Friday Lakshmi Puja

शुक्रवार को लक्ष्मी पूजन से बरसेगी धनवर्षा: जानिए सही विधि, नियम और फायदे

शुक्रवार का दिन मां लक्ष्मी (Maa Lakshmi) को समर्पित माना जाता है। देवी लक्ष्मी को धन, वैभव, सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य की देवी कहा गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भक्त श्रद्धा और विधिपूर्वक मां लक्ष्मी का पूजन करते हैं, उनके जीवन में कभी धन की कमी नहीं होती और घर में सुख-शांति बनी रहती है। खासकर शुक्रवार (Friday) को लक्ष्मी पूजन करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं शुक्रवार को लक्ष्मी पूजन का सही तरीका, आवश्यक सामग्री, पूजन विधि और इससे जुड़ी महत्वपूर्ण बातें। शुक्रवार को लक्ष्मी पूजन का महत्व शुक्रवार को मां लक्ष्मी की पूजा करने का शास्त्रों में विशेष महत्व बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन उनकी उपासना करने से धन-संपदा की प्राप्ति होती है। यदि आपके घर में भी धन की कमी बनी रहती है या मां लक्ष्मी का वास नहीं टिक पा रहा है, तो शुक्रवार (Friday) को विधिपूर्वक लक्ष्मी जी का पूजन करें और व्रत रखें। मां लक्ष्मी समृद्धि और वैभव की देवी हैं, इसीलिए इनकी पूजा अत्यंत पुण्यफलदायी मानी गई है। माता को प्रसन्न करने हेतु अनेक पूजा-विधियाँ, उपाय, आराधना के तरीके और मंत्र बताए गए हैं, जिनसे उनकी अनुकंपा प्राप्त होती है। शुक्रवार को मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए करें ये आसान और प्रभावी उपाय इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया व्रत रखने का नियम इस दिन श्रद्धालु व्रत भी रखते हैं। व्रती केवल फलाहार करते हैं या एक समय सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। दिनभर मां लक्ष्मी का नामजप और ध्यान करते हैं। सूरज ढलने के बाद पूजन करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Maa Lakshmi #LakshmiPujan #Dhanteras #WealthAttraction #LakshmiBlessings #FestiveVibes #FridayPuja #LakshmiPujaVidhi #PujaRules #Diwali2025 #ProsperityRituals

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Guru Gobind Singh Ji

Guru Gobind Singh Ji: पांच ककार, जो सिखों की पहचान और गौरव के प्रतीक बने

गुरु गोबिंद सिंह (Guru Gobind Singh) न केवल एक महान आध्यात्मिक गुरु थे, बल्कि वे एक वीर योद्धा, कवि और दार्शनिक भी थे। उन्होंने सिख धर्म को एक नई दिशा दी और ‘खालसा पंथ’ की स्थापना कर सिखों को संगठित किया। गुरु गोबिंद सिंह ने सिखों के लिए पांच महत्वपूर्ण प्रतीकों को अपनाने की परंपरा शुरू की, जिन्हें ‘पांच ककार’ (Five Kakaars) कहा जाता है। इन पांच ककारों को धारण करना हर सिख के लिए अनिवार्य माना जाता है। आइए जानते हैं कि ये पांच ककार क्या हैं और इनका सिख धर्म में क्या महत्व है। खालसा पंथ (Khalsa Panth) और पांच ककार की शुरुआत गुरु गोबिंद सिंह जी (Guru Gobind Singh) ने 1699 में बैसाखी के दिन आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ (Khalsa Panth)  की स्थापना की थी। इस दिन उन्होंने अपने अनुयायियों को एक विशेष पहचान दी और उन्हें ‘पांच ककार’ धारण करने का आदेश दिया। ये पांच ककार न केवल उनकी धार्मिक पहचान का प्रतीक बने बल्कि इनका गहरा आध्यात्मिक और व्यावहारिक महत्व भी है। क्या हैं पांच ककार? सिख धर्म में पांच ककार (Five Kakaars) निम्नलिखित हैं: 1. केश (अवढ़िक बाल) केश, यानी बिना कटे बाल, सिख धर्म का सबसे महत्वपूर्ण ककार है। गुरु गोबिंद सिंह जी (Guru Gobind Singh) ने अपने अनुयायियों को आदेश दिया कि वे अपने बालों को न काटें और उन्हें प्राकृतिक रूप में बनाए रखें। इसका उद्देश्य ईश्वर की दी गई प्राकृतिक देह को सम्मान देना और सिखों की अलग पहचान बनाए रखना था। इसके अलावा, लंबे बाल धैर्य, आत्म-नियंत्रण और सादगी का प्रतीक माने जाते हैं। 2. कंघा (कंघी) कंघा लकड़ी से बना एक छोटा कंघा होता है, जिसे सिख अपने केशों को साफ-सुथरा और व्यवस्थित रखने के लिए प्रयोग करते हैं। यह सफाई और अनुशासन का प्रतीक माना जाता है। गुरु गोबिंद सिंह जी के अनुसार, शरीर और आत्मा दोनों की पवित्रता आवश्यक है, और कंघा इस बात का प्रतीक है कि सिखों को अपने बालों के साथ-साथ अपने विचारों को भी स्वच्छ और व्यवस्थित रखना चाहिए। 3. कड़ा (लोहे का ब्रेसलेट) कड़ा एक लोहे का ब्रेसलेट होता है, जिसे सिख अपनी कलाई में पहनते हैं। यह गुरु के प्रति अटूट आस्था और आज्ञाकारिता का प्रतीक माना जाता है। इसके अलावा, यह बुरे कर्मों से बचने की भी याद दिलाता है। जब भी कोई व्यक्ति कुछ गलत करने के लिए हाथ उठाता है, तो यह कड़ा उसे याद दिलाता है कि उसे धर्म और सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए। 4. कृपाण (छोटी तलवार) कृपाण एक छोटी तलवार होती है, जिसे हर सिख धारण करता है। यह साहस, आत्मरक्षा और न्याय के लिए खड़े होने का प्रतीक है। कृपाण यह दर्शाता है कि सिख धर्म केवल आध्यात्मिकता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें अन्याय और अत्याचार के खिलाफ लड़ने की भी शिक्षा दी गई है। हालांकि, कृपाण का उपयोग केवल आत्मरक्षा और धर्म की रक्षा के लिए किया जाता है। 5. कच्छा (विशेष प्रकार का अंडरवियर) कच्छा एक विशेष प्रकार का अंडरवियर या निकर होता है, जिसे सिख पहनते हैं। यह संयम, पवित्रता और नैतिकता का प्रतीक है। यह एक योद्धा की पोशाक का हिस्सा भी है, जिससे सिखों को हमेशा सतर्क और अनुशासित रहने की प्रेरणा मिलती है। इसे भी पढ़ें:-  विष्णु भक्ति से मिलेगा अक्षय पुण्य, जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और भोग का महत्व पांच ककार (Five Kakaars) का महत्व गुरु गोबिंद सिंह जी (Guru Gobind Singh) ने जब खालसा पंथ (Khalsa Panth)  की स्थापना की, तब उन्होंने सिखों को इन पांच प्रतीकों को अपनाने के लिए कहा। इनका मुख्य उद्देश्य सिखों को धार्मिक, आध्यात्मिक और नैतिक रूप से मजबूत बनाना था। पांच ककार सिखों की पहचान को बनाए रखने के साथ-साथ उन्हें अनुशासन, साहस और सेवा की भावना से जोड़ते हैं। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News  Guru Gobind Singh #GuruGobindSinghJi #FiveKs #SikhIdentity #PanjKakaar #KhalsaTradition #SikhPride #Sikhism #SikhSymbols #SikhHeritage #SpiritualStrength

