Harvard Scientist's Mathematical Proof Suggests God's Existence

Mathematical proof of God: हार्वर्ड के वैज्ञानिक डॉक्टर विली सून ने मैथ्स के इस फॉर्मूले से किया भगवान के अस्तित्व को साबित

सदियों से भगवान के अस्तित्व को लेकर लोगों के मन में कई तरह के सवाल रहे हैं। एक तपका है जो ईश्वर के होने पर आँख मूंदकर विश्वास करता है तो वहीं दूसरा तपका ऐसा भी है जो भगवान के अस्तित्व को सिरे से खारिज करता आ रहा है। लोग अपनी-अपनी आस्था के हिसाब से भगवान की आराधना करते आ रहे हैं। भिन्न-भिन्न धर्मों के लोग अपने-अपने हिसाब से भगवान की पूजा करते हैं। महत्वपूर्ण बात यह कि आस्था के अलावा वैज्ञानिकों के लिए भी यह हमेशा जिज्ञासा का विषय रहा है कि कि क्या हमारे ब्रम्हांड में भगवान जैसी कोई चीज है भी या नहीं भी? इसी जिज्ञासा को लेकर एक वैज्ञानिक ने भगवान के अस्तित्व का खुलासा किया है। भगवान के अस्तित्व का खुलासा वो भी गणित के एक सूत्र (Mathematical proof of God) से। मजे की बात यह कि अब गणित के सूत्र से भगवान का खुलासा होने लगा है। खैर, आपको बता दें कि हार्वर्ड के एस्ट्रोफिजिशियस्ट और एयरोस्पेस इंजीनियर डॉक्टर विली सून ने दावा है कि गणित का एक सूत्र भगवान के अस्तित्व का अंतिम प्रमाण हो सकता है। दरअसल, डॉक्टर विली सून हाल ही में टकर कार्ल्सन नेटवर्क पॉडकास्ट पर कुछ फॉर्मूले पेश करते हुए कहा कि “ब्रह्मांड का रहस्य मात्र तारों में ही नहीं, लेकिन गणित के कुछ बुनियादों में भी लिखे हो सकते हैं।”  यह फॉर्मूला सबसे पहले कैंब्रिज के गणितज्ञ पॉल डिराक की ओर से (Mathematical proof of God) किया गया था प्रस्तावित  प्राप्त जानकारी के मुताबिक उन्होंने अपनी थ्योरी में फाइन ट्यूनिंग आर्ग्यूमेंट को मुख्य केंद्र बनाया है। इसके मुताबिक ब्रम्हांड के फिजिकल लॉ सटीक रूप से जीवन को समर्थन देने के लिए संतुलित किए गए हैं। अब यह संयोग तो नहीं हो सकता है न? बता दें कि यह फॉर्मूला सबसे पहले कैंब्रिज के गणितज्ञ पॉल डिराक की ओर से प्रस्तावित (Mathematical proof of God) किया गया था। इसमें यह दर्शाया गया है कि कैसे कुछ कॉस्मिक एलाइन बिल्कुल अद्भुत सटीकता के साथ एक-दूसरे से मेल खाते हैं। बड़ी बात यह कि इस घटना ने वैज्ञानिकों को चौंका दिया है। डिराक ने अनुमान लगाया है कि यूनिवर्स के फिजिकल लॉ के परफेक्ट बैलेंस को गणित के थ्योरी में महान सुंदरता और शक्ति के संदर्भ में परिभाषित किया जा सकता है। इसे समझने के लिए व्यक्ति को हाई इंटेलिजेंस की आवश्यकता होगी। बता दें कि साल 1963 में गणितज्ञ पॉल डिराक ने अपनी किताब में लिखा कि “कोई शायद इस स्थिति का वर्णन इस तरह कर सकता है कि भगवान एक बेहद उच्च श्रेणी के गणितज्ञ हैं। उन्होंने यूनिवर्स को बनाने में बेहद एडवांस मैथमैटिक्स का इस्तेमाल किया था।”  इसे भी पढ़ें:-  ब्रह्मा जी ने कैसे की सृष्टि की रचना? जानिए क्या है पौराणिक कहानी डॉक्टर सून ने डिराक की थ्योरी (Mathematical proof of God) के जरिए भगवान के अस्तित्व को लेकर कही यह बात  यही नहीं, पॉडकास्ट में डॉक्टर सून ने भी डिराक की थ्योरी (Mathematical proof of God) के जरिए भगवान के अस्तित्व को लेकर बात कही। इस दौरान उन्होंने कहा कि “हमारे जीवन को रोशन करने वाली हमेशा उपस्थित इन शक्तियों के कई उदाहरण हैं। हालांकि कई वैज्ञानिकों ने साइंस को धर्म से जोड़ने से परहेज किया है। डॉक्टर सून ने अपना तर्क देते हुए कहा कि “गणित और यूनिवर्स के बीच का सामंजस्य एक जानबूझकर किए गए डिजाइन की ओर इशारा करता है। भगवान ने हमें प्रकाश का अनुसरण करने के लिए यह प्रकाश दिया है, ताकि हम अपनी पूरी कोशिश कर सकें।” देखना दिलचस्प यह कि यह थ्योरी वैज्ञानिकों को किस हद तक संतुष्ट कर पाती है।   Latest News in Hindi Today Hindi news Mathematical proof of God #MathematicalProofOfGod #DrWillieSoon #FineTuningArgument #ScienceAndFaith #PaulDirac #AntimatterDiscovery #CosmicDesign #UniverseFineTuning #PhysicsAndTheology #ExistenceOfGod

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Spiritual significance of gems in dreams

स्वप्न शास्त्र: सपनों में दिखने वाले हीरे, मोती और नीलम का क्या है रहस्य? जानिए इनके शुभ-अशुभ संकेत

स्वप्न शास्त्र, जिसे ज्योतिष शास्त्र की एक महत्वपूर्ण शाखा माना जाता है, हमारे सपनों और उनके संकेतों का अध्ययन करता है। यह मान्यता है कि हमारे सपने सिर्फ एक कल्पना नहीं होते, बल्कि वे हमारे भविष्य से जुड़े संकेत भी देते हैं। खासकर जब सपनों में कोई खास वस्तु या प्रतीक दिखाई देते हैं, तो उनका अर्थ गहरा होता है। रत्नों को हमेशा से ही समृद्धि, शक्ति और भाग्य से जोड़ा जाता रहा है, और जब ये हमें सपनों में दिखाई देते हैं, तो वे हमारे जीवन से जुड़ी अहम जानकारियों को उजागर करते हैं। आइए जानते हैं कि स्वप्न शास्त्र के अनुसार, अगर सपने में हीरा, मोती या नीलम दिखाई दे तो इसका क्या अर्थ होता है और ये हमारे जीवन को कैसे प्रभावित कर सकते हैं। सपने में हीरा दिखने का अर्थ हीरा धन, ऐश्वर्य और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। यह शुक्र ग्रह से संबंधित रत्न है और इसे पहनने वाले व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि, वैभव और आकर्षण बढ़ता है। अगर कोई व्यक्ति सपने (Dream) में हीरा देखता है, तो इसका अर्थ कई तरह से निकाला जा सकता है, सपने में मोती देखना मोती को चंद्रमा का रत्न (Gems) माना जाता है और यह शांति, धैर्य और मानसिक स्थिरता का प्रतीक होता है। यदि कोई व्यक्ति सपने में मोती देखता है, तो इसका अर्थ इस प्रकार हो सकता है, सपने में नीलम देखना नीलम को शनि ग्रह से संबंधित रत्न माना जाता है। यह व्यक्ति के भाग्य को तेजी से बदल सकता है, इसलिए इसे बहुत सोच-समझकर धारण करने की सलाह दी जाती है। यदि कोई व्यक्ति सपने में नीलम देखता है, तो इसका अर्थ इस प्रकार हो सकता है, सपने में गोमेद देखना यदि आप सपने में गोमेद रत्न देखते हैं, तो यह संकेत करता है कि आपके जीवन में नई चीजें सीखने के अवसर मिल सकते हैं। इसके अलावा, यह सपना आपके कौशल के विकास और दक्षता में वृद्धि की ओर भी इशारा करता है। यह दर्शाता है कि जिस कार्य में आप लगे हुए हैं, उसमें आपको निपुणता प्राप्त हो सकती है। इसे भी पढ़ें:- रविवार को सूर्य पूजा में पढ़ें यह कथा, मिलेगी सुख-समृद्धि सपने में पुखराज देखना स्वप्न (Dream) में पुखराज रत्न का दिखना शुभ संकेत नहीं माना जाता। यह आपके स्वास्थ्य से जुड़ी संभावित परेशानियों का संकेत हो सकता है, जिससे आपको सतर्क रहने की आवश्यकता है। हालांकि, इस सपने का एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि यह आपके आध्यात्मिक उन्नति की ओर संकेत कर सकता है। स्वप्न शास्त्र में रत्नों का महत्व यदि सपने (Dream) में कोई रत्न (Gems) चमकदार दिखाई दे, तो यह एक शुभ संकेत माना जाता है, जो सफलता, धन और समृद्धि की ओर इशारा करता है। इसके विपरीत, यदि रत्न धुंधले या फीके नजर आएं, तो यह किसी परेशानी या आने वाली बाधाओं का संकेत हो सकता है। सपने में यदि आप किसी को रत्न देते हुए देखते हैं, तो यह आपके जीवन में किसी बड़े बदलाव का सूचक हो सकता है। वहीं, यदि आप सपने में रत्न खरीदते हैं, तो यह व्यापार और आर्थिक उन्नति का संकेत देता है, जबकि रत्न बेचना किसी प्रकार की हानि या नुकसान की ओर इशारा कर सकता है। Latest News in Hindi Today Hindi news Dream #DreamInterpretation #VedicDreams #GemstoneDreams #SpiritualSigns #DreamMeaning #AuspiciousDreams #MysticVisions #AstrologySecrets #DivineMessages #SymbolicDreams

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Kalki Avatar When & Where Will Vishnu's 10th Incarnation Be

कल्कि अवतार: कब और कहां लेंगे भगवान विष्णु कल्कि का अवतार?

हिंदू पुराणों और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु (Lord Vishnu) ने अब तक दस अवतार लिए हैं, जिनमें से कल्कि अवतार अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। कल्कि अवतार को कलियुग (Kal Yuga) के अंत और सतयुग की शुरुआत के लिए जिम्मेदार माना जाता है। यह अवतार धर्म की पुनर्स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए लिया जाएगा। आइए जानते हैं कि भगवान विष्णु कब और कहां कल्कि अवतार लेंगे, और इस अवतार का महत्व क्या है। कल्कि अवतार क्या है? कल्कि अवतार भगवान विष्णु (Lord Vishnu) का दसवां और अंतिम अवतार है। इस अवतार के बारे में कहा जाता है कि यह कलियुग के अंत में प्रकट होगा। कल्कि अवतार का उद्देश्य धर्म की पुनर्स्थापना करना और अधर्म का विनाश करना है। इस अवतार को लेकर कई पुराणों और ग्रंथों में विस्तार से वर्णन किया गया है। कल्कि अवतार कब लिया जाएगा? कल्कि अवतार (Kalki Avatar) के बारे में कहा जाता है कि यह कलियुग के अंत में प्रकट होगा। कलियुग (Kal Yuga) की अवधि 4,32,000 वर्ष मानी जाती है, और अभी इस युग का प्रारंभिक चल रहा है। हालांकि, कल्कि अवतार के प्रकट होने का सही समय अभी निर्धारित नहीं है, लेकिन ऐसा माना जाता है कि जब पृथ्वी पर अधर्म अपने चरम पर होगा, तब भगवान विष्णु कल्कि के रूप में अवतार लेंगे। कल्कि अवतार कहां प्रकट होगा? कल्कि अवतार के बारे में कहा जाता है कि यह उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के सम्भल नामक स्थान पर प्रकट होगा। सम्भल को कल्कि अवतार की जन्मस्थली माना जाता है। इस स्थान को लेकर कई पुराणों और ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। कल्कि अवतार का स्वरूप कल्कि अवतार (Kalki Avatar) को एक श्वेत घोड़े पर सवार योद्धा के रूप में दर्शाया जाता है। उनके हाथ में एक तलवार होगी, जिससे वे अधर्म का विनाश करेंगे। कल्कि अवतार का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और प्रभावशाली होगा। उनके आगमन से पृथ्वी पर फैले अंधकार का अंत होगा और धर्म की पुनर्स्थापना होगी। कल्कि अवतार का महत्व कल्कि अवतार (Kalki Avatar) का महत्व इसलिए है क्योंकि यह अवतार धर्म की पुनर्स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए लिया जाएगा। कलियुग (Kal Yuga) में जब पृथ्वी पर अधर्म, अत्याचार और अन्याय अपने चरम पर होगा, तब कल्कि अवतार का प्रकट होना मानव जाति के लिए मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करेगा। इस अवतार के माध्यम से भगवान विष्णु (Lord Vishnu) पृथ्वी को पाप और अधर्म से मुक्त करेंगे। इसे भी पढ़ें:-  ब्रह्मा जी ने कैसे की सृष्टि की रचना? जानिए क्या है पौराणिक कहानी कल्कि अवतार से जुड़ी भविष्यवाणियां कल्कि अवतार (Kalki Avatar) से जुड़ी कई भविष्यवाणियां पुराणों और ग्रंथों में की गई हैं। इन भविष्यवाणियों के अनुसार, कल्कि अवतार के समय पृथ्वी पर अत्यधिक अराजकता और अधर्म फैला होगा। लोग धर्म और नैतिकता को भूल चुके होंगे, और समाज में हिंसा और अन्याय का बोलबाला होगा। ऐसे समय में कल्कि अवतार का प्रकट होना मानव जाति के लिए एक नई उम्मीद लेकर आएगा। कल्कि अवतार और आधुनिक विज्ञान कल्कि अवतार (Kalki Avatar) की अवधारणा को लेकर कई लोग इसे केवल एक पौराणिक कथा मानते हैं, लेकिन कुछ लोग इसे आधुनिक विज्ञान से जोड़कर देखते हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि कल्कि अवतार का संबंध भविष्य में होने वाली किसी बड़ी वैज्ञानिक खोज या घटना से हो सकता है। हालांकि, यह केवल एक अनुमान है और इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Vishnu #KalkiAvatar #VishnuAvatar #KalkiIncarnation #HinduProphecy #KalkiComing #KaliyugaEnd #DharmaRestoration #HinduBeliefs #KalkiArrival #SanatanDharma

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स्वस्तिक का महत्व

Swastik benefits : स्वस्तिक बनाते समय इन बातों का रखें ध्यान, तभी मिलेगा शुभ परिणाम

स्वस्तिक का प्रतीक हिन्दू धर्म में एक बेहद शुभ और पवित्र चिन्ह माना जाता है। यह चिन्ह न केवल धार्मिक अवसरों पर, बल्कि जीवन के हर पहलू में सकारात्मकता और समृद्धि का संकेत देता है। प्राचीन काल से यह प्रतीक शांति, सुख और समृद्धि का प्रतीक माना जाता रहा है। आज भी भारतीय घरों में स्वस्तिक के चिन्ह को शुभ माना जाता है और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में इसका प्रयोग किया जाता है। लेकिन स्वस्तिक बनाने से पहले कुछ खास बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है, ताकि इसके परिणाम सकारात्मक और शुभ हों।  स्वस्तिक का महत्व स्वस्तिक का आकार और प्रतीक एक क्रॉस के रूप में होता है, जिसमें चार समान लंबाई की शाखाएँ होती हैं जो एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। यह प्रतीक सूर्य की चारों दिशाओं को दर्शाता है, जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड में फैलती है। स्वस्तिक का अर्थ है ‘कल्याण’, ‘शांति’ और ‘सौम्यता’। यह धर्म, सुख, समृद्धि और आशीर्वाद का प्रतीक है। हिन्दू धर्म में स्वस्तिक का प्रयोग पूजा-पाठ, उत्सवों और संस्कारों में प्रमुख रूप से किया जाता है। स्वस्तिक बनाने से जुड़ी महत्त्वपूर्ण बातें स्वस्तिक को शुभ और परिणामकारी बनाने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए: सही दिशा में स्वस्तिक बनाएं स्वस्तिक बनाने से पहले यह जानना बेहद जरूरी है कि स्वस्तिक का चिन्ह किस दिशा में बनाया जा रहा है। हिन्दू धर्म में स्वस्तिक का चिन्ह हमेशा उत्तर या पूर्व दिशा की ओर बनाना शुभ माना जाता है। इन दिशाओं में स्वस्तिक बनाने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। स्वस्तिक के निशान का आकार और अनुपात स्वस्तिक का आकार भी महत्वपूर्ण होता है। स्वस्तिक के चार भाग समान रूप से और समांतर होने चाहिए। यदि स्वस्तिक के प्रत्येक भाग की लंबाई में भिन्नता होगी, तो यह शुभ संकेत नहीं माना जाता है। इसका मतलब यह हो सकता है कि आपकी पूजा या कार्य में विघ्न आ सकता है। स्वस्तिक के बीच में एक बिंदु का होना कुछ विद्वान और धार्मिक गुरु यह मानते हैं कि स्वस्तिक के बीच में एक बिंदु होना चाहिए। यह बिंदु देवताओं के आशीर्वाद का प्रतीक होता है। बिना बिंदु के स्वस्तिक में आधिकारिक शक्ति का अभाव होता है। स्वस्तिक के बनाए जाने का समय स्वस्तिक का प्रतीक विशेष रूप से उन समयों में बनाना चाहिए, जब विशेष पूजा का आयोजन किया जा रहा हो। जैसे कि व्रत, महा पूजा, शादी, गृह प्रवेश, आदि। इसके अलावा, यह सुनिश्चित करें कि स्वस्तिक को दिन के शुभ समय में और बिना किसी विघ्न के बनाना जाए। स्वस्तिक का प्रयोग घर में स्वस्तिक का प्रयोग घर के मुख्य द्वार, पूजा स्थल, और मंदिरों में शुभ लाभ के लिए किया जाता है। घर में स्वस्तिक के प्रतीक को रांगोली के रूप में, या दीवारों पर सजावट के रूप में बनाना चाहिए। यह घर के प्रत्येक सदस्य के लिए सुख-शांति और समृद्धि लाता है। इसके अलावा, स्वस्तिक को घर में किसी भी स्थान पर फर्श या आंगन में बनाना शुभ माना जाता है, ताकि घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह हो। स्वस्तिक को सफाई से बनाएं स्वस्तिक का चिन्ह हमेशा साफ-सुथरी और स्वच्छ जगह पर बनाएं। यदि आपके पास स्वस्तिक बनाने के लिए रंगों का प्रयोग हो, तो उन रंगों का चयन भी शुद्ध और पवित्र होना चाहिए। इसे भी पढ़ें:- इन 3 दिनों तक बंद रहते हैं कपाट, बंटता है अनोखा प्रसाद! सर्वोत्तम शुभ मुहूर्त में स्वस्तिक बनाना स्वस्तिक का प्रतीक शुभ मुहूर्त में बनाना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। हिन्दू धर्म में विशेष दिनों का महत्व होता है, जैसे कि बुधवार, रविवार और अन्य विशेष तिथियां, जो स्वस्तिक के लिए सबसे उत्तम मानी जाती हैं। सर्वोत्तम सामग्रियों का चयन स्वस्तिक बनाते समय यदि आप स्वस्तिक को किसी वस्तु पर उकेर रहे हैं, तो सुनिश्चित करें कि वह वस्तु शुद्ध और पवित्र हो। उदाहरण स्वरूप, स्वस्तिक को लकड़ी, धातु, पत्थर, मिट्टी, या कागज पर उकेरा जा सकता है, लेकिन इसकी शुद्धता का ध्यान रखना चाहिए। स्वस्तिक के लाभ स्वस्तिक का प्रयोग करने से घर में शांति और सुख बढ़ता है। यह बुरे समय से बचने का उपाय भी माना जाता है और जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने में मदद करता है। जिन घरों में नियमित रूप से स्वस्तिक का प्रतीक लगाया जाता है, वहां नकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश नहीं होता और घर में स्थिरता बनी रहती है। स्वस्तिक का सही ढंग से उपयोग करने से घर में समृद्धि, ताजगी और शांति बनी रहती है। Latest News in Hindi Today Hindi news स्वस्तिक #SwastikSymbol #VastuTips #AuspiciousSigns #SpiritualSymbols #PositiveEnergy #HinduTraditions #GoodLuck #VedicWisdom #SacredSymbols #Prosperity

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Lakshmi's vahan,

उल्लू कैसे बना मां लक्ष्मी का वाहन: जानिए क्या है पौराणिक कहानी

हिंदू धर्म में देवी-देवताओं के वाहनों का विशेष महत्व है। ये वाहन न केवल देवताओं की शक्ति और प्रभाव को दर्शाते हैं, बल्कि उनके चरित्र और गुणों को भी प्रकट करते हैं। मां लक्ष्मी, (Maa Lakshmi) जो धन, समृद्धि और सौभाग्य की देवी हैं, उनका वाहन उल्लू (Owl) है। यह बात अक्सर लोगों को आश्चर्यचकित करती है कि आखिर उल्लू जैसा पक्षी मां लक्ष्मी का वाहन कैसे बन गया। इसके पीछे एक पौराणिक कथा और गहरा रहस्य छिपा है। आइए जानते हैं कि उल्लू कैसे मां लक्ष्मी का वाहन बना और इसका क्या महत्व है। उल्लू और मां लक्ष्मी की पौराणिक कथा पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार मां लक्ष्मी (Maa Lakshmi) ने यह निर्णय लिया कि वह अपने लिए एक वाहन चुनेंगी। उन्होंने सभी जानवरों को अपने पास आने का आमंत्रण दिया और यह शर्त रखी कि जो जानवर कार्तिक अमावस्या के दिन सबसे पहले उनके पास पहुंचेगा, वही उनका वाहन बनेगा। सभी जानवर इस अवसर का लाभ उठाने के लिए उत्सुक थे, क्योंकि मां लक्ष्मी का वाहन बनना एक बहुत बड़ा सम्मान था। कार्तिक अमावस्या के दिन, सभी जानवर मां लक्ष्मी के पास पहुंचने के लिए तैयार हो गए। गरुड़, हंस, सिंह, नंदी और अन्य जानवरों ने सोचा कि वे सबसे पहले पहुंचकर मां लक्ष्मी का वाहन बन जाएंगे। लेकिन उल्लू, जो अक्सर रात में ही सक्रिय रहता है, ने इस दिन एक अलग रणनीति बनाई। मां लक्ष्मी ने धरती पर एक उल्लू को देखा। उल्लू (Owl) रात के अंधेरे में भी अच्छी तरह देख सकता है और वह बहुत चालाक और बुद्धिमान भी होता है। तब से उल्लू मां लक्ष्मी का वाहन है और उनके साथ रहता है। उल्लू का महत्व और प्रतीकात्मकता उल्लू (Owl) को मां लक्ष्मी का वाहन बनाने के पीछे कई प्रतीकात्मक कारण हैं। उल्लू को बुद्धिमान और चालाक पक्षी माना जाता है। यह रात के अंधेरे में भी देख सकता है, जो अंधकार में प्रकाश की ओर ले जाने का प्रतीक है। मां लक्ष्मी धन और समृद्धि की देवी हैं और उनका उल्लू पर सवार होना यह दर्शाता है कि धन और समृद्धि को प्राप्त करने के लिए बुद्धिमत्ता और चालाकी की आवश्यकता होती है। उल्लू को अक्सर अंधविश्वास और डर का प्रतीक माना जाता है, लेकिन हिंदू धर्म में इसका विपरीत महत्व है। उल्लू मां लक्ष्मी (Maa Lakshmi) के साथ रहकर यह संदेश देता है कि धन और समृद्धि को प्राप्त करने के लिए अंधविश्वास से दूर रहना चाहिए और बुद्धिमत्ता से काम लेना चाहिए। उल्लू का मां लक्ष्मी का वाहन बनना यह भी दर्शाता है कि धन और समृद्धि को सही तरीके से प्रबंधित करने के लिए बुद्धिमत्ता और सतर्कता की आवश्यकता होती है। इसे भी पढ़ें:- कब से शुरू हो रहे हैं नवरात्र, जानें मां दुर्गा के आगमन का संकेत उल्लू की पूजा और महत्व हिंदू धर्म में उल्लू को मां लक्ष्मी (Maa Lakshmi का वाहन मानकर उसकी पूजा की जाती है। कई लोग मां लक्ष्मी की पूजा के दौरान उल्लू की मूर्ति या चित्र भी रखते हैं। मान्यता है कि उल्लू की पूजा करने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और धन और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। उल्लू की पूजा करने के लिए लोग उसकी मूर्ति या चित्र को मां लक्ष्मी के साथ स्थापित करते हैं और उसे फूल, अक्षत और मिठाई अर्पित करते हैं। उल्लू की पूजा करने से मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और घर में धन और समृद्धि का वास होता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Maa Lakshmi #MaaLakshmi #LakshmiVahan #UlluStory #HinduMythology #LakshmiPuran #WealthSymbol #MythologicalTales #HinduGods #SpiritualWisdom #ReligiousLegends

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Lord Hanuman Saturday Importance

Hanuman Chalisa for Shani Dosh : तो इसलिए होती है शनिवार को शनिदेव की जगह क्यों हनुमान जी की पूजा

शनिदेव (Shani Dev) को न्याय का देवता और कर्मफल का दाता माना जाता है। उनकी पूजा करने से व्यक्ति के जीवन से शनि के अशुभ प्रभाव दूर होते हैं और सुख-समृद्धि का आगमन होता है। लेकिन, शनिवार (Saturday) के दिन हनुमान जी (Hanuman Ji) की पूजा करने की भी परंपरा है। यह बात अक्सर लोगों के मन में सवाल उठाती है कि आखिर शनिवार को शनिदेव का दिन होने के बावजूद हनुमान जी की पूजा क्यों की जाती है? इसके पीछे धार्मिक मान्यताएं और पौराणिक कथाएं छिपी हैं। आइए जानते हैं कि शनिवार को हनुमान जी की पूजा क्यों की जाती है और इसका क्या महत्व है। हनुमान जी की पूजा का महत्व हनुमान जी (Hanuman Ji) को भगवान राम का परम भक्त और संकटमोचन माना जाता है। उनकी पूजा करने से व्यक्ति के सभी कष्ट दूर होते हैं और उसे शक्ति और साहस प्राप्त होता है। हनुमान जी की पूजा करने से न केवल शनिदेव (Shani Dev) के अशुभ प्रभाव दूर होते हैं, बल्कि व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि और शांति का आगमन भी होता है। शनिवार के दिन हनुमान जी की पूजा करने से शनिदेव की कृपा भी प्राप्त होती है और व्यक्ति को कर्मफल के अनुसार फल मिलता है। शनिवार को हनुमान जी की पूजा क्यों? शनिवार (Saturday) को हनुमान जी की पूजा करने के पीछे कई धार्मिक और पौराणिक कारण हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार लंकापति रावण ने शनिदेव (Shani Dev) को बंदी बना लिया था। जब हनुमान जी (Hanuman Ji) माता सीता की खोज में लंका पहुंचे, तो उनकी दृष्टि शनिदेव पर पड़ी, जिन्हें रावण ने अपने पैरों तले दबा रखा था। हनुमान जी ने उनसे पूछा कि वे इस स्थिति में कैसे पहुंचे, तो शनिदेव ने बताया कि रावण ने उन्हें बंदी बना लिया है। यह सुनकर हनुमान जी क्रोधित हो गए और लंका का दहन कर दिया, साथ ही शनिदेव को रावण के बंधन से मुक्त कराया। प्रसन्न होकर शनिदेव ने हनुमान जी को वचन दिया कि जो भी व्यक्ति विधि-विधान से उनकी पूजा करेगा, उसे शनिदोष से मुक्ति मिलेगी। हनुमान जी की पूजा विधि शनिवार (Saturday) के दिन हनुमान जी की पूजा करने के लिए सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। हनुमान जी की मूर्ति या चित्र को लाल कपड़े पर स्थापित करें और उन्हें सिंदूर, चंदन और फूलों से सजाएं। हनुमान जी को गुड़ और चना का भोग लगाएं और हनुमान चालीसा का पाठ करें। पूजा के बाद हनुमान जी की आरती करें और प्रसाद वितरित करें। इसे भी पढ़ें:- रविवार को सूर्य पूजा में पढ़ें यह कथा, मिलेगी सुख-समृद्धि शनिवार को हनुमान जी की पूजा का लाभ शनिवार (Saturday) के दिन हनुमान जी की पूजा करने से व्यक्ति को कई लाभ प्राप्त होते हैं। इस दिन हनुमान जी की पूजा करने से शनिदेव के अशुभ प्रभाव दूर होते हैं और व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि और शांति का आगमन होता है। हनुमान जी की पूजा करने से व्यक्ति को शक्ति और साहस प्राप्त होता है और उसके सभी कष्ट दूर होते हैं। शनिवार के दिन हनुमान जी की पूजा करने से व्यक्ति को शनिदेव (Shani Dev) की कृपा भी प्राप्त होती है और उसे कर्मफल के अनुसार फल मिलता है। Latest News in Hindi Today Hindi news Shani Dev Hanuman Ji #Shanidev #HanumanJayanti #SaturdayWorship #ShaniDosh #HanumanBlessings #SpiritualSaturday #ShaniPuja #HanumanBhakti #ShanivarVrat #DivineBlessings

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Creator of Universe

ब्रह्मा जी ने कैसे की सृष्टि की रचना? जानिए क्या है पौराणिक कहानी

हिंदू धर्म के अनुसार, सृष्टि (Universe) की रचना का रहस्य भगवान ब्रह्मा से जुड़ा हुआ है। ब्रह्मा को सृष्टि का रचयिता (Creator of Universe) माना जाता है और उन्हें त्रिदेवों में से एक का स्थान प्राप्त है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना कैसे की थी? इसके पीछे की कथा न केवल रोचक है, बल्कि गहन दार्शनिक अर्थों से भरी हुई है। आइए, इस पौराणिक कथा को विस्तार से जानते हैं। प्रारंभ: शून्य से सृष्टि का आरंभ हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में केवल अंधकार और शून्य था। न कोई आकाश था, न धरती, न ही कोई जीवित प्राणी। इस अवस्था को “प्रलय” कहा जाता है। प्रलय के बाद, जब सृष्टि का निर्माण होना था, तब परमात्मा ने अपने निराकार रूप से साकार रूप धारण किया और ब्रह्मा के रूप में प्रकट हुए। ब्रह्मा जी को सृष्टि की रचना का दायित्व सौंपा गया। ब्रह्मा जी का प्रकटन पुराणों के अनुसार, ब्रह्मा जी एक कमल के फूल से प्रकट हुए, जो भगवान विष्णु की नाभि से निकला था। इस कमल को “नाभि कमल” कहा जाता है। ब्रह्मा जी ने इस कमल पर बैठकर सृष्टि की रचना का कार्य प्रारंभ किया। यह कमल ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है और इससे जुड़ी कथा ब्रह्मा के प्रकटन की महत्ता को दर्शाती है। सृष्टि की रचना का प्रक्रिया ब्रह्मा जी (Lord Brahma) ने सृष्टि की रचना के लिए सबसे पहले पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) का निर्माण किया। इन तत्वों के संयोजन से उन्होंने ब्रह्मांड (Universe) की रचना की। इसके बाद, उन्होंने समय की गणना के लिए युगों और कालचक्र की रचना की। ब्रह्मा जी ने सृष्टि को व्यवस्थित करने के लिए दस प्रजापतियों का निर्माण किया, जिन्हें उनके मानस पुत्र भी कहा जाता है। इन प्रजापतियों में मरीचि, अत्रि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वशिष्ठ, प्रचेता, भृगु और नारद शामिल हैं। इन प्रजापतियों ने ब्रह्मा जी की सहायता से विभिन्न प्राणियों और जीवों की रचना की। इसे भी पढ़ें:- कब से शुरू हो रहे हैं नवरात्र, जानें मां दुर्गा के आगमन का संकेत मनुष्य की उत्पत्ति ब्रह्मा जी (Lord Brahma) ने मनुष्य की रचना के लिए अपने शरीर से दो शक्तियों को प्रकट किया। पहली शक्ति थी “स्वायंभुव मनु”, जो पहले मनुष्य थे, और दूसरी शक्ति थी “शतरूपा”, जो पहली स्त्री थीं। इन दोनों से ही मनुष्य जाति का विस्तार हुआ। स्वायंभुव मनु और शतरूपा को आदि मानव के रूप में जाना जाता है, जिनसे संपूर्ण मानव जाति की उत्पत्ति हुई। वेदों की रचना ब्रह्मा जी (Lord Brahma) ने सृष्टि की रचना के साथ-साथ ज्ञान और धर्म की नींव रखने के लिए वेदों की भी रचना की। वेदों को “अपौरुषेय” माना जाता है, यानी इनकी रचना किसी मनुष्य द्वारा नहीं की गई थी। ब्रह्मा जी ने वेदों के माध्यम से मनुष्यों को धर्म, कर्म और जीवन के मार्ग का ज्ञान दिया। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद यह चार वेद हैं, जो ब्रह्मा जी द्वारा प्रकट किए गए। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Universe #BrahmaCreation #HinduMythology #UniverseCreation #PuranicStories #VedicWisdom #SanatanDharma #DivineCreation #IndianMythology #BrahmaPuran #HinduBeliefs

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Importance of Taraweeh in Ramadan

रमजान में तरावीह नमाज का क्या है महत्व: जानिए क्यों है यह इबादत खास

रमजान (Ramadan) का पवित्र महीना मुसलमानों के लिए इबादत, रहमत और मगफिरत का समय होता है। यह महीना न केवल रोजे रखने का होता है, बल्कि इसमें नमाज, कुरान तिलावत और दूसरे इबादतों का विशेष महत्व होता है। रमजान के दौरान तरावीह की नमाज का विशेष स्थान है। यह नमाज रमजान की रातों में पढ़ी जाती है और इसे पूरे महीने नियमित रूप से अदा किया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि तरावीह की नमाज क्यों पढ़ी जाती है और इसका क्या महत्व है? आइए, इसके बारे में जानते हैं। रमजान: इस्लाम का पवित्र महीना इस्लाम धर्म में रमजान (Ramadan) का महीना बेहद पवित्र माना जाता है। इस दौरान लोग रोजा रखते हैं और खुदा की इबादत करते हैं। भारत में इस साल रमजान 2 मार्च से शुरू हो चुका है। इस्लामी कैलेंडर के अनुसार, रमजान साल का नौवां महीना होता है, जिसे खास महत्व दिया जाता है। पूरे महीने रोजे रखे जाते हैं, और जब शव्वाल के महीने का चांद नजर आता है, तो पहली तारीख को ईद-उल-फितर का त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है। रमजान के दौरान किए गए अच्छे कामों का 70 गुना ज्यादा सवाब (पुण्य) मिलता है। इस महीने हर मुस्लिम को पांच वक्त की नमाज पढ़नी जरूरी होती है, लेकिन इसके अलावा तरावीह की नमाज भी पढ़ना सुन्नत माना जाता है। यह नमाज ईशा के बाद और वित्र से पहले पढ़ी जाती है। तरावीह की नमाज से अल्लाह के प्रति आस्था और गहरी होती है, जिससे व्यक्ति को अधिक सवाब मिलता है। तरावीह नमाज क्या है? तरावीह (Taraweeh) शब्द अरबी भाषा के शब्द “तरवीह” से लिया गया है, जिसका अर्थ है “आराम करना” या “विश्राम करना”। यह नमाज रमजान के महीने में रात के समय पढ़ी जाती है और इसमें लंबी किरात (कुरान की आयतें पढ़ना) के बाद छोटे-छोटे विराम लिए जाते हैं। तरावीह की नमाज ईशा की नमाज के बाद पढ़ी जाती है और इसमें आमतौर पर 8 या 20 रकात होती हैं। यह नमाज जमात के साथ मस्जिद में पढ़ी जाती है, हालांकि इसे अकेले भी पढ़ा जा सकता है। रमजान में तरावीह पढ़ना क्यों जरूरी है? मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना कारी इसहाक गोरा ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि रमजान (Ramadan) मुसलमानों के लिए बेहद पवित्र महीना है, जिसकी महिमा कुरान और हदीसों में वर्णित है। इस महीने में किए गए हर नेक काम का सवाब (पुण्य) 70 गुना बढ़ा दिया जाता है। रमजान के दौरान रोजे रखना हर बालिग मुसलमान के लिए अनिवार्य (फर्ज) माना गया है। जहां तक नमाज की बात है, तो रमजान में भी उतनी ही नमाज पढ़ी जाती है, जितनी आम दिनों में पढ़ी जाती है। नमाज हर मुसलमान पर फर्ज होती है, और इसे छोड़ने पर गुनाह माना जाता है। इसे भी पढ़ें:- कब से शुरू हो रहे हैं नवरात्र, जानें मां दुर्गा के आगमन का संकेत नमाज से पहले तरावीह पढ़ना क्यों जरूरी है? रमजान (Ramadan) के दौरान नमाज के साथ एक खास इबादत जुड़ जाती है, जिसे तरावीह कहा जाता है। यह नमाज ईशा के बाद और वित्र से पहले अदा की जाती है। इसे विभिन्न इस्लामी परंपराओं में सुन्नत-ए-मुवक्किदा माना गया है, यानी इसे पढ़ना बेहद जरूरी है, और अधिकतर इस्लामी विद्वान भी इस पर सहमत हैं। रमजान का महीना पवित्र होता है, और इस दौरान किए गए हर अच्छे काम का सवाब 70 गुना बढ़ा दिया जाता है। इस महीने लोग दान (जकात) देते हैं, जिससे जरूरतमंदों की मदद की जा सके। रमजान की आध्यात्मिकता (रूहानियत) इतनी गहरी होती है कि इसका प्रभाव अन्य धर्मों के लोगों पर भी पड़ता है। जो लोग तरावीह नहीं पढ़ते, उनके बारे में अलग-अलग विचार हैं, लेकिन इस्लाम में जो चीज फर्ज कर दी गई है, उसे पूरा करना जरूरी होता है। इसे न मानने पर व्यक्ति गुनहगार माना जाता है। तरावीह नमाज कैसे पढ़ें? तरावीह (Taraweeh) की नमाज ईशा की नमाज के बाद पढ़ी जाती है। इसमें हर दो रकात के बाद थोड़ा विराम लिया जाता है, जिसमें तस्बीह, दुआ या कुरान की तिलावत की जा सकती है। तरावीह की नमाज को 8 या 20 रकात के रूप में पढ़ा जा सकता है, जो अलग-अलग मसलक (सुन्नी, हनफी, शाफई आदि) के अनुसार भिन्न हो सकता है। Latest News in Hindi Today Hindi news Ramadan #Ramadan2025 #Taraweeh #IslamicPrayer #RamadanBlessings #NightPrayers #RamadanWorship #QuranRecitation #Spirituality #RamadanSpecial #MuslimFaith

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Holi Hindu Festival

होली 2025: इस साल होली के दिन लगेगा चंद्र ग्रहण, जानें इसका आपके जीवन पर क्या होगा प्रभाव

होली (Holi) का त्योहार रंगों, उत्साह और खुशियों का प्रतीक माना जाता है। यह त्योहार हर साल फाल्गुन माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। लेकिन इस साल होली (Holi) का त्योहार एक दुर्लभ खगोलीय घटना के साथ मनाया जाएगा। 14 मार्च 2025 को होली के दिन चंद्र ग्रहण (Lunar Eclipse) लगेगा, जो इस त्योहार को और भी खास बना देगा। चंद्र ग्रहण का यह संयोग कई लोगों के मन में सवाल उठा रहा है कि इसका हमारे जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा? आइए जानते हैं कि होली पर चंद्र ग्रहण का क्या महत्व है और इसका हमारे जीवन पर क्या असर हो सकता है। चंद्र ग्रहण क्या है और क्यों लगता है? चंद्र ग्रहण (Lunar Eclipse) एक खगोलीय घटना है, जो तब होती है जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा (Moon) के बीच आ जाती है। इस स्थिति में पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है, जिससे चंद्रमा का प्रकाश कुछ समय के लिए मंद पड़ जाता है। चंद्रग्रहण का ज्योतिषीय, धार्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसका कारण राहु-केतु को माना जाता है। ज्योतिष के अनुसार, यह ग्रहण केतु के प्रभाव से लगेगा। राहु और केतु को सांप के समान माना जाता है, जिनके डसने से ग्रहण होता है। कुछ मान्यताओं के अनुसार, जब राहु और केतु चंद्रमा को ग्रसने का प्रयास करते हैं, तब चंद्रग्रहण घटित होता है। चंद्र ग्रहण (Lunar Eclipse) तीन प्रकार के होते हैं: पूर्ण चंद्र ग्रहण, आंशिक चंद्र ग्रहण और उपच्छाया चंद्र ग्रहण। 14 मार्च 2025 को लगने वाला चंद्र ग्रहण एक पूर्ण चंद्र ग्रहण होगा, जिसमें चंद्रमा (Moon) पूरी तरह से पृथ्वी की छाया में छिप जाएगा। होली और चंद्र ग्रहण का संयोग भारत में इस वर्ष होलिका दहन 13 मार्च को और होली का उत्सव 14 मार्च को मनाया जाएगा। इसी दिन साल का पहला चंद्र ग्रहण (Lunar Eclipse) भी लगेगा। हालांकि, चूंकि यह ग्रहण भारत में दिन के समय पड़ेगा, इसलिए यह यहां दिखाई नहीं देगा। ग्रहण नजर न आने के कारण इसका कोई धार्मिक प्रभाव नहीं होगा, और होली (Holi) के त्योहार पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। इसे भी पढ़ें:- कब से शुरू हो रहे हैं नवरात्र, जानें मां दुर्गा के आगमन का संकेत क्या भारत में सूतक रहेगा इस वर्ष होली के दिन, 14 मार्च को आंशिक चंद्र ग्रहण लगेगा। भारतीय समयानुसार, उपछाया ग्रहण सुबह 9:27 बजे शुरू होगा, जबकि आंशिक ग्रहण 10:39 बजे प्रारंभ होकर 11:56 बजे समाप्त हो जाएगा। चूंकि ग्रहण दिन के समय पड़ेगा, इसलिए यह भारत में दिखाई नहीं देगा और इसका कोई प्रभाव भी नहीं पड़ेगा। हालांकि, इसका असर मुख्य रूप से ऑस्ट्रेलिया, अंटार्कटिका, यूरोप के कई क्षेत्रों, उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका, तथा अफ्रीका के बड़े हिस्सों में देखा जाएगा। राशि पर क्या होगा असर वैज्ञानिक दृष्टि से चंद्रग्रहण एक खगोलीय घटना है, जो तब घटित होती है जब सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक सीधी रेखा में आते हैं। इस स्थिति में पृथ्वी सूर्य के प्रकाश को चंद्रमा तक पहुंचने से रोक देती है, जिससे चंद्रग्रहण होता है। 14 मार्च को लगने वाला यह चंद्रग्रहण कन्या राशि में होगा, इसलिए इस राशि के जातकों को विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए, क्योंकि यह ग्रहण उनके लिए अशुभ प्रभाव ला सकता है। ग्रहण के समय चंद्रमा सिंह राशि में स्थित रहेगा, जबकि सूर्य और शनि चंद्रमा के सातवें भाव में रहकर उस पर पूर्ण सप्तम दृष्टि डालेंगे, जिससे इसका प्रभाव और अधिक तीव्र होगा। केतु चंद्रमा (Moon) के द्वितीय भाव में रहेगा, जिससे मानसिक तनाव की स्थिति बन सकती है। वहीं, राहु, बुध और शुक्र चंद्रमा के आठवें भाव में स्थित होंगे, जिससे कुछ राशियों पर मिश्रित प्रभाव पड़ेगा। दूसरी ओर, गुरु ग्रह (बृहस्पति) चंद्रमा के दशम भाव में रहेगा, जिससे धार्मिक और आध्यात्मिक प्रवृत्तियों में वृद्धि होगी। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Lunar Eclipse #Holi2025 #LunarEclipse2025 #HoliFestival #ChandraGrahan #HoliImpact #HoliCelebration #Astrology2025 #HinduFestival #SpiritualEffects #FestivalVibes

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Ramadan 2025 timetable

रमजान 2025 सेहरी-इफ्तार टाइम टेबल: जानिए 30 दिन के रोजों का सही समय

रमजान (Ramadan) का पवित्र महीना मुस्लिम समुदाय के लिए आध्यात्मिकता, इबादत और संयम का समय होता है। यह महीना इस्लामिक कैलेंडर के नौवें महीने के रूप में मनाया जाता है और इसमें रोजे (उपवास) रखने का विशेष महत्व होता है। रोजे के दौरान सहरी (सुबह का भोजन) और इफ्तार (शाम का भोजन) का समय निर्धारित होता है, जो सूर्योदय और सूर्यास्त के अनुसार तय किया जाता है। 2025 के रमजान महीने के लिए सहरी (Sehri) और इफ्तार (Iftar) का टाइम टेबल जारी किया गया है, जो मुस्लिम समुदाय के लिए रोजे रखने में मददगार साबित होगा। आइए, इस टाइम टेबल और रमजान के महत्व के बारे में विस्तार से जानते हैं। रमजान का महत्व रमजान (Ramadan) इस्लाम धर्म का सबसे पवित्र महीना माना जाता है। इस महीने में मुस्लिम समुदाय के लोग रोजे रखते हैं, जिसमें सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक खाने-पीने और अन्य शारीरिक इच्छाओं से परहेज किया जाता है। रोजे का मुख्य उद्देश्य आत्म-नियंत्रण, संयम और ईश्वर के प्रति समर्पण को बढ़ाना है। इसके अलावा, रमजान के दौरान कुरान का पाठ, नमाज और दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है। सेहरी और इफ्तार का समय रोजे के दौरान सेहरी (Sehri) और इफ्तार (Iftar) का समय निर्धारित होता है। सेहरी सूर्योदय से पहले किया जाने वाला भोजन है, जिसे फज्र की नमाज से पहले खाया जाता है। इफ्तार सूर्यास्त के बाद किया जाने वाला भोजन है, जिसे मगरिब की नमाज से पहले खाया जाता है। सेहरी और इफ्तार का समय स्थान और सूर्योदय-सूर्यास्त के समय के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। रमजान 2025 का सेहरी-इफ्तार टाइम टेबल 2025 में रमजान का महीना से 02 मार्च से मनाया जाएगा।  रोजा तारीख सेहरी इफ्तार 1 02 मार्च, रविवार सुबह 05:15 बजे शाम 06:34 बजे 2 03 मार्च, सोमवार सुबह 05:14 बजे शाम 06:34 बजे 3 04 मार्च, मंगलवार सुबह 05:13 बजे शाम 06:35 बजे 4 05 मार्च, बुधवार सुबह 05:12 बजे शाम 06:35 बजे 5 06 मार्च, गुरुवार सुबह 05:11 बजे शाम 06:36 बजे 6 07 मार्च, शुक्रवार सुबह 05:10 बजे शाम 06:37 बजे 7 08 मार्च, शनिवार सुबह 05:09 बजे शाम 06:37 बजे 8 09 मार्च, रविवार सुबह 05:08 बजे शाम 06:38 बजे 9 10 मार्च, सोमवार सुबह 05:07 बजे शाम 06:38 बजे 10 11 मार्च, मंगलवार सुबह 05:06 बजे शाम 06:39 बजे 11 12 मार्च, बुधवार सुबह 05:05 बजे शाम 06:40 बजे 12 13 मार्च, गुरुवार सुबह 05:03 बजे शाम 06:40 बजे 13 14 मार्च, शुक्रवार सुबह 05:02 बजे शाम 06:41 बजे 14 15 मार्च, शनिवार सुबह 05:01 बजे शाम 06:41 बजे 15 16 मार्च, रविवार सुबह 05:00 बजे शाम 06:42 बजे 16 17 मार्च, सोमवार सुबह 04:59 बजे शाम 06:43 बजे 17 18 मार्च, मंगलवार सुबह 04:57 बजे शाम 06:43 बजे 18 19 मार्च, बुधवार सुबह 04:56 बजे शाम 06:44 बजे 19 20 मार्च, गुरुवार सुबह 04:55 बजे शाम 06:44 बजे 20 21 मार्च, शुक्रवार सुबह 04:54 बजे शाम 06:45 बजे 21 22 मार्च, शनिवार सुबह 04:53 बजे शाम 06:45 बजे 22 23 मार्च, रविवार सुबह 04:51 बजे शाम 06:46 बजे 23 24 मार्च, सोमवार सुबह 04:50 बजे शाम 06:46 बजे 24 25 मार्च, मंगलवार सुबह 04:49 बजे शाम 06:47 बजे 25 26 मार्च, बुधवार सुबह 04:48 बजे शाम 06:48 बजे 26 27 मार्च, गुरुवार सुबह 04:46 बजे शाम 06:48 बजे 27 28 मार्च, शुक्रवार सुबह 04:45 बजे शाम 06:49 बजे 28 29 मार्च, शनिवार सुबह 04:44 बजे शाम 06:49 बजे 29 30 मार्च, रविवार सुबह 04:43 बजे शाम 06:50 बजे 30 31 मार्च, सोमवार सुबह 04:41 बजे शाम 06:50 बजे इसे भी पढ़ें:- कब से शुरू हो रहे हैं नवरात्र, जानें मां दुर्गा के आगमन का संकेत रमजान के 30 दिनों का महत्व रमजान (Ramadan) के 30 दिनों का हर दिन विशेष महत्व रखता है। पहले 10 दिन रहमत (दया) के, अगले 10 दिन मगफिरत (क्षमा) के और अंतिम 10 दिन नजात (मुक्ति) के माने जाते हैं। रमजान के आखिरी 10 दिनों में लैलतुल कद्र (शब-ए-कद्र) का विशेष महत्व होता है, जिसे हजार महीनों से बेहतर माना जाता है। Latest News in Hindi Today Hindi news हिंदी समाचार Ramadan #Ramadan2025 #SehriIftarTimeTable #FastingTimings #RamadanSchedule #IslamicCalendar #SehriTime #IftarTime #RamadanMubarak #HolyMonth #FastingTips #RamadanPreparation #IndianMuslims #SpiritualJourney #RamadanGuidance #IslamicFaith #RamadanTimetable #SehriIftar

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