Copper Ring

तांबे का छल्ला पहनने के चमत्कारी फायदे

तांबा (Copper) एक ऐसा धातु है, जिसका उपयोग हजारों वर्षों से आयुर्वेद और वास्तु शास्त्र में किया जाता रहा है। खासकर तांबे का छल्ला (Copper Ring) या अंगूठी पहनने को शुभ माना जाता है। यह केवल एक आकर्षक आभूषण ही नहीं होता, बल्कि इसे धारण करने से व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से कई प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं। आज के समय में भी तांबे के छल्ले  (Copper Ring) का चलन बना हुआ है और लोग इसे पहन कर अपने स्वास्थ्य और जीवन में सकारात्मक बदलाव महसूस करते हैं। तांबे का संबंध किससे है ज्योतिष शास्त्र के अनुसार तांबा मुख्य रूप से सूर्य ग्रह से जुड़ा हुआ धातु माना जाता है। जब व्यक्ति तांबे का छल्ला (Copper Ring) पहनता है, तो यह उसकी कुंडली में सूर्य की स्थिति को मजबूत करने में सहायक होता है। इसके अलावा, तांबे का संबंध मंगल ग्रह से भी माना गया है। इसलिए यदि कुंडली में मंगल ग्रह कमजोर हो, तो तांबे का छल्ला धारण करना लाभकारी हो सकता है। तांबे का छल्ला पहनने के नियम ज्योतिष शास्त्र के अनुसार तांबे का छल्ला (Copper Ring) धारण करने के लिए रविवार का दिन अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि यह दिन सूर्य देव को समर्पित होता है और तांबा भी सूर्य ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है। इसे पहनने का सबसे उपयुक्त स्थान अनामिका उंगली (Ring Finger) मानी जाती है, क्योंकि यह उंगली सूर्य से संबंधित मानी जाती है और इसमें तांबे का प्रभाव अधिक सकारात्मक होता है। इसे भी पढ़ें:- क्यों देवी यमुना कहलाती हैं ‘कालिंदी’? जानिए भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी इस दिव्य कथा तांबे का छल्ला पहनने के फायदे ध्यान देने योग्य बातें नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news  Copper Ring #CopperRingBenefits #HealthTips #VastuShastra #SpiritualHealing #CopperTherapy #WellnessTips #AncientRemedies #HolisticHealing #EnergyBalance

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Vat Savitri 2025 date and significance