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Mamleshwar Temple Pahalgam

ममलेश्वर मंदिर: पहलगाम का ऐतिहासिक शिव मंदिर जहां भगवान शिव ने काटा था गणेश का शीश

कश्मीर घाटी के सुरम्य नगर पहलगाम में स्थित ममलेश्वर मंदिर (Mamaleshwar Temple) न केवल अपनी प्राचीनता और वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह हिन्दू धर्म के एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल के रूप में भी जाना जाता है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और यह वह पवित्र स्थल है जहाँ कथानुसार भगवान शिव (Lord Shiva) ने अपने पुत्र गणेश का शीश काटा था।​ ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व ममलेश्वर मंदिर (Mamaleshwar Temple) की स्थापना लगभग चौथी शताब्दी में हुई थी, जो इसे कश्मीर घाटी के प्राचीनतम मंदिरों में से एक बनाती है। यह मंदिर ममलाका गांव में स्थित है, जो पहलगाम से लगभग एक मील की दूरी पर है। मंदिर का नाम ‘ममलेश्वर’ या ‘ममल’ शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘जाओ मत’, जो इस स्थान की पवित्रता और महत्व को दर्शाता है।​ पौराणिक कथा ममलेश्वर मंदिर (Mamaleshwar Temple) से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा है, जिसके अनुसार एक बार देवी पार्वती स्नान करने जा रही थीं। उन्होंने अपने पुत्र गणेश जी (Ganesh Ji) को द्वार पर बैठा दिया और निर्देश दिया कि जब तक वे न लौटें, तब तक किसी को भी अंदर प्रवेश न करने दिया जाए। माता की आज्ञा का पालन करते हुए गणेश जी (Ganesh Ji) बाहर पहरा देने लगे। उसी समय भगवान शिव (Lord Shiva) वहां पहुंचे और पार्वती जी से मिलने के लिए भीतर जाने लगे। लेकिन द्वार पर विराजमान गणेश जी ने उन्हें रोक दिया। शिव जी ने कई बार समझाने की कोशिश की, लेकिन गणेश जी माता की आज्ञा का पालन करते हुए डटे रहे। इससे क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया। जब माता पार्वती बाहर आईं और ये दृश्य देखा, तो वे अत्यंत दुखी और क्रोधित हो गईं। उन्होंने शिव जी को सारी बात समझाई और अपने पुत्र को पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की। शिव जी को अपनी गलती का अहसास हुआ। इसके बाद उन्होंने एक हाथी का सिर लाकर गणेश जी के शरीर से जोड़ा और उन्हें नया जीवन प्रदान किया। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया वास्तुकला और संरचना पहलगाम, जो कश्मीर घाटी का एक बेहद मनमोहक स्थल है, अक्सर ‘धरती का स्वर्ग’ कहा जाता है। लेकिन यह स्थान केवल अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी धार्मिक और आध्यात्मिक महत्ता के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां भगवान शिव (Lord Shiva) और उनके परिवार से जुड़े कई पूजनीय मंदिर और तीर्थस्थल स्थित हैं। इन्हीं में एक प्रमुख मंदिर है ममलेश्वर मंदिर, जिसे स्थानीय लोग ‘मम्मल मंदिर’ के नाम से भी जानते हैं। यह मंदिर पहलगाम गांव में स्थित है और कश्मीर घाटी के प्राचीनतम और प्रमुख शिव मंदिरों में गिना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में लोहरा वंश के राजा जयसिंह द्वारा कराया गया था। उन्होंने मंदिर की छत को एक स्वर्ण कलश से सुशोभित करवाया था। भगवान शिव को समर्पित यह पवित्र स्थल हर वर्ष हजारों भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करता है, जो यहां आकर शिवजी के दर्शन कर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं। इस प्राचीन मंदिर के गर्भगृह में दो सुंदर नंदी की प्रतिमाएं स्थित हैं, और इनके समीप एक शिवलिंग स्थापित है। शिवलिंग के पास ही एक प्राकृतिक जल स्रोत से पानी निकलता है, जो एक छोटे से कुंड में एकत्र होता है, जिससे यह स्थान और भी पवित्र हो जाता है। यह मंदिर ‘मम्मल मंदिर’ नाम से भी प्रसिद्ध है। इस नाम के पीछे एक रोचक पौराणिक कथा है। ‘मम’ का अर्थ होता है ‘मत’ और ‘मल’ का अर्थ होता है ‘जाना’, यानी ‘मत जाओ’। यह नाम प्रतीक है सुरक्षा और संरक्षण का। Latest News in Hindi Today Hindi News Mamaleshwar Temple #MamleshwarTemple #Pahalgam #ShivaTemple #LordShiva #GaneshStory #AncientTemples #PilgrimageIndia #SpiritualTravel #HinduMythology #HistoricTemples

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Heatwave Days & Surya Dev Worship Tips

नौतपा 2025: 25 मई से शुरू होंगे भीषण गर्मी के नौ दिन, जानें धार्मिक महत्व और सूर्य देव को प्रसन्न करने के उपाय

भारत में जब मई-जून की चिलचिलाती गर्मी अपने चरम पर होती है, तब एक विशेष समय को लेकर चर्चा शुरू हो जाती है, जिसे ‘नौतपा‘ कहा जाता है। नौतपा यानी वह नौ दिन, जब सूर्य की तपिश सबसे तीव्र मानी जाती है और पृथ्वी पर उसका सीधा प्रभाव महसूस किया जाता है। लेकिन ज्योतिष और धार्मिक दृष्टि से यह केवल गर्मी नहीं, बल्कि सूर्य देव की विशेष कृपा पाने का अवसर भी है। नौतपा 2025 कब से शुरू होगा? नौतपा वह समय होता है जब सूर्य देव रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करते हैं। इस दौरान सूर्य पृथ्वी के नजदीक होते हैं, जिससे गर्मी की तीव्रता में वृद्धि हो जाती है। नौतपा की अवधि 9 दिनों की होती है, जो हर साल मई या जून में आती है और जब सूर्य मृगशिरा नक्षत्र में प्रवेश करते हैं, तब यह समाप्त हो जाता है। पंचांग के अनुसार, 2025 में नौतपा 25 मई से शुरू होकर 8 जून तक चलेगा। यह समय सूर्य के रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करने से शुरू होता है। इस वर्ष सूर्य 25 मई को दोपहर के समय रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करेगा, और उसके साथ ही नौतपा की शुरुआत मानी जाएगी। इस दौरान सूर्य की किरणें पृथ्वी पर अत्यधिक तीव्रता से पड़ती हैं, जिससे मौसम में जबरदस्त गर्मी देखने को मिलती है। नौतपा का ज्योतिषीय और धार्मिक महत्व ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, नौतपा में सूर्य की ऊर्जा सबसे अधिक प्रभावशाली होती है। सूर्य आत्मा और आत्मबल का प्रतीक माने जाते हैं। इस समय सूर्य देव की आराधना, आदित्य ह्रदय स्तोत्र, सूर्य नमस्कार और ध्यान करने से शरीर और मन दोनों को सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। नौतपा के नौ दिन मौसम विज्ञान के लिहाज से भी अहम माने जाते हैं। इस दौरान अधिक गर्मी से समुद्र का जल वाष्पित होता है, जो आगे चलकर मानसून में वर्षा का कारण बनता है। इसीलिए नौतपा को ‘वर्षा की तैयारी का समय’ भी कहा जाता है। नौतपा में कौन-से कार्य करने चाहिए? नौतपा के दौरान सूर्य देव की विधिपूर्वक उपासना करना चाहिए, जिससे जातक की कुंडली में सूर्य की स्थिति मजबूत हो सकती है। प्रत्येक सुबह सूर्य देव को जल अर्पित करना भी लाभकारी है। इसके लिए एक तांबे के लोटे में जल भरकर उसमें लाल फूल और रोली डालें, फिर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करें। यह प्रक्रिया करने से जातक को सूर्य देव की कृपा मिलती है और उसके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया क्यों होती है नौतपा के दौरान इतनी गर्मी? नौतपा के दौरान इतनी अधिक गर्मी होने का कारण यह है कि इस समय सूर्य देव पृथ्वी के बहुत करीब होते हैं, जिससे उनकी किरणें सीधे और तीव्र रूप से पृथ्वी पर पड़ती हैं। जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में होते हैं, तो इसका गर्मी पर सीधा प्रभाव पड़ता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, रोहिणी नक्षत्र शुक्र देव का नक्षत्र होता है, जो सूर्य का शत्रु माना जाता है। इस मिलन के कारण गर्मी में वृद्धि होती है। नौतपा और मानसून संबंध ज्योतिषियों के अनुसार, सूर्य देव रोहिणी नक्षत्र में 15 दिनों तक रहते हैं। जबकि नौतपा की अवधि 9 दिनों की होती है और इस दौरान भयंकर गर्मी का सामना करना पड़ता है, लेकिन इसका प्रभाव 15 दिनों तक जारी रहता है। इस तेज गर्मी के कारण समुद्रों के ऊपर वाष्पीकरण की प्रक्रिया तेज हो जाती है, जिससे पानी से भरे बादल बनते हैं, जो मानसून को सक्रिय करने में मदद करते हैं। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News नौतपा #Nautapa2025 #SuryaDev #Heatwave2025 #HinduTraditions #SpiritualRemedies #IndianSummer #SuryaWorship #NautapaHeat #VedicRituals #May2025Weather

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Ganga Saptami 2025

गंगा सप्तमी 2025: गंगा अवतरण का पावन पर्व कब और कैसे मनाएं?

हिंदू धर्म में गंगा नदी को केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि एक दिव्य माता और मोक्ष का मार्ग माना गया है। जिस तरह जीवन में माता का स्थान सर्वोपरि होता है, ठीक उसी प्रकार गंगा माता (Maa Ganga) को भी समस्त पापों का नाश करने वाली और जीवन में पवित्रता लाने वाली देवी माना गया है। हर साल वैशाख शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को श्रद्धा और भक्ति के साथ गंगा सप्तमी (Ganga Saptami) का पर्व मनाया जाता है। यह दिन मां गंगा के पृथ्वी पर अवतरित होने की स्मृति में समर्पित होता है। गंगा सप्तमी का महत्व गंगा सप्तमी (Ganga Saptami) का पर्व हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, जिसे गंगा जयंती भी कहा जाता है। यह दिन मां गंगा (Maa Ganga) के धरती पर आगमन की याद दिलाता है। राजा भगीरथ की कठिन तपस्या के फलस्वरूप मां गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुईं। उन्होंने अपने पूर्वजों के पापों को धोकर उन्हें मोक्ष प्रदान किया। इस दिन ही मां गंगा (Maa Ganga) का पवित्र जल धरती पर आया, जिससे न केवल धार्मिक शुद्धता मिली, बल्कि यह दिन आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक भी बन गया। गंगा सप्तमी के दिन गंगा नदी में स्नान, पूजा और ध्यान करने का विशेष महत्व है। ऐसा करने से व्यक्ति के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मानसिक शांति प्राप्त होती है। साथ ही, इस दिन किए गए दान से अत्यधिक पुण्य मिलता है, जिससे जीवन में सुख और समृद्धि का वास होता है।इसे भी पढ़ें:-   गंगा सप्तमी 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त: वैदिक पंचांग के अनुसार, 03 मई 2025 को सुबह 07:51 बजे वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि आरंभ होगी और 04 मई 2025 को सुबह 04:18 बजे समाप्त होगी। सनातन धर्म में उदया तिथि को महत्वपूर्ण माना जाता है, इसलिए 03 मई 2025 को ही गंगा सप्तमी (Ganga Saptami) का पर्व मनाया जाएगा। इस दिन गंगा स्नान के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 10:58 बजे से दोपहर 01:38 बजे तक रहेगा। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया गंगा सप्तमी शुभ योग (Ganga Saptami Shubh Yoga) ज्योतिषियों के अनुसार, इस वर्ष गंगा सप्तमी पर त्रिपुष्कर योग का निर्माण हो रहा है। इसके साथ ही रवि योग और शिववास योग का भी संयोग है। रवि योग में गंगा स्नान करने से सभी प्रकार के शारीरिक और मानसिक कष्टों से मुक्ति मिलती है, जबकि शिववास योग में गंगा स्नान कर महादेव की पूजा करने से सुख, समृद्धि और सौभाग्य में वृद्धि होती है। गंगा सप्तमी पर इन गलतियों से बचें नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Ganga Saptami #GangaSaptami2025 #GangaAvataran #HinduFestival #GangaPuja #SpiritualIndia #VratRituals #HinduTradition #RiverGanga #GangaJayanti #PiousFestival

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Kailash Mansarovar Yatra 2025

कैलाश मानसरोवर यात्रा 2025: शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया

हिंदू धर्म, बौद्ध, जैन और तिब्बती बोन धर्म के अनुयायियों के लिए पवित्र माने जाने वाले कैलाश मानसरोवर की यात्रा  (Kailash Mansarovar Yatra) आध्यात्मिकता, आस्था और साहस का संगम मानी जाती है। हर साल हजारों श्रद्धालु इस कठिन लेकिन दिव्य यात्रा में भाग लेते हैं। कैलाश पर्वत को भगवान शिव (Lord Shiva) का निवास स्थल माना जाता है और मानसरोवर झील को अमृत समान पवित्र जलधारा। 2025 में भी यह यात्रा एक बार फिर भारतीय श्रद्धालुओं के लिए खुल रही है, और इसके लिए पंजीकरण प्रक्रिया जल्द ही शुरू हो जाएगी। कब से कब तक होगी यात्रा? इस वर्ष कैलाश मानसरोवर यात्रा (Kailash Mansarovar Yatra) की शुरुआत 30 जून 2025 से होगी। यात्रा पांच चरणों में 50-50 लोगों के दल के साथ आयोजित की जाएगी। यात्रा का पहला दल 10 जुलाई को लिपुलेख पास के रास्ते चीन में प्रवेश करेगा, जबकि अंतिम दल की वापसी 22 अगस्त 2025 को भारत में होगी। यानी इस बार कैलाश मानसरोवर यात्रा का संपूर्ण आयोजन 30 जून से 22 अगस्त 2025 तक निर्धारित है। हर दल की यात्रा दिल्ली से आरंभ होगी। प्रारंभिक पड़ाव टनकपुर होगा, जहां एक रात विश्राम होगा। इसके बाद धारचुला में दो रातें, गुंजी में दो और नाभीढांग में दो रात ठहरने के बाद यात्रा दल कैलाश मानसरोवर क्षेत्र की ओर आगे बढ़ेगा। वापसी के समय यात्री बूंदी, चौकोड़ी और अल्मोड़ा जैसे स्थानों से होते हुए दिल्ली लौटेंगे। इस पूरी यात्रा की अवधि कुल 22 दिन की होगी। रजिस्ट्रेशन कैसे करें? कैलाश मानसरोवर यात्रा (Kailash Mansarovar Yatra) में शामिल होने के लिए इच्छुक श्रद्धालुओं को भारत सरकार के विदेश मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर ऑनलाइन पंजीकरण करना होगा। आवेदन के समय आवेदक के पास वैध पासपोर्ट, पैन कार्ड और तीन पासपोर्ट साइज फोटो होना अनिवार्य है। पंजीकरण प्रक्रिया पूरी करने के बाद निर्धारित शुल्क जमा करना होगा। यदि आवेदन प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूर्ण हो जाती है, तो आवेदक को इसकी पुष्टि SMS या ईमेल के माध्यम से भेज दी जाती है। इसे भी पढ़ें:-  विष्णु भक्ति से मिलेगा अक्षय पुण्य, जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और भोग का महत्व कैलाश मानसरोवर यात्रा से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियाँ कैलाश मानसरोवर यात्रा (Kailash Mansarovar Yatra) की अवधि सामान्यतः 22 से 25 दिनों की होती है। इस आध्यात्मिक और कठिन यात्रा पर जाने के लिए एक श्रद्धालु को लगभग 1.5 लाख से 3 लाख रुपये तक का खर्च आ सकता है, जो यात्रा के माध्यम, सुविधाओं और मार्ग के अनुसार बदल सकता है। इस यात्रा में शामिल होने के लिए शारीरिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ और फिट होना अनिवार्य है, क्योंकि इसमें ऊंचाई पर ट्रेकिंग और कठिन रास्तों से गुजरना होता है। इसके अलावा, यात्री के पास एक वैध पासपोर्ट होना आवश्यक है, क्योंकि यात्रा का कुछ हिस्सा चीन (तिब्बत) के क्षेत्र में आता है, जहां प्रवेश के लिए पासपोर्ट अनिवार्य होता है। कितने श्रद्धालु करेंगे यात्रा? भारत सरकार के निर्देशानुसार, इस वर्ष कैलाश मानसरोवर यात्रा में कुल 5 दलों को भेजा जाएगा, जिनमें प्रत्येक दल में 50-50 यात्री शामिल होंगे। इस प्रकार कुल 250 श्रद्धालु इस पवित्र यात्रा का हिस्सा बन सकेंगे। इसके अलावा, कुछ निजी टूर ऑपरेटर भी कैलाश मानसरोवर यात्रा (Kailash Mansarovar Yatra) की व्यवस्था करते हैं। हालांकि इनके माध्यम से यात्रा करने पर भी पंजीकरण प्रक्रिया भारत सरकार की विदेश मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट के जरिए ही पूरी करनी होती है। यदि कोई यात्री प्राइवेट टूर ऑपरेटर के माध्यम से यात्रा करना चाहता है, तो वे आवेदन प्रक्रिया में भी पूरी सहायता प्रदान करते हैं। Latest News in Hindi Today Hindi News Kailash Mansarovar Yatra #KailashMansarovarYatra2025 #ShivDham #SpiritualJourney #MansarovarYatra #MountKailash #KailashYatra #Pilgrimage2025 #KailashDarshan #HolyYatra #HimalayanPilgrimage

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Amarnath yatra 2025

Amarnath yatra 2025: 3 जुलाई से शुरू होगी अमरनाथ यात्रा, जानिए कैसे कर सकते हैं आप रजिस्टर?

हमारे देश में ऐसे कई तीर्थस्थल हैं, जिनके दर्शन हर साल लाखों लोग करते हैं। इन्हीं तीर्थस्थलों में से एक है अमरनाथ गुफा (Amarnath Gufa), जो हिमालय में स्थित है। ऐसा माना गया है कि यह वो जगह है जहां भगवान् शिव जी ने मां पार्वती को अमरता के रहस्य के बारे में ज्ञान दिया था। इस अमरता के रहस्य को अमर कथा के नाम से जाना जाता है। इस गुफा में प्राकृतिक रूप से बर्फ का लिंग बनता है, जिसे शिव जी का प्रतीक माना जाता है। यह शिवलिंग चन्द्रमा के अनुसार घटता और बढ़ता रहता है। अमरनाथ गुफा (Amarnath Gufa) के दर्शन साल में केवल कुछ ही महीने किए जा सकते हैं। अमरनाथ यात्रा 2025 (Amarnath yatra 2025) जल्द ही शुरू होने वाली है। आइए जानें इसके बारे में।  अमरनाथ यात्रा 2025 (Amarnath yatra 2025): पाएं जानकारी अमरनाथ जम्मू और कश्मीर राज्य के श्रीनगर में स्थित है और समुद्र तल से इसकी ऊंचाई 3,600 फुट है। यह एक प्रमुख हिन्दू तीर्थस्थान है। यहां यात्रा करने के लिए श्रद्धालुओं को सबसे पहले इसके लिए रजिस्ट्रेशन करानी होती है। इस साल यानी अमरनाथ यात्रा 2025 (Amarnath yatra 2025) के लिए सरकार ने 14 अप्रैल से रजिस्ट्रेशन्स की शुरुआत कर दी है। अगर आप भी अमरनाथ गुफा (Amarnath Gufa) के दर्शन करना चाहते हैं, तो आज ही अपना रेजिस्ट्रेशन कराएं। अमरनाथ यात्रा 2025 (Amarnath yatra 2025) की तिथि जैसा की पहले ही बताया गया है कि अमरनाथ यात्रा (Amarnath yatra) करने के लिए पहले से ही रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी है और इसकी रजिस्ट्रेशन 14 April 2025 से शुरू हो चुकी है। यह यात्रा 3 जुलाई 2025 से शुरू होने वाली है और 9 अगस्त 2025 तक चलेगी। सुरक्षा की दृष्टि से हर दिन केवल 15,000 यात्रियों को ही यहां जाने की अनुमति दी जाएगी। इसलिए, इच्छुक श्रद्धालुओं को जल्दी रजिस्ट्रेशन कराने की सलाह दी जाती है। अमरनाथ यात्रा 2025 (Amarnath yatra 2025): कैसे करें रजिस्ट्रेशन? अमरनाथ यात्रा 2025 (Amarnath yatra 2025) के लिए आप इस तरह से रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं: ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन इसमें रजिस्टर करने के लिए आपको अपना नाम, यात्रा की तिथि, आधार नंबर, मोबाइल नंबर, फोटोग्राफ आदि भी भरना होगा। इसके साथ ही स्कैन्ड कम्पल्सरी हेल्थ सर्टिफिकेट अपलोड करना भी जरूरी है। अपना नंबर भी ओटीपी के माध्यम से वेरिफाई करना होगा। जब आप यह प्रोसेस पूरा कर लेंगे तो आपको दो घंटों के अंदर एक पेमेंट लिंक मिलेगा जहां आपको रजिस्ट्रेशन फीस (₹220) भरनी होगी। जब आपकी ट्रांजेक्शन पूरी हो जायेगी तो यात्रा रेजिस्ट्रेशन परमिट को डाउनलोड कर पाएंगे। इसे भी पढ़ें:-  विष्णु भक्ति से मिलेगा अक्षय पुण्य, जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और भोग का महत्व ऑफलाइन रजिस्ट्रेशन  अमरनाथ यात्रा 2025 (Amarnath yatra 2025) के लिए ऑफलाइन रजिस्ट्रेशन भी आप करा सकते हैं। अमरनाथ यात्रा (Amarnath yatra) के लिए जम्मू और कश्मीर (Jammu & Kashmir) एडमिस्ट्रशन ने व्यवस्था कर रखी है। कुछ सेंटर जैसे वैष्णवी धाम, पंचायत भवन और महाराजा हॉल इसके लिए टोकन स्लिप्स इशू कर रहे हैं। आमतौर पर यह टोकन आपके द्वारा चुनी यात्रा डेट के तीन दिन पहले इशू किए जाएंगे। श्रद्धालु हेल्थ चेकअप और औपचारिक रजिस्ट्रेशन के लिए सरस्वती धाम जा सकते है। उसी दिन, उन्हें अपना कार्ड लेने और प्रक्रिया पूरी करने के लिए जम्मू में आरएफआईडी कार्ड केंद्र भी जाना होगा। Latest News in Hindi Today Hindi News Amarnath yatra 2025 #Amarnathyatra2025 #Amarnathyatra #AmarnathGufa #tirthsthan #Amarnath

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Tilak finger rules in Hinduism

Tilak finger rules in Hinduism: तो इसलिए पूजा-पाठ में तर्जनी और कनिष्ठा से नहीं लगाते तिलक

हिंदू धर्म में पूजा-पाठ का बड़ा ही महत्व होता है। सनातन धर्म पूजा-पाठ के दौरान भगवान को तिलक (Tilak) लगाने का विधान (Tilak finger rules in Hinduism) है। यही नहीं, पूजा करने वाले और करवाने वाले जातकों को भी तिलक लगाई जाती है। धार्मिक मान्यता है कि तिलक के लगाने और लगवाने से न सिर्फ यश और ज्ञान में वृद्धि होती है, बल्कि मनोबल भी बढ़ता है। सनातन परंपरा के अनुसार माथे पर तिलक लगाने से व्यक्ति के दिल और दिमाग में सकारात्मकता के भाव आते हैं और कुंडली में मौजूद उग्र ग्रह भी शांत होते हैं। तिलक लगाने से जीवन में यश बढ़ता है और पापों का नाश होता है। साथ ही, जीवन से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। इससे मन में अच्छे विचार आते हैं। खैर, कहा तो यह भी जाता है कि तिलक लगवाने से मां सरस्वती और मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। और तो और बिना तिलक के कोई भी पूजा या अनुष्ठान पूरा नहीं माना जाता है।  जिस उंगली से तिलक लगा (Tilak finger rules in Hinduism) रहे हैं या लगवा रहे हैं  मान्यताओं के अनुसार माथे पर तिलक लगाने से आज्ञा चक्र जागृत होता है और भाग्य खुलता है। ऐसे में बड़ा सवाल यह की तिलक लगाने हेतु किस उंगली का प्रयोग करें। कभी-कभी मन ऐसी शंका निर्माण होती है कि जिस ऊँगली से तिलक लगा रहे हैं या लगवा रहे हैं, क्या वो सही है? इससे भी बड़ा सवाल यह कि तिलक लगाने के लिए किस उंगली का प्रयोग किया जाता है और इसमें उंगली का क्या महत्व (Tilak finger rules in Hinduism) है? आज के इस आर्टिकल में आप जानेंगे किस उंगली से तिलक लगाना शुभ होता है और किस उंगली का क्या महत्व है। आइये जानते हैं, किस ऊँगली से तिलक लगना होता है शुभ। बता दें कि स्कंदपुराण में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि अलग-अलग उंगली से तिलक लगाने का फल अलग-अलग प्राप्त होता है। अनामिका शांतिदा प्रोक्ता मध्यमायुष्करी भवेत्। अंगुष्ठः पुष्टिदः प्रोक्ता तर्जनी मोक्षदायिनी।। जब राजा युद्ध पर जाते थे तो रानियां अंगूठे से ही राजा के मस्तक पर लगाती थीं विजय तिलक (Tilak finger rules in Hinduism) अंगूठे का सीधा संबंध शुक्र ग्रह से होता है। शुक्र ग्रह को यश और धन-वैभव का कारक माना (Tilak finger rules in Hinduism) जाता है। कारण यही जो, दशहरा और रक्षाबंधन जैसे त्योहार पर बहनें अपने भाई की विजय की कामना करते हुए उन्हें अंगूठे से ही तिलक लगाती हैं। यही नहीं, पहले जब राजा युद्ध पर जाते थे, तब रानियां अंगूठे से ही राजा के मस्तक पर विजय तिलक लगाया करती थीं। कहा जा जाता है कि किसी की मंगल कामना के लिए अनामिका से बिंदी लगाकर अंगूठे से तिलक करना चाहिए।   इसलिए नहीं करते तर्जनी उंगली का प्रयोग (Tilak finger rules in Hinduism) तर्जनी, अंगूठे और मध्यमा उंगली के बीच की उंगली होती है। इस उंगली का संबंध गुरु ग्रह से होता है। इस उंगली से पितृगणों को अर्थात पिंड को तिलक किया जाता है। मृतक की आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति हो सके इसलिए इस उंगली का प्रयोग मृत व्यक्ति को तिलक लगाने के लिए किया जाता है। इसलिए भूलकर भी तिलक लगाने के लिए तर्जनी ऊँगली का प्रयोग न करें। इसे भी पढ़ें:-  विष्णु भक्ति से मिलेगा अक्षय पुण्य, जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और भोग का महत्व  मध्यमा उंगली से खुद को कर सकते हैं तिलक  मध्यमा उंगली हाथ की सबसे बड़ी उंगली होती है। इस उंगली का संबंध शनि ग्रह (Tilak finger rules in Hinduism) से होता है। शास्त्रों के अनुसार, मध्यमा उंगली का प्रयोग खुद को तिलक लगाने के लिए करना चाहिए। जब भी आप पूजा करें, तो सबसे पहले अनामिका से भगवान को तिलक लगाए और फिर बाद में  मध्यमा उंगली से खुद को तिलक करें। चाहें तो आप अनामिका से तिलक कर सकते हैं।  इस उंगली से तिलक लगाने से आज्ञा चक्र होता है जागृत  अनामिका, कनिष्ठा और मध्यमा के बीच में होती है। आम भाषा में इसे रिंग फिंगर भी (Tilak finger rules in Hinduism) कहा जाता है। इस उंगली का संबंध सीधा सूर्य से होता है। इस उंगली से भगवान, गुरु या किसी अन्य व्यक्ति की मंगल कामना के लिए तिलक करना चाहिए। यह मानसिक शक्ति को प्रबल बनाती है। इस उंगली से तिलक लगाने से आज्ञा चक्र जागृत होता है। तिलक लगाने में नहीं किया जाता है कनिष्ठा का उपयोग  कनिष्ठा यानी सबसे छोटी उंगली जिसका उपयोग तिलक लगाने में नहीं किया (Tilak finger rules in Hinduism) जाता है। यहां तक कि किसी भी शुभ कार्य में इस उंगली का प्रयोग नहीं किया जाता है। सबसे छोटी उंगली का संबंध बुध ग्रह से माना गया है। Latest News in Hindi Today Hindi News Tilak finger rules in Hinduism #TilakRules #HinduTraditions #TilakSignificance #PujaRituals #SpiritualIndia #VedicWisdom #HinduismFacts #TilakFinger #SacredCustoms #ReligiousBeliefs

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Kalashtami

कलााष्टमी 2025: भगवान शिव की पूजा से पाएं जीवन में सुख और शांति

प्रत्येक माह की कृष्ण पक्ष की आठवीं तिथि को कालाष्टमी (Kalashtami) का पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यह दिन खासकर भगवान शिव (Lord Shiv) और उनके रौद्र रूप की पूजा अर्चना के लिए समर्पित होता है। इस दिन विशेष रूप से रात्रि को उपवास और शिव पूजा (Shiv Puja) की जाती है, क्योंकि इसे भगवान शिव (Lord Shiv) के नाथ रूप से जोड़कर देखा जाता है।  कालाष्टमी पूजा का शुभ समय  वैदिक पंचांग के अनुसार 20 अप्रैल को शाम 7 बजे से वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत होगी, जो 21 अप्रैल को शाम 06:58 बजे समाप्त होगी। काल भैरव देव की पूजा विशेष रूप से रात के समय की जाती है, जिसे निशा काल कहा जाता है। इस वर्ष वैशाख माह की कालाष्टमी (Kalashtami) 20 अप्रैल को मनाई जाएगी, और निशा काल में पूजा का समय रात 11:58 बजे से 12:42 बजे तक रहेगा। कालाष्टमी (Kalashtami) का महत्व कालाष्टमी (Kalashtami) का पर्व विशेष रूप से भगवान शिव के रौद्र रूप की पूजा के लिए जाना जाता है। यह तिथि उन भक्तों के लिए बेहद शुभ मानी जाती है, जो अपने जीवन में हर तरह के दुखों और परेशानियों से मुक्ति चाहते हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव के रौद्र रूप की पूजा करने से व्यक्ति के जीवन से सारे नकारात्मक प्रभाव समाप्त हो जाते हैं और वह भगवान शिव की विशेष कृपा का पात्र बनता है। साथ ही, इस दिन भगवान शिव के साथ ही उनके वाहन नंदी और उनके पार्थिव रूप, कालभैरव की भी पूजा की जाती है। इसे भी पढ़ें:-  विष्णु भक्ति से मिलेगा अक्षय पुण्य, जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और भोग का महत्व कालाष्टमी पूजा विधि नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Kalashtami #Kalashtami2025 #LordShiva #Kalabhairav #ShivaWorship #HinduFestival #SpiritualPeace #PujaBenefits #KalashtamiPuja #Bhakti #IndianTradition

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Akshaya Tritiya

अक्षय तृतीया 2025: 30 अप्रैल को दुर्लभ योगों में मनाएं यह पावन पर्व

सर्वार्थ सिद्धि योग और रोहिणी नक्षत्र का संयोग, खरीदारी और मांगलिक कार्यों के लिए अत्यंत शुभ अक्षय तृतीया, जिसे अखा तीज भी कहा जाता है, हिंदू धर्म में अत्यंत शुभ और पुण्यदायी पर्व माना जाता है। इस दिन किए गए धार्मिक कार्य, दान-पुण्य और खरीदारी का फल अक्षय यानी कभी नष्ट न होने वाला होता है। वर्ष 2025 में अक्षय तृतीया 30 अप्रैल, बुधवार को मनाई जाएगी, जो कई शुभ योगों के संयोग के कारण विशेष महत्व रखती है।​ अक्षय तृतीया 2025: तिथि और महासंयोग इस वर्ष अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya) का आयोजन 29 अप्रैल को सायं 05:31 मिनट से शुरू होकर 30 अप्रैल को दोपहर 02:31 मिनट तक रहेगा। इस बार अक्षय तृतीया पर महासंयोग बनेगा। पंचांग के अनुसार, अक्षय तृतीया इस वर्ष सर्वार्थ सिद्धि योग में मनाई जाएगी। ज्योतिष में इसे एक खास योग माना गया है, जिसका सीधा संबंध मां लक्ष्मी से है। इस विशेष योग में पूजा करने से मां लक्ष्मी भक्तों की हर इच्छा पूरी करती हैं। इस दिन स्वर्ण आभूषण की खरीदारी से उनकी अक्षय वृद्धि होती है। साथ ही इस दिन किए गए जप, तप, ज्ञान, स्नान, दान, और होम आदि कार्य भी अक्षय फल प्राप्त करते हैं, जिससे इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है।  तीर्थ स्नान और अन्न-जल का दान अक्षय तृतीया ((Akshaya Tritiya) के इस पवित्र दिन पर तीर्थ स्नान का महत्व अत्यधिक है। धार्मिक ग्रंथों में यह कहा गया है कि इस दिन तीर्थ स्नान करने से सभी पाप समाप्त हो जाते हैं और हर तरह के दोष समाप्त हो जाते हैं, इसे दिव्य स्नान के रूप में जाना जाता है। यदि तीर्थ स्थल पर स्नान करने का अवसर न हो तो घर पर गंगाजल मिलाकर स्नान करना भी पुण्यकारी होता है और तीर्थ स्नान के समान फल मिलता है। इसके बाद अन्न और जल का दान करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। जो व्यक्ति इस दिन दान का संकल्प लेकर जरूरतमंदों को अन्न और जल का दान करता है, उसे कई यज्ञ और कठिन तपस्या करने जितना पुण्य प्राप्त होता है।  पूजा विधि और दान-पुण्य इसे भी पढ़ें:-  विष्णु भक्ति से मिलेगा अक्षय पुण्य, जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और भोग का महत्व अक्षय तृतीया पर कर सकते हैं ये विशेष कार्यअक्षय तृतीया, (Akshaya Tritiya) जिसे आखा तीज के नाम से भी जाना जाता है, एक अत्यंत शुभ और पवित्र पर्व है। इस दिन भगवान परशुराम की जयंती भी मनाई जाती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, सतयुग और त्रेतायुग की शुरुआत भी इसी दिन हुई थी। अक्षय तृतीया के दिन बिना किसी विशेष मुहूर्त के भी शुभ कार्य, जैसे विवाह, गृह प्रवेश, नए व्यापार की शुरुआत, और सोना-चांदी की खरीदारी आदि किए जा सकते हैं। इस दिन व्रत, उपवास और दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है — यानी ऐसा पुण्य जो कभी समाप्त नहीं होता।​ भगवान विष्णु के अवतार अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya) को चिरंजीवी तिथि भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु (Lord Vishnu) के अवतार परशुराम जी का जन्म हुआ था। परशुराम जी को चिरंजीवी माना जाता है, अर्थात वे सदैव जीवित रहेंगे। इसके अतिरिक्त, भगवान विष्णु के नर-नरायण और हयग्रीव अवतार भी इसी तिथि पर प्रकट हुए थे। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Akshaya Tritiya #AkshayaTritiya2025 #AkshayaTritiya #HinduFestival #RareYogas #AuspiciousDay #HinduPuja #GoldBuying #AkshayaTritiyaYog #April30Festival #SpiritualCelebration

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