husband longevity tips

पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय

पति की लंबी आयु और सुख-शांति के लिए भारतीय संस्कृति में सदियों से व्रत और पूजा का विशेष महत्व रहा है। विवाह एक पवित्र बंधन है, जिसमें पति-पत्नी एक-दूसरे के लिए भगवान का रूप माने जाते हैं। इसलिए पति की लंबी आयु के लिए पत्नी द्वारा किया गया व्रत न केवल धार्मिक कर्तव्य माना जाता है, बल्कि यह परिवार में खुशहाली और समृद्धि का भी प्रतीक होता है। हर वर्ष कई ऐसे व्रत और पर्व आते हैं जो पति की लंबी आयु और कल्याण के लिए समर्पित होते हैं। लेकिन समय के साथ कुछ नए और पुराने व्रतों को लेकर जानकारी भी बदलती रहती है। तो आइए जानते हैं कि आज के समय में पति की लंबी आयु के लिए कौन-कौन से व्रत रखने चाहिए और इनकी पूजा विधि क्या है। 1. करवा चौथ हिंदू धर्म में करवा चौथ का विशेष महत्व है। यह व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं करवा माता के साथ भगवान शिव (Lord Shiva), माता पार्वती, श्री गणेश और भगवान कार्तिकेय की पूजा करती हैं। धार्मिक मान्यता है कि करवा माता की कृपा से सुहागन महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इस व्रत में सूर्योदय से लेकर चंद्रमा के दर्शन तक निर्जला उपवास किया जाता है। इस दिन महिलाएं सुहागिन होने का विशेष महत्व समझते हुए सजी-संवर कर चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं और पति की लंबी आयु की कामना करती हैं।  2. हरियाली तीज व्रत हरियाली तीज का व्रत श्रावण महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है। यह व्रत महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और वैवाहिक सुख की कामना के लिए करती हैं। इस दिन विशेष रूप से भगवान शिव (Lord Shiva) और माता पार्वती की पूजा की जाती है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन महिलाएं 16 श्रृंगार करके विधिपूर्वक पूजा करें तो उन्हें अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। कुंवारी कन्याएं भी यह व्रत मनचाहा जीवनसाथी पाने के लिए करती हैं। 3. कजरी तीज कजरी तीज का पर्व हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। इसे सतूड़ी तीज भी कहा जाता है। इस दिन महिलाएं अपने पति के सुख और लंबी उम्र की कामना करते हुए व्रत रखती हैं। साथ ही, यह व्रत कुंवारी कन्याओं के लिए भी विशेष माना गया है, जो अच्छे जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए इसे करती हैं। मान्यता है कि माता पार्वती ने इसी तिथि को भगवान शिव (Lord Shiva) को पति रूप में पाने के लिए कठिन तप किया था, और उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए थे। इस कारण यह तिथि अत्यंत पवित्र मानी जाती है और माता पार्वती की विशेष पूजा होती है। 4. कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी व्रत यह व्रत भगवान गणेश को समर्पित है और माना जाता है कि इससे जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं। इस व्रत को रखने से मानसिक शांति मिलती है और पारिवारिक सुख-शांति बनी रहती है। पति की लंबी आयु और समृद्धि के लिए भी यह व्रत अत्यंत शुभ माना गया है। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां 5. मंगला गौरी व्रत हिंदू परंपरा में श्रावण मास के प्रत्येक मंगलवार को मंगला गौरी व्रत का विशेष महत्व है। यह व्रत विशेष रूप से विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए करती हैं। यह उपासना माता पार्वती को समर्पित होती है। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धा और भक्ति के साथ करने से वैवाहिक जीवन में सुख और सौभाग्य बना रहता है। साथ ही, यह व्रत अविवाहित कन्याओं के लिए भी लाभकारी माना गया है—उनकी मनोकामना पूर्ण होती है और उन्हें इच्छित वर प्राप्त होता है। 6. वैभव लक्ष्मी व्रत वैभव लक्ष्मी व्रत मुख्य रूप से धन-संपत्ति की प्राप्ति और मां लक्ष्मी (Lord Laxmi) की कृपा पाने के उद्देश्य से किया जाता है। हालांकि, यदि पति-पत्नी मिलकर इस व्रत को विधिपूर्वक करें तो उनके आपसी संबंधों में भी मजबूती आती है और वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बढ़ती है। यह व्रत जीवन में समृद्धि लाने वाला माना जाता है। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से न केवल पारिवारिक कलह समाप्त होती है, बल्कि माता लक्ष्मी की कृपा से हर क्षेत्र में उन्नति होने लगती है। प्रत्येक शुक्रवार को किए जाने वाले इस व्रत से भाग्य भी प्रबल हो जाता है। Latest News in Hindi Today Hindi news  #husbandlonglife #vratformarriedwomen #auspiciousfast #hinduvrat #spiritualremedies #karwachauth #loveanddevotion #suhaagvrat #indiantraditions

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प्रेम विवाह में रुकावट का कारण बनते हैं कुंडली के ये ग्रह दोष