Vat Savitri Vrat 2025: आस्था और अखंड सौभाग्य का पर्व वट सावित्री व्रत

भारतीय संस्कृति में व्रत-त्योहारों का विशेष स्थान है, जो न केवल धार्मिक भावनाओं को सशक्त करते हैं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक रिश्तों को भी मजबूती प्रदान करते हैं। वट सावित्री व्रत (Vat Savitri Vrat) हिन्दू धर्म में महिलाओं द्वारा रखा जाने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत है, जिसे विवाहित स्त्रियां अपने पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और सफल वैवाहिक जीवन की कामना के लिए करती हैं। वैदिक पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि 26 मई 2025 को दोपहर 12:11 बजे आरंभ होकर 27 मई की सुबह 8:31 बजे तक रहेगी। तिथि की गणना के आधार पर इस वर्ष वट सावित्री व्रत सोमवार, 26 मई 2025 को रखा जाएगा। यह व्रत पौराणिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसका उल्लेख महाभारत के वनपर्व में भी मिलता है। वट सावित्री व्रत (Vat Savitri Vrat) का मुख्य आधार वह पौराणिक कथा है, जिसमें सावित्री ने अपने अद्भुत धैर्य और भक्ति से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस लिए थे। यह व्रत हर वर्ष ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। इस पावन व्रत को विवाहित महिलाएं (Married women) श्रद्धा पूर्वक करती हैं और बरगद (वट) वृक्ष की पूजा करती हैं। धार्मिक विश्वास के अनुसार इस व्रत को करने से वैवाहिक जीवन (Married Life) में सुख-शांति बनी रहती है और पति-पत्नी के संबंधों में मधुरता तथा मजबूती आती है। वटवृक्ष को त्रिदेव – ब्रह्मा, विष्णु और महेश – का स्वरूप माना गया है।  व्रत की विधि: वट सावित्री व्रत (Vat Savitri Vrat) की पूजा प्रातःकाल से ही प्रारंभ होती है। व्रति महिलाएं स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनती हैं और निर्जला व्रत का संकल्प लेती हैं। इसके पश्चात पूजा की थाली में रोली, चावल, मौली, फल, फूल, धूप, दीपक, नई चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी आदि सामग्री रखी जाती है। इसके बाद महिलाएं वटवृक्ष (बरगद के पेड़) के पास जाकर विधिवत पूजा करती हैं। इसके साथ ही महिलाएं वट सावित्री व्रत कथा (Vat Savitri Vrat Story) का श्रवण करती हैं या स्वयं पढ़ती हैं। पूजा के बाद महिलाएं अपने पति का आशीर्वाद लेती हैं और शाम को जल या फलाहार ग्रहण करती हैं। इसे भी पढ़ें:- क्यों देवी यमुना कहलाती हैं ‘कालिंदी’? जानिए भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी इस दिव्य कथा व्रत कथा: प्राचीन समय में अश्वपति नामक राजा की पुत्री सावित्री का विवाह वनवासी सत्यवान से हुआ था, जो धर्मात्मा किंतु निर्धन थे। विवाह के पश्चात सावित्री को ज्ञात हुआ कि सत्यवान अल्पायु हैं और एक वर्ष बाद उनका देहांत हो जाएगा। इस बात को जानकर भी उसने अपने धर्म का पालन किया और अंतिम समय में जब यमराज सत्यवान के प्राण लेने आए, तो सावित्री ने अपने विवेक और तपस्या से यमराज को प्रसन्न कर लिया। सावित्री की दृढ़ निष्ठा, धर्मपरायणता और समर्पण से प्रभावित होकर यमराज ने सत्यवान के प्राण लौटा दिए और उसे दीर्घायु का आशीर्वाद दिया। तभी से यह व्रत स्त्रियों द्वारा श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news  Vat Savitri Vrat #VatSavitriVrat2025 #VatSavitriPuja #HinduFestivals #MarriedWomenFast #IndianTraditions #SavitriSatyavan #VatPurnima2025 #PujaVidhi #SpiritualIndia

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Special Worship in Jyeshtha

लड्डू गोपाल की कृपा पाने के लिए ज्येष्ठ माह में करें विशेष पूजा

भारतीय सनातन परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण को बाल स्वरूप में पूजने की परंपरा अत्यंत पुरानी है। लड्डू गोपाल, अर्थात भगवान श्रीकृष्ण (Lord Krishna) का बाल रूप, भक्तों के लिए केवल एक मूर्ति नहीं, बल्कि एक जीवंत भावनात्मक संबंध का प्रतीक होते हैं। उनके लिए भोग बनाना, वस्त्र पहनाना, झूला झुलाना और सेवा करना भक्तों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन जाता है। वर्ष का हर माह लड्डू गोपाल की भक्ति के लिए विशेष होता है, लेकिन ज्येष्ठ मास में उनकी सेवा-पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। कैसे करें लड्डू गोपाल की सेवा–पूजा ज्येष्ठ मास में? ज्येष्ठ माह में प्रतिदिन प्रातः स्नान के पश्चात सबसे पहले घंटी बजाकर लड्डू गोपाल (Laddu Gopal) को जागृत करें। इसके बाद मंदिर की साफ-सफाई करें और गंगाजल छिड़ककर स्थान को पवित्र बनाएं। फिर लड्डू गोपाल को स्नान कराएं और उन्हें साफ-सुथरे वस्त्र पहनाएं। उनके मस्तक पर चंदन का तिलक लगाएं और सुंदर शृंगार करें। इसके पश्चात दीप प्रज्वलित कर उनकी आरती करें। भोग में फल, मिठाई और माखन-मिश्री अर्पित करें। ध्यान रखें कि भोग में तुलसी के पत्ते अवश्य डालें, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि बिना तुलसी के लड्डू गोपाल भोग स्वीकार नहीं करते। इसे भी पढ़ें:- क्यों देवी यमुना कहलाती हैं ‘कालिंदी’? जानिए भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी इस दिव्य कथा ज्येष्ठ मास में विशेष तिथि – निर्जला एकादशी और वट सावित्री व्रत इस माह की निर्जला एकादशी और वट सावित्री व्रत का विशेष धार्मिक महत्व होता है। इन अवसरों पर लड्डू गोपाल की विशेष पूजा, व्रत और दान करना अति पुण्यकारी माना गया है। इन तिथियों पर भगवान को तुलसी पत्र, पंचामृत, फल एवं दक्षिणा अर्पित कर व्रत किया जाता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news  Lord Krishna #LadduGopal #JyeshthaMonth #KrishnaPuja #SpiritualBenefits #HinduRituals #DivineBlessings #JyeshthaPuja2025 #LadduGopalSeva #BhaktiVibes #LordKrishna

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Chandra Mahadasha

चंद्र महादशा: कैसे प्रभावित करती है आपका जीवन और क्या हैं इससे मुक्ति के उपाय?

ज्योतिष शास्त्र में नवग्रहों की दशाओं का जीवन पर गहरा प्रभाव होता है। इनमें चंद्र की महादशा (Chandra Mahadasha) विशेष मानी जाती है क्योंकि यह व्यक्ति के मन, भावनाओं, स्वास्थ्य और पारिवारिक संबंधों को प्रभावित करती है। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में चंद्रमा शुभ स्थिति में हो, तो यह दशा अत्यंत लाभकारी होती है, लेकिन यदि अशुभ स्थिति में हो तो मानसिक अशांति, भ्रम, अनिद्रा और भावनात्मक असंतुलन जैसे प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। आइए जानते हैं कि चंद्र की महादशा (Chandra Mahadasha)  कितने वर्षों तक चलती है, इसका जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है, और सोम देव को प्रसन्न करने के उपाय क्या हैं। चंद्र महादशा कितने वर्षों तक चलती है? ज्योतिष शास्त्र के अनुसार चंद्रमा की महादशा  (Chandra Mahadasha) लगभग 10 वर्षों तक प्रभावी रहती है। इस अवधि में प्रारंभ में चंद्रमा की ही अंतर्दशा और प्रत्यंतर दशा चलती है। माना जाता है कि चंद्र देव विशेष रूप से वृषभ और कर्क राशि के जातकों के लिए शुभ परिणाम प्रदान करते हैं। यदि कुंडली में चंद्रमा बलवान स्थिति में हो, तो व्यक्ति निर्णय लेने में सक्षम और मानसिक रूप से स्थिर रहता है। यदि चंद्रमा का संयोग शुभ ग्रहों के साथ हो, तो इसका प्रभाव अत्यंत सकारात्मक होता है। हालांकि, जब चंद्रमा की महादशा  (Chandra Mahadasha) में राहु या केतु की अंतर्दशा आती है, तो फल अनुकूल नहीं माने जाते। इसके पश्चात मंगल और राहु की अंतर्दशा व प्रत्यंतर दशा आती है, जबकि केतु की अंतर्दशा करीब 10 महीनों तक रहती है। इसके बाद मंगल और शुक्र की दशाएं आती हैं। चंद्र महादशा  (Chandra Mahadasha) में यदि जातक अच्छे और धार्मिक कर्मों का पालन करे, तो उसे शुभ फलों की प्राप्ति होती है। विशेषकर भगवान शिव (Lord Shiva) की आराधना करने से इस अवधि में सुख, शांति और मानसिक संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है। इसे भी पढ़ें:- क्यों देवी यमुना कहलाती हैं ‘कालिंदी’? जानिए भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी इस दिव्य कथा कैसे करें सोम देव (चंद्रमा) को प्रसन्न? ज्योतिषाचार्यों के अनुसार चंद्र देव की कृपा प्राप्त करने के लिए भगवान शिव (Lord Shiva) की आराधना अत्यंत प्रभावी मानी जाती है। विशेष रूप से सोमवार और शुक्रवार के दिन, प्रातः काल स्नान करने के बाद शिवलिंग पर गाय के कच्चे दूध से अभिषेक करना अत्यंत शुभ फलदायी होता है। चाहें तो इस दूध में थोड़ी मात्रा में गंगाजल मिलाकर भी अभिषेक किया जा सकता है। इसके साथ ही, सफेद वस्त्र, चावल, दूध, दही या चीनी जैसी सफेद वस्तुओं का दान करने से भी चंद्र देव प्रसन्न होते हैं और जीवन में शांति, मानसिक संतुलन एवं सौम्यता का संचार होता है। शिव चालीसा और शिव आरती का पाठ करें चंद्रमा भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान हैं। अतः शिव की आराधना चंद्र दोष के निवारण में अत्यंत प्रभावी मानी जाती है। Latest News in Hindi Today Hindi news Chandra Mahadasha #ChandraMahadasha #MoonMahadasha #VedicAstrology #MahadashaEffects #ChandraDashaRemedies #AstrologyTips #PlanetaryPeriods #LifeInMahadasha #JyotishVidya #SpiritualRemedies

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Jyestha Amavasya puja

ज्येष्ठ अमावस्या पर करें पितृ तर्पण और स्तोत्र पाठ, मिलेगा पितृ दोष से छुटकारा

सनातन धर्म में अमावस्या तिथि का विशेष महत्व होता है, लेकिन ज्येष्ठ अमावस्या का स्थान पितरों के तर्पण और पितृ दोष (Pitru Dosha) शांति के लिए सर्वोपरि माना जाता है। इस दिन पवित्र नदी या जलाशय में स्नान करके श्रद्धापूर्वक पितरों को जल तर्पण किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन नियमपूर्वक तर्पण करने और पितृ स्तोत्र का जाप करने से पितृ दोष खत्म हो जाता है और पूर्वजों की आत्मा को शांति प्राप्त होती है। कब है ज्येष्ठ अमावस्या 2025? वर्ष 2025 में ज्येष्ठ अमावस्या (Jyeshtha Amavasya) का आरंभ 26 मई को दोपहर 12 बजकर 12 मिनट पर होगा और इसका समापन 27 मई को सुबह 8 बजकर 32 मिनट पर होगा। पंचांग के अनुसार, अमावस्या तिथि का महत्व उदया तिथि के अनुसार मान्यता प्राप्त है, इसलिए ज्येष्ठ अमावस्या 26 मई को मनाई जाएगी। इस दिन सोमवार होने के कारण इसे सोमवती अमावस्या के रूप में भी मनाया जाएगा, जो धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ मानी जाती है। साथ ही, इसी दिन शनि जयंती और वट सावित्री व्रत भी पड़ रहे हैं, जिससे इस दिन का आध्यात्मिक महत्व और भी अधिक बढ़ गया है। चूंकि अमावस्या तिथि का समापन मंगलवार को हो रहा है, अतः 27 मई को भौमवती अमावस्या के रूप में भी इसे देखा जाएगा। ज्येष्ठ अमावस्या पर बन रहे हैं दुर्लभ योग, दांपत्य जीवन के लिए बेहद शुभ ज्येष्ठ अमावस्या (Jyeshtha Amavasya) के दिन 2025 में कई खास ज्योतिषीय संयोग बन रहे हैं, जो इस दिन को और अधिक शुभ और प्रभावशाली बना देते हैं। इस दिन चंद्रमा वृषभ राशि में स्थित होंगे, जो उनकी उच्च राशि मानी जाती है। साथ ही, चंद्रमा के साथ सूर्य और बुध भी इसी राशि में विराजमान रहेंगे। ग्रहों की यह स्थिति — सूर्य (राजा), चंद्रमा (रानी) और बुध (राजकुमार) — एक ही राशि में होने के कारण यह समय विशेष रूप से वैवाहिक जीवन और दांपत्य संबंधों के लिए अनुकूल माना जा रहा है। इस दिन सूर्य और बुध की युति से बुधादित्य योग का भी निर्माण होगा, जो ज्ञान, बुद्धि और नेतृत्व क्षमता में वृद्धि करने वाला योग होता है। इसके अलावा शुक्र भी अपनी उच्च राशि मीन में स्थित रहेंगे, जो प्रेम, सौंदर्य और विलासिता के दृष्टिकोण से शुभ संकेत देता है। चंद्रमा से गुरु द्वितीय भाव में रहेंगे और इस स्थिति में सुनफा योग बन रहा है, जो आर्थिक समृद्धि और आत्मविश्वास को बढ़ाने वाला माना जाता है। वहीं, एक और विशेष बात यह है कि शनि जयंती के दिन शनि ग्रह 30 वर्षों के बाद फिर से मीन राशि में प्रवेश कर रहे हैं, जो गुरु की राशि है। यह परिवर्तन कर्म, अनुशासन और न्याय की दिशा में एक नई शुरुआत का संकेत देता है। पितृ तर्पण का महत्व ज्येष्ठ अमावस्या (Jyeshtha Amavasya) को पितरों के पृथ्वी पर आने का विशेष दिन माना जाता है। इसलिए इस दिन पितृ पूजा और पितृ दोष (Pitru Dosha) निवारण के उपाय अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। इसी दिन शनि देव की जयंती भी होती है, जो उनके जन्म के अवसर के रूप में मनाई जाती है। इस दिन शनि देव को सरसों का तेल, काले तिल आदि अर्पित करना शुभ माना जाता है। शनि मंत्र का जप करने से भी विशेष फल प्राप्त होते हैं। साथ ही पीपल के पेड़ की जड़ पर जल अर्पित करना और दीपक जलाना भी इस अवसर पर किए जाने वाले महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान हैं। इसे भी पढ़ें:-  कैसे प्रभावित करती है आपका जीवन और क्या हैं इससे मुक्ति के उपाय? तर्पण की विधि ज्येष्ठ अमावस्या (Jyeshtha Amavasya) के दिन पूजा की विशेष विधि अत्यंत फलदायक मानी जाती है। सबसे पहले सुबह जल्दी उठकर पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए, लेकिन यदि नदी स्नान संभव न हो तो घर पर गंगाजल से स्नान कर सकते हैं। स्नान के बाद सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करना आवश्यक है। पितरों की शांति के लिए पिंडदान और तर्पण करना इस दिन अत्यंत शुभ माना जाता है। यदि संभव हो तो तीर्थ स्थान पर स्नान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और पितृ दोष से मुक्ति मिलती है। इसके बाद पीपल के पेड़ पर जल, अक्षत, सिंदूर आदि चढ़ाकर दीपक जलाना चाहिए और कम से कम सात या ग्यारह बार उसकी परिक्रमा करनी चाहिए। अंत में शनिदेव के मंदिर जाकर उन्हें सरसों का तेल, काले तिल, काले वस्त्र और नीले फूल अर्पित करें। इस तरह किए गए धार्मिक कर्म व्यक्ति के जीवन में शांति, समृद्धि और पुण्य लेकर आते हैं। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Jyeshtha Amavasya #JyeshthaAmavasya #PitruTarpan #PitruDoshNivaran #AncestorWorship #AmavasyaRituals #HinduTradition #SpiritualRemedies #PitruStotraPath #HinduFestivals #Amavasya2025

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Celebrate Gayatri Jayanti 2025 on June 6

गायत्री जयंती 2025: 6 जून को है देवी गायत्री का प्राकट्य दिवस, जानें तिथि, महत्व और पूजन विधि

गायत्री जयंती, वेदों की जननी देवी गायत्री के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाई जाती है। यह पर्व हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इस दिन ऋषि विश्वामित्र ने सर्वप्रथम गायत्री मंत्र का उद्घोष किया था। यह मंत्र आध्यात्मिक जागृति और ज्ञान का प्रतीक है। गायत्री जयंती 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 6 जून को देर रात 2 बजकर 15 मिनट पर आरंभ होगी और 7 जून की सुबह 4 बजकर 47 मिनट पर समाप्त होगी। चूंकि सनातन धर्म में उदया तिथि को प्राथमिकता दी जाती है, इसलिए गायत्री जयंती (Gayatri Jayanti) का पर्व 6 जून को ही मनाया जाएगा। शुभ योग गायत्री जयंती 2025 (Gayatri Jayanti) के अवसर पर वरीयान योग, रवि योग और भद्रावास का शुभ संयोग बन रहा है। भद्रावास का योग दोपहर 3 बजकर 31 मिनट तक रहेगा, इस दौरान भद्रा पाताल लोक में स्थित रहेगी, जिससे शुभ कार्यों में कोई विघ्न नहीं होगा। गायत्री जयंती का धार्मिक महत्व गायत्री माता को वेदों की जननी, ज्ञान, बुद्धि और आध्यात्मिक प्रकाश की देवी माना जाता है। गायत्री मंत्र (Gayatri Mantra) का जप करने से मानसिक शुद्धि, आध्यात्मिक उन्नति और पापों से मुक्ति मिलती है। इस दिन देवी गायत्री की पूजा करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि का प्रवाह होता है। जानिए कैसे हुआ इस दिव्य मंत्र का प्राकट्य और क्या है इसके पीछे की मान्यता गायत्री मंत्र (Gayatri Jayanti) की उत्पत्ति से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, सबसे पहले इसका बोध स्वयं परमपिता ब्रह्मा को हुआ था। माता गायत्री की कृपा से ब्रह्माजी ने अपने चारों मुखों से इस मंत्र की व्याख्या की। ऐसा माना जाता है कि हिंदू धर्म के चारों वेद, जो इसकी मूल आधारशिला माने जाते हैं, इसी मंत्र की विस्तृत व्याख्या हैं। प्रारंभ में गायत्री मंत्र (Gayatri Mantra) केवल देवताओं तक ही सीमित था, लेकिन जैसे भागीरथ ने गंगा को धरती पर लाकर मानवता को पवित्र किया, वैसे ही महान ऋषि विश्वामित्र ने इस दिव्य मंत्र को आम जनमानस तक पहुंचाकर आत्मा की शुद्धि का मार्ग प्रशस्त किया। यह भी माना जाता है कि मां गायत्री सूर्य मंडल में निवास करती हैं और जिन लोगों की कुंडली में सूर्य से जुड़ी कोई बाधा होती है, वे इस मंत्र का जाप करके लाभ प्राप्त कर सकते हैं। इसे भी पढ़ें:- क्यों देवी यमुना कहलाती हैं ‘कालिंदी’? जानिए भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी इस दिव्य कथा पूजन विधि और मंत्र गायत्री जयंती (Gayatri Jayanti) के दिन पूजा आरंभ करने के लिए सबसे पहले ब्रह्म मुहूर्त में उठें। फिर स्नान आदि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर गंगाजल मिला हुआ जल प्रयोग करें। इसके पश्चात आचमन करके पीले या लाल रंग के वस्त्र धारण करें। फिर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करें और उसी समय गायत्री मंत्र का जप करें: ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥ इसके बाद पंचोपचार विधि से मां गायत्री की श्रद्धापूर्वक पूजा करें। पूजा के दौरान मां को फल, फूल और मिष्ठान अर्पित करें। अंत में गायत्री माता की आरती करके पूजन पूर्ण करें। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Gayatri Jayanti #GayatriJayanti2025 #GoddessGayatri #GayatriMantra #HinduFestivals #VedicTradition #SpiritualIndia #GayatriPuja #June6Festival #DivineMother #PujaVidhi

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Masik Karthigai

मासिक कार्तिगाई 2025: 26 मई को मनाएं यह पावन पर्व, जानें तिथि, महत्व और पूजा विधि

मासिक कार्तिगाई (Masik Karthigai) हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक माह में कृतिका नक्षत्र के दिन मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह पर्व विशेष रूप से दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में, भगवान शिव (Lord Shiva) और भगवान मुरुगन (कार्तिकेय) की आराधना के लिए प्रसिद्ध है। इस दिन दीप जