Shani Dev under feet

रावण ने शनिदेव को क्यों रखा था अपने चरणों तले?

भारतीय पौराणिक कथाओं में रावण एक ऐसा पात्र है जिसे उसके बल, बुद्धि और अहंकार के लिए जाना जाता है। लंका का राजा रावण केवल एक शक्तिशाली योद्धा ही नहीं, बल्कि महान ज्योतिषाचार्य, तांत्रिक और शिवभक्त भी था। रामायण के अनुसार, रावण ने अपने पुत्र मेघनाद के जन्म के समय ग्रहों की स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की थी। लेकिन इसी प्रसंग में शनिदेव (ShaniDev) से उसका टकराव हो गया। यह कथा आज भी धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। ग्रहों को किया था नियंत्रित कहते हैं कि जब रावण के पुत्र मेघनाद का जन्म होने वाला था, तब रावण (Ravana) चाहता था कि वह अमर और अजेय योद्धा बने। इसके लिए रावण ने नवग्रहों को एक-एक कर बंदी बना लिया और उन्हें अपने दरबार में एक विशेष स्थान पर उल्टी दिशा में बैठा दिया। उसका उद्देश्य यह था कि ग्रहों की चाल उसके अनुसार चले और किसी भी तरह से मेघनाद के जीवन में कोई बाधा न आए। रावण ने शनि, बृहस्पति, मंगल, बुध, शुक्र, राहु, केतु, सूर्य और चंद्रमा – सभी ग्रहों को नियंत्रण में ले लिया। उसने प्रत्येक ग्रह को आदेश दिया कि वे अपनी-अपनी ऊंची स्थिति में रहें, ताकि मेघनाद की कुंडली श्रेष्ठतम बन सके। शनिदेव से हुआ विरोध रावण (Ravana) ज्योतिष शास्त्र का गहरा जानकार था और चाहता था कि उसका पुत्र अत्यंत शक्तिशाली और दीर्घायु हो। इसी उद्देश्य से जब उसकी पत्नी मंदोदरी गर्भवती थी, तो रावण ने सभी ग्रहों को आदेश दिया कि वे मेघनाद के जन्म के समय उच्च और शुभ स्थिति में रहें ताकि उसके पुत्र को उत्तम ग्रहों का आशीर्वाद मिल सके। रावण (Ravana) के भय से सभी ग्रह उसकी आज्ञा का पालन करने लगे, लेकिन शनिदेव को यह अन्यायपूर्ण लगा। चूंकि शनि आयु और कर्मों का न्याय करते हैं, वे स्वेच्छा से रावण के आदेश का पालन नहीं करना चाहते थे। यह भांपते हुए रावण ने बलपूर्वक शनिदेव को उस स्थिति में स्थापित कर दिया जो मेघनाद के दीर्घायु होने के लिए आवश्यक थी। हालांकि शनिदेव (ShaniDev) ने ऊपर से रावण की बात मान ली, लेकिन जैसे ही मेघनाद के जन्म का समय आया, उन्होंने अपनी दृष्टि वक्री कर ली, जिससे मेघनाद अल्पायु हो गया। जब रावण को इस बात का पता चला, तो वह अत्यंत क्रोधित हुआ और गुस्से में आकर अपनी तलवार से शनि के पैर पर वार कर दिया, जिससे उनका एक पैर कट गया। कहा जाता है कि तभी से शनि देव लंगड़ाकर चलते हैं और उनकी गति धीमी मानी जाती है। यही कारण है कि शनि को धीमी चाल वाला ग्रह कहा जाता है और उनका प्रभाव लंबे समय तक रहता है। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां हनुमान जी ने किया शनिदेव को मुक्त हनुमान जी (Hanuman Ji) ने जब शनि देव को रावण की कैद से मुक्त कराया था, तब शनि महाराज (ShaniDev) ने उनसे प्रसन्न होकर वचन दिया कि जो भी व्यक्ति श्रद्धा से हनुमान जी की पूजा करेगा, मैं उसे अपने प्रकोप से नहीं सताऊंगा। इसी कारण माना जाता है कि शनि दोष, साढ़े साती या ढैय्या से बचाव के लिए हनुमान जी (Hanuman ji) की उपासना सबसे प्रभावी उपाय है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news ShaniDev #Ravana #ShaniDev #HinduMythology #Ramayan #ShaniDosha #MythologicalFacts

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Tulsi plant dried

तुलसी के नियम: सूख जाए तुलसी का पौधा तो घबराएं नहीं, अपनाएं ये उपाय, मिलेगी सुख-समृद्धि

