानी जाती है। पीली कौड़ी को तिजोरी या पूजा स्थल में रखने से घर में धनलाभ के योग बनते हैं। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya) के दिन आदि शंकराचार्य द्वारा रचित कनकधारा स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। यह स्तोत्र देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए अत्यंत प्रभावी माना गया है और इसका पाठ करने से घर में अन्न, धन और सुख-शांति का वास होता है। अक्षय तृतीया 2025 (Akshaya Tritiya 2025) का मुहूर्त इस वर्ष अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya) का पर्व 29 अप्रैल 2025 को शाम 5:31 बजे आरंभ होकर 30 अप्रैल 2025 को दोपहर 2:12 बजे तक रहेगा। मुख्य पर्व 30 अप्रैल, बुधवार को मनाया जाएगा। सोना खरीदने का शुभ मुहूर्त 30 अप्रैल की सुबह 5:31 बजे से लेकर 11:55 बजे तक रहेगा। अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya) केवल भौतिक समृद्धि का नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उत्थान और शुभ संकल्पों का पर्व भी है। इस दिन यदि सोना खरीदना संभव न हो तो उपर्युक्त 5 वस्तुओं की खरीद से भी अक्षय पुण्य और सुख-समृद्धि प्राप्त की जा सकती है। इस अवसर पर शुभ कार्य करें, दान दें और सत्कर्मों से जीवन को धन्य बनाएं। Latest News in Hindi Today Hindi News Akshaya Tritiya #AkshayaTritiya2025 #GoldAlternatives #AuspiciousBuying #SilverPurchase #WealthAndProsperity #SpiritualShopping #AkshayaTritiyaTips #HinduFestivals #LuckyItems #FestiveShopping

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Lord Rama

राम की अंतिम लीला: क्यों लिया भगवान श्रीराम ने सरयू में जल समाधि?

भगवान श्रीराम (Lord Rama) का जीवन भारतीय संस्कृति और धर्मग्रंथों में आदर्श पुरुष के रूप में वर्णित है। रामायण की गाथा केवल उनके जीवन के वीरता और धर्मपालन के किस्सों तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके जीवन के अंतिम चरणों में जल समाधि लेने की घटना भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस पौराणिक कथा के पीछे गहरे धार्मिक और आध्यात्मिक रहस्य छिपे हैं। आइए जानते हैं भगवान राम द्वारा जल समाधि लेने के पीछे की कथा और उसका महत्व। भगवान राम (Lord Rama) का राजतिलक और कालदूत का संदेश लंका विजय और अयोध्या वापसी के बाद भगवान राम का राजतिलक हुआ और अयोध्या में ‘रामराज्य’ की स्थापना हुई। यह कालखंड धर्म, न्याय और सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। लेकिन समय का चक्र निरंतर चलता रहता है। जब भगवान राम का धरती पर मानव रूप में कार्यकाल पूरा होने का समय आया, तो स्वयं ब्रह्मा के आदेश पर कालदूत उनके पास आया। कालदूत ने भगवान राम को सूचित किया कि अब उनका पृथ्वी पर कार्य समाप्त हो गया है और उन्हें अपने वास्तविक स्वरूप – विष्णु लोक में लौटना होगा। राम ने काल से एकांत में मिलने की बात कही थी। लेकिन उसी समय उनका प्रिय भाई लक्ष्मण कुछ विशेष परिस्थिति में उस गोपनीय सभा में प्रवेश कर गया। भगवान राम ने पहले ही शपथ ली थी कि यदि कोई इस वार्ता के दौरान आएगा, तो उसे त्यागना पड़ेगा। शपथ के पालन हेतु भगवान राम को अत्यंत दुख के साथ लक्ष्मण का त्याग करना पड़ा। लक्ष्मण का त्याग और भगवान राम का निर्णय एक विशेष घटना के दौरान लक्ष्मण जी (Lord Rama) उस कक्ष में प्रवेश कर गए जहाँ भगवान राम और कालदेव (यमराज) के बीच गुप्त वार्ता चल रही थी। इस अनजाने में हुए व्यवधान से उनकी बातचीत में विघ्न उत्पन्न हो गया। भगवान राम ने पहले ही प्रतिज्ञा की थी कि वार्ता में किसी के हस्तक्षेप पर उसे त्यागना होगा। अपनी इसी प्रतिज्ञा का पालन करते हुए, भगवान राम ने भारी हृदय से लक्ष्मण का त्याग कर दिया।लक्ष्मण जी (Laxman Ji) ने अपने बड़े भाई की मर्यादा, प्रतिज्ञा और अयोध्या की सुरक्षा को सर्वोपरि मानते हुए इस निर्णय को सहर्ष स्वीकार किया। इसके बाद उन्होंने भगवान राम से विदा ली और सरयू नदी के तट पर जाकर जल समाधि लेकर अपने सांसारिक जीवन का त्याग कर दिया। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया भगवान राम ने भी ली जल समाधि लक्ष्मण जी (Laxman Ji) के जल समाधि लेने के बाद भगवान राम गहरे शोक में डूब गए। साथ ही उन्हें यह भी भली-भांति ज्ञात हो गया था कि पृथ्वी पर उनके अवतार का उद्देश्य अब पूर्ण हो चुका है। इस बीच ब्रह्मा जी और अन्य देवताओं ने भी उन्हें अपने दिव्य धाम, बैकुंठ, लौटने का आग्रह किया।अंततः भगवान राम (Lord Rama) ने सरयू नदी के तट पर पहुंचकर उसमें प्रवेश किया और जल समाधि के माध्यम से अपनी पृथ्वी पर लीला का समापन किया। इस प्रकार वे अपने मूल धाम, बैकुंठ, में लौट गए। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Lord Rama #LordRam #JalSamadhi #Ramayana #Ayodhya #HinduMythology #RamFinalLeela #ShriRam #SaryuRiver #RamSamadhi #RamStory

