रावण ने शनिदेव को क्यों रखा था अपने चरणों तले?
भारतीय पौराणिक कथाओं में रावण एक ऐसा पात्र है जिसे उसके बल, बुद्धि और अहंकार के लिए जाना जाता है। लंका का राजा रावण केवल एक शक्तिशाली योद्धा ही नहीं, बल्कि महान ज्योतिषाचार्य, तांत्रिक और शिवभक्त भी था। रामायण के अनुसार, रावण ने अपने पुत्र मेघनाद के जन्म के समय ग्रहों की स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की थी। लेकिन इसी प्रसंग में शनिदेव (ShaniDev) से उसका टकराव हो गया। यह कथा आज भी धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। ग्रहों को किया था नियंत्रित कहते हैं कि जब रावण के पुत्र मेघनाद का जन्म होने वाला था, तब रावण (Ravana) चाहता था कि वह अमर और अजेय योद्धा बने। इसके लिए रावण ने नवग्रहों को एक-एक कर बंदी बना लिया और उन्हें अपने दरबार में एक विशेष स्थान पर उल्टी दिशा में बैठा दिया। उसका उद्देश्य यह था कि ग्रहों की चाल उसके अनुसार चले और किसी भी तरह से मेघनाद के जीवन में कोई बाधा न आए। रावण ने शनि, बृहस्पति, मंगल, बुध, शुक्र, राहु, केतु, सूर्य और चंद्रमा – सभी ग्रहों को नियंत्रण में ले लिया। उसने प्रत्येक ग्रह को आदेश दिया कि वे अपनी-अपनी ऊंची स्थिति में रहें, ताकि मेघनाद की कुंडली श्रेष्ठतम बन सके। शनिदेव से हुआ विरोध रावण (Ravana) ज्योतिष शास्त्र का गहरा जानकार था और चाहता था कि उसका पुत्र अत्यंत शक्तिशाली और दीर्घायु हो। इसी उद्देश्य से जब उसकी पत्नी मंदोदरी गर्भवती थी, तो रावण ने सभी ग्रहों को आदेश दिया कि वे मेघनाद के जन्म के समय उच्च और शुभ स्थिति में रहें ताकि उसके पुत्र को उत्तम ग्रहों का आशीर्वाद मिल सके। रावण (Ravana) के भय से सभी ग्रह उसकी आज्ञा का पालन करने लगे, लेकिन शनिदेव को यह अन्यायपूर्ण लगा। चूंकि शनि आयु और कर्मों का न्याय करते हैं, वे स्वेच्छा से रावण के आदेश का पालन नहीं करना चाहते थे। यह भांपते हुए रावण ने बलपूर्वक शनिदेव को उस स्थिति में स्थापित कर दिया जो मेघनाद के दीर्घायु होने के लिए आवश्यक थी। हालांकि शनिदेव (ShaniDev) ने ऊपर से रावण की बात मान ली, लेकिन जैसे ही मेघनाद के जन्म का समय आया, उन्होंने अपनी दृष्टि वक्री कर ली, जिससे मेघनाद अल्पायु हो गया। जब रावण को इस बात का पता चला, तो वह अत्यंत क्रोधित हुआ और गुस्से में आकर अपनी तलवार से शनि के पैर पर वार कर दिया, जिससे उनका एक पैर कट गया। कहा जाता है कि तभी से शनि देव लंगड़ाकर चलते हैं और उनकी गति धीमी मानी जाती है। यही कारण है कि शनि को धीमी चाल वाला ग्रह कहा जाता है और उनका प्रभाव लंबे समय तक रहता है। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां हनुमान जी ने किया शनिदेव को मुक्त हनुमान जी (Hanuman Ji) ने जब शनि देव को रावण की कैद से मुक्त कराया था, तब शनि महाराज (ShaniDev) ने उनसे प्रसन्न होकर वचन दिया कि जो भी व्यक्ति श्रद्धा से हनुमान जी की पूजा करेगा, मैं उसे अपने प्रकोप से नहीं सताऊंगा। इसी कारण माना जाता है कि शनि दोष, साढ़े साती या ढैय्या से बचाव के लिए हनुमान जी (Hanuman ji) की उपासना सबसे प्रभावी उपाय है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news ShaniDev #Ravana #ShaniDev #HinduMythology #Ramayan #ShaniDosha #MythologicalFacts