प्रेम जीवन में हर व्यक्ति चाहता है कि जिसे वह दिल से चाहता है, वही उसका जीवनसाथी बने। लेकिन वास्तविक जीवन में ऐसा हमेशा संभव नहीं हो पाता। कई बार दो लोग एक-दूसरे से बेहद प्रेम करते हैं, परंतु उनका रिश्ता विवाह तक नहीं पहुंच पाता। इसके पीछे सिर्फ सामाजिक या पारिवारिक कारण ही नहीं, बल्कि कुंडली में मौजूद कुछ ग्रह दोष भी होते हैं जो प्रेम विवाह में रुकावटें खड़ी करते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुछ विशेष ग्रह यदि कुंडली में कमजोर या पीड़ित हों तो प्रेम विवाह या लव मैरिज में सफलता नहीं मिलती। आइए जानते हैं ऐसे ग्रहों और भावों के बारे में जो सच्चे प्यार की मंज़िल तक पहुंचने में अड़चन बनते हैं। 1. शुक्र ग्रह का महत्व शुक्र ग्रह को प्रेम, आकर्षण, कला, रोमांस और वैवाहिक सुख का कारक माना गया है। यदि जन्म कुंडली में शुक्र दुर्बल हो, किसी शत्रु ग्रह के साथ स्थित हो या राहु, केतु अथवा शनि जैसे ग्रहों की अशुभ दृष्टि से प्रभावित हो, तो व्यक्ति को प्रेम जीवन में असफलताओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे लोग कई बार चाहकर भी रिश्तों को आगे नहीं बढ़ा पाते या अपने सच्चे प्यार को खो बैठते हैं। 2. सप्तम भाव और सप्तमेश की दशा जन्म कुंडली में सप्तम भाव विवाह और जीवनसाथी से जुड़ा प्रमुख भाव होता है। यदि यह भाव या इसका स्वामी यानी सप्तमेश नीच स्थिति में हो, या शनि, राहु जैसे अशुभ ग्रहों से प्रभावित हो, तो विवाह में बाधाएं आती हैं। लव मैरिज (Love Marriage) के मामलों में इसका प्रभाव और भी गहरा होता है, क्योंकि ऐसे मामलों में निर्णय व्यक्ति स्वयं लेता है। ऐसे में यदि ग्रह सहयोग न दें, तो प्रेम विवाह में देर, अड़चनें या असफलता देखने को मिलती है। 3. पंचम भाव और पंचमेश की भूमिका जन्म कुंडली का पंचम भाव प्रेम संबंधों, आकर्षण और रोमांटिक जीवन से जुड़ा होता है। यदि इस भाव में कोई पाप ग्रह स्थित हो, जैसे शनि, राहु या केतु, या इसका स्वामी (पंचमेश) कमजोर या पीड़ित हो, तो प्रेम जीवन में स्थिरता नहीं रहती। ऐसे जातकों के रिश्ते टूटने की संभावना अधिक होती है, या परिवार की ओर से प्रेम विवाह (Love Marriage) में अड़चनें आती हैं। कई बार प्रेम की शुरुआत तो होती है, लेकिन वह विवाह तक नहीं पहुंच पाता। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां 4. राहु-केतु का प्रभाव ज्योतिष में राहु और केतु को छाया ग्रह माना गया है, जो भ्रम, अनिश्चितता और अस्थिरता का संकेत देते हैं। यदि राहु पंचम, सप्तम या एकादश भाव में स्थित हो, तो प्रेम संबंधों की शुरुआत तो होती है, लेकिन उनका अंत अक्सर सुखद नहीं होता। विशेष रूप से जब राहु शुक्र ग्रह को प्रभावित करता है, तो रिश्तों में धोखा, असत्य या रहस्य उत्पन्न होते हैं। कभी-कभी विवाह तय होते-होते रुक भी जाता है। 5. चंद्रमा की भूमिका: चंद्रमा मन और भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है। यदि चंद्रमा कमजोर हो या उस पर शनि, राहु या केतु का प्रभाव हो, तो व्यक्ति की भावनात्मक स्थिरता प्रभावित होती है। ऐसा व्यक्ति अक्सर अपने रिश्तों को लेकर असमंजस में रहता है—कभी स्वीकृति देता है, तो कभी इंकार करता है। यह असमर्थता और भ्रम प्रेम संबंधों को कमजोर कर देती है और उनका भविष्य संकट में डाल देती है। Latest News in Hindi Today Hindi news Love Marriage #LoveMarriage #KundliDosha #AstrologyRemedies #PlanetaryDosha #MarriageObstacles #VedicAstrology #LoveProblems

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Jyeshtha Purnima

ज्येष्ठ पूर्णिमा 2025: जानिए तिथि, व्रत विधि और धार्मिक महत्व

हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि को ज्येष्ठ पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima) के रूप में मनाया जाता है। यह दिन धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, जिसमें व्रत, पूजन, दान और स्नान का विशेष महत्व होता है। इस वर्ष, ज्येष्ठ पूर्णिमा 11 जून 2025, बुधवार को मनाई जाएगी।  ज्येष्ठ पूर्णिमा 2025: तिथि और समय इस बार ज्येष्ठ पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima) का पावन पर्व 11 जून 2025, दिन बुधवार को मनाया जाएगा। पंचांग के मुताबिक, पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 10 जून को सुबह 11:35 बजे होगी और इसका समापन 11 जून को दोपहर 1:13 बजे होगा। ऐसे में व्रत और पूजन कार्य 11 जून को करना श्रेष्ठ रहेगा।  ज्येष्ठ पूर्णिमा का धार्मिक महत्व ऐसा माना जाता है कि ज्येष्ठ पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima) के दिन व्रत रखकर चंद्रमा की आराधना करने से चंद्र दोष शांत होता है। जिन लोगों की कुंडली में चंद्रमा अशुभ स्थिति में होता है या चंद्र की दशा चल रही होती है, उनके लिए इस दिन की गई पूजा विशेष रूप से लाभकारी मानी जाती है। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की भक्ति करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है। इसके अलावा, इस दिन गंगा स्नान का भी विशेष महत्व होता है, जो न केवल पापों से मुक्ति दिलाता है, बल्कि व्यक्ति के भीतर आध्यात्मिक ऊर्जा को भी जाग्रत करता है। पूजन विधि और व्रत के नियम ज्येष्ठ पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima) के दिन श्रद्धालु सूर्योदय से पूर्व स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और भगवान विष्णु का ध्यान कर व्रत का संकल्प लेते हैं। पूजा में फूल, धूप, दीप, नैवेद्य और तुलसी पत्र अर्पित कर भगवान विष्णु (Lord Vishnu) व माता लक्ष्मी (Mata Laxmi)  की आराधना की जाती है। इस दिन परिवार सहित सत्यानारायण कथा का पाठ भी किया जाता है। रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देकर चंद्र दोष शांति की प्रार्थना की जाती है। यह व्रत आत्मशुद्धि और मानसिक शांति का माध्यम माना जाता है। यदि पूर्णिमा तिथि चतुर्दशी से प्रारंभ हो, तो उपवास एक दिन पहले से भी रखा जा सकता है। साथ ही, इस दिन जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या धन दान करना विशेष पुण्यकारी होता है, जो समाज में सहयोग और करुणा की भावना को भी बढ़ाता है। विशेष भोग  ज्येष्ठ पूर्णिमा के अवसर पर भगवान विष्णु (Lord Vishnu) और माता लक्ष्मी (Mata Laxmi) को विशेष भोग अर्पित करने की परंपरा है। इस दिन खीर का भोग चढ़ाना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके अलावा फल, मिठाई और पंचामृत भी भगवान को अर्पित किए जा सकते हैं। ध्यान रहे कि भोग में तुलसी के पत्तों का समावेश अवश्य हो, क्योंकि भगवान विष्णु को तुलसी अत्यंत प्रिय है। कुछ स्थानों पर इस दिन वट सावित्री व्रत भी मनाया जाता है, जिसमें महिलाएं वट वृक्ष (बरगद के पेड़) की पूजा करती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा का श्रवण करती हैं। इस अवसर पर भी विशेष भोग तैयार किए जाते हैं, जिनमें फल और मिठाई का विशेष स्थान होता है। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां  दान और पुण्य ज्येष्ठ पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima) के दिन दान का विशेष महत्व होता है। इस दिन जल से भरे घड़े, छाता, वस्त्र, चप्पल, पंखा, शक्कर, अनाज आदि का दान करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। यह दान ब्राह्मणों, जरूरतमंदों और गरीबों को करना चाहिए। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Jyeshtha Purnima #JyeshthaPurnima2025 #PurnimaVrat #HinduFestival #VratVidhi #PurnimaKatha #FullMoonRituals #HinduReligion #ReligiousSignificance

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Ram Darbar family muhurat

Ram Darbar family muhurat: बड़ा ही भव्य होगा अयोध्या का दरबार, परिवार के साथ इस मुहूर्त में विराजेंगे राजा राम