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Story of Lord Parshuram’s Wrath

परशुराम जयंती 2025: धर्म की रक्षा के लिए उठाया था फरसा, जानिए क्यों किया क्षत्रियों का 21 बार संहार

भगवान परशुराम की जयंती (Parshuram Jayanti) प्रतिवर्ष वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। वर्ष 2025 में यह तिथि 29 अप्रैल को शाम 5 बजकर 31 मिनट से आरंभ होकर 30 अप्रैल को दोपहर 2 बजकर 12 मिनट तक रहेगी। हालांकि, अधिकांश हिन्दू त्योहार उदयातिथि के आधार पर मनाए जाते हैं, लेकिन चूंकि भगवान परशुराम का जन्म प्रदोष काल में हुआ था, इसलिए इस बार परशुराम जयंती (Parshuram Jayanti) 29 अप्रैल 2025, मंगलवार के दिन मनाई जाएगी। भगवान परशुराम को ‘दिव्य योद्धा’, ‘ब्रह्म क्षत्रिय’ और ‘अखंड तपस्वी’ के रूप में पूजा जाता है। उन्हें भगवान विष्णु का क्रोधी रूप माना जाता है, जिन्होंने अन्याय और अधर्म के विरुद्ध खड़े होकर अपने फरसे से क्षत्रियों का 21 बार विनाश किया। लेकिन अक्सर यह सवाल उठता है कि आखिर परशुराम ने क्षत्रियों को 21 बार क्यों मारा था? इसके पीछे कौन सी कथा है? 21 बार क्षत्रियों का विनाश क्यों? एक पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान परशुराम (Lord Parshuram) और सहस्त्रार्जुन के बीच एक भीषण युद्ध हुआ। सहस्त्रार्जुन, जो महिष्मती का सम्राट था, अत्यंत अहंकारी हो गया था और धर्म की सभी सीमाओं को लांघ चुका था। वह वेदों, पुराणों और ब्राह्मणों का अपमान करता था, साथ ही ऋषियों के आश्रमों को भी नष्ट कर रहा था। जब यह अन्याय पराकाष्ठा पर पहुंचा, तब परशुराम अपने फरसे (परशु) को लेकर महिष्मती पहुंचे और सहस्त्रार्जुन से युद्ध किया। इस संग्राम में उन्होंने अपने अद्भुत पराक्रम से सहस्त्रार्जुन की हजारों भुजाएं और उसके धड़ को काट डाला। इस घटना के बाद, परशुराम ने अपने पिता के कहने पर इस वध का प्रायश्चित करने के लिए तीर्थ यात्रा शुरू की। इसी बीच सहस्त्रार्जुन का पुत्र अपने अन्य क्षत्रिय साथियों के साथ परशुराम के पिता महर्षि जमदग्नि के आश्रम पहुंचा, जहां तपस्या कर रहे ऋषि की हत्या कर दी और आश्रम को भी आग के हवाले कर दिया। जब माता रेणुका ने इस भयावह दृश्य को देखा, तो उन्होंने दुख में डूबे स्वर में अपने पुत्र परशुराम को पुकारा। जब परशुराम लौटे, तो उन्होंने अपनी मां को विलाप करते देखा और पाया कि उनके पिता का सिर धड़ से अलग था, और शरीर पर 21 गंभीर घाव थे। यह दृश्य देखकर परशुराम अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने उसी क्षण यह प्रतिज्ञा की कि वे हैहय वंश और उसके समर्थक क्षत्रियों का अंत करेंगे। उन्होंने शपथ ली कि वे 21 बार क्षत्रियों का संहार कर इस पाप का प्रतिशोध लेंगे। पुराणों के अनुसार परशुराम ने अपने इस संकल्प को पूरा करते हुए 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन कर दिया। उनका यह अभियान धर्म की पुनर्स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए था। परशुराम नाम कैसे पड़ा पुराणों के अनुसार, भगवान परशुराम (Lord Parshuram) का वास्तविक नाम ‘राम’ था। लेकिन जब भगवान शिव ने उन्हें एक दिव्य अस्त्र ‘परशु’ प्रदान किया, तो वे हमेशा उसी अस्त्र को अपने साथ रखने लगे। शिवजी द्वारा दिए गए इस परशु को धारण करने के कारण ही वे ‘परशु-राम’ कहलाए, जिसका अर्थ है – परशु धारण करने वाला राम। यही नाम कालांतर में प्रसिद्ध हुआ और वे ‘परशुराम’ के नाम से विख्यात हो गए। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया क्षत्रियों का संहार और धर्म की स्थापना कहा जाता है कि परशुराम ने प्रत्येक युद्ध में क्षत्रियों को पराजित करने के बाद उनकी भूमि को ब्राह्मणों को दान कर दिया। उन्होंने कुरुक्षेत्र के निकट ‘समंतपंचक’ नामक स्थान पर क्षत्रियों का रक्त बहाया और वहाँ पाँच सरोवर बनाए। इसके बाद उन्होंने तपस्या की और हिंसा का मार्ग त्याग दिया। परशुराम अमर माने जाते हैं और आज भी कई मान्यताओं के अनुसार वे हिमालय में तपस्या कर रहे हैं। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Lord Parshuram #ParshuramJayanti2025 #LordParshuram #HinduFestival #ParshuramHistory #DharmaProtector #VishnuAvatar #ParshuramWrath #KshatriyaAnnihilation #ParshuramLegend #ParshuramStory

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