Lord Vishnu Sheshnag

शांत मुद्रा में शेषनाग पर क्यों विराजते हैं भगवान विष्णु? जानिए क्षीर सागर से जुड़े गहरे रहस्य

हिंदू धर्म में भगवान विष्णु (Lord Vishnu) को संहार नहीं, बल्कि सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में पूजा जाता है। उन्हें ‘श्री हरि’ कहा जाता है, जो संसार की रक्षा करते हैं, अधर्म का विनाश करते हैं और धर्म की स्थापना करते हैं। लेकिन एक बात जो हमेशा लोगों को आकर्षित करती है, वह है भगवान विष्णु की क्षीर सागर में शेषनाग पर विश्राम मुद्रा में स्थिति। आखिर भगवान विष्णु सदैव एक शांत मुद्रा में शेषनाग की शैय्या पर क्यों विराजमान रहते हैं? और उन्हें श्री हरि (Shree Hari) क्यों कहा जाता है? इन सवालों के उत्तर हमें पौराणिक कथाओं और शास्त्रों में मिलते हैं।  क्षीर सागर और शेषनाग का प्रतीकात्मक अर्थ आपने कई बार भगवान विष्णु (Shree Hari) को चित्रों या मूर्तियों में शेषनाग की शैय्या पर अत्यंत शांत और सहज मुद्रा में विश्राम करते हुए देखा होगा। यह दृश्य मन में यह प्रश्न जरूर उत्पन्न करता है कि आखिर भगवान विष्णु ने विश्राम के लिए शेषनाग जैसे भयंकर नाग को ही क्यों चुना? इसके पीछे एक गहन प्रतीकात्मक अर्थ छिपा है। दरअसल, भगवान विष्णु सृष्टि के पालनकर्ता हैं और शेषनाग को ‘काल’ यानी समय का प्रतीक माना जाता है। विष्णु जी का शेषनाग पर विश्राम करना इस बात का संकेत है कि उन्होंने काल यानी समय पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया है। यह दृश्य सृष्टि के सभी प्राणियों को यह संदेश देता है कि यदि व्यक्ति संतुलन, धैर्य और आत्मबल के साथ जीवन को जिए, तो वह समय और परिस्थितियों पर विजय प्राप्त कर सकता है। नारायण क्यों करते हैं शेषनाग पर विश्राम? जानिए इसका आध्यात्मिक अर्थ भगवान विष्णु (Lord Vishnu) को अक्सर शेषनाग की शैय्या पर क्षीर सागर में विश्राम करते हुए दर्शाया जाता है। उनका यह शांत रूप गहरी आध्यात्मिक सीख देता है। यह चित्र हमें कठिन समय में धैर्य, संतुलन और आत्म-नियंत्रण बनाए रखने की प्रेरणा देता है। क्षीर सागर को सुख और शांति का प्रतीक माना गया है, जबकि शेषनाग ‘काल’ का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में विष्णु का यह रूप यह संदेश देता है कि चाहे जीवन में कितनी भी समस्याएं, पीड़ा या भय हो, एक व्यक्ति को समय और परिस्थितियों से ऊपर उठकर संतुलित और शांत रहना चाहिए। इसे भी पढ़ें: सत्तू शरबत: शरीर को मजबूत और स्वस्थ बनाने में फायदेमंद है यह देसी टॉनिक  इंसान को धैर्य और आत्मबल के साथ हर मुश्किल का करना चाहिए सामना  जिस प्रकार भगवान विष्णु पर सृष्टि के पालन की जिम्मेदारी है, उसी प्रकार हर मनुष्य भी अपने कर्तव्यों और दायित्वों से जुड़ा होता है। जीवन में उतार-चढ़ाव, समस्याएं और संघर्ष आना स्वाभाविक है, लेकिन इनसे टूटना नहीं चाहिए। भगवान विष्णु की तरह, जो विषम परिस्थितियों में भी शेषनाग की विषैली शैय्या पर स्थिर और शांत रहते हैं, उसी प्रकार एक इंसान को भी धैर्य और आत्मबल के साथ हर मुश्किल का सामना करना चाहिए। श्री हरि (Shree Hari) का यह रूप हमें यह सिखाता है कि विषम स्थितियों में घबराने या विचलित होने की बजाय, शांत चित्त और सकारात्मक दृष्टिकोण से परिस्थितियों का सामना करना ही सच्चा धर्म है। उनका यह दिव्य स्वरूप हर व्यक्ति के लिए एक प्रेरणा है कि जीवन की जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी मन को स्थिर और शांत रखा जा सकता है। भगवान विष्णु को ‘श्री हरि’ क्यों कहा जाता है? ‘हरि’ (Shree Hari) शब्द का अर्थ होता है हर लेने वाला – विशेषतः दुख, भय और अज्ञान को हरने वाला। भगवान विष्णु को ‘श्री हरि’ कहने के पीछे यह मान्यता है कि वे अपने भक्तों के पापों को हर लेते हैं और उन्हें मोक्ष की ओर ले जाते हैं। साथ ही ‘श्री’ शब्द माता लक्ष्मी का सूचक है, जो भगवान विष्णु की पत्नी हैं। अतः ‘श्री हरि’ नाम यह दर्शाता है कि वे लक्ष्मीपति हैं और संसार की सुख-समृद्धि के दाता भी। Latest News in Hindi Today Hindi news Shree Hari #LordVishnu #Sheshnag #KshiraSagar #HinduMythology #SpiritualSecrets #DivinePose