तुलसी का पौधा हिंदू धर्म में अत्यंत पूजनीय माना जाता है। इसे केवल एक साधारण पौधा नहीं, बल्कि देवी का स्वरूप माना गया है। तुलसी (Tulsi) को ‘विष्णुप्रिया’ कहा गया है और यह हर घर की आस्था, पवित्रता और सकारात्मक ऊर्जा की प्रतीक होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तुलसी (Tulsi) का पौधा घर में लगाने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सुख-समृद्धि बनी रहती है। लेकिन अक्सर देखा गया है कि समय के साथ तुलसी के पत्ते सूख जाते हैं या पौधा पूर्ण रूप से सूख जाता है। ऐसे में कई लोग भ्रमित हो जाते हैं कि क्या सूखी तुलसी को फेंकना पाप होगा या इसके लिए कोई विशेष नियम हैं? तो आइए जानें तुलसी से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण धार्मिक मान्यताएं और सूखी तुलसी से जुड़े नियम (Tulsi Rule), जिनका पालन करने से दोष नहीं लगता, बल्कि जीवन में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है। तुलसी का धार्मिक महत्व तुलसी (Tulsi) का उल्लेख अनेक पुराणों और धर्मग्रंथों में मिलता है। पद्म पुराण और स्कंद पुराण में तुलसी (Tulsi) की महिमा का विस्तृत वर्णन है। माना जाता है कि तुलसी के पौधे में माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु (Lord Vishnu) का वास होता है। इसे घर में लगाना पवित्रता का प्रतीक माना गया है। हर दिन तुलसी की पूजा करना, उसके सामने दीप जलाना और “ॐ तुलस्यै नमः” मंत्र का जाप करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और दरिद्रता दूर होती है। क्या करें सूखी हुई तुलसी के पत्तों या पौधे का? अगर आपके घर में तुलसी (Tulsi) का पौधा बिना मौसम के अचानक सूख जाए, तो इसे नजरअंदाज न करें। यह घर में बढ़ती नकारात्मक ऊर्जा, पारिवारिक कलह या आर्थिक नुकसान का संकेत हो सकता है। हालांकि तुलसी का सूखना स्वाभाविक भी हो सकता है, लेकिन यदि यह अनायास और बिना कारण हो रहा है, तो कुछ विशेष उपायों को अपनाकर आप सकारात्मक ऊर्जा को फिर से आमंत्रित कर सकते हैं। 1. तुलसी की जड़ को प्रवेश द्वार पर टांगेसूखी तुलसी (Tulsi) के पौधे की जड़ को धीरे से निकालकर साफ पानी से धो लें। इसके बाद इसे लाल या पीले रंग के साफ कपड़े में लपेट लें और घर के मुख्य द्वार पर टांग दें। यह उपाय घर में सकारात्मक ऊर्जा लाता है और मां लक्ष्मी की कृपा बनाए रखता है। 2. तुलसी की लकड़ियों से बनाएं दीपकसूखी हुई तुलसी (Tulsi) से सात छोटी-छोटी लकड़ियां एकत्र करें और इन्हें सूत या कलावे से बांध दें। अब इन लकड़ियों को गाय के घी में डुबोकर एक दीपक में रखें और भगवान विष्णु के सामने जलाएं। यह उपाय विशेष रूप से एकादशी या त्रयोदशी तिथि पर करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है। इससे भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है और घर में शांति बनी रहती है। 3. गंगाजल से करें शुद्धिकरणतुलसी (Tulsi) की इन्हीं सात लकड़ियों को साप्ताहिक रूप से गंगाजल में भिगो दें। इसके बाद उसी गंगाजल से पूरे घर में हल्का छिड़काव करें। यह विधि घर से नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त करने में सहायक होती है और वातावरण को पवित्र बनाती है। 4. तुलसी की लकड़ी पर्स या तिजोरी में रखेंतुलसी की सात लकड़ियों को पूजन कर एक लाल कपड़े या पीले धागे में बांध लें। अब इसे अपने पर्स, तिजोरी या धन रखने के स्थान में रखें। यह उपाय धन की स्थिरता बनाए रखने में सहायक माना गया है और इससे मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां 5. तुलसी की जड़ से करें ग्रह दोष निवारणयदि आपकी कुंडली में ग्रह दोष हैं, तो सूखी तुलसी की थोड़ी सी जड़ लेकर उसे लाल कपड़े में लपेटें और इसे गले या बाजू में धारण करें। यह उपाय नकारात्मक ग्रहों के प्रभाव को कम करता है और कुंडली में संतुलन स्थापित करता है। इन सभी उपायों में आस्था और श्रद्धा अत्यंत आवश्यक है। तुलसी केवल एक पौधा नहीं, बल्कि एक देवी स्वरूप है, जिसकी पूजा से जीवन में सुख, समृद्धि और शांति का वास होता है। इसलिए जब भी तुलसी का पौधा सूख जाए, तो उसे फेंकने के बजाय इन उपायों से उसका सम्मानजनक निस्तारण करें और उसके दिव्य प्रभाव का लाभ उठाएं। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Tulsi #Tulsi #VastuTips #PlantCare #HolyBasil #TulsiRemedies #SpiritualBenefits #PositiveEnergy #HinduRituals #GardeningTips

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Kuldevi and Kuldevata

क्या आप जानते हैं आपके कुलदेवी-देवता कौन हैं?

भारतीय संस्कृति में कुलदेवी (Kuldevi) और कुलदेवता का विशेष स्थान है। ये वे दिव्य शक्तियाँ हैं जो पीढ़ियों से किसी कुल या वंश की रक्षा करती आई हैं। हर जाति, समाज या गोत्र की अपनी एक कुलदेवी या कुलदेवता होते हैं, जिन्हें परिवार की परंपराओं के अनुसार पूजा जाता है। ऐसा माना जाता है कि कुलदेवी-देवता की कृपा से परिवार में सुख, समृद्धि और उन्नति बनी रहती है, वहीं अगर इनकी उपेक्षा की जाए तो जीवन में बाधाएं, अशांति और कष्ट आ सकते हैं। लेकिन आज के बदलते समय में बहुत से लोग यह नहीं जानते कि उनके कुलदेवी या कुलदेवता (Kuldevta) कौन हैं, या उन्हें कैसे पूजा जाए। कई बार यह जानकारी बुजुर्गों के जाने के साथ ही परिवार में खत्म हो जाती है। आइए जानते हैं कि कैसे आप अपने कुलदेवी-देवता की पहचान कर सकते हैं, और किन बातों का ध्यान रखकर आप उनकी कृपा प्राप्त कर सकते हैं। इस तरह लगाएं अपने कुलदेवी-देवता का पतायदि आपको अपने कुलदेवी (Kuldevi) या कुलदेवता (Kuldevta) की जानकारी नहीं है, तो आप अपने गोत्र के माध्यम से इसका पता लगा सकते हैं। हर गोत्र से संबंधित एक विशिष्ट देवी या देवता होते हैं। इसके लिए आप किसी विद्वान ज्योतिषाचार्य या पंडित से मार्गदर्शन ले सकते हैं। इसके अलावा, अपने परिवार के बुजुर्गों से भी इस विषय में जानकारी प्राप्त की जा सकती है, क्योंकि वे पीढ़ियों से चली आ रही पूजा-पद्धति से परिचित होते हैं। यदि परिवार में कोई बुजुर्ग जीवित नहीं हैं, तो यह जानने का प्रयास करें कि आपके कुल या वंश की मुख्य पूजा कहां और किस स्थान पर होती है। यह जानकारी भी आपको आपके कुलदेवी-देवता की पहचान करने में मदद कर सकती है। कैसे जानें कौन हैं आपके कुलदेवी-देवता? कई परिवारों के पारंपरिक पुरोहित या पंडित होते हैं जो पीढ़ियों से परिवार की पूजा करते आए हैं। वे आपके कुलदेवता या कुलदेवी के बारे में जानकारी दे सकते हैं, साथ ही यह भी बता सकते हैं कि उनकी पूजा कब और कैसे करनी चाहिए। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां कुलदेवी-देवता को नाराज करने वाले कार्य अपने कुलदेवी (Kuldevi) या कुलदेवता की पूजा-अर्चना कभी भी बंद न करें और उन्हें भूलने की भूल न करें। ऐसा करने से उनकी कृपा आपसे दूर हो सकती है, जिससे जीवन में अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ और परेशानियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। पूजा के समय अपने कुलदेवी-देवता का मन ही मन स्मरण अवश्य करें। यदि आपको उनके नाम याद न हों, तो आप उस स्थान का नाम लेकर भी उनकी पूजा कर सकते हैं, जहाँ वे विराजमान हैं। इसके अलावा, यदि आपके कुलदेवी-देवता किसी अन्य स्थान पर स्थित हैं, तो समय-समय पर वहां जाकर उनके दर्शन करना और आशीर्वाद लेना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Kuldevi #Kuldevi #Kuldevata #FamilyDeity #HinduTradition #SpiritualHeritage #AncestralGod

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Goddess Chhinnamasta

Goddess Chhinnamasta: चमत्कारी रूप… अद्भुत अवतार — देवी छिन्नमस्तिका का कैसे हुआ अवतरण?

देवी छिन्नमस्तिका (Goddess Chhinnamasta) हिन्दू धर्म की एक अत्यंत प्राचीन और शक्तिशाली देवी हैं, जिन्हें छिन्नमस्ता, छिन्नमूर्ति और छिन्नमालिनी के नाम से भी जाना जाता है। वे शक्ति की प्रकटीकरण हैं और उनके रूप में दिव्य ऊर्जा का संचार होता है। उनकी भव्य और रहस्यमय छवि अनेक लोगों को आकर्षित करती है। आज हम जानेंगे कि कैसे हुआ देवी छिन्नमस्तिका का अवतरण और उनकी पूजा का महत्व क्या है। छिन्नमस्तिका पूजा का महत्व देवी छिन्नमस्तिका (Goddess Chhinnamasta) की पूजा विशेष रूप से तंत्र साधना में महत्वपूर्ण मानी जाती है। उनकी आराधना से भक्तों को भय, रोग, शत्रुता, मानसिक तनाव और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति मिलती है। इसके अलावा, छिन्नमस्तिका देवी अपने भक्तों को आत्मविश्वास, साहस, और जीवन की अनिश्चितताओं से लड़ने की शक्ति प्रदान करती हैं। उनकी पूजा में मंत्र जाप, हवन और यंत्र स्थापना की जाती है। विशेषकर नवमी या चतुर्दशी तिथि को उनकी आराधना की जाती है, जिसे उनके अनुयायी बड़ी श्रद्धा और विधिपूर्वक करते हैं। शिव जी से जुड़ा संबंध:  कई स्थानों पर यह माना जाता है कि माता छिन्नमस्तिका देवी काली का ही एक रूप हैं। अन्य प्रसिद्ध कथाओं के अनुसार, एक बार संसार में भारी संकट और अराजकता फैल गई थी। इस संकट से मुक्ति पाने के लिए लोगों ने देवी पार्वती की तपस्या की। तब माता ने भक्तों के दुःख दूर करने हेतु छिन्नमस्ता का रूप धारण किया और विश्व में पुनः शांति स्थापित की।हालांकि, मां का यह स्वरूप अत्यंत प्रचंड था, जिससे पृथ्वी पर विनाश फैल गया। इस स्थिति में सभी देवताओं ने एकजुट होकर भगवान शिव (Lord Shiva) से सहायता मांगी। उनकी प्रार्थना सुनकर भोलेनाथ मां छिन्नमस्ता के पास पहुँचे। स्वयं को इस प्रकार किया संतुष्ट:जब भगवान शिव (Lord Shiva) माता छिन्नमस्ता के पास पहुँचे, तब देवी ने उनसे कहा, “हे स्वामी, मुझे अत्यंत भूख लगी है, मैं अपनी इस भूख को कैसे शांत करूं?” इस पर शिवजी (Lord Shiva) ने उत्तर दिया, “आप ही समस्त ब्रह्मांड की धारक हैं, फिर आपको किसी और की आवश्यकता क्यों होनी चाहिए?”यह सुनकर देवी छिन्नमस्ता ने तुरंत अपने खड्ग से अपनी गर्दन काट ली और अपना सिर अपने बाएं हाथ में धारण कर लिया।देवी के कटे हुए गले से तीन रक्त धाराएं निकलने लगीं — एक धारा को उन्होंने स्वयं ग्रहण किया, जबकि शेष दो धाराओं के माध्यम से उन्होंने अपनी दोनों सहचरी देवियों को संतुष्ट किया। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां देवी छिन्नमस्ता की पूजा क्यों मानी जाती है चुनौतीपूर्ण? देवी छिन्नमस्ता (Goddess Chhinnamasta) को एक अत्यंत तीव्र, भयावह और उग्र रूप में जाना जाता है। वे तंत्र साधना की महत्वपूर्ण देवी हैं और उनकी आराधना जैन व बौद्ध परंपराओं में भी की जाती है। बौद्ध धर्म में उन्हें “छिन्नमुण्डा वज्रवराही” के रूप में पूजा जाता है।छिन्नमस्ता देवी मृत्यु की प्रतीक मानी जाती हैं और वे योगशक्ति, कामनाओं पर नियंत्रण और यौन वासनाओं के दमन का प्रतिनिधित्व करती हैं। देवी का रूप अत्यंत विचित्र है — वे स्वयं अपने खड्ग से अपना सिर काटकर उसे हाथ में धारण करती हैं और अपनी गर्दन से निकलती रक्त की धाराओं में से एक को स्वयं पीती हैं।उनका यह स्वरूप भयावह और उग्र माना जाता है। इसी कारण आम घरों में या पारंपरिक मंदिरों में उनकी पूजा नहीं की जाती। उनकी आराधना केवल विशेष तांत्रिक मंदिरों या साधना स्थलों पर की जाती है, जहां विशेष विधियों और सावधानियों के साथ पूजा सम्पन्न की जाती है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Goddess Chhinnamasta #goddesschhinnamasta #hindugoddesse #mahavidya #spiritualawakening #shaktipath #chhinnamastika #fiercegoddess #tantricsymbolism

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Kanwar Yatra start date

कांवड़ यात्रा 2025: 11 जुलाई से शुरू होगी भोलेनाथ की भक्ति यात्रा

हर वर्ष की तरह इस बार भी सावन मास में भगवान शिव के भक्तों की आस्था का महापर्व ‘कांवड़ यात्रा’ 11 जुलाई 2025, शुक्रवार से आरंभ होगी। यह यात्रा श्रावण मास के पहले दिन यानी प्रतिपदा तिथि से प्रारंभ होती है और शिवरात्रि तक चलती है। इस दौरान लाखों श्रद्धालु गंगा जल लेकर अपने-अपने क्षेत्रों के शिव मंदिरों में जलाभिषेक करते हैं। सावन मास की तिथियां और शिवरात्रि पंचांग के अनुसार, 2025 में श्रावण मास की शुरुआत 11 जुलाई से होगी। इस महीने के प्रत्येक सोमवार को ‘सावन सोमवार’ का व्रत रखा जाता है, जो भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। इस वर्ष की श्रावण शिवरात्रि 15 जुलाई को मनाई जाएगी। सावन 2025 की शुरुआत और समाप्ति तिथिवैदिक पंचांग के अनुसार, सावन माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि 11 जुलाई को रात 2 बजकर 6 मिनट से शुरू होगी। यह तिथि 12 जुलाई की रात 2 बजकर 8 मिनट पर समाप्त होगी। इसलिए, सावन मास की शुरुआत 11 जुलाई से मानी जाएगी, जबकि यह माह 9 अगस्त को समाप्त होगा। कांवड़ यात्रा का धार्मिक महत्व कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) का संबंध समुद्र मंथन की कथा से जुड़ा है। मान्यता है कि जब समुद्र मंथन से निकले विष को भगवान शिव (Lord Shiva) ने ग्रहण किया, तब उनके गले में जलन हुई। इस जलन को शांत करने के लिए देवताओं ने गंगा जल से उनका अभिषेक किया। तब से यह परंपरा चली आ रही है कि श्रावण मास में भक्त गंगा जल लाकर शिवलिंग पर अर्पित करते हैं। कांवड़ यात्रा क्यों होती है कठिन?कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) को बेहद कठिन माना जाता है क्योंकि श्रद्धालुओं को सिर या कंधे पर भारी कांवड़, जिसमें गंगा जल भरा होता है, लेकर लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। इस यात्रा की शारीरिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, यात्रा से पहले अच्छे स्वास्थ्य का होना आवश्यक है। यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की सहायता के लिए कई कांवड़ यात्रा शिविर लगाए जाते हैं, जिन्हें सरकार, धार्मिक और सामाजिक संगठनों द्वारा संचालित किया जाता है। उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रियों पर हेलीकॉप्टर से पुष्पवर्षा भी की जाती है, जिससे उनकी हौसला-अफजाई होती है। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां जानिए कांवड़ यात्रा की शुरुआत कहाँ से होती हैकांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) की शुरुआत आमतौर पर हरिद्वार या गंगा नदी से जल भरने के बाद होती है। कांवड़िए गंगा नदी से पवित्र जल लेकर भगवान शिव (Lord Shiva) के मंदिर की ओर निकलते हैं। कई कांवड़िए इस दौरान पैदल सैकड़ों किलोमीटर की लंबी यात्रा करते हैं। कांवड़ यात्रा के कई मार्ग होते हैं, लेकिन सबसे प्रसिद्ध रास्ता हरिद्वार से देवघर तक जाता है। यात्रा इन मार्गों से होकर गुजरेगीकांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) के रास्ते में हरिद्वार, देहरादून, ऋषिकेश, हाथरस, बुलंदशहर, दिल्ली, गाजियाबाद, मेरठ, मुजफ्फरनगर, प्रयागराज, वाराणसी जैसे महत्वपूर्ण स्थानों पर कांवड़ यात्रा शिविर लगाए जाते हैं। पूरे सावन माह के दौरान कांवड़ यात्री “बम-बम भोले” और “जय शिव” के जयकारे लगाते हुए यात्रा करते हैं। यह यात्रा केवल एक धार्मिक तीर्थयात्रा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता, सद्भाव और भाईचारे का भी प्रतीक है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Kanwar Yatra #KanwarYatra2025 #BholeBaba #Sawan2025 #ShivBhakti #BolBam2025 #ShivYatra #HarHarMahadev

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Nirjala Ekadashi

निर्जला एकादशी 2025: सबसे कठिन व्रत, जो देता है साल भर की एकादशियों का पुण्य

हिंदू पंचांग के अनुसार निर्जला एकादशी व्रत (Nirjala Ekadashi) को सभी एकादशियों में सबसे अधिक फलदायक और कठोर तपस्वी व्रत माना गया है। यह व्रत ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है। इस दिन व्रती बिना जल और अन्न के उपवास करता है, इसलिए इसे निर्जला एकादशी के नाम से जाना जाता है। निर्जला एकादशी 2025 में कब है? हिंदू धर्म में मान्यता के अनुसार, इस वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 6 जून 2025 को रात 2 बजकर 15 मिनट पर होगी और यह तिथि 7 जून को सुबह 4 बजकर 47 मिनट तक रहेगी। पंचांग पर आधारित गणना के अनुसार उदया तिथि को ही प्रधानता दी जाती है, इसलिए इस बार निर्जला एकादशी का पावन व्रत शुक्रवार, 6 जून 2025 को रखा जाएगा। क्या है निर्जला एकादशी व्रत? निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi) व्रत का मुख्य उद्देश्य शरीर और मन की पवित्रता, आत्मिक विकास और भगवान विष्णु की कृपा को प्राप्त करना होता है। यह व्रत खासतौर पर उन श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है जो पूरे वर्ष एकादशी का व्रत नहीं रख पाते। धर्मग्रंथों में उल्लेख है कि यदि कोई व्यक्ति केवल निर्जला एकादशी का व्रत पूरी श्रद्धा से करता है, तो उसे वर्ष भर की सभी एकादशियों के बराबर पुण्य फल प्राप्त होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों को इस व्रत के महत्व को बताते हुए कहा था कि यह व्रत मनुष्य के सभी पापों को नष्ट करता है और मोक्ष की प्राप्ति कराता है। निर्जला एकादशी व्रत के नियम  इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां निर्जला एकादशी के लाभ  निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi) का व्रत अत्यंत पुण्यफलदायक माना जाता है और यह सभी एकादशियों में श्रेष्ठ स्थान रखता है। इसे भी भीमसेनी एकादशी के रूप में जाना जाता है। मान्यता है कि महाभारत काल में पांडवों में से भीम ने केवल इसी एकादशी का कठोर व्रत रखकर सभी एकादशियों का पुण्य अर्जित किया था। ऐसा कहा जाता है कि यदि यह व्रत पूरी निष्ठा और आस्था के साथ किया जाए, तो भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह व्रत व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाता है तथा आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Nirjala Ekadashi #NirjalaEkadashi2025 #EkadashiFast #HinduFasting #SpiritualBenefits #BhimseniEkadashi #HinduFestival2025 #EkadashiVrat

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Jagannath temple celebration

जगन्नाथ रथ यात्रा 2025: आस्था और भक्ति की भव्य यात्रा

भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की भव्य रथ यात्रा (Jagannath Rath Yatra) इस वर्ष 27 जून 2025, शुक्रवार को आयोजित की जाएगी। यह यात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया तिथि से प्रारंभ होती है और इसे ‘घोषा यात्रा’ या ‘श्री गुंडिचा यात्रा’ के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। जगन्नाथ रथ यात्रा 2025 (Jagannath Rath Yatra 2025) की तिथि और प्रमुख अनुष्ठान  धार्मिक महत्व मान्यताओं के अनुसार, जो श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath) के रथ को खींचते हैं, उसे देखते हैं या केवल स्पर्श भी करते हैं, उन्हें अत्यंत पुण्य की प्राप्ति होती है। माना जाता है कि इस रथ यात्रा (Rath Yatra) के दर्शन मात्र से व्यक्ति के कई जन्मों के पाप समाप्त हो जाते हैं। यह रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, भक्ति और भव्यता का अनुपम संगम है। यह यात्रा यह संदेश देती है कि जब मन निष्कलंक और प्रेम से परिपूर्ण होता है, तो स्वयं भगवान भी भक्तों के बीच आते हैं। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां मौसी के घर होती है विशेष सेवा  मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath), उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से पहले कुछ समय के लिए अस्वस्थ हो जाते हैं और लगभग 15 दिनों तक विश्राम करते हैं। जब वे स्वस्थ होकर विश्रामगृह से बाहर आते हैं, तब इस आनंद के अवसर पर रथ यात्रा (Rath Yatra) का आयोजन होता है।इस दौरान तीनों भगवान विशाल रथों पर सवार होकर अपनी मौसी के घर (गुंडिचा मंदिर) जाते हैं, जहां उनका विशेष सत्कार होता है और वे सात दिनों तक वहां ठहरते हैं। इसके बाद वे पुनः अपने मूल स्थान श्रीजगन्नाथ मंदिर लौटते हैं। विशेष रथों में विराजते हैं भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के लिए विशेष रथ बनाए जाते हैं। जगन्नाथ रथ यात्रा (Lord Jagannath) में तीन अलग-अलग रथ होते हैं, जिन पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा विराजमान होते हैं। भगवान जगन्नाथ का रथ, जिसे नंदीघोष कहा जाता है, लाल और पीले रंगों से सजाया जाता है और इसकी ऊंचाई लगभग 45.5 फीट होती है। इस रथ का निर्माण केवल नीम की लकड़ी से किया जाता है और इसमें कील या किसी भी प्रकार के धातु का इस्तेमाल नहीं होता। इसकी तैयारी अक्षय तृतीया से शुरू हो जाती है। इस रथ में कुल 16 पहिए होते हैं और यह बलभद्र तथा सुभद्रा के रथों की तुलना में थोड़ा बड़ा होता है।  सुरक्षा और प्रशासनिक तैयारियाँ श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (SJTA) ने इस वर्ष के रथ यात्रा के लिए विशेष तैयारियाँ की हैं। पिछले वर्ष ‘पाहंडी’ अनुष्ठान के दौरान हुई दुर्घटना को ध्यान में रखते हुए, इस बार प्रत्येक रथ के लिए अलग-अलग ‘पाहंडी’ टीमों का गठन किया गया है। इसके अलावा, भीड़ नियंत्रण के लिए विशेष उपाय किए गए हैं, और रथों पर मोबाइल फोन के उपयोग पर प्रतिबंध जारी रहेगा। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Jagannath #JagannathRathYatra2025 #RathYatra #LordJagannath #PuriFestival #HinduFestivals #OdishaCulture #ChariotFestival

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Baba Khatu Shyam

कब जरुरी है बाबा खाटू श्याम के दरबार में हाजिरी लगाना

भारत के आध्यात्मिक और धार्मिक मान्यताओं में बाबा खाटू श्याम (Baba Khatu Shyam) का नाम विशेष श्रद्धा और भक्ति के साथ लिया जाता है। राजस्थान के खाटू गांव में स्थित बाबा के मंदिर में लाखों श्रद्धालु हर वर्ष आते हैं, अपनी मनोकामनाएं पूरी करने और जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति पाने के लिए। बाबा खाटू श्याम को भगवान कृष्ण (Lord Krishna) का अवतार माना जाता है, जो संकट में अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उनका जीवन सुखमय बनाते हैं। बाबा खाटू श्याम का महत्व और इतिहास बाबा खाटू श्याम जी (Baba Khatu Shyam) का असली नाम बरद्वाज ऋषि का पुत्र बारद्वाज था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, उन्होंने महाभारत युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण के लिए युद्ध किया था। भगवान कृष्ण ने उनकी वीरता और भक्ति को देखते हुए अपने रूप में उनके नाम से खाटू श्याम जी का पूजन करने का आदेश दिया। इसीलिए उनके भक्त उन्हें “श्री खाटू श्याम” के नाम से पुकारते हैं। कब लगानी चाहिए बाबा के दरबार में हाजिरी? धार्मिक मान्यता है कि जीवन में जब भी संकट, परेशानी या कठिनाइयों का सामना हो, तब बाबा खाटू श्याम (Baba Khatu Shyam) के दरबार में हाजिरी लगाना शुभ और फलदायक होता है। लेकिन इसके साथ ही कुछ संकेत भी होते हैं, जिनके मिलने पर बाबा के दरबार में विशेष भक्ति और आराधना करनी चाहिए। आइए जानते हैं उन प्रमुख संकेतों के बारे में: 1. सपनों में बाबा का दर्शन यदि आपको सपने में बाबा खाटू श्याम का दर्शन होता है, तो इसे एक विशेष संकेत माना जाता है कि बाबा आपको अपनी ओर बुला रहे हैं। ऐसे अवसर पर आपको बाबा खाटू श्याम (Baba Khatu Shyam) के दर्शन अवश्य करने चाहिए और उनकी भव्य पूजा-अर्चना करनी चाहिए। धार्मिक विश्वास के अनुसार, बाबा खाटू श्याम की उपासना से साधक के जीवन में सकारात्मक बदलाव और शुभ फल प्राप्त होते हैं, साथ ही उनकी असीम कृपा सदैव बनी रहती है। 2. खाटू श्याम बाबा की कृपा से बदली जीवन की दिशा? जीवन में कई ऐसी घटनाएं होती हैं जो हमारे मार्ग को बदल सकती हैं। यदि आपके जीवन में खाटू श्याम बाबा (Baba Khatu Shyam) की वजह से कोई सकारात्मक बदलाव आया है, तो इसे बाबा की ओर से बुलावे का संकेत समझना चाहिए। ऐसे समय में आपको अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए अवश्य खाटू श्याम मंदिर जाकर उनके दर्शन करने चाहिए। 3. खाटू श्याम मंदिर की समूह यात्रा के लिए आपको कोई संकेत या संदेश प्राप्त हुआ होगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान अपने भक्तों तक विभिन्न माध्यमों से संकेत पहुँचाते हैं। यदि आपको खाटू श्याम मंदिर (Baba Khatu Shyam) की किसी सामूहिक यात्रा के बारे में कोई संदेश या सूचना प्राप्त होती है, तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह समझना चाहिए कि यह बाबा खाटू श्याम की ओर से आपको उनके मंदिर में आने का आमंत्रण है। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां 4. बार-बार सुनाई दे रहा है खाटू श्याम बाबा का नाम अगर आप लगातार किसी न किसी रूप में खाटू श्याम बाबा का नाम सुनते रहते हैं, तो इसे एक संकेत माना जाता है कि बाबा आपको अपने पास बुला रहे हैं। ऐसे में आपको खाटू श्याम बाबा (Baba Khatu Shyam) से दर्शन करने के लिए खाटू धाम अवश्य जाना चाहिए। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Baba Khatu Shyam #BabaKhatuShyam #Krishna #LordKrishna #ShyamBhakti

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Dos and Don’ts of Shaligram Puja

शालिग्राम पूजा के नियम: भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए जानें क्या करें और क्या न करें

हिंदू धर्म में शालिग्राम शिला को भगवान विष्णु का स्वरूप माना गया है। शालिग्राम की पूजा से घर में सुख-शांति, धन-समृद्धि और सौभाग्य बना रहता है। यह शिला मुख्यतः नेपाल के गंडकी नदी से प्राप्त होती है और इसे अत्यंत पवित्र और पूजनीय माना जाता है। खासतौर पर वैष्णव संप्रदाय में शालिग्राम की उपासना अत्यधिक महत्व रखती है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि जिस घर में शालिग्राम की विधिवत पूजा की जाती है, वहां दुर्भाग्य, रोग और कलह प्रवेश नहीं करते। हालांकि, शालिग्राम जी की पूजा करते समय कुछ विशेष नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है, अन्यथा पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। पुराणों के अनुसार, शालिग्राम भगवान (Lord Shaligram) के कुल 33 स्वरूपों का वर्णन मिलता है, जिनमें से 24 शालिग्राम श्रीहरि विष्णु के 24 अवतारों के प्रतीक माने जाते हैं। उदाहरण स्वरूप, गोलाकार शालिग्राम को गोपाल स्वरूप का प्रतीक माना जाता है, वहीं मछली की आकृति वाला लंबा शालिग्राम मत्स्य अवतार का संकेत देता है। इसी तरह, कछुए जैसे आकार वाला शालिग्राम भगवान विष्णु के कूर्म या कच्छप अवतार का प्रतीक होता है। ऐसा कहा जाता है कि जहां शालिग्राम जी (Shaligram Ji)की पूजा होती है, वहां स्वयं भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का वास होता है। विष्णु पुराण में उल्लेख है कि जिस घर में शालिग्राम का वास होता है, वह स्थान तीर्थ के समान पुण्यदायी माना जाता है। इसके अतिरिक्त, शालिग्राम को अर्पित पंचामृत को प्रसाद स्वरूप ग्रहण करने से व्यक्ति के समस्त पापों का नाश होता है और वह मोक्ष की ओर अग्रसर होता है। शालिग्राम जी की पहचान शालिग्राम (Shaligram) एक काले रंग का गोल या अंडाकार पत्थर होता है, जिसमें प्राकृतिक रूप से चक्र और रेखाएं बनी होती हैं। इसे विशेष रूप से भगवान विष्णु का प्रतीक माना गया है। हर शालिग्राम में अलग-अलग लक्षण होते हैं, जैसे शंखचक्रधारी शालिग्राम, नृसिंह शालिग्राम, लक्ष्मी नारायण शालिग्राम आदि। शालिग्राम पूजन विधि: ध्यान देने योग्य बातें शालिग्राम जी (Shaligram Ji) की पूजा करते समय घर की शुद्धता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। जिस स्थान पर शालिग्राम विराजमान हों, उसे एक मंदिर की तरह पवित्र और सजावटी बनाना चाहिए। साथ ही अपने व्यवहार और विचारों को भी सात्विक बनाए रखें। शालिग्राम पूजन में नियमितता बहुत महत्वपूर्ण है। पूजन की प्रक्रिया किसी भी दिन नहीं टूटनी चाहिए — प्रतिदिन श्रद्धा और नियमपूर्वक पूजा करना आवश्यक है। शास्त्रों में शालिग्राम पर कच्चे अक्षत (चावल) चढ़ाने की मनाही है। यदि चावल अर्पित करना चाहें, तो उन्हें पहले हल्दी से पीला रंग देकर ही चढ़ाएं। यह भी माना जाता है कि भगवान शालिग्राम की पूजा तुलसी दल के बिना अधूरी मानी जाती है। तुलसी अर्पित करते ही भगवान शीघ्र प्रसन्न होते हैं। पूजा के दौरान शालिग्राम को जल से स्नान कराएं, फिर उन पर चंदन लगाएं और तुलसी के पत्ते अर्पित करें। अंत में भोग लगाएं और आरती करें। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां इन गलतियों से बचेंशालिग्राम शिला को उपहार स्वरूप लेना वर्जित माना गया है। इसे किसी से भेंट स्वरूप प्राप्त करना अशुभ परिणाम दे सकता है। इसी प्रकार, पूजा के समय शालिग्राम पर कभी भी सफेद अक्षत यानी बिना रंगे चावल अर्पित नहीं करने चाहिए। इन नियमों का पालन करके आप नकारात्मक प्रभावों से बच सकते हैं और पूजा का संपूर्ण फल प्राप्त कर सकते हैं। शास्त्रों के अनुसार, शालिग्राम जी (Shaligram Ji) को गंगाजल अर्पित नहीं करना चाहिए, क्योंकि मान्यता है कि मां गंगा का उद्गम शालिग्राम शिला से हुआ है। इसलिए शालिग्राम पर गंगाजल चढ़ाना वर्जित माना गया है। पूजा करते समय शालिग्राम को पंचामृत से स्नान कराएं, फिर उन पर चंदन का लेप करें और तुलसी दल अर्पित करें। ऐसा करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Shaligram #ShaligramPuja #VishnuWorship #HinduRituals #Spirituality #VishnuBlessings #PujaRules #HinduTraditions #ShaligramDosAndDonts

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Mahabharata war weapons

महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां

महाभारत (Mahabharata) केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह भारतीय इतिहास का एक ऐसा महाकाव्य है जिसमें धर्म, नीति, राजनीति, रणनीति, युद्ध कौशल और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। खास बात यह है कि कुरुक्षेत्र के मैदान में लड़े गए इस महायुद्ध में केवल तलवारें और धनुष-बाण ही नहीं, बल्कि अत्यंत शक्तिशाली और दिव्य अस्त्र-शस्त्रों का भी प्रयोग हुआ था, जिनकी शक्ति आज के आधुनिक हथियारों से भी कहीं अधिक थी। आइए जानते हैं उन प्रमुख अस्त्र-शस्त्रों के बारे में, जो महाभारत के युद्ध को निर्णायक बनाने में सहायक बने। 1. ब्रह्मास्त्र ब्रह्मा जी द्वारा प्रदान किया गया यह अस्त्र सबसे शक्तिशाली माना जाता था। इसका प्रयोग अर्जुन, अश्वत्थामा और कर्ण जैसे योद्धाओं के पास था। कहा जाता है कि यह अस्त्र जहाँ गिरता, वहाँ कई मीलों तक जीवन समाप्त हो जाता और भूमि बंजर हो जाती। इस अस्त्र का प्रयोग अंतिम उपाय के रूप में ही किया जाता था क्योंकि इसका प्रभाव अत्यंत विनाशकारी था। 2. पाशुपतास्त्र भगवान शिव द्वारा प्रदान किया गया यह अस्त्र केवल परम भक्तों को ही प्राप्त होता था। अर्जुन को यह अस्त्र भगवान शिव ने खुद एक परीक्षा के बाद दिया था। इसकी विशेषता यह थी कि यह शत्रु का संपूर्ण नाश कर देता था और इसे मन, वाणी, दृष्टि या धनुष से चलाया जा सकता था। 3. नारायणास्त्र नारायणास्त्र एक ऐसा दिव्य शस्त्र था जिससे पूरे ब्रह्मांड में भय व्याप्त हो जाता था। यह भगवान विष्णु का अस्त्र माना जाता है। महाभारत के युद्ध में जब अश्वत्थामा ने इसे पांडवों की सेना पर प्रयोग किया, तो देखते ही देखते हजारों सैनिक मारे गए। इसकी शक्ति इतनी प्रचंड थी कि इसका सामना कोई भी अस्त्र नहीं कर सकता था। इसे शांत करने का केवल एक ही उपाय था—पूरा समर्पण भाव और शांति का मार्ग अपनाना। 4. वरुणास्त्र इसका प्रयोग जल उत्पन्न करने के लिए किया जाता था। यह विरोधी के चारों ओर जल का घेरा बना देता था जिससे उसकी गति बाधित होती थी। युद्ध के दौरान इसे कई बार अग्नि को शांत करने के लिए भी प्रयोग किया गया। 5. सुदर्शन चक्र सुदर्शन चक्र को भगवान विष्णु का प्रमुख प्रतीक माना जाता है और यह श्रीकृष्ण के पास था। महाभारत (Mahabharata) युद्ध में कौरव और पांडव केवल बाहरी पात्र थे, जबकि असल में पापियों को उनके पापों की सजा श्रीकृष्ण अपने सुदर्शन चक्र से देते थे। यह तथ्य बर्बरीक के कटे सिर ने भी सबके सामने रखा था। सुदर्शन चक्र को न्याय और धर्म की अद्भुत शक्ति का प्रतीक माना जाता है। 6. वज्रास्त्र इंद्रदेव का यह अस्त्र भीषण गर्जना और प्रकाश के साथ वार करता था। इसकी टक्कर का कोई अस्त्र नहीं था, और यह भारी विनाश करने की क्षमता रखता था। इसे भी पढ़ें:- क्यों देवी यमुना कहलाती हैं ‘कालिंदी’? जानिए भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी इस दिव्य कथा 7. वसावी शक्ति इंद्र देव के पास वसावी शक्ति नामक एक बेहद प्रभावशाली और एकबारगी प्रयोग होने वाला अस्त्र था। यह अस्त्र इंद्र ने कर्ण को दिया था। कर्ण ने इसे अर्जुन को हराने के लिए रखा था, लेकिन परिस्थितियों के कारण उसे इसका इस्तेमाल भीम के पुत्र घटोत्कच पर करना पड़ा। ऐसा माना जाता है कि यदि यह अमोघ शक्ति अर्जुन पर प्रयोग किया जाता, तो अर्जुन का बचना लगभग असंभव होता। 8. गांडीव धनुष यह अर्जुन का धनुष था जो अग्निदेव ने उन्हें खांडव वन दहन के समय दिया था। इसकी विशेषता यह थी कि इससे निकले प्रत्येक बाण अपने लक्ष्य को भेदते थे। यह धनुष दिव्य था और इससे लगातार बिना थके तीर चलाए जा सकते थे। 9. ब्रह्मास्त्र ब्रह्मास्त्र एक अत्यंत शक्तिशाली दिव्य अस्त्र था, जिसे महाभारत (Mahabharata) के महान योद्धा जैसे अर्जुन, कर्ण और श्रीकृष्ण ने चलाने का ज्ञान प्राप्त था। युद्ध में अश्वत्थामा ने इसका उपयोग किया, जिससे गर्भ में रहे हुए शिशु तक की मृत्यु हो गई। हालांकि, अश्वत्थामा के पास इसे वापस लेने का तरीका नहीं था। शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्मास्त्र के प्रभाव को खत्म करने के लिए एक और ब्रह्मास्त्र का प्रहार करना आवश्यक होता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Mahabharata #Mahabharata #DivineAstras #IndianMythology #CelestialWeapons #Brahmastra #Pashupatastra #MahabharataWar #EpicBattle

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