गंगा दशहरा के अवसर पर प्रभु श्री राम की नगरी अयोध्या के राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा होने जा रही है।संयोग देखिये आज ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का जन्म दिन भी है। और आज ही आज 11 बजकर 25 मिनट से 11बजकर 40मिनट तक की जाएगी। जानकारी के लिए बता दें कि यह प्राण प्रतिष्ठा आज अभिजीत मुहूर्त में की जाएगी। अभिजीत मुहूर्त दिन का सबसे शुभ और पवित्र समय माना जाता (Ram Darbar family muhurat) है। आज ही रामदरबार और गर्भगृह के चारों कोनों में बने परकोटे के अन्य मंदिरों में भी सात विग्रहों की प्राण प्रतिष्ठा की जाएगी। अयोध्या और काशी से आए 101 वैदिक आचार्य इस प्राण प्रतिष्ठा के आयोजन को पूरा कराएंगे। बड़ी बात यह कि आज सिद्ध योग भी बन रहा है। पूजन, भोग, आरती के बाद अनुष्ठान की समाप्ति होगी। प्राण प्रतिष्ठा के बाद सीता राम समेत चारों भाइयों और बजरंगबली आभूषण पहनाए जाएंगे।  अयोध्या जिला प्रशासन और राम मंदिर ट्रस्ट ने कर ली हैं सभी (Ram Darbar family muhurat) तैयारियां बता दें कि प्राण प्रतिष्ठा के इस आयोजन में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ समेत तकरीबन पांच सौ से अधिक मेहमान शामिल (Ram Darbar family muhurat) होंगे। सीएम योगी मख्य अतिथि होंगे। इसके आलावा संघ, विहिप और बीजेपी से जुड़े पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को भी प्राण प्रतिष्ठा में आने का न्योता दिया गया है। इस बीच सीएम पहले हनुमानगढ़ी जाएंगे और 10 बजकर 40 मिनट से 10 बजकर 55 मिनट तक दर्शन-पूजन करेंगे। इसके बाद 11 बजे से 11.10 तक वो श्रीरामजन्मभूमि का दर्शन पूजन करेंगे। फिर 11.10 से 1 बजे तक सीएम श्रीरामजन्मभूमि परिसर में राम दरबार और नवनिर्मित 6 मंदिरों में प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल होंगे। जानकारी के लिए बता दें कि अयोध्या जिला प्रशासन और राम मंदिर ट्रस्ट ने सभी तैयारियां कर ली हैं। विशेषकर कार्यक्रम स्थल और आसपास के क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था चाकचौबंद है।   सीएम योगी के नेतृत्व में अयोध्या आध्यात्मिक और सांस्कृतिक राजधानी के रूप में (Ram Darbar family muhurat) उभरी है इस कार्यक्रम को लेकर संत समुदाय का कहना है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राम मंदिर के निर्माण और अयोध्या के विकास के माध्यम से रामनगरी का खोया हुआ गौरव लौटाया है। इतना ही नहीं, विगत आठ वर्षों में अयोध्या में 32 हजार करोड़ से अधिक विकास परियोजनाओं ने शहर को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दी है। सड़क, रेल, हवाई अड्डा, सौंदर्यीकरण और पर्यटन से जुड़ी परियोजनाओं ने अयोध्या को विश्व नक्शे पर चमकदार बनाया है। यही नहीं, रामकथा पार्क, सरयू तट का सौंदर्यीकरण और आधुनिक सुविधाओं से युक्त मंदिर परिसर इसकी (Ram Darbar family muhurat) बानगी हैं। इस दौरान संत-महंतों ने योगी आदित्यनाथ की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनके नेतृत्व में अयोध्या आध्यात्मिक और सांस्कृतिक राजधानी के रूप में उभरी है। सरयू त्रयोदशी जन्मोत्सव के अवसर पर नदी तट पर विशेष आरती और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित होंगे।  इसे भी पढ़ें:- इस तरह विदेशी श्रद्धालु अब अयोध्या के राम मंदिर में पा सकेंगे वीआईपी पास प्रशासन ने इस भव्य आयोजन के लिए सुरक्षा और व्यवस्था के (Ram Darbar family muhurat) किए हैं पुख्ता इंतजाम  कार्यक्रम की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने इस भव्य आयोजन के लिए सुरक्षा और व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम (Ram Darbar family muhurat) किए हैं। देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बनने अयोध्या पहुंच रहे हैं। यह दिन न केवल आध्यात्मिक, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक बनेगा। गौरतलब हो कि योगी आदित्यनाथ का अयोध्या से गहरा आध्यात्मिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक संबंध है। उनका संबंध न सिर्फ बतौर मुख्यमंत्री बल्कि एक संत, राम भक्त और राम मंदिर आंदोलन के सक्रिय सहयोगी के रूप में है। गोरखनाथ मठ और योगी आदित्यनाथ की तीन पीढ़ियां राम मंदिर आंदोलन से जुड़ी रही हैं।  Latest News in Hindi Today Ram Darbar family muhurat AyodhyaRamMandir #RamDarbar #LordRam #AyodhyaDiaries #RamMandir2025 #DivineIndia #HinduCulture

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Bhagavan

नई गाड़ी में किस भगवान की मूर्ति रखनी चाहिए? जानें वास्तु शास्त्र के अनुसार शुभ संकेत

नई गाड़ी खरीदना हर किसी के लिए एक विशेष और सुखद अनुभव होता है। यह न केवल आर्थिक प्रगति का प्रतीक है, बल्कि जीवन में एक नई उपलब्धि भी दर्शाता है। जब कोई व्यक्ति पहली बार गाड़ी खरीदता है, तो वह चाहता है कि उसका यह वाहन उसे सुख, समृद्धि और सुरक्षा प्रदान करे। ऐसे में कई लोग अपनी नई कार के डैशबोर्ड पर भगवान की मूर्ति या तस्वीर रखना पसंद करते हैं, ताकि हर यात्रा मंगलमय और सुरक्षित रहे। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि गाड़ी के डैशबोर्ड पर कौन से भगवान की मूर्ति रखना वास्तु के अनुसार शुभ माना गया है? अगर नहीं, तो आइए जानते हैं वास्तु शास्त्र के अनुसार सही मूर्ति और उससे जुड़ी कुछ अहम बातें। नई गाड़ी में भगवान की मूर्ति रखने का महत्व क्या है? नई गाड़ी में भगवान की मूर्ति स्थापित करना सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि इसके पीछे वास्तु और मानसिक शांति से जुड़े कई अहम कारण भी होते हैं। हिंदू संस्कृति में किसी भी नए काम की शुरुआत ईश्वर का आशीर्वाद लेकर करना शुभ माना जाता है। जब कोई व्यक्ति नई कार खरीदता है, तो यह उसके जीवन का एक महत्वपूर्ण और शुभ क्षण होता है, जो तरक्की, सुख-समृद्धि और सुरक्षा का प्रतीक बनता है। कार में भगवान (Bhagavan) की मूर्ति या फोटो रखने से सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है और व्यक्ति के भीतर एक विश्वास पैदा होता है कि हर यात्रा ईश्वर की कृपा से सुरक्षित और सफल होगी। भगवान गणेश की मूर्ति: शुभता और बाधा निवारण का प्रतीक कार के डैशबोर्ड पर भगवान गणेश की मूर्ति रखना एक प्रचलित परंपरा है, जिसे शुभता और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। गणेश जी (Ganesha) को विघ्नहर्ता कहा जाता है, यानी वे सभी प्रकार की बाधाओं और मुश्किलों को दूर करने वाले देवता हैं। इसलिए गाड़ी में उनकी मूर्ति रखने से न केवल धार्मिक आस्था व्यक्त होती है, बल्कि यह मानसिक सुरक्षा का भी एहसास कराता है। ऐसा माना जाता है कि गणेश जी की मूर्ति रखने से यात्रा के दौरान आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और नकारात्मक ऊर्जा वाहन के आसपास नहीं आती। मूर्ति चुनते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि भगवान गणेश का मुख सीधे वाहन की दिशा की ओर हो, ताकि उनकी दृष्टि हमेशा रास्ते पर बनी रहे और यात्राएं सफल व सुरक्षित हों। कैसी हो गणेश जी की मूर्ति: मां दुर्गा या कालिका की तस्वीर: नकारात्मक ऊर्जा से बचाव कार के डैशबोर्ड पर माता दुर्गा की मूर्ति रखना शक्ति, साहस और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। मां दुर्गा को संकटों को दूर करने वाली और अपने भक्तों की रक्षा करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। खासकर महिलाएं अपने वाहन में मां दुर्गा की मूर्ति रखने को शुभ समझती हैं, क्योंकि इससे आत्मविश्वास और साहस में बढ़ोतरी होती है। ऐसा माना जाता है कि मां दुर्गा की कृपा से गाड़ी चलाते समय किसी भी तरह की नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा मिलती है। माता दुर्गा की उपस्थिति आपकी यात्राओं को सुरक्षित और सफल बनाने में मदद करती है। डैशबोर्ड पर रखी गई मूर्ति छोटी, साफ-सुथरी होनी चाहिए और वाहन की दिशा की ओर रखी जानी चाहिए, ताकि देवी की दृष्टि हमेशा सामने बनी रहे और मार्ग में आने वाले सभी बाधाओं का नाश हो सके। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां हनुमान जी की मूर्ति  अगर आप चाहते हैं कि आपकी गाड़ी दुर्घटनाओं और किसी भी तरह की परेशानियों से सुरक्षित रहे, तो कार के डैशबोर्ड पर भगवान हनुमान जी (Bhagavan) की मूर्ति या तस्वीर रखना अत्यंत शुभ माना जाता है। हनुमान जी को शक्ति, बुद्धिमत्ता और विजय का प्रतीक माना जाता है। खासकर लंबी यात्रा के दौरान हनुमान जी का स्मरण करना यात्रियों के लिए सुरक्षा का एक बड़ा स्रोत होता है। मान्यता है कि अगर आपकी कार में हनुमान जी की मूर्ति स्थापित हो, तो वह आपके मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं और विपत्तियों को दूर करने में सहायता करती है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Bhagavan #VastuForCar #GodIdolForCar #CarVastuTips #NewCarVastu #VastuShastra #CarDashboardGod #VehiclePositivity

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Ganga Dussehra date and significance

गंगा दशहरा 2025: धन, सुख और समृद्धि पाने का शुभ अवसर

हिंदू धर्म में गंगा दशहरा का पर्व अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पर्व मां गंगा के धरती पर अवतरण की स्मृति में मनाया जाता है। गंगा दशहरा हर वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इस दिन मां गंगा राजा भगीरथ के तप से प्रसन्न होकर स्वर्ग से धरती पर अवतरित हुई थीं।  गंगा दशहरा 2025: जानिए तिथि और पुण्य स्नान का शुभ समय पंचांग के अनुसार, गंगा दशहरा का पर्व ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। वर्ष 2025 में यह तिथि 04 जून को रात 11 बजकर 54 मिनट से आरंभ होकर 06 जून की रात 02 बजकर 15 मिनट तक रहेगी। गंगा दशहरा (Ganga Dussehra) के दिन पुण्य स्नान का विशेष महत्व होता है। इस दिन गंगा नदी में स्नान करने से सभी पापों का नाश होता है और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। 2025 में गंगा दशहरा का मुख्य स्नान 05 जून को होगा। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करना अत्यंत फलदायी माना गया है। ब्रह्म मुहूर्त का समय 05 जून को सुबह 04:02 से 04:42 बजे तक रहेगा। गंगा दशहरा का धार्मिक महत्व पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब राजा सगर के 60,000 पुत्रों की आत्मा को मुक्ति दिलाने के लिए भगीरथ ने कठोर तप किया, तब मां गंगा (Maa Ganga) ने प्रकट होकर धरती पर अवतरण किया। कहा जाता है कि गंगा जल का स्पर्श मात्र ही सभी पापों और कष्टों को दूर कर देता है। गंगा दशहरा पर स्नान, दान और जप-तप का विशेष महत्व है। इस दिन मां गंगा (Maa Ganga) का पूजन करने और विशेष उपाय अपनाने से आर्थिक तंगी, दरिद्रता और जीवन की बाधाएं समाप्त होती हैं। गंगा जल से लक्ष्मी पूजन गंगा दशहरा (Ganga Dussehra) के दिन अपने घर में मां लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र के समक्ष गंगा जल से स्नान कराएं। फिर उन्हें चांदी का सिक्का, कमल का फूल, और मिश्री अर्पित करें। इससे घर में सुख-समृद्धि आती है।  तुलसी में गंगाजल चढ़ाएं गंगा दशहरा (Ganga Dussehra) के दिन तुलसी का पौधा घर में लगाना अत्यंत शुभ फलदायी माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस विशेष दिन यदि उत्तर दिशा में तुलसी का पौधा रोपा जाए, तो घर में देवी लक्ष्मी का स्थायी वास होता है। इससे मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है और आर्थिक समृद्धि प्राप्त होती है। ऐसा माना जाता है कि यह उपाय अपनाने से तिजोरी कभी खाली नहीं होती और घर में सुख-शांति बनी रहती है। गंगा स्नान  यदि लगातार मेहनत करने के बावजूद भी व्यापार में सफलता नहीं मिल रही है, तो गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान करना अत्यंत लाभकारी माना गया है। स्नान के उपरांत तांबे के लोटे में जल भरकर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करें। धार्मिक मान्यता है कि इस उपाय से न केवल व्यापार में तरक्की होती है, बल्कि घर-परिवार में भी सुख-समृद्धि और खुशियों का आगमन होता है। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां गंगा दशहरा के दिन का विशेष दान गंगा दशहरा (Ganga Dussehra) का दिन आर्थिक समस्याओं को दूर करने के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन श्रद्धापूर्वक मंदिर में या जरूरतमंद लोगों को जल से भरे मिट्टी के कलश का दान करें और साथ में दक्षिणा भी अर्पित करें। मान्यता है कि इस उपाय से आर्थिक संकट से मुक्ति मिलती है और घर में धन-संपत्ति बढ़ने के योग बनते हैं। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Ganga Dussehra #GangaDussehra2025 #SpiritualFestival #HinduFestivals #GangaMaa #WealthAndHappiness #FestivalOfPurity