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Lord Kuber

कैसे बने भगवान कुबेर धन के देवता? जानिए शिव से मिले अद्भुत वरदान की कथा

भगवान कुबेर न केवल देवताओं के कोषाध्यक्ष हैं बल्कि वे समृद्धि, वैभव और धन के प्रतीक भी माने जाते हैं। जानिए कैसे घोर तपस्या के बाद शिवजी से उन्हें यह दिव्य पद और सम्मान प्राप्त हुआ। हिंदू धर्म में धन, वैभव और समृद्धि के प्रतीक माने जाने वाले भगवान कुबेर न केवल देवताओं के कोषाध्यक्ष हैं, बल्कि स्वर्ग के खजाने के रक्षक भी हैं। उन्हें लोकसभा और वैश्विक स्तर पर भी “गॉड ऑफ वेल्थ” (धन के देवता) के रूप में पूजा जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि वे कैसे धन के देवता बने और उन्हें यह पद कैसे प्राप्त हुआ? इस लेख में हम जानेंगे भगवान कुबेर की पौराणिक कथा, उनका जन्म, शिव से प्राप्त वरदान और धार्मिक महत्ता। कुबेर का जन्म और वंश भगवान कुबेर (Lord Kuber) का उल्लेख स्कंद पुराण में मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उनका जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। हालांकि उनमें एक दोष था, उन्हें चोरी करने की आदत थी, और उस वजह से उनके पिता को इस बात का पता चला, तो उन्होंने कुबेर को घर से निकाल दिया। कुबेर भटकते हुए एक शिव मंदिर पहुंचे, जहां उन्होंने एक पुजारी को सोते देखा और प्रसाद चुराने का निश्चय किया। चोरी करते समय पुजारी को न जगाने और दीपक को बुझने से बचाने के लिए उन्होंने दीपक के सामने अपना अंगोछा फैला दिया। फिर भी वह पकड़े गए, हाथापाई हुई और उनकी मृत्यु हो गई। मृत्यु के पश्चात यमदूत उन्हें ले जा रहे थे, लेकिन मार्ग में भगवान शिव के गण भी पहुंच गए। उन्होंने कुबेर को शिवजी के समक्ष प्रस्तुत किया। भगवान शिव को यह प्रतीत हुआ कि कुबेर ने चोरी करते हुए भी दीपक की लौ को बचाने का प्रयास किया था, जिससे उनकी भक्ति झलकती थी। महादेव इस भाव से प्रसन्न हुए और उन्होंने कुबेर को ‘धन के देवता’ का पद प्रदान किया। तभी से भगवान कुबेर को समृद्धि और धन के अधिपति के रूप में पूजा जाता है। रामायण में उल्लिखित रामायण में वर्णित एक कथा के अनुसार, भगवान कुबेर (Lord Kuber) ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए हिमालय में कठोर तपस्या की थी। इस तप के दौरान शिवजी के साथ माता पार्वती भी प्रकट हुईं। जब कुबेर ने पार्वती जी को अपनी बाईं आंख से देखा, तो उनके दिव्य तेज के प्रभाव से उनकी वह आंख जलकर पीली हो गई। इसके बाद कुबेर ने एक अन्य स्थान पर जाकर पुनः तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा कि तुम्हारी तपस्या ने मुझे अत्यंत प्रसन्न किया है। इसलिए अब से तुम एकाक्षी पिंगल के नाम से प्रसिद्ध होगे, जिसका अर्थ है, एक आंख वाला और पीले नेत्रों वाला। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय धार्मिक महत्ता और पूजा हिंदू धर्म में भगवान कुबेर (Lord Kuber) की पूजा विशेष रूप से धनतेरस, दीपावली, अक्षय तृतीया, और नववर्ष जैसे अवसरों पर की जाती है। विशेष रूप से व्यापारी वर्ग और धन-संपत्ति की इच्छा रखने वाले लोग कुबेर की आराधना करते हैं। वास्तु शास्त्र के अनुसार, धन के देवता कुबेर की प्रतिमा को घर की उत्तर दिशा में स्थापित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसा करने से न केवल भगवान कुबेर की कृपा प्राप्त होती है, बल्कि मां लक्ष्मी का आशीर्वाद भी घर में बना रहता है और समृद्धि में वृद्धि होती है। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Kuber #lordkuber #godofwealth #shivablessing #hindumythology #wealthgod #kuberstory #divineboon #spiritualstory

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Is West-Facing Kitchen Good

क्या पश्चिम दिशा में किचन बनाना सही है? जानें वास्तु शास्त्र की राय और उपाय

भारतीय वास्तु शास्त्र में घर की दिशा और वास्तु का विशेष महत्व होता है। जिस प्रकार घर में मुख्य द्वार, पूजा स्थान या शयनकक्ष के लिए दिशाओं का ध्यान रखना जरूरी होता है, उसी तरह रसोईघर (किचन) की दिशा भी जीवन पर प्रभाव डालती है। अक्सर लोग यह जानना चाहते हैं कि पश्चिम दिशा में रसोई बनाना शुभ होता है या अशुभ? आइए इस लेख में जानते हैं इस विषय पर विस्तृत जानकारी, पौराणिक मान्यताओं और वास्तु विशेषज्ञों की सलाह।  क्या कहता है वास्तु शास्त्र?  वास्तु शास्त्र के अनुसार रसोईघर यानी किचन अग्नि तत्व से जुड़ा होता है, इसलिए इसे आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व दिशा) में बनाना सबसे उत्तम माना गया है। अग्नि देवता का संबंध दक्षिण-पूर्व से है और यह दिशा ऊर्जा, उत्साह और स्वास्थ्य का प्रतीक मानी जाती है। लेकिन आधुनिक समय में ज़मीन की स्थिति या घर के नक्शे के अनुसार सभी के लिए यह दिशा उपलब्ध हो पाना संभव नहीं होता। पश्चिम दिशा में रसोई का निर्माण शुभ है या अशुभ, यह जानना हर गृहिणी के लिए जरूरी है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि रसोई पश्चिम दिशा में बनी हो तो क्या यह अशुभ है? पश्चिम दिशा में रसोई: शुभ या अशुभ? वास्तु शास्त्र के अनुसार, रसोईघर के लिए सबसे उपयुक्त स्थान आग्नेय कोण यानी दक्षिण-पूर्व दिशा मानी जाती है, क्योंकि यह दिशा शुक्र ग्रह की होती है, जो सुख, समृद्धि और स्वास्थ्य का कारक है। यदि किसी कारणवश रसोई इस दिशा में नहीं बनाई जा सकती, तो पूर्व दिशा भी एक विकल्प हो सकती है। लेकिन यदि रसोई पश्चिम दिशा में है, तो इसे वास्तु की दृष्टि से अनुकूल नहीं माना जाता। पश्चिम दिशा में किचन होने से घर में लगातार बीमारियों, तनाव, गृह कलह और दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ सकती है। चूंकि रसोई अग्नि तत्व से जुड़ी होती है और पश्चिम दिशा इससे मेल नहीं खाती, इसलिए यह स्थिति घर की ऊर्जा को असंतुलित कर सकती है और अशुभ प्रभाव ला सकती है। पश्चिम दिशा में किचन है तो ये उपाय अपनाएं वास्तु दोष होने पर क्या करें उपाय? यदि आपके घर में किचन पश्चिम दिशा में है और आप दिशा बदलना संभव नहीं समझते, तो वास्तु विशेषज्ञ कुछ सरल उपायों से नकारात्मकता को कम करने की सलाह देते हैं: चूल्हा इस प्रकार लगाएं कि खाना बनाते समय मुंह पूर्व दिशा की ओर हो। यदि यह संभव न हो, तो उत्तर दिशा की ओर भी किया जा सकता है। पश्चिम दिशा में किचन हो तो दीवारों का रंग हल्का पीला, क्रीम या संतरी (ऑरेंज) रखें। ये रंग ऊर्जा को संतुलित करने में मदद करते हैं। नियमित रूप से किचन में गौ धूप, कपूर या हवन सामग्री जलाएं। इससे नकारात्मक ऊर्जा कम होती है। किचन के उत्तर-पूर्व कोने में तांबे का बर्तन रखें। यह ऊर्जा का संतुलन बनाए रखने में सहायक होता है। किचन की पूर्वी दीवार पर भगवान अन्नपूर्णा माता या श्री गणेश जी की तस्वीर लगाएं। रसोई में नियमित सफाई और पर्याप्त वेंटीलेशन जरूरी है। किचन में एक छोटा सा पौधा भी सकारात्मक ऊर्जा देता है। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय पश्चिम दिशा में रसोई: क्या कहा गया है शास्त्रों में? वास्तु शास्त्र में किसी भी दिशा को पूर्णत: निषेध नहीं किया गया है। हर दिशा में जीवन और प्रकृति के तत्वों का सामंजस्य होता है। यदि उस दिशा में रसोई बनती है, तो उसमें कुछ सावधानियों और उपचारों से वास्तु दोष को नियंत्रित किया जा सकता है। पश्चिम दिशा को यम की दिशा भी माना जाता है, परंतु यदि उसका सही उपयोग किया जाए, तो यह दिशा भी समृद्धि का स्रोत बन सकती है। Latest News in Hindi Today Hindi news उत्तर-पूर्व दिशा #vastu #kitchenvastu #westfacingkitchen #vastutips #vasturemedies #homeenergy #positivevibes

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Blood Goddess

जब देश की हर महिला थी खून की कमी से जूझती, तब प्रकट हुईं रहस्यमयी रक्तदेवी

भारतवर्ष में देवी-देवताओं की कहानियां सिर्फ आस्था नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति के गहरे संकेत भी देती हैं। एक ऐसी ही रहस्यमयी कथा जुड़ी है उस देवी से, जो तब प्रकट हुईं जब देश की अधिकांश महिलाएं “खून की कमी” यानी एनीमिया जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं। कहा जाता है कि इस देवी का प्राकट्य न केवल आध्यात्मिक रूप से चमत्कारी था, बल्कि सामाजिक और स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी क्रांतिकारी। अस्सी के दशक तक शुक्रवार का दिन खास तौर पर महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता था, क्योंकि उस समय यह दिन संतोषी माता की पूजा का था। शुक्रवार को महिलाएं पूरे विश्वास और श्रद्धा के साथ व्रत रखती, संतोषी माता की कथा सुनतीं और गुड़ चना का प्रसाद चढ़ाती थीं। व्रत खोलने से पहले प्रसाद को बड़े मन से ग्रहण किया जाता था और पूरे दिन घर में कोई भी झगड़ा या विवाद नहीं होता था। यह परंपरा पूरी श्रद्धा और अनुशासन के साथ निभाई जाती थी। धार्मिक आस्था में तर्क और विज्ञान की जगह नहीं होती संतोषी माता (Santoshi Mata) का उल्लेख किसी भी प्राचीन पुराण में नहीं मिलता, न ही वेदों में उनका नाम आता है, क्योंकि वेदों में केवल कुछ मुख्य देवताओं का ही वर्णन है। संतोषी माता का प्रचार-प्रसार करीब 1960 के दशक के मध्य से शुरू हुआ था। माना जाता है कि यह पूजा खासकर हिंदी भाषी प्रदेशों में किसी स्थानीय देवी की पूजा से प्रेरित हो सकती है। कुछ लोगों का कहना है कि संतोषी माता का यह उत्सव पश्चिम बंगाल से आया होगा, लेकिन बंगाली पूजा में आमतौर पर भव्य और रसयुक्त व्यंजन चढ़ाए जाते हैं, इसलिए गुड़ चना जैसे सादे प्रसाद का चढ़ावा वहां कम माना जाता है। धार्मिक आस्था में तर्क और विज्ञान की जगह नहीं होती, इसलिए इस सरल और सस्ते प्रसाद को भी इसकी विशेषता के रूप में देखा जाता है। बनी ‘रक्तदेवी’ की मंदिर कुछ लोग यह कहते हैं कि उस समय देश की औसत महिलाओं में खून में आयरन की कमी एक सामान्य समस्या थी, जिसे समाज ने स्वीकार भी किया था। उस दौर में हालात और भी खराब थे क्योंकि महिलाएं पहले अपने पूरे परिवार को खाना खिलाती थीं और खुद के लिए खाने को एक तरह से आशीर्वाद मानती थीं। जो लोग धर्म और विज्ञान को जोड़कर देखते हैं, उनका कहना है कि आयरन बढ़ाने के लिए आज भी गुड़ और चना से बेहतर प्राकृतिक उपाय कोई नहीं हो सकता। इसी कारण से संतोषी माता (Santoshi Mata) की पूजा और उनका प्रचार तेजी से बढ़ा। संतोषी माता से वैष्णो देवी तक: धार्मिक आस्था का बदलता रूप हम ऐसे देश के निवासी हैं जहाँ देवी-देवताओं पर आस्था के लिए किसी तर्क की जरूरत नहीं होती। जैसे ही कहीं यह खबर फैलती है कि किसी मूर्ति ने दूध पिया है, पूरा देश इसे आजमाने लगता है और हर कोई दावा करता है कि उसने भी वही किया है, यह हम सबने कई बार देखा है। देश में संतोषी माता (Santoshi Mata) की पूजा का प्रचार जबरदस्त हुआ। करीब 50 साल पहले, 30 मई 1975 को ‘जय संतोषी माता’ नामक फिल्म रिलीज हुई, जिसका बजट लगभग 5 से 12 लाख रुपये था। यह फिल्म कमाल की कमाई कर गई, और विभिन्न स्रोतों के अनुसार, इसने 5 से 25 करोड़ रुपये तक की कमाई की। उस समय यह फिल्म शोले के बाद सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में से एक बनी। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय आज भी देश के कई हिस्सों में संतोषी माता के मंदिर मौजूद हैं वरिष्ठ पत्रकार और धर्म विशेषज्ञ इष्टदेव सांकृत्यायन का मानना है कि संतोषी माता का उद्भव शायद किसी स्थानीय देवी की लोकप्रियता से प्रेरित था। उन्होंने यह भी कहा कि संतोषी माता के प्रसार के बाद शुक्रवार का दिन वैभव लक्ष्मी को समर्पित हो गया, जिनकी पूजा और स्वरूप संतोषी माता से काफी मिलता-जुलता है। उनके अनुसार, “जब तक संतोष नहीं आएगा, तब तक समृद्धि नहीं आएगी। इसलिए संतोष का संदेश देने के लिए ही इस देवी की पूजा का प्रचार हुआ होगा।” आज भी देश के कई हिस्सों में संतोषी माता के मंदिर मौजूद हैं, जहाँ श्रद्धालु उनकी पूजा करते हैं। 1984 में दूरदर्शन के देशभर में प्रसारित होने के बाद धीरे-धीरे संतोषी माता का प्रचार कम होने लगा। इसी दौरान संचार और यातायात के बेहतर होने के साथ-साथ वैष्णो देवी की लोकप्रियता बढ़ने लगी। टी-सीरीज के गुलशन कुमार ने वैष्णो माता के कई वीडियो कैसेट जारी किए, और फिल्मों के माध्यम से भी उनका प्रचार व्यापक हुआ। इससे वैष्णो माता की भक्तों की संख्या तेजी से बढ़ी और उनकी मनोकामनाएं पूरी होने लगीं। Latest News in Hindi Today Hindi news #bloodgoddess #anemiaawareness #womenshealth #mystery #divineintervention #indianmythology #healing #spiritualpower

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Avoid sharing these 4 dreams

इन 4 सपनों को किसी से न करें साझा, वरना बन सकता है नुकसान का कारण

हमारे शास्त्रों, पुराणों और विशेष रूप से स्वप्न शास्त्र (Dream Science) में सपनों को महज एक मानसिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि भविष्य के संकेतों के रूप में देखा गया है। मान्यता है कि हमारे सपने कई बार ईश्वर या ब्रह्मांड द्वारा दिए गए संकेत होते हैं जो हमें चेतावनी, शुभ समाचार या दिशा देने के लिए आते हैं। लेकिन इन सपनों का प्रभाव केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हमने क्या देखा, बल्कि इस पर भी होता है कि हम उसके बारे में दूसरों से कैसा व्यवहार करते हैं। कुछ सपने (Dream) ऐसे होते हैं जिन्हें किसी से भी साझा नहीं करना चाहिए। ये सपने भले ही शुभ प्रतीत हों, लेकिन अगर इन्हें गलत समय या गलत व्यक्ति से साझा किया जाए, तो उसका लाभ खत्म हो सकता है और उसका असर उल्टा भी पड़ सकता है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार कुछ सपने बेहद शुभ संकेत होते हैं, लेकिन उन्हें दूसरों से बताना लाभ को हानि में बदल सकता है। आइए जानते हैं ऐसे ही 4 सपनों के बारे में जिन्हें भूलकर भी किसी से नहीं कहना चाहिए। 1. भगवान के दर्शन सपने में भगवान का दर्शन होना बड़ी कृपा और शुभ संकेत माना जाता है, जो यह बताता है कि आपकी परेशानियां जल्द ही खत्म होने वाली हैं। लेकिन अगर इस पवित्र सपने को आप किसी के साथ साझा कर देते हैं, तो उसकी आध्यात्मिक शक्ति कमजोर पड़ सकती है और आपकी समस्याओं का समाधान देर से हो सकता है। इसलिए ऐसे सपनों को अपने तक ही रखना ही बेहतर होता है। 2. देवी-देवताओं का दर्शन अगर सपने में आप खुद को किसी राजा या उच्च पदाधिकारी के रूप में देखते हैं, तो यह आपके जीवन में बड़ी जिम्मेदारियों और सफलता के आने का संकेत है। यह सपना आपकी बढ़ती आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता का प्रतीक भी है। लेकिन यदि आपने इस सपने को दूसरों के साथ साझा कर दिया, तो संभव है कि कोई आपकी योजनाओं में बाधा डालने की कोशिश करे या आपकी महत्वाकांक्षाओं को कमतर दिखाने का प्रयास करे। इसलिए ऐसे सपनों को गुप्त रखना ही बेहतर होता है। 3. फूलों से भरा बगीचा सपने (Dream Science) में रंगीन फूलों से भरा हुआ बगीचा दिखना बहुत शुभ माना जाता है, यह आपके जीवन में आने वाली खुशियों और अच्छे समाचारों का संकेत देता है। परंतु यदि आप इस सपने को दूसरों के साथ साझा कर देते हैं, तो वह आनंद या शुभ परिणाम किसी कारणवश रुक सकता है या उसकी दिशा बदल सकती है। इसलिए इस प्रकार के सपनों को भी गुप्त रखना बेहतर होता है। 4. चांदी से भरा कलश अगर आपको सपने में चांदी से भरे कलश दिखाई दें, तो यह आपके जीवन में धन, सुख और समृद्धि के आने का संकेत होता है। हालांकि, शास्त्रों के अनुसार जब तक यह सपना पूरी तरह साकार न हो जाए, तब तक इसे किसी से बताना शुभ नहीं माना जाता क्योंकि इससे इसका शुभ फल प्रभावित हो सकता है। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय ऐसे सपनों का जिक्र क्यों नहीं करना चाहिए? शास्त्रों के अनुसार कुछ सपनों में छुपी ऊर्जा बहुत ही संवेदनशील और महत्वपूर्ण होती है। यदि आप उन्हें किसी के साथ साझा कर देते हैं, तो उस ऊर्जा की ताकत कम हो सकती है। कभी-कभी सामने वाला व्यक्ति आपकी बातों को हल्के में लेकर उनका मजाक भी बना सकता है, जिससे उन शुभ संकेतों का प्रभाव नकारात्मक हो सकता है। इसलिए, जब तक वह सपना पूरा न हो जाए, तब तक चुप रहना और उसे गुप्त रखना ही बुद्धिमानी होती है। Latest News in Hindi Today Hindi news Dream Science #dreams #dreaminterpretation #spiritual #psychology #badluck #secret #lifeadvice #positivity #wellbeing #mindpower

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gold ring finger

सोने की अंगूठी किस उंगली में पहनते हैं आप? कहीं ये आदत न बन जाए मुसीबत की जड़!

भारत में सोने की अंगूठी पहनना न केवल फैशन और परंपरा का हिस्सा है, बल्कि इसे समृद्धि, सौभाग्य और शक्ति का प्रतीक भी माना जाता है। खासकर शादीशुदा स्त्रियों और पुरुषों के लिए सोने की अंगूठी पहनना आम बात है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अंगूठी किस उंगली में पहनना चाहिए और किसमें नहीं – इसका सीधा प्रभाव आपकी सेहत, धन-धान्य और जीवन की ऊर्जा पर पड़ सकता है? अगर आप भी बिना ज्योतिषीय या स्वास्थ्य दृष्टिकोण जाने अंगूठी पहनते हैं, तो यह खबर आपके लिए बेहद जरूरी है।  सोने की अंगूठी का धार्मिक महत्व भारत में सोने को बेहद पवित्र धातु माना जाता है। इसे माता लक्ष्मी का प्रतीक कहा गया है। यही वजह है कि लोग इसे गहनों के रूप में पहनते हैं ताकि देवी लक्ष्मी की कृपा बनी रहे। लेकिन आयुर्वेद और ज्योतिष दोनों मानते हैं कि सोना शरीर में ऊष्मा पैदा करता है, और इसका असर शरीर की ऊर्जा प्रणाली पर पड़ता है। ज्योतिष और विज्ञान दोनों मानते हैं कि सोने की अंगूठी गलत उंगली में पहनना ला सकता है दुर्भाग्य और स्वास्थ्य समस्याएं। जानिए किस उंगली में पहनना है सही और क्यों बाकी उंगलियों से बचना जरूरी है। कौन सी उंगली में नहीं पहननी चाहिए सोने की अंगूठी? मध्यमा उंगली (Middle Finger) मध्यमा उंगली में सोने की अंगूठी पहनना शुभ नहीं माना जाता। यह उंगली शनि ग्रह से जुड़ी होती है, जबकि सोना सूर्य से संबंधित है। इन दोनों ग्रहों के स्वभाव में विरोध होने के कारण, इस उंगली में सोने की अंगूठी (Gold Ring) पहनना जीवन में बाधाएं, धन हानि और नकारात्मकता को आमंत्रित कर सकता है। इसे ऐसा कदम माना जाता है जैसे कोई व्यक्ति खुद ही अपने लिए परेशानी खड़ी कर रहा हो। इसलिए इस उंगली में सोने की अंगूठी पहनने से हमेशा बचना चाहिए। अंगूठा (Thumb) जहां तक अंगूठे की बात है, आमतौर पर इस उंगली में अंगूठी पहनने की परंपरा नहीं है। विशेष रूप से सोने की अंगूठी तो बिल्कुल भी नहीं पहननी चाहिए, क्योंकि अंगूठा चंद्रमा का प्रतीक माना गया है। इस उंगली में सोने की बजाय चांदी का उपयोग अधिक शुभ और लाभकारी होता है। सोने की अंगूठी (Gold Ring) पहनने से यहां मानसिक असंतुलन और भावनात्मक अशांति की संभावना बढ़ सकती है, इसलिए इसे धारण करने से परहेज करना चाहिए। कनिष्ठा उंगली (Little Finger) कनिष्ठा उंगली बुध ग्रह से जुड़ी होती है, जो संवाद कौशल, बुद्धिमत्ता, तर्कशक्ति और व्यापार से संबंधित होता है। यदि कोई व्यक्ति संवाद, लेखन या व्यवसाय के क्षेत्र में है और अपनी बातों में प्रभाव बढ़ाना चाहता है, तो इस उंगली में सोने की अंगूठी पहनना फायदेमंद हो सकता है। यह निर्णय क्षमता को बेहतर बनाती है और सोच में स्पष्टता लाती है। कौन सी उंगली है सबसे शुभ? तर्जनी उंगली (Index Finger) अगर आप अपने भीतर आत्मविश्वास, विवेक और आध्यात्मिक गुणों को विकसित करना चाहते हैं, तो तर्जनी उंगली में सोने की अंगूठी पहनना लाभकारी साबित हो सकता है। यह उंगली गुरु ग्रह बृहस्पति से संबंधित होती है, जिसे शिक्षा, ज्ञान और नेतृत्व का प्रतीक माना गया है। अनामिका उंगली (Ring Finger) सोने की अंगूठी (Gold Ring) पहनने के लिए अनामिका उंगली को सबसे शुभ माना जाता है। यह उंगली सूर्य और शुक्र ग्रह से जुड़ी होती है, जो आकर्षण, रचनात्मकता, प्रसिद्धि और नेतृत्व जैसी गुणों को बढ़ावा देती है। इसलिए शादी के बाद अधिकतर महिलाएं इसी उंगली में अंगूठी पहनती हैं, जिसे मंगलकारी और शुभ संकेत माना जाता है। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय पुरुष और महिलाओं के लिए अलग-अलग नियम ध्यान देने वाली बात यह भी है कि पुरुषों और महिलाओं के लिए अंगूठी पहनने के नियम थोड़े अलग होते हैं। पुरुषों को दाहिने हाथ में अंगूठी पहननी चाहिए, जबकि स्त्रियों के लिए बायां हाथ शुभ माना जाता है। Latest News in Hindi Today Hindi news Gold Ring #goldring #ringfinger #vastutips #astrologytips #ringwearingrules #jewelrytips #stayalert #luckycharm #avoidmistakes

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Lord Shiva Third Eye

भगवान शिव की तीसरी आंख: चेतना, संहार और सृजन का रहस्य

हिंदू धर्म में भगवान शिव को संहारक के रूप में जाना जाता है, लेकिन उनका संहार केवल विनाश नहीं बल्कि सृजन का भी मार्ग है। शिव की सबसे रहस्यमयी और शक्तिशाली पहचान उनके तीसरे नेत्र से जुड़ी है, जिसे “त्रिनेत्रधारी” स्वरूप कहा जाता है। यह तीसरी आंख न केवल उनकी दिव्य चेतना का प्रतीक है, बल्कि ज्ञान, विवेक, और समय आने पर सर्वनाश की शक्ति का भी प्रतिनिधित्व करती है। तीसरी आंख का रहस्य क्या है? धार्मिक कथाओं के अनुसार, एक बार भगवान शिव हिमालय पर्वत पर देवताओं की एक सभा में व्यस्त थे। उसी समय मां पार्वती अचानक वहां पहुंचीं और प्रेमवश उन्होंने भगवान शिव की दोनों आंखों को अपने हाथों से ढक लिया। जैसे ही शिव की आंखें ढकीं, संपूर्ण सृष्टि अंधकार में डूब गई। चारों ओर हाहाकार मच गया। पशु-पक्षी भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगे। यह दृश्य भगवान शिव (Lord Shiva) से देखा नहीं गया। तभी उनके ललाट से एक तेजस्वी ज्योति फूटी, जो आगे चलकर उनका तीसरा नेत्र बना। इस नेत्र के प्रकट होते ही पूरे ब्रह्मांड में पुनः प्रकाश फैल गया। जब पार्वती जी ने शिव से इस तीसरे नेत्र के बारे में पूछा, तो उन्होंने बताया कि यह नेत्र संसार की रक्षा के लिए है। यदि यह नेत्र न प्रकट होता, तो संपूर्ण सृष्टि का विनाश निश्चित था। यह तीसरा नेत्र (Third Eye) न केवल चेतना और जागरूकता का प्रतीक है, बल्कि सृष्टि के संतुलन और संचालन का भी आधार है। तीनों कालों की दृष्टा है शिव की तीसरी आंख भगवान शिव (Lord Shiva) की तीसरी आंख (Third Eye) को अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है। मान्यता है कि इस दिव्य नेत्र के माध्यम से वे भूतकाल, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालों को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। यही कारण है कि शिव की तीसरी आंख को उनकी सामान्य दोनों आंखों से अधिक प्रभावशाली और विशिष्ट माना गया है। कहा जाता है कि यह नेत्र वह सब देख सकता है, जो सामान्य दृष्टि की पकड़ से बाहर होता है।  इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय कब खोलते हैं, भगवान शिव अपनी तीसरी आंख भगवान शिव (Lord Shiva) अपनी तीसरी आंख (Third Eye)  तब खोलते हैं जब उन्हें भौतिक जगत की परतों को हटाकर केवल शुद्ध सत्य को देखना होता है। यह नेत्र माया, भ्रम और संसार की बाहरी परतों को भस्म कर देता है, इसलिए इसे विनाश का प्रतीक माना जाता है। लेकिन असल में यह विनाश सत्य की स्थापना के लिए होता है। शिव की तीसरी आंख उस चेतना का प्रतिनिधित्व करती है जो भौतिक सीमाओं से परे जाकर वास्तविकता को समझती है। माना जाता है कि यह आंख कर्म और स्मृतियों के प्रभाव से काम करती है। जहां सामान्य आंखें समय के साथ भ्रमित हो सकती हैं, वहीं तीसरी आंख हमारे अस्तित्व की गहरी और स्पष्ट तस्वीर प्रस्तुत करती है। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Shiva #lordshiva #thirdeye #hindumythology #shivapower #spiritualawakening #divinecreation #shivasecrets 

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नहीं टिकता पैसा? हो सकता है घर में ये 7 आदतें कर रही हों मां लक्ष्मी को नाराज

हमारे समाज में धन की प्राप्ति और उसकी सुरक्षा को लेकर बहुत से लोग चिंतित रहते हैं। कई बार ऐसा होता है कि मेहनत करके कमाया गया पैसा कुछ ही समय में खत्म हो जाता है और आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगती है। ऐसे में यह सोचना स्वाभाविक है कि कहीं घर में कोई ऐसी आदतें या काम तो नहीं हो रहे, जो मां लक्ष्मी को नाराज कर रहे हैं। धन की देवी मां लक्ष्मी के आशीर्वाद के बिना समृद्धि पाना मुश्किल है। इसलिए जरूरी है कि हम घर में कुछ खास बातों का ध्यान रखें, जिससे धन की हानि से बचा जा सके। आइए जानते हैं वे 7 काम जो घर में मां लक्ष्मी को नाराज कर सकते हैं और जिससे आपका पैसा टिकता नहीं। 1. घर की सफाई और व्यवस्था में लापरवाही मां लक्ष्मी साफ-सफाई को बहुत महत्व देती हैं। अगर घर में नियमित सफाई नहीं होती, फर्श पर धूल जमी रहती है, या बाथरूम और रसोई गंदे होते हैं, तो ऐसी जगह मां लक्ष्मी निवास नहीं करतीं। इससे घर में नकारात्मक ऊर्जा फैलती है और धन आने के बाद भी टिकता नहीं। इसलिए सुबह-शाम झाड़ू-पोंछा कर घर को स्वच्छ बनाए रखना आवश्यक है। 2. सुबह देर तक सोना सुबह सूरज उगने के बाद भी देर तक सोना आलस्य का प्रतीक माना जाता है, जिससे मां लक्ष्मी प्रसन्न नहीं होतीं। इसलिए जल्दी उठकर स्नान करना और घर में सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखना बहुत जरूरी है। इसके अलावा, शाम के वक्त सोना भी घर की ऊर्जा को कम कर देता है, जो धन की प्राप्ति में बाधा उत्पन्न कर सकता है। 3. पैसे की बर्बादी और अनावश्यक खर्च अगर बिना सोच-विचार के फिजूलखर्ची होती है, तो धन का टिकना मुश्किल होता है। बजट बनाएं और जरूरत के अनुसार ही खर्च करें। बचत को प्राथमिकता दें और निवेश में समझदारी बरतें। मां लक्ष्मी को आर्थिक समझदारी और बचत करने वाला व्यक्ति बहुत प्रिय होता है। 4. खराब ऊर्जा और नकारात्मक माहौल घर में लगातार लड़ाई-झगड़ा, नकारात्मक बातें, और तनाव का माहौल मां लक्ष्मी को पसंद नहीं आता। ऐसे माहौल में सकारात्मक ऊर्जा का अभाव होता है, जिससे धन की वृद्धि नहीं होती। इसलिए घर में प्रेम, सद्भाव और सुख-शांति बनाए रखें। 5. घर में टूटा-फूटा सामान रखना यदि घर में टूटे हुए बर्तन, घड़ी, शीशे या फर्नीचर रखा हो, तो यह गरीबी और दरिद्रता का कारण बन सकता है। वास्तुशास्त्र के अनुसार, ऐसी टूटी-फूटी चीजें नकारात्मक ऊर्जा को बढ़ावा देती हैं और धन घर में टिकता नहीं। इसलिए इन चीजों को तुरंत हटा देना या मरम्मत करवा लेना चाहिए। 6. पूजा स्थल की उपेक्षा मां लक्ष्मी को पूजा स्थल की स्वच्छता और पवित्रता बहुत प्रिय है। यदि घर के मंदिर या पूजा स्थल पर गंदगी हो, धूल जमा हो या दीपक-दीया जलाया न जाए, तो इसे अशुभ माना जाता है। इसलिए पूजा स्थान को हमेशा साफ-सुथरा रखना और रोजाना दीपक जलाना आवश्यक है, ताकि देवी लक्ष्मी की कृपा बनी रहे। 7. रात भर जूठे बर्तन छोड़ना रात के खाने के बाद बर्तनों को तुरंत धो देना चाहिए। अगर जूठे बर्तन रात भर सिंक में पड़े रहते हैं, तो इससे घर में नकारात्मक ऊर्जा फैलती है और घर की खुशहाली कम हो जाती है। मां लक्ष्मी गंदगी और आलस्य से नाखुश होती हैं। सुबह जब कोई व्यक्ति उठता है और सामने पहला नज़ारा गंदगी का होता है, तो उसका पूरा दिन प्रभावित होता है। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के उपाय मां लक्ष्मी का आशीर्वाद पाने के लिए सूर्योदय से पहले उठना बेहद शुभ माना जाता है।धन की देवी की कृपा प्राप्त करने के लिए घर में हमेशा साफ-सफाई बनाए रखना जरूरी है, क्योंकि गंदगी वाले स्थान पर कभी भी मां लक्ष्मी का वास नहीं होता।मां लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए घर में श्रीयंत्र स्थापित करके उसकी नियमित पूजा और श्रीसूक्त का पाठ करना चाहिए।मां लक्ष्मी को कमल के फूल बहुत प्रिय हैं, इसलिए पूजा में इसे अवश्य चढ़ाना चाहिए।उनकी पूजा में मां लक्ष्मी की पसंदीदा वस्तुएं जैसे शंख, कौड़ी, मखाना, और खीर आदि का भी अर्पण करना शुभ होता है।इसके अलावा, घर में तुलसी का पौधा लगाकर उसकी नियमित सेवा और पूजा करने से भी मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। Latest News in Hindi Today Hindi news लक्ष्मी #wealth #lakshmi #financialtips #vasthu #moneyhabits #positivity #prosperity #hindubeliefs #moneyenergy #richlife

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इस वजह से रात में होते हैं ज़्यादातर हिंदू विवाह?

विवाह भारतीय संस्कृति का एक अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण संस्कार है, जिसे सिर्फ दो आत्माओं का मिलन नहीं, बल्कि दो परिवारों और उनकी परंपराओं का संगम माना जाता है। भारत में विवाह से जुड़े कई रीति-रिवाज, मान्यताएं और परंपराएं हैं, जो सदियों से चली आ रही हैं। इन्हीं में से एक परंपरा है—रात्रिकाल में विवाह संपन्न करना। अक्सर देखा जाता है कि हिंदू विवाह की मुख्य रस्में—जैसे फेरों का आयोजन—रात के समय होते हैं। पर क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर शुभ विवाह अधिकतर रात में ही क्यों होते हैं? इसके पीछे सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि खगोलीय, सामाजिक और सांस्कृतिक कारण भी हैं। धार्मिक मान्यता और शास्त्रीय आधार हिंदू धर्म में सूर्य और चंद्रमा को प्रत्यक्ष देवताओं के रूप में पूजा जाता है, और विवाह जैसे पवित्र संस्कार में इन्हीं को साक्षी मानने की परंपरा है। सूर्य जहां अग्नि और ऊर्जा के प्रतीक हैं, वहीं चंद्रमा शांति, भावनात्मक गहराई और सौम्यता का प्रतीक माने जाते हैं। माना जाता है कि एक सफल और मधुर वैवाहिक जीवन के लिए चंद्रमा जैसे गुणों का होना बेहद आवश्यक है, इसीलिए विवाह मुख्य रूप से चंद्रमा को साक्षी मानकर रात्रि में सम्पन्न किया जाता है। रात के समय आकाश में ध्रुव तारा दिखाई देता है, जो पति-पत्नी के अटूट और स्थायी संबंधों का प्रतीक माना जाता है। विवाह के दौरान वर-वधू इस तारे को साक्षी मानकर अपने दांपत्य जीवन की शुरुआत करते हैं। प्राचीन काल में विवाह एक विस्तृत प्रक्रिया होती थी, जिसमें दिनभर की रस्मों और पूजा-पाठ के बाद रात में मुख्य विधि—जैसे फेरे—संपन्न की जाती थी। यह परंपरा आज भी खासकर उत्तर भारत में जीवित है। रात के समय वातावरण अपेक्षाकृत शांत और स्वच्छ होता है, जिससे मंत्रों और अनुष्ठानों पर ध्यान केंद्रित करना आसान होता है। इसके अलावा, गर्मियों में दिन का समय अधिक गर्म होता है, जबकि रात को मौसम ठंडा और आरामदायक होता है, जिससे विवाह की सारी गतिविधियाँ सहज रूप से संपन्न हो पाती हैं। इस प्रकार रात्रिकालीन विवाह न केवल धार्मिक और खगोलीय दृष्टि से महत्व रखता है, बल्कि व्यावहारिक कारणों से भी यह अधिक उपयुक्त माना जाता है। अग्नि के समक्ष सात फेरे ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, विवाह जैसे पवित्र संस्कार को हमेशा श्रेष्ठ मुहूर्त में ही संपन्न करने की सलाह दी जाती है। जब विवाह की रस्में रात्रिकाल में शुरू होती हैं, तब उसका सबसे महत्वपूर्ण चरण—फेरे—भी उसी समय होते हैं। ऐसा विश्वास है कि यदि फेरे ध्रुव तारे को साक्षी मानकर लिए जाएं, तो वह संबंध जन्म-जन्मांतर तक अटूट बना रहता है। चूंकि ध्रुव तारा रात में ही स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, इसलिए ज्योतिषाचार्य विवाह की मुख्य रस्में रात में करने की सलाह देते हैं। यही कारण है कि अधिकतर हिंदू शादियां रात्रिकाल में ही आयोजित की जाती हैं, ताकि यह पवित्र बंधन ध्रुव तारे की स्थायित्व और दृढ़ता का आशीर्वाद प्राप्त कर सके। इसे भी पढ़ें: सत्तू शरबत: शरीर को मजबूत और स्वस्थ बनाने में फायदेमंद है यह देसी टॉनिक क्या दिन में भी हो सकती हैं शादियां? जानिए शास्त्रों की मान्यता शास्त्रों के अनुसार, अधिकतर शुभ कार्यों को दिन में करना उत्तम माना गया है, और इसी आधार पर विवाह जैसे पवित्र संस्कार को भी दिन में संपन्न किया जा सकता है। ऐसा कोई कठोर नियम नहीं है कि शादियां केवल रात्रि में ही होनी चाहिए। यदि हम पुराणों की कथाओं पर गौर करें, तो पाते हैं कि माता सीता और द्रौपदी का स्वयंवर दिन के समय ही हुआ था। इससे यह स्पष्ट होता है कि दिन में विवाह करना भी पूरी तरह से शुभ और धार्मिक दृष्टि से उचित है। हालांकि, वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह के लिए अनुकूल मुहूर्त अधिकतर रात के समय बनते हैं, इसलिए रात्रिकाल में विवाह की सलाह दी जाती है। परंतु जब दिन में उचित मुहूर्त उपलब्ध हो, तब भी विवाह समारोह पूर्ण श्रद्धा और विधिपूर्वक संपन्न किया जा सकता है। Latest News in Hindi Today Hindi विवाह #hinduwedding #nightwedding #indiantraditions #weddingtiming #astrology #hinduculture #marriagerituals

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Radha and Rukmini

राधा और रुक्मिणी: प्रेम और धर्म के दो दिव्य रूप

हिंदू धर्म में भगवान श्रीकृष्ण (Lord Krishna) की दो प्रमुख स्त्रियाँ सर्वाधिक श्रद्धा और प्रेम की प्रतीक मानी जाती हैं—एक हैं श्री राधारानी और दूसरी श्री रुक्मिणी देवी। जहां राधा आत्मिक प्रेम और भक्ति की प्रतीक हैं, वहीं रुक्मिणी वैवाहिक निष्ठा और कर्तव्यपरायणता की मिसाल हैं। श्रीकृष्ण से जुड़ी इन दोनों महान स्त्रियों का जीवन हमें प्रेम और धर्म के दो अलग-अलग लेकिन पूज्य मार्गों की ओर प्रेरित करता है। श्रीकृष्ण की लीलाओं में राधा और रुक्मिणी दोनों का विशेष स्थान है, लेकिन इन दोनों देवी स्वरूपों में कई स्पष्ट अंतर भी दिखाई देते हैं। दोनों के प्रेम, समर्पण और संबंध की प्रकृति अलग-अलग है। आइए जानते हैं उनके प्रमुख अंतर: 1. शहर और गाँव की संस्कृति का प्रतिनिधित्व रुक्मिणी देवी (Rukmini Devi) का जन्म एक राजघराने में हुआ था। वे विदर्भ देश की राजकुमारी थीं, जिन्होंने एक समृद्ध और शास्त्रीय परंपरा में जीवन व्यतीत किया। दूसरी ओर, श्री राधा (Radha) एक साधारण ग्रामीण परिवेश की गोपी थीं, जो ब्रज की धरती पर पली-बढ़ीं। इस प्रकार, रुक्मिणी एक शहरी राजकन्या थीं, जबकि राधा ग्रामीण संस्कृति की जीवंत प्रतीक थीं। 2. राधा को ‘रानी’, रुक्मिणी को ‘माता’ के रूप में सम्मान श्रद्धा और भक्ति की परंपरा में राधा जी को ‘रानी’ के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है — रासलीला की अधिष्ठात्री और कृष्ण (Lord Krishna) के दिव्य प्रेम की प्रतीक। वहीं, रुक्मिणी को भक्तगण ‘माता’ के रूप में पूजते हैं — एक आदर्श पत्नी और गृहस्थ जीवन की मर्यादा निभाने वाली देवी। 3. प्रेमिका और पत्नी के रूप में भिन्न भाव श्री राधा का श्रीकृष्ण से संबंध प्रेमिका के रूप में है — निश्छल, निष्काम और समर्पण से भरा हुआ रूहानी प्रेम। वहीं रुक्मिणी देवी श्रीकृष्ण की अर्धांगिनी हैं — पत्नी और सेविका दोनों रूपों में उन्होंने अपने धर्म का पालन किया। जहाँ राधा का प्रेम माधुर्य भाव में लीन है, वहीं रुक्मिणी का समर्पण दाम्पत्य और सेवा की भावना से ओतप्रोत है। 4. विवाह की पौराणिक व्याख्याएं भिन्न श्री रुक्मिणी (Shri Rukmini) का विवाह श्रीकृष्ण से तब हुआ जब उन्होंने उनका हरण कर लिया था, जैसा कि भागवत पुराण में वर्णन मिलता है। वहीं ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, राधा और श्रीकृष्ण (Lord Krishna) का विवाह स्वयं ब्रह्माजी ने संपन्न कराया था — यह विवाह लौकिक नहीं, बल्कि दिव्य भावनात्मक स्तर पर हुआ था। 5. जीवन के अलग-अलग चरणों की साक्षी राधा श्रीकृष्ण के बाल्यकाल की साक्षी थीं। वे कृष्ण की बाल लीलाओं की सहभागी रहीं। दूसरी ओर, रुक्मिणी उनके युवावस्था और गृहस्थ जीवन की साक्षी हैं — वे श्रीकृष्ण के राजकीय जीवन में शामिल रहीं। 6. वियोग में समर्पण की गहराई राधा (Radha) ने श्रीकृष्ण के रहते-रहते अपने प्राण त्याग दिए थे, उनके प्रेम में पूर्ण समर्पण का उदाहरण बनते हुए। वहीं रुक्मिणी ने कृष्ण के पृथ्वी से विदा लेने के बाद अपने जीवन का त्याग किया — उन्होंने पत्नी धर्म का आदर्श निभाया। 7. भावाभिव्यक्ति में भिन्नता राधा प्रेम में डूबी गोपी थीं, जो कृष्ण के लिए नृत्य करतीं, गीत गातीं और रास रचाती थीं। रुक्मिणी देवी अधिक गंभीर, संयमित और शांत स्वभाव की थीं। वे राजमहल की मर्यादा में रहकर भक्ति करती थीं। 8. दर्शन की दृष्टि से कृष्ण तत्व-दर्शन में राधा को आत्मा और रुक्मिणी (Rukmini) को शरीर के रूप में प्रतीकात्मक माना गया है। राधा का प्रेम आत्मिक स्तर पर था, जबकि रुक्मिणी का संबंध व्यवहारिक और लौकिक रूप से जुड़ा था। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय 9. राधा — आदिशक्ति, रुक्मिणी — लक्ष्मी अवतार धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, राधा को आदिशक्ति का स्वरूप माना गया है — प्रेम, शक्ति और चेतना की प्रतीक। वहीं रुक्मिणी को श्री लक्ष्मी का अवतार कहा गया है, जो ऐश्वर्य, सौंदर्य और समृद्धि की देवी हैं। 10. अस्तित्व में विलय का अंतर कहा जाता है कि श्रीकृष्ण राधा में समाए हुए हैं, उनका स्वरूप राधा के बिना अधूरा है। वहीं रुक्मिणी अपने समर्पण से स्वयं श्रीकृष्ण में समाहित हो गई हैं — जैसे जल में गिरी बूंद सागर का ही अंश बन जाती है। 11. महाभारत में भी उल्लेखित अंतर महाभारत के अनुशासन पर्व में युधिष्ठिर द्वारा पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में भीष्म पितामह ने बताया कि देवी लक्ष्मी ने स्वयं रुक्मिणी से कहा था — “मेरा वास तुममें है, जबकि राधा का निवास गोकुल के गोलोक धाम में है।” इससे स्पष्ट होता है कि रुक्मिणी लौकिक ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री हैं और राधा आध्यात्मिक प्रेम की। Latest News in Hindi Today Hindi news Rukmini #radha #rukmini #krishna #hindumythology #divinelove #spirituallove #dharmicpath #radhaandrukmini

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