Dwipushkar Yoga 2024

Dwipushkar Yoga: दो बार बन रहा है यह दुर्लभ योग, जानें किनके लिए है विशेष शुभ

हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र महीने में इस साल दो बार द्विपुष्कर योग बन रहा है, जो एक दुर्लभ और अत्यंत शुभ योग माना जाता है। सनातन धर्म में चैत्र मास का विशेष महत्व माना जाता है, क्योंकि यह महीना पूरी तरह से मां दुर्गा को समर्पित होता है। इस दौरान भक्त प्रतिदिन मां दुर्गा की पूजा-अर्चना और उपासना करते हैं। विशेष रूप से, चैत्र नवरात्र के दौरान मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है, साथ ही श्रद्धालु नवरात्रि व्रत का पालन करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से साधक की सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि एवं सौभाग्य की वृद्धि होती है। ज्योतिषीय दृष्टि से, इस वर्ष चैत्र मास में दो बार दुर्लभ द्विपुष्कर योग का संयोग बन रहा है। मान्यता है कि इस योग के दौरान मां दुर्गा की भक्ति और साधना करने से साधक को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। साथ ही, इस शुभ योग में किए गए कार्यों में सफलता और सिद्धि प्राप्त होती है। आइए जानते हैं कि द्विपुष्कर योग (Dwipushkar Yoga) क्या है, यह कब बन रहा है और किन लोगों के लिए यह विशेष रूप से शुभ होगा। द्विपुष्कर योग क्या है? द्विपुष्कर योग (Dwipushkar Yoga) एक अत्यंत शुभ और दुर्लभ योग है, जो तब बनता है जब एक ही दिन में दो पुष्कर योग होते हैं। पुष्कर योग को हिंदू ज्योतिष में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह धन, समृद्धि और सौभाग्य लाने वाला होता है। जब एक दिन में दो बार पुष्कर योग बनता है, तो इसे द्विपुष्कर योग कहा जाता है। पुष्कर योग तब बनता है जब बृहस्पति और चंद्रमा की स्थिति विशेष रूप से अनुकूल होती है। यह योग व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में मदद करता है। चैत्र महीने में द्विपुष्कर योग का समय ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि, यानी 16 मार्च को द्विपुष्कर योग (Dwipushkar Yoga) बन रहा है। यह योग दिन में 11:44 बजे से प्रारंभ होकर शाम 04:58 बजे तक रहेगा। इसके अलावा, वैष्णव जनों को समर्पित पापमोचनी एकादशी के अवसर पर, 26 मार्च को भी द्विपुष्कर योग का संयोग बन रहा है। 26 मार्च को यह शुभ योग ब्रह्म मुहूर्त में 03:49 बजे से सुबह 06:18 बजे तक रहेगा। मान्यता है कि इस योग के दौरान भगवान विष्णु और मां दुर्गा की पूजा करने से साधक को विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह योग वृषभ, तुला, धनु और मीन राशि के जातकों के लिए अत्यंत शुभ माना जा रहा है, जिससे उन्हें देवी दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होगी। इसे भी पढ़ें:- होलिका दहन की रात काले तिल और सरसों से करें ये चमत्कारिक टोटके! द्विपुष्कर योग का महत्व द्विपुष्कर योग (Dwipushkar Yoga) का हिंदू ज्योतिष में विशेष महत्व है। यह योग व्यक्ति के जीवन में धन, समृद्धि और सौभाग्य लाने वाला होता है। इस दिन किए गए शुभ कार्यों का फल कई गुना बढ़ जाता है और व्यक्ति को जीवन में सफलता प्राप्त होती है। द्विपुष्कर योग के दिन दान-पुण्य, पूजा-पाठ और मंत्र जाप करने से विशेष लाभ मिलता है। इस दिन किए गए कार्यों से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं और उसे मनचाहे फल की प्राप्ति होती है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news #DwipushkarYoga #RareYoga2024 #AuspiciousTime #HinduAstrology #ShubhMuhurat #YogaForSuccess #LuckyDays #SpecialYoga #VedicAstrology #DivineTiming

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Holi Festival 2025

होली: कहां और कैसे मनाई जाती है रंगों की यह अनूठी पर्व

होली (Holi), रंगों का त्योहार भारत के सबसे लोकप्रिय और उत्साहपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह त्योहार न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में भारतीय समुदायों द्वारा बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। होली का त्योहार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है, जो आमतौर पर मार्च के महीने में पड़ता है। यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत, प्रेम, भाईचारे और एकता का प्रतीक है। होली के इस पावन अवसर पर लोग एक-दूसरे को रंग लगाकर, गले मिलकर और मिठाइयां खिलाकर खुशियां बांटते हैं। होली का त्योहार भारत के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। आइए जानते हैं कि भारत के अलग-अलग राज्यों और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में होली कैसे मनाई जाती है। ब्रज की होली: राधा-कृष्ण की लीलाओं का प्रतीक ब्रज भूमि, जो कि मथुरा और वृंदावन को मिलाकर बनती है, होली (Holi) के उत्सव का केंद्र मानी जाती है। यहां होली का त्योहार राधा और कृष्ण की दिव्य लीलाओं के साथ जुड़ा हुआ है। ब्रज में होली का उत्सव लगभग एक सप्ताह तक चलता है। यहां लट्ठमार होली विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जिसमें महिलाएं पुरुषों को लाठियों से मारती हैं और पुरुष खुद को ढाल से बचाते हैं। यह परंपरा श्रीकृष्ण और गोपियों की लीलाओं से जुड़ी हुई है। मथुरा-वृंदावन की होली: भक्ति और उल्लास का मेल मथुरा और वृंदावन में होली का त्योहार भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यहां के मंदिरों में विशेष होली समारोह आयोजित किए जाते हैं। बांके बिहारी मंदिर और इस्कॉन मंदिर में होली के दौरान भक्तों की भीड़ उमड़ती है। यहां होली के दिन फूलों की होली (Holi) खेली जाती है, जिसमें रंगों की जगह फूलों का उपयोग किया जाता है। बरसाना और नंदगांव की लट्ठमार होली बरसाना और नंदगांव की लट्ठमार होली दुनिया भर में प्रसिद्ध है। यह परंपरा श्रीकृष्ण और राधा की लीलाओं से जुड़ी हुई है। इस दौरान महिलाएं पुरुषों को लाठियों से मारती हैं और पुरुष खुद को ढाल से बचाते हैं। यह अनूठी परंपरा देखने के लिए दुनिया भर से पर्यटक यहां आते हैं। बंगाल की होली: दोल यात्रा पश्चिम बंगाल में होली को दोल यात्रा या दोल पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। यह त्योहार राधा और कृष्ण की पूजा के साथ जुड़ा हुआ है। इस दौरान मंदिरों में राधा और कृष्ण की मूर्तियों को सजाया जाता है और उन्हें झूले पर झुलाया जाता है। यहां होली के दिन रंगों के साथ-साथ भक्ति और संगीत का भी विशेष महत्व होता है। हरियाणा की होली: भाभी-देवर की मस्ती हरियाणा में होली (Holi) का त्योहार भाभी और देवर के रिश्ते की मस्ती और उल्लास से भरा होता है। यहां भाभी द्वारा देवर को सताए जाने की प्रथा है, जिसमें भाभी देवर को रंग लगाने के साथ-साथ उन्हें मजाक में डांटती और सताती हैं। यह परंपरा भाईचारे और पारिवारिक रिश्तों को मजबूत करने का एक अनूठा तरीका है। महाराष्ट्र की होली: रंग पंचमी और सूखे गुलाल की धूममहाराष्ट्र में होली को रंग पंचमी के रूप में मनाया जाता है। यहां सूखे गुलाल से होली खेलने की परंपरा है। रंग पंचमी के दिन लोग एक-दूसरे पर गुलाल उड़ाते हैं और मिठाइयां बांटते हैं। यह त्योहार यहां पांच दिनों तक चलता है, जिसमें पारंपरिक गीत-संगीत और नृत्य का आयोजन भी किया जाता है। गोवा की होली: शिमगो और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूमगोवा में होली (Holi) को शिमगो के रूप में मनाया जाता है। यहां होली के दिन जलूस निकालने की परंपरा है, जिसमें स्थानीय लोग पारंपरिक वेशभूषा में शामिल होते हैं। जलूस के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जिसमें नृत्य, संगीत और नाटक शामिल होते हैं। यह त्योहार गोवा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है। पंजाब की होली: होला मोहल्ला और शक्ति प्रदर्शनपंजाब में होली को होला मोहल्ला के रूप में मनाया जाता है। यह त्योहार आनंदपुर साहिब में विशेष रूप से मनाया जाता है। इस दौरान सिख योद्धाओं द्वारा शक्ति प्रदर्शन किया जाता है, जिसमें मार्शल आर्ट्स, घुड़सवारी और अन्य शारीरिक कौशल का प्रदर्शन शामिल होता है। यह त्योहार सिख समुदाय की वीरता और शौर्य को याद करने का अवसर प्रदान करता है। दक्षिण गुजरात और मध्यप्रदेश की होली: आदिवासी संस्कृति का रंगदक्षिण गुजरात के आदिवासी समुदाय के लिए होली सबसे बड़ा त्योहार है। यहां आदिवासी लोग पारंपरिक नृत्य और संगीत के साथ होली मनाते हैं। इसी तरह, मध्यप्रदेश के मालवा अंचल के आदिवासी इलाकों में भी होली को बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। यहां होली के दिन आदिवासी लोग पारंपरिक गीत गाते हैं और ढोल-नगाड़ों की थाप पर नाचते हैं। होली (Holi) का त्योहार भारत की विविध संस्कृतियों को एक सूत्र में बांधता है। यह त्योहार हमें प्रेम, भाईचारे और एकता का संदेश देता है। इसे भी पढ़ें:- तो इसलिए होती है शनिवार को शनिदेव की जगह क्यों हनुमान जी की पूजा नेपाल की होली: फागु पूर्णिमा नेपाल में होली को फागु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। यह त्योहार नेपाल में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। इस दौरान लोग एक-दूसरे को रंग लगाते हैं और नेपाली लोक संगीत और नृत्य का आनंद लेते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होली होली का त्योहार अब केवल भारत तक ही सीमित नहीं है। यह त्योहार दुनिया भर में भारतीय समुदायों द्वारा मनाया जाता है। अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों में होली के उत्सव का आयोजन किया जाता है। इन देशों में होली के दिन लोग एक-दूसरे को रंग लगाते हैं, नृत्य और संगीत का आनंद लेते हैं। Latest News in Hindi Today Hindi news Holi #HoliFestival #FestivalOfColors #Holi2025 #ColorfulHoli #HappyHoli #HoliCelebration #HoliIndia #HoliTradition #HoliFun #HoliVibes

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Celebrate Holi 2025 in Mathura

होली का अद्भुत रंगारंग उत्सव: मथुरा की इन खास जगहों पर मनाएं रंगों का त्योहार

मथुरा, भारत के सबसे प्रसिद्ध त्योहारों में से एक होली का आगाज हो चुका है। यह शहर भगवान कृष्ण की जन्मस्थली होने के कारण होली के उत्सव के लिए विश्वभर में मशहूर है। मथुरा की गलियों में होली का जश्न देखने के लिए देश-विदेश से लाखों पर्यटक यहां आते हैं। आइए जानते हैं मथुरा की उन खास जगहों के बारे में, जहां होली का उत्सव अद्भुत और अविस्मरणीय होता है।  बांके बिहारी मंदिर: होली की रंगत का केंद्र मथुरा (Mathura) में होली का जश्न बांके बिहारी मंदिर (Banke Bihari Temple) से शुरू होता है। यह मंदिर भगवान कृष्ण के प्रमुख मंदिरों में से एक है और होली के मौके पर यहां का नजारा देखने लायक होता है। मंदिर में होली का उत्सव लगभग एक सप्ताह तक चलता है, जिसमें फूलों की होली, गुलाल की होली और लट्ठमार होली जैसे आयोजन होते हैं। मंदिर के पुजारी भगवान कृष्ण को रंगों से सजाते हैं और भक्तों के साथ मिलकर होली का जश्न मनाते हैं। यहां की होली की खास बात यह है कि इसमें केवल प्राकृतिक रंगों और गुलाल का ही इस्तेमाल किया जाता है, जो पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित होते हैं। गोकुल की रंगीली होली पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, बालकृष्ण बचपन में अत्यंत चंचल और नटखट थे। गोकुल की गोपियां उनकी शरारतों से खूब आनंदित होती थीं। इसी कारण मथुरा में विशेष रूप से लठमार होली मनाई जाती है, जिसकी परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस अनूठे आयोजन में महिलाएं लाठियां लेकर पुरुषों को हल्के-फुल्के अंदाज में हंसी-मजाक के रूप में मारती हैं। बरसाना की लठमार होली विश्व प्रसिद्ध है, जहां नंदगांव (Nandgaon) के ग्वालों और बरसाना की गोपियों के बीच यह पारंपरिक उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। नंदगांव में ‘फाग आमंत्रण उत्सव’ आयोजित किया जाता है, जिसमें सखियों को होली खेलने का निमंत्रण दिया जाता है। इसी दिन बरसाना के श्रीराधारानी मंदिर में ‘लड्डू मार होली’ का आयोजन भी होता हैं। इसे भी पढ़ें:- होलिका दहन की रात काले तिल और सरसों से करें ये चमत्कारिक टोटके! नंदगांव और बरसाना: लट्ठमार होली की धूम मथुरा (Mathura) से कुछ किलोमीटर दूर स्थित नंदगांव (Nandgaon) और बरसाना की लट्ठमार होली पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यहां की होली का अपना एक अलग ही इतिहास और परंपरा है। कहा जाता है कि भगवान कृष्ण नंदगांव से बरसाना आकर राधा और उनकी सखियों के साथ होली खेलते थे। इस दौरान महिलाएं पुरुषों को लाठियों से मारती थीं और पुरुष खुद को बचाने की कोशिश करते थे। आज भी यह परंपरा जीवित है और लट्ठमार होली के दिन नंदगांव (Nandgaon) के पुरुष बरसाना जाते हैं, जहां महिलाएं उन्हें लाठियों से मारती हैं। यह नजारा बेहद ही मनोरंजक और अनोखा होता है। इसके अलावा, यहां की होली में रंग-गुलाल और पारंपरिक गीत-संगीत का भी विशेष महत्व होता है। मथुरा की गलियों में होली का मजा मथुरा (Mathura) की गलियों में होली का जश्न देखने के लिए हजारों लोग यहां आते हैं। यहां की गलियों में रंग-गुलाल और पानी के रंगों से होली खेली जाती है। लोग एक-दूसरे को रंग लगाकर और गले मिलकर होली का जश्न मनाते हैं। मथुरा की गलियों में होली के दिन पारंपरिक गीत-संगीत और नृत्य का भी आयोजन किया जाता है। यहां के लोग होली के दिन घरों में पकवान बनाते हैं और एक-दूसरे के साथ मिलकर खाते हैं। Latest News in Hindi Today Hindi news Banke Bihari Temple #Holi2025 #MathuraHoli #HoliFestival #BrajHoli #HoliInVrindavan #HoliCelebration #ColorsOfHoli #HoliTourism #FestivalOfColors #RadhaKrishnaHoli

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Holi 2025: होली के दिन अवश्य करें इस स्तोत्र का पाठ, भगवान कृष्ण प्रसन्न होकर दूर करेंगे सब दुख

होली, रंगों का त्योहार भारत के सबसे प्रसिद्ध और उत्साहपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह त्योहार न केवल रंगों और उल्लास से भरा होता है, बल्कि इसमें आध्यात्मिक महत्व भी छिपा होता है। होली के दिन भगवान कृष्ण (Lord Krishna) की पूजा और उनके स्तोत्र का पाठ करने से जीवन के सभी दुख दूर हो जाते हैं और भक्तों को आनंद और शांति की प्राप्ति होती है। होली 2025 में भी इस परंपरा को निभाने का विशेष महत्व होगा। आइए जानते हैं कि होली (Holi) के दिन किस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए और इसका क्या महत्व है। होली 2025 की तारीख होली (Holi)  का त्योहार फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। साल 2025 में होली 14 मार्च 2025, शुक्रवार को मनाई जाएगी। होली से एक दिन पहले होलिका दहन किया जाएगा, जो 13 मार्च 2025, गुरुवार को होगा। होली का त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत, प्रेम और भाईचारे का प्रतीक है। श्री राधा कृष्ण अष्टकम  चथुर मुखाधि संस्थुथं, समास्थ स्थ्वथोनुथं।हलौधधि सयुथं, नमामि रधिकधिपं॥भकाधि दैथ्य कालकं, सगोपगोपिपलकं।मनोहरसि थालकं, नमामि रधिकधिपं॥सुरेन्द्र गर्व बन्जनं, विरिञ्चि मोह बन्जनं।वृजङ्ग ननु रञ्जनं, नमामि रधिकधिपं॥मयूर पिञ्च मण्डनं, गजेन्द्र दण्ड गन्दनं।नृशंस कंस दण्डनं, नमामि रधिकधिपं॥प्रदथ विप्रदरकं, सुधमधम कारकं।सुरद्रुमपःअरकं, नमामि रधिकधिपं॥दानन्जय जयपाहं, महा चमूक्षयवाहं।इथमहव्यधपहम्, नमामि रधिकधिपं॥मुनीन्द्र सप करणं, यदुप्रजप हरिणं।धरभरवत्हरणं, नमामि रधिकधिपं॥सुवृक्ष मूल सयिनं, मृगारि मोक्षधयिनं।श्र्वकीयधमययिनम्, नमामि रधिकधिपं॥ वन्दे नवघनश्यामं पीतकौशेयवाससम्।सानन्दं सुन्दरं शुद्धं श्रीकृष्णं प्रकृतेः परम्॥राधेशं राधिकाप्राणवल्लभं वल्लवीसुतम्।राधासेवितपादाब्जं राधावक्षस्थलस्थितम्॥राधानुगं राधिकेष्टं राधापहृतमानसम्।राधाधारं भवाधारं सर्वाधारं नमामि तम्॥राधाहृत्पद्ममध्ये च वसन्तं सन्ततं शुभम्।राधासहचरं शश्वत् राधाज्ञापरिपालकम्॥ध्यायन्ते योगिनो योगान् सिद्धाः सिद्धेश्वराश्च यम्।तं ध्यायेत् सततं शुद्धं भगवन्तं सनातनम्॥निर्लिप्तं च निरीहं च परमात्मानमीश्वरम्।नित्यं सत्यं च परमं भगवन्तं सनातनम्॥यः सृष्टेरादिभूतं च सर्वबीजं परात्परम्।योगिनस्तं प्रपद्यन्ते भगवन्तं सनातनम्॥बीजं नानावताराणां सर्वकारणकारणम्।वेदवेद्यं वेदबीजं वेदकारणकारणम्॥योगिनस्तं प्रपद्यन्ते भगवन्तं सनातनम्।गन्धर्वेण कृतं स्तोत्रं यः पठेत् प्रयतः शुचिः।इहैव जीवन्मुक्तश्च परं याति परां गतिम्॥हरिभक्तिं हरेर्दास्यं गोलोकं च निरामयम्।पार्षदप्रवरत्वं च लभते नात्र संशयः॥ इसे भी पढ़ें:- होलिका दहन की रात काले तिल और सरसों से करें ये चमत्कारिक टोटके! होली के दिन स्तोत्र पाठ का महत्व होली (Holi) के दिन भगवान कृष्ण (Lord Krishna) की पूजा और उनके स्तोत्र का पाठ करने का विशेष महत्व है। भगवान कृष्ण को होली का त्योहार अत्यंत प्रिय है, क्योंकि वे स्वयं रासलीला और रंगों के प्रेमी थे। होली के दिन भगवान कृष्ण (Lord Krishna) के स्तोत्र का पाठ करने से उनकी कृपा प्राप्त होती है और जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। स्तोत्र पाठ करने से न केवल भक्तों को आध्यात्मिक शांति मिलती है, बल्कि उनके मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी होता है। होली के दिन स्तोत्र पाठ करने से भगवान कृष्ण प्रसन्न होते हैं और भक्तों को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Holi #Holi2025 #KrishnaBhakti #HoliPuja #HoliFestival #SpiritualHoli #BhagwanKrishna #HoliMantra #HoliStotra #KrishnaBlessings #HoliCelebration

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Harihar Milan,

हरिहर मिलन: जब देवघर में भगवान शिव और श्रीकृष्ण खेलते हैं होली

होली का त्योहार भारत के सबसे प्रसिद्ध और उत्साहपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह त्योहार न केवल रंगों और उल्लास से भरा होता है, बल्कि इसमें आध्यात्मिक और पौराणिक महत्व भी छिपा होता है। भारत में एक ऐसा धाम है, जहां होली के दिन भगवान शिव (Lord Shiva) और भगवान कृष्ण (Lord Krishna) की अद्भुत लीला देखने को मिलती है। यह स्थान है देवघर मंदिर, जहां महादेव के साथ होली खेलने आते हैं कन्हैया। आइए जानते हैं कि देवघर में होली कैसे मनाई जाती है और इसका क्या महत्व है। हरिहर मिलन के दिन देवघर आए थे बाबा बैद्यनाथ पौराणिक ग्रंथों और बाबा बैद्यनाथ मंदिर के तीर्थ पुरोहितों के अनुसार, ‘हरिहर मिलन’ (Harihar Milan) के दिन ही बाबा बैद्यनाथ देवघर पहुंचे थे। इस अवसर पर विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु (श्रीकृष्ण) अपने आराध्य भगवान शिव से मिलने आते हैं। दोनों देवता साथ में होली खेलते हैं और आनंद से भर जाते हैं। हरिहर मिलन का प्रसंग बाबा बैद्यनाथ मंदिर के तीर्थ पुरोहित प्रभाकर शांडिल्य के अनुसार, हरिहर मिलन (Harihar Milan) के दिन ही भगवान शिव देवघर पहुंचे थे। इस घटना का संबंध रावण से जुड़ी कथा से है। मान्यता है कि रावण ने भगवान शिव से आग्रह किया था कि वे लंका चलें। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव (Lord Shiva) शिवलिंग के रूप में लंका जाने के लिए तैयार हुए, लेकिन एक शर्त रखी कि यात्रा के दौरान रावण शिवलिंग को कहीं भी न रखे, क्योंकि जहां भी वह शिवलिंग रखेगा, वह वहीं स्थापित हो जाएगा। जब रावण शिवलिंग लेकर लंका जा रहा था, तब भगवान विष्णु वृद्ध ब्राह्मण के रूप में प्रकट हुए। इसी दौरान रावण को लघुशंका महसूस हुई, जिससे वह शिवलिंग को रखने के लिए मजबूर हो गया। बैद्यनाथ धाम वह स्थान है, जहां माता सती का हृदय गिरा था, और यही कारण था कि भगवान विष्णु की योजना के तहत रावण को यहां शिवलिंग रखना पड़ा। इसे भी पढ़ें:- कब मनाई जाएगी छोटी होली, जानिए इस दिन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? हरिहर मिलन पर खेली जाती है होली रावण ने भगवान शिव (Lord Shiva) से वचन लिया था कि यदि वह शिवलिंग को जमीन पर रख देगा, तो शिव वहीं स्थापित हो जाएंगे। भगवान विष्णु ने ही रावण से शिवलिंग लेकर इसे देवघर में स्थापित कर दिया। इसी स्थान पर माता सती और भगवान शिव का मिलन हुआ। जिस शिवलिंग को भगवान विष्णु ने ग्रहण किया था, उसी के साथ वे श्रीकृष्ण के रूप में ‘हरिहर मिलन’ के अवसर पर होली खेलते हैं। भगवान शिव और श्रीकृष्ण खेलते हैं गुलाल प्रभाकर शांडिल्य के अनुसार, ‘हरिहर मिलन’ (Harihar Milan) के अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण (Lord Krishna) की प्रतिमा वर्ष में केवल एक बार बाहर लाई जाती है। इस दौरान वे बैजू मंदिर के पास झूला झूलते हैं और आनंदित हो जाते हैं। इसके बाद वे परमानंद महादेव के पास जाते हैं, जहां भगवान शिव और श्रीकृष्ण एक साथ गुलाल खेलते हैं। इस दिन भगवान को विशेष भोग अर्पित किया जाता है, जिसमें मालपुआ चढ़ाया जाता है। भक्त भी भगवान के साथ गुलाल अर्पित कर इस पावन अवसर को मनाते हैं। चूंकि गुलाल प्राकृतिक रंग होता है, इसलिए इसे भगवान को समर्पित किया जाता है। ‘हरिहर मिलन’ (Harihar Milan) के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण अपनी मूल स्थान पर लौट जाते हैं। Latest News in Hindi Today Hindi news Harihar Milan #HariharMilan #DevgharHoli #ShivaKrishnaHoli #SpiritualFestivals #HoliWithGods #DivineCelebration #MythologicalHoli #ShivKrishnaLeela #FestiveDevghar #HoliTraditions

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Holika Dahan rituals

होलिका दहन की रात काले तिल और सरसों से करें ये चमत्कारिक टोटके!

होली का त्योहार न केवल रंगों और उल्लास से भरा होता है, बल्कि इसमें आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व भी छिपा होता है। होलिका दहन (Holika Dahan) के दिन किए जाने वाले कुछ विशेष टोटके और उपायों से घर में सुख-समृद्धि और धन का अंबार लग सकता है। होलिका दहन की रात काले तिल और सरसों का उपयोग करके कुछ चमत्कारिक टोटके किए जा सकते हैं, जो आपके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा ला सकते हैं। आइए जानते हैं कि होलिका दहन की रात काले तिल (Black Sesame Seeds) और सरसों से कौन-से टोटके करने चाहिए और इनका क्या महत्व है। होलिका दहन का महत्व होलिका दहन (Holika Dahan) का त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। यह त्योहार प्रह्लाद और होलिका की कथा से जुड़ा हुआ है, जिसमें भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच गए और होलिका जल गई। होलिका दहन के दिन लोग बुराई को जलाकर अच्छाई की जीत का जश्न मनाते हैं। होलिका दहन के दिन किए जाने वाले टोटके और उपायों से घर में सुख-समृद्धि और धन का अंबार लग सकता है। काले तिल (Black Sesame Seeds) और सरसों (Mustard Seeds) का उपयोग करके कुछ विशेष टोटके किए जा सकते हैं, जो आपके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा ला सकते हैं। भद्रा का प्रभाव और शुभ मुहूर्त इस वर्ष होलिका दहन (Holika Dahan) के दिन भद्रा का प्रभाव रहेगा, जो रात 10:44 बजे समाप्त होगा। इसके बाद ही होलिका दहन किया जाएगा। यह पर्व अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि यदि विधिपूर्वक पूजा की जाए, तो जीवन की समस्याएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि आती है। काले तिल और सरसों का महत्व काले तिल (Black Sesame Seeds) और सरसों (Mustard Seeds) का हिंदू धर्म और ज्योतिष में विशेष महत्व है। काले तिल को शनि देव का प्रतीक माना जाता है और इसे धन और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। सरसों को मां लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है और इसे घर में सुख-समृद्धि लाने के लिए उपयोग किया जाता है। होलिका दहन (Holika Dahan) की रात काले तिल और सरसों (Mustard Seeds) का उपयोग करके कुछ विशेष टोटके किए जा सकते हैं, जो आपके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा ला सकते हैं। इसे भी पढ़ें:- कब मनाई जाएगी छोटी होली, जानिए इस दिन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? होलिका दहन के खास उपाय नकारात्मक ऊर्जा से बचाव: सरसों और काले तिल (Black Sesame Seeds) को अपने ऊपर से सात बार घुमाकर होलिका की अग्नि में अर्पित करें। यह उपाय नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त करता है। धन संबंधी समस्याओं का समाधान: होलिका दहन के बाद राख ठंडी होने पर उसे लाल कपड़े में बांधकर तिजोरी में रखें। यह आर्थिक परेशानियों को दूर करने में सहायक होता है। माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए: घर के मुख्य दरवाजे पर दीपक जलाएं, जिससे माता लक्ष्मी का आशीर्वाद बना रहता है। आर्थिक तंगी से मुक्ति: होलिका की अग्नि में नारियल अर्पित करने से धन संबंधी समस्याएं दूर होती हैं। विशेष उपाय: देसी घी से भरा पान का पत्ता होलिका में अर्पित करें, जिससे माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। होलिका दहन के लिए आवश्यक पूजन सामग्री होलिका पूजन के लिए कच्चा सूती धागा, नारियल, गुलाल, रोली, अक्षत, धूप, फूल, बताशे, ताजा अनाज, साबूत मूंग, गांठ वाली हल्दी, एक कटोरी पानी, हवन सामग्री, गुड़, चावल, मिठाई, फल, गेहूं का आटा, फूलों की माला, घी, सरसों का तेल, मिट्टी का दीया, उपले, गंगाजल, कपूर, और धूप-अगरबत्ती जैसी सामग्री का उपयोग किया जाता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Holika Dahan #HolikaDahan #HolikaDahan2025 #BlackSesameRituals #MustardTotka #FestivalOfFire #HoliRituals #Holi2025 #HinduTradition #SpiritualRemedies #GoodLuckRituals

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Lord Krishna’s Lost City Submerged in the Sea

द्वारका नगरी की कहानी: श्रीकृष्ण का भव्य साम्राज्य जिसे समुद्र ने निगल लिया

भारत की पौराणिक कथाओं में कई नगरों का वर्णन मिलता है, लेकिन कुछ नगर ऐसे हैं जो इतिहास और रहस्य के धुंध में लुप्त हो गए। इन्हीं में से एक है द्वारका नगरी, जिसे स्वयं भगवान श्रीकृष्ण (Lord Shri Krishna) ने बसाया था। यह नगर अपने वैभव, उन्नति और धार्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध था, लेकिन एक दिन समुद्र की लहरों ने इसे अपने भीतर समा लिया। द्वारका के डूबने के पीछे क्या कारण था? क्या यह प्राकृतिक आपदा थी, या फिर यह किसी श्राप का परिणाम था? श्रीकृष्ण के द्वारका जाने की कथा धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, श्रीकृष्ण (Shri Krishna) को द्वारका जाने की आवश्यकता तब पड़ी जब उन्होंने अपने अत्याचारी मामा और मथुरा के राजा कंस का वध किया। कंस के ससुर और मगध के राजा जरासंध ने इस घटना का प्रतिशोध लेने का संकल्प लिया और मथुरा पर बार-बार आक्रमण करने लगा। वह 17 बार आक्रमण कर चुका था, लेकिन श्रीकृष्ण को पराजित नहीं कर सका। हालांकि, निरंतर युद्धों से न केवल आर्थिक हानि हो रही थी, बल्कि यादवों की सुरक्षा भी संकट में थी। इसे देखते हुए, श्रीकृष्ण (Shri Krishna) ने मथुरा छोड़कर यादवों के लिए एक नए सुरक्षित स्थान की स्थापना का निर्णय लिया। उन्होंने भगवान विश्वकर्मा को भव्य नगर द्वारका के निर्माण का आदेश दिया। विश्वकर्मा ने समुद्र के ऊपर केवल एक रात में इस अद्भुत नगरी का निर्माण कर दिया, जहां यादवों को बसाया गया। इसके बाद श्रीकृष्ण “द्वारकाधीश” के नाम से प्रसिद्ध हुए। कैसी थी द्वारका नगरी? द्वारका (Dwarka), जिसका अर्थ है ‘द्वारों का नगर’, भगवान श्रीकृष्ण (Shri Krishna) की राजधानी थी। द्वारका एक भव्य और अद्भुत नगरी थी, जिसमें छह विशाल दरवाजे और भव्य प्रासाद थे। इसकी गलियां मोतियों और बहुमूल्य पत्थरों से सजी हुई थीं, जिससे यह एक स्वर्गीय नगर जैसी प्रतीत होती थी। इस अद्वितीय नगरी का निर्माण मय दानव की असाधारण वास्तुकला से हुआ था, जिसने इसे अद्भुत स्वरूप प्रदान किया। महाभारत में द्वारका का वर्णन ‘सोने से बनी नगरी’ के रूप में किया गया है, जो इसकी विलक्षण सुंदरता और समृद्धि को दर्शाता है। यह नगर सात टीलों पर स्थित था और एक मजबूत किलेबंदी से सुरक्षित था, जिससे यह बाहरी आक्रमणों से संरक्षित रह सके। 4000 साल पहले किसने दिया द्वारका को डूबने का श्राप? शास्त्रों में द्वारका (Dwarka) को कुशस्थली के रूप में वर्णित किया गया है, जो एक समृद्ध और खुशहाल नगरी थी। यहां के लोग प्रेम और भाईचारे के साथ रहते थे, और स्वयं श्रीकृष्ण इस नगर का संचालन कर रहे थे। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब सबकुछ इतना सुंदर और अद्भुत था, तो फिर द्वारका डूबी कैसे? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, द्वारका के डूबने के पीछे दो श्रापों का बड़ा योगदान था। यह पवित्र नगरी, जो आज हिंदुओं के चारधाम और सप्तपुरी में शामिल है, कठोर श्रापों का शिकार हुई। आइए जानते हैं, कौन-कौन से श्रापों ने इस दिव्य नगरी को जलमग्न कर दिया। इसे भी पढ़ें:- कब और कहां लेंगे भगवान विष्णु कल्कि का अवतार? द्वारका के जलमग्न होने का सबसे प्रसिद्ध श्राप ऋषि दुर्वासा और स्वयं श्रीकृष्ण के वचन से जुड़ा है। महाभारत का युद्ध विनाशकारी था, जिसमें कौरवों का अंत हो गया और पांडवों ने विजय प्राप्त की। युद्ध के बाद युधिष्ठिर का हस्तिनापुर में राजतिलक हुआ, जहां श्रीकृष्ण (Lord Shri Krishna) भी मौजूद थे। इसी दौरान, कौरवों की माता गांधारी ने श्रीकृष्ण को इस युद्ध का सबसे बड़ा दोषी मानते हुए श्राप दिया कि जैसे उनके कुल का विनाश हुआ, वैसे ही श्रीकृष्ण के सामने ही उनके वंश का नाश होगा। ऐसा माना जाता है कि द्वारका के डूबने का एक प्रमुख कारण यही श्राप था। महाभारत युद्ध के 36 साल बाद, समुद्र में पूरी द्वारका नगरी समा गई। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि विश्वामित्र, देव ऋषि नारद और कण्व ऋषि द्वारका नगरी पहुंचे थे। वहीं, कुछ यादव बालकों ने उनके साथ उपहास करने की योजना बनाई, जिसमें श्रीकृष्ण के पुत्र सांब भी शामिल थे। उन्होंने सांब को स्त्री वेश में ऋषियों के सामने प्रस्तुत किया और मज़ाक में कहा कि यह स्त्री गर्भवती है, कृपया बताएं कि इसके गर्भ में पलने वाला शिशु कौन होगा।  यह अपमान ऋषियों को सहन नहीं हुआ, और उन्होंने श्राप दिया कि इस गर्भ से एक मुसल (गदा जैसा हथियार) जन्म लेगा, जो पूरे यदुवंश के नाश का कारण बनेगा। इसके बाद यादवों के बीच कलह और संघर्ष बढ़ने लगे, और अंततः वे आपस में लड़-लड़कर खत्म हो गए। बलराम ने भी अपने शरीर का त्याग कर दिया, और श्रीकृष्ण को एक शिकारी के तीर से अनजाने में चोट लग गई, जिसके बाद वे अपने दिव्य लोक में चले गए। जब पांडवों को द्वारका (Dwarka) की स्थिति का पता चला, तो अर्जुन वहां पहुंचे और श्रीकृष्ण के बचे हुए परिजनों को इंद्रप्रस्थ ले आए। इसके बाद द्वारका नगरी धीरे-धीरे समुद्र में डूब गई और हमेशा के लिए विलुप्त हो गई। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Dwarka #DwarkaMystery #LordKrishna #LostCityDwarka #AncientIndia #Mythology #HinduHistory #KrishnaLegend #SubmergedCity #IndianHeritage #HistoricalMystery

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Choti Holi 13 मार्च 2025

Choti Holi 2025: कब मनाई जाएगी छोटी होली, जानिए इस दिन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

होली का त्योहार भारत के सबसे प्रसिद्ध और उत्साहपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह त्योहार न केवल रंगों और उल्लास से भरा होता है, बल्कि इसमें आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी छिपा होता है। होली का त्योहार दो दिनों तक मनाया जाता है, जिसमें पहले दिन छोटी होली और दूसरे दिन बड़ी होली मनाई जाती है। छोटी होली, जिसे होलिका दहन (Holika Dahan) के नाम से भी जाना जाता है, बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। आइए जानते हैं कि छोटी होली 2025 में कब मनाई जाएगी और इस दिन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए। छोटी होली 2025 की तारीख छोटी होली फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। साल 2025 में छोटी होली (Choti Holi) 13 मार्च 2025, गुरुवार को मनाई जाएगी। इस दिन होलिका दहन किया जाएगा, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। छोटी होली के अगले दिन बड़ी होली मनाई जाएगी, जो 14 मार्च 2025, शुक्रवार को होगी। छोटी होली का महत्व छोटी होली  (Choti Holi) का त्योहार हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। छोटी होली के दिन होलिका दहन किया जाता है, जो प्रह्लाद और होलिका की कथा से जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथा के अनुसार, प्रह्लाद भगवान विष्णु (Lord Vishnu) के परम भक्त थे, जबकि उनके पिता हिरण्यकश्यपु भगवान विष्णु के विरोधी थे। हिरण्यकश्यपु ने प्रह्लाद को मारने के लिए कई प्रयास किए, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद हर बार बच गए। अंत में, हिरण्यकश्यपु ने अपनी बहन होलिका से प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठने को कहा। होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में नहीं जलेगी, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से होलिका जल गई और प्रह्लाद बच गए। इस घटना को याद करते हुए छोटी होली के दिन होलिका दहन किया जाता है। छोटी होली के दिन क्या करें? छोटी होली के दिन निम्नलिखित कार्य करने चाहिए: इसे भी पढ़ें:- इस साल होली के दिन लगेगा चंद्र ग्रहण, जानें इसका आपके जीवन पर क्या होगा प्रभाव छोटी होली के दिन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? छोटी होली के दिन निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए: छोटी होली के दिन क्या न करें? छोटी होली के दिन निम्नलिखित बातों से बचना चाहिए: नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Choti Holi #ChotiHoli2025 #HolikaDahan #HoliFestival #HoliCelebration #FestivalOfColors #HoliRituals #IndianFestivals #Holi2025 #HinduFestival #SpiritualTraditions

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Pradosh Vrat

फाल्गुन प्रदोष व्रत 2025: महत्व, पूजा विधि और कथा

हिंदू धर्म में व्रत और त्योहारों का विशेष महत्व है। इनमें से एक महत्वपूर्ण व्रत है प्रदोष व्रत, जो भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के लिए किया जाता है। प्रदोष व्रत हर महीने की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है और यह व्रत भक्तों को भगवान शिव (Lord Shiva) की कृपा प्राप्त करने का अवसर प्रदान करता है। जानते हैं कि प्रदोष व्रत का क्या महत्व है, इसकी पूजा विधि क्या है और इससे जुड़ी कथा क्या है। कब है फाल्गुन मास का प्रदोष व्रत फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि 11 मार्च को सुबह 8:12 बजे शुरू होगी और 12 मार्च को सुबह 9:11 बजे समाप्त होगी। इसलिए, प्रदोष व्रत (Pradosh Vrat) 11 मार्च को रखा जाएगा। चूंकि यह व्रत मंगलवार को पड़ रहा है, इसे भौम प्रदोष व्रत कहा जाएगा। यह मार्च महीने का पहला और फाल्गुन मास का अंतिम प्रदोष व्रत होगा। प्रदोष व्रत का महत्व प्रदोष व्रत (Pradosh Vrat) का हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के लिए किया जाता है। प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव (Lord Shiva) की विशेष पूजा की जाती है और उनकी कृपा प्राप्त की जाती है। इस व्रत को करने से भक्तों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। प्रदोष व्रत का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह व्रत भगवान शिव के प्रति भक्ति और समर्पण का प्रतीक है। इस व्रत को करने से भक्तों को आध्यात्मिक शांति और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। प्रदोष व्रत की पूजा विधि प्रदोष व्रत (Pradosh Vrat) की पूजा विधि अत्यंत सरल और पवित्र मानी जाती है। इस व्रत को करने के लिए निम्नलिखित विधि का पालन करें: इसे भी पढ़ें:  ब्रह्मा जी ने कैसे की सृष्टि की रचना? जानिए क्या है पौराणिक कहानी प्रदोष व्रत के लाभ प्रदोष व्रत (Pradosh Vrat) करने से कई लाभ प्राप्त होते हैं। यह व्रत भगवान शिव (Lord Shiva) की कृपा पाने का एक उत्तम साधन माना जाता है। इसे रखने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और भक्तों पर अपना आशीर्वाद बरसाते हैं। प्रदोष व्रत के माध्यम से भक्त अपने पापों से मुक्त होकर मोक्ष की ओर अग्रसर होते हैं। यह व्रत न केवल आत्मिक शुद्धि प्रदान करता है, बल्कि मन को शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा भी देता है। साथ ही, इसे करने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है और परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम बढ़ता है। Latest News in Hindi Today Hindi news Pradosh Vrat #PradoshVrat2025 #LordShiva #PradoshVrat #ShivaPuja #IndianFestivals #HinduRituals #SpiritualJourney #DivineBlessings #PradoshVratKatha #IndianCulture #FaithAndDevotion #ShivaBhakt #VratAndPuja #SpiritualPeace #IncredibleIndia

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Yuyutsu in Mahabharata

महाभारत युद्ध के बाद जीवित रहने वाला कौरव: युयुत्सु की अनसुनी कहानी

महाभारत (Mahabharata) का महाकाव्य भारतीय संस्कृति और इतिहास का एक अहम हिस्सा है। यह कथा न केवल धर्म, न्याय और कर्तव्य के बारे में है, बल्कि इसमें मानवीय भावनाओं, संघर्ष और जीवन के गहरे सबक भी छिपे हैं। महाभारत के युद्ध में कौरवों और पांडवों के बीच भीषण संग्राम हुआ, जिसमें अधिकांश कौरव मारे गए। लेकिन क्या आप जानते हैं कि धृतराष्ट्र (Dhritarashtra) की एक संतान ऐसी भी थी, जो इस युद्ध के बाद भी जीवित रही? आइए, जानते हैं उस कौरव की कथा, जिसने महाभारत के युद्ध में अपनी जान बचाई और आगे चलकर एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। धृतराष्ट्र की संतान: कौरवों का परिचय धृतराष्ट्र,( Dhritarashtra) हस्तिनापुर के महाराज विचित्रवीर्य के पुत्र थे, लेकिन जन्म से ही अंधे होने के कारण वे राजगद्दी पर नहीं बैठ सके। उनकी पत्नी गांधारी से उन्हें 100 पुत्र और एक पुत्री प्राप्त हुईं, जिन्हें कौरव के नाम से जाना जाता है। इनमें सबसे बड़े पुत्र दुर्योधन थे, जो कौरवों के नेता बने। महाभारत के युद्ध में कौरवों की ओर से लड़ने वाले अधिकांश योद्धा युद्ध में मारे गए, लेकिन धृतराष्ट्र की एक संतान ऐसी थी, जो इस युद्ध के बाद भी जीवित रही। कौरवों का 101वां भाई कौन था? धृतराष्ट्र (Dhritarashtra) और गांधारी के 100 पुत्रों के अलावा, उनका एक और पुत्र था, जिसका जन्म गांधारी की दासी सुगाधा से हुआ था। इस पुत्र का नाम युयुत्सु (Yuyutsu) था, जो दुर्योधन का सौतेला भाई था। युयुत्सु (Yuyutsu) को भी वैसे ही शिक्षित और पाला गया जैसा कि धृतराष्ट्र के अन्य पुत्रों को, लेकिन दुर्योधन ने कभी उसे अपना भाई नहीं माना और न ही उसे सम्मान दिया। इस कारण युयुत्सु कौरवों से अधिक पांडवों के प्रति झुकाव रखते थे और अंततः महाभारत युद्ध में उन्होंने पांडवों का साथ दिया। युयुत्सु का निर्णय: पांडवों का साथ जब कुरुक्षेत्र युद्ध की घोषणा हुई, तब युयुत्सु (Yuyutsu) ने इसे रोकने की पूरी कोशिश की, लेकिन यह संभव नहीं हो सका। शुरुआत में वे कौरवों की ओर थे, लेकिन जब युद्ध का पहला दिन आया, तो युधिष्ठिर ने घोषणा की कि यह धर्मयुद्ध है, और जो भी धर्म का पक्ष लेना चाहता है, वह अपनी सेना बदल सकता है। युधिष्ठिर की इस बात को सुनकर युयुत्सु (Yuyutsu) ने सत्य और धर्म का साथ देने का निर्णय लिया। उन्होंने कौरवों की सेना छोड़कर पांडवों की सेना में शामिल होने का फैसला किया। उनके इस फैसले से दुर्योधन बहुत क्रोधित हुआ, लेकिन युयुत्सु ने धर्म के मार्ग को चुना और पांडवों के साथ युद्ध में शामिल हुए। युद्ध में युयुत्सु की भूमिका युयुत्सु (Yuyutsu) अत्यंत बुद्धिमान और कुशल प्रबंधक थे। उनकी इस क्षमता को देखते हुए पांडवों ने उन्हें सीधा युद्ध करने के बजाय सैन्य प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी। वे पांडवों की सेना के लिए भोजन, पानी और हथियारों की व्यवस्था करने का कार्य संभालते थे, जिससे युद्ध के दौरान सैन्य जरूरतों को पूरा किया जा सके। इसे भी पढ़ें:- कल्कि अवतार: कब और कहां लेंगे भगवान विष्णु कल्कि का अवतार? युद्ध के बाद युयुत्सु का जीवन महाभारत (Mahabharata) के युद्ध के बाद, जब पांडवों ने हस्तिनापुर का शासन संभाला, तो युयुत्सु ने भी उनके शासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। युधिष्ठिर ने युयुत्सु को अपना सलाहकार और मंत्री बनाया। युयुत्सु की न्यायप्रियता और बुद्धिमत्ता ने उन्हें पांडवों के शासन में एक विश्वसनीय सहयोगी बना दिया। उन्होंने हस्तिनापुर के पुनर्निर्माण और प्रजा के कल्याण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। युयुत्सु का चरित्र और सीख युयुत्सु (Yuyutsu) का चरित्र महाभारत (Mahabharata) की कथा में एक महत्वपूर्ण सीख देता है। वे इस बात का उदाहरण हैं कि न्याय और धर्म का साथ देना कितना महत्वपूर्ण है, चाहे उसके लिए अपने परिवार या समाज के विरुद्ध ही क्यों न जाना पड़े। युयुत्सु ने दिखाया कि सही और गलत के बीच फर्क करना और धर्म के मार्ग पर चलना ही मनुष्य का सबसे बड़ा कर्तव्य है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Mahabharata #Mahabharata #KurukshetraWar #Yuyutsu #Kauravas #MahabharatFacts #HinduMythology #DharmYudh #EpicStories #AncientIndia #MahabharatSecrets

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