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Sankashti Chaturthi moonrise time

कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी 2025: कब है व्रत, क्या है पूजन विधि और शुभ मुहूर्त?

सनातन धर्म में चतुर्थी तिथि को अत्यंत शुभ और महत्वपूर्ण माना गया है। यह पर्व प्रत्येक माह श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन विघ्नों को दूर करने वाले भगवान श्री गणेश (Lord Ganesha) की विधिवत पूजा की जाती है। विशेष कार्यों में सफलता प्राप्त करने, सुख-समृद्धि और सौभाग्य की कामना के लिए इस दिन व्रत रखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी (Krishnapingal Sankashti Chaturthi) व्रत करने से साधक की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं और जीवन के संकट दूर होते हैं। यह व्रत विशेष रूप से बुद्धि, समृद्धि और बाधाओं को दूर करने वाले भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। आइए जानते हैं कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी 2025 की तिथि, शुभ समय (मुहूर्त) और योग से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां। व्रत तिथि और चंद्रमा उदय का समय वैदिक पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 14 जून को दोपहर 3 बजकर 46 मिनट से आरंभ होकर 15 जून को दोपहर 3 बजकर 51 मिनट तक रहेगी। तिथि की मान्यता के अनुसार, कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी (Krishnapingal Sankashti Chaturthi) व्रत इस वर्ष 14 जून को रखा जाएगा। इस दिन चंद्रमा का उदय रात्रि 10 बजकर 7 मिनट पर होगा, जो व्रतीजनों के लिए विशेष रूप से पूजन का शुभ समय माना जाता है। शुभ योग इस वर्ष आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर दोपहर 3 बजकर 13 मिनट से इंद्र योग का शुभ संयोग बन रहा है। साथ ही इस दिन भद्रवास का योग भी पड़ रहा है। इन दोनों मंगलकारी योगों में भगवान गणेश (Lord Ganesha) की उपासना करने से श्रद्धालुओं की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होने का विश्वास किया जाता है। कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी (Krishnapingal Sankashti Chaturthi) के दिन एक विशेष और शुभ योग, शिववास योग बन रहा है, जिसकी शुरुआत दोपहर 3 बजकर 46 मिनट से होगी। यह योग पूजा-पाठ और व्रत के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। इस विशेष योग में माना जाता है कि भगवान शिव माता पार्वती के साथ कैलाश पर्वत पर विराजमान होते हैं। ऐसे में इस पावन समय पर भोलेनाथ का जलाभिषेक करने से साधक को समस्त भौतिक सुख-सुविधाएं प्राप्त होती हैं। पूजन विधि और व्रत की प्रक्रिया इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां  व्रत का महत्व और लाभ कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी (Krishnapingal Sankashti Chaturthi) का व्रत रखने से जीवन की तमाम रुकावटें समाप्त होती हैं और व्यक्ति को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस उपवास से मन को शांति मिलती है, आत्मबल बढ़ता है और परिवारिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। भगवान गणेश की कृपा से व्रती के सभी कार्य निर्विघ्न पूर्ण होते हैं। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news #KrishnaPingalaChaturthi2025 #SankashtiChaturthi #GaneshVrat #PujaVidhi #MoonriseTime #ChaturthiPuja #HinduFestivals2025

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Budhwa Mangal 2025

बुढ़वा मंगल 2025: चौथा बड़ा मंगल, हनुमान भक्ति से कटेंगे सारे संकट

इस वर्ष 2025 में बुढ़वा मंगल (Budhwa Mangal) का चौथा मंगलवार 3 जून को पड़ रहा है। यह दिन विशेष रूप से उत्तर भारत, खासकर उत्तर प्रदेश में भगवान हनुमान (Lord Hanuman) की उपासना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और भक्ति के साथ हनुमानजी की पूजा करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।  बुढ़वा मंगल का महत्व बड़ा मंगल (Budhwa Mangal) का धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है। मान्यता है कि त्रेता युग में ज्येष्ठ माह के एक मंगलवार को भगवान श्रीराम (Lord SriRam) और हनुमान जी का प्रथम मिलन हुआ था, जिसे अत्यंत शुभ और पावन घटना माना जाता है। इसी कारण ज्येष्ठ मास के मंगलवार ‘बड़ा मंगल’ के रूप में मनाए जाते हैं। एक अन्य कथा के अनुसार अवध के नवाब शुजा-उद-दौला की बेगम को संतान की प्राप्ति होने पर उन्होंने अलीगंज (लखनऊ) में एक हनुमान मंदिर (Hanuman Mandir) का निर्माण कराया। संयोगवश मंदिर का उद्घाटन ज्येष्ठ महीने के मंगलवार को हुआ, जिसके बाद से इस माह के सभी मंगलवारों को बड़ा मंगल (Budhwa Mangal) के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई। बड़ा मंगल न केवल धार्मिक आस्था का पर्व है, बल्कि यह सामाजिक सौहार्द और आपसी एकता का भी प्रतीक बन चुका है। इस दिन हिंदू-मुस्लिम समुदाय के लोग मिलकर भंडारे और प्रसाद वितरण जैसे सेवा कार्य करते हैं, जिससे समाज में भाईचारे की भावना और अधिक प्रबल होती है। पूजा विधि और अनुष्ठान बड़ा मंगल (Budhwa Mangal) के पावन अवसर पर हनुमान जी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ और लाल रंग के वस्त्र धारण करें। फिर घर में या मंदिर में हनुमान जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। पूजा की शुरुआत देसी घी का दीपक जलाकर करें। हनुमान जी को सिंदूर और चमेली का तेल अर्पित करें, जो उन्हें अत्यंत प्रिय माने जाते हैं। साथ ही, लाल फूल और तुलसी की माला चढ़ाएं। भोग स्वरूप बूंदी के लड्डू, गुड़ और भुने चने अर्पित करें। इसके पश्चात श्रद्धापूर्वक हनुमान चालीसा और बजरंग बाण का पाठ करें। पूजन के दौरान “ॐ हं हनुमते नमः” जैसे मंत्रों का जाप करना अत्यंत फलदायक माना जाता है। पूजन का समापन आरती के साथ करें और यदि किसी प्रकार की त्रुटि पूजा में हुई हो, तो भगवान से क्षमा-याचना करें। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां हनुमानजी के मंत्रों का जाप बुढ़वा मंगल (Budhwa Mangal) के शुभ अवसर पर यदि श्रद्धा और आस्था के साथ हनुमान जी के विशेष मंत्रों का जाप किया जाए, तो इससे न केवल जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, बल्कि भूत-प्रेत जैसी नकारात्मक शक्तियों और ऊर्जा से भी रक्षा मिलती है। यह माना जाता है कि इन मंत्रों के उच्चारण से मानसिक शांति, साहस और आत्मबल की वृद्धि होती है। हनुमान जी के कुछ ऐसे चमत्कारिक मंत्र इस दिन विशेष फल प्रदान करते हैं, जैसे: नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Budhwa Mangal #BudhwaMangal2025 #HanumanBhakti #BigMangal #HanumanTuesday #HinduFestivals #BudhwaMangalRemedies #SpiritualTuesday #LordHanuman

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Gupt Navratri puja vidhi

आषाढ़ गुप्त नवरात्रि 2025: घट स्थापना का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

हिंदू धर्म में नवरात्रि का विशेष स्थान है। साल भर में कुल नौ नवरात्रि मनाए जाते हैं, जिनमें से आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि भी एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह नवरात्रि भगवान शिव और माता दुर्गा की आराधना का खास समय माना जाता है। आषाढ़ गुप्त नवरात्रि 2025 (Ashadha Gupt Navratri 2025) की तिथियां और घट स्थापना का शुभ मुहूर्त जानना हर भक्त के लिए आवश्यक है, ताकि वे इस पावन पर्व का सही तरीके से आयोजन कर सकें। आषाढ़ गुप्त नवरात्रि 2025 (Ashadha Gupt Navratri 2025) कब है? पंचांग के अनुसार आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 25 जून की शाम 4 बजे से आरंभ होगी। हिंदू धर्म में उदया तिथि को विशेष महत्व दिया जाता है, इसलिए आषाढ़ गुप्त नवरात्रि (Ashadha Gupt Navratri) 26 जून से शुरू होगी। यह नवरात्रि 26 जून को दोपहर 1 बजकर 24 मिनट पर समाप्त होगी। हिंदू पंचांग के मुताबिक, घटस्थापना का शुभ समय 26 जून को सुबह 5:25 बजे से लेकर सुबह 6:58 बजे तक होगा। इसके अलावा, अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:56 बजे से दोपहर 12:52 बजे तक रहेगा, जिसमें भी घटस्थापना की जा सकती है। गुप्त नवरात्रि का धार्मिक महत्व सनातन परंपरा में गुप्त नवरात्रि को अत्यंत शक्तिशाली और रहस्यमय साधना का काल माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुप्त नवरात्रि (Gupt Navratri) के दौरान मां दुर्गा (Maa Durga) की दस महाविद्याओं का प्राकट्य हुआ था, और इसी कारण इस काल में उनकी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि यदि इस पावन समय में देवी दुर्गा के 32 विशिष्ट नामों का जाप श्रद्धा और नियमपूर्वक किया जाए, तो जीवन की सभी समस्याएं और संकट समाप्त हो सकते हैं। साथ ही दुर्गा सप्तशती, देवी महात्म्य और श्रीमद् देवी भागवत जैसे ग्रंथों का पाठ करने से नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है। गुप्त नवरात्रि (Gupt Navratri)  की साधना विशेष रूप से कुंडली के दोषों को दूर करने वाली मानी जाती है। यह काल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति के लिए अत्यंत उपयुक्त है। मान्यता है कि इस दौरान की गई साधना साधक को आध्यात्मिक रूप से जागरूक करती है और उसे देवी कृपा का भागी बनाती है। आषाढ़ गुप्त नवरात्रि में घट स्थापना क्यों जरूरी है? गुप्त नवरात्रि की शुरुआत घट स्थापना से होती है। यह घट पूजा नवरात्रि के दौरान देवी माँ के आवास के रूप में स्थापित किया जाता है। इसे स्थापित करना शुभ माना जाता है क्योंकि घट से घर और मंदिर में पवित्रता आती है। इस घट में जल, पंचामृत, सुपारी, अक्षत, आदि रखा जाता है जो देवी शक्ति का प्रतीक हैं। घट स्थापना से पूरे नवरात्रि की पूजा विधिवत संपन्न होती है। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां घट स्थापना की विधि नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Ashadha Gupt Navratri #AshadhaGuptNavratri2025 #GhatasthapanaMuhurat #GuptNavratriPujaVidhi #AshadhaNavratri #SecretNavratri #NavratriRituals

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payal and black thread together meaning

पैरों में पायल और काला धागा एक साथ पहनना: शुभ है या अपशकुन?

भारतीय संस्कृति में महिलाओं के पहनावे और आभूषणों का विशेष महत्व होता है। पायल (Anklets) और काला धागा (Black Thread) जैसे परिधान न केवल सौंदर्य को बढ़ाते हैं, बल्कि इन्हें कई धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं से भी जोड़ा जाता है। हालांकि इन दोनों का प्रयोग अलग-अलग कारणों से होता है, लेकिन सवाल उठता है कि क्या महिलाएं एक साथ पैरों में पायल और काला धागा पहन सकती हैं? क्या यह शुभ होता है या इससे अपशकुन आता है? इस लेख में हम इस विषय के सभी महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा करेंगे। पायल का महत्व  पायल (Anklets) पहनने की प्रथा बहुत प्राचीन है और इसे केवल सजावट के लिए नहीं बल्कि स्वास्थ्य और ऊर्जा के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। विशेष रूप से चांदी की पायल पहनने से शरीर में ठंडक बनी रहती है, क्योंकि चांदी एक ऐसी धातु है जो शरीर की गर्मी को संतुलित करने में मदद करती है। यह पैरों में सूजन, दर्द और थकान जैसी समस्याओं को कम करने में मदद करती है। इसके अलावा, चांदी नकारात्मक ऊर्जा को दूर करती है और सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ावा देती है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, पायल पहनने से घर में सकारात्मक वातावरण बनता है और महिलाओं के जीवन में सौभाग्य आता है। विशेष रूप से विवाहित महिलाएं इसे शुभ माना करती हैं क्योंकि इससे उनके वैवाहिक जीवन में सामंजस्य बना रहता है और मानसिक तनाव भी कम होता है। काला धागा पहनने की परंपरा काला धागा (Black Thread) नकारात्मक ऊर्जा और नजरदोष से सुरक्षा का एक प्राचीन उपाय माना जाता है। इसे पैरों में बांधने से इसका प्रभाव और भी मजबूत हो जाता है। काले रंग का संबंध राहु, केतु और शनि जैसे ग्रहों से होता है, जो अशुभ प्रभावों को कम करने में सहायता करते हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, शनिवार को किसी भैरव मंदिर जाकर काले धागे (Black Thread) को सिद्ध कर पहनना बहुत शुभ माना जाता है। इससे आत्मविश्वास बढ़ता है, मन में सकारात्मकता आती है और मानसिक तनाव, भय तथा चिंता में भी कमी आती है।  इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां क्या एक साथ पहनना सही है? भारतीय संस्कृति में पायल (Anklets) को सुहाग का प्रतीक माना जाता है, इसलिए विवाहित महिलाएं इसे विशेष रूप से महत्व देती हैं। वहीं, काले धागे को नजरबट्टू के रूप में देखा जाता है और अक्सर पति या सास की सलाह पर पहनाया जाता है। ग्रामीण इलाकों में आज भी यह माना जाता है कि पायल और काला धागा एक साथ पहनना अशुभ होता है, खासकर त्योहारों या धार्मिक अवसरों पर। दूसरी ओर, शहरी युवतियां इसे फैशन ट्रेंड की तरह अपनाती हैं और नियमित पहनती हैं। धार्मिक दृष्टिकोण से देखें तो, यदि पायल और काला धागा सही भावना और श्रद्धा के साथ पहने जाएं तो इनमें कोई दोष नहीं माना जाता।  फिर भी, खास ध्यान रखने वाली बात यह है कि जिन महिलाओं की राशि मेष, वृश्चिक या कर्क हो, उन्हें यह दोनों चीजें पैरों में साथ-साथ पहनने से बचना चाहिए। ऐसा करने पर उनके स्वास्थ्य में परेशानियां आ सकती हैं, परिवार में कलह हो सकती है और आर्थिक हानि भी हो सकती है। इन राशियों की महिलाओं के लिए सलाह दी जाती है कि वे काले धागे की जगह सफेद धागा या चांदी का कड़ा पहनें, जिससे उनका भाग्य मजबूत होता है और शुभ प्रभाव आता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Anklets #Payal #BlackThread #AuspiciousSigns #IndianTradition #SpiritualBeliefs #HinduRituals #FashionWithMeaning #MythVsTruth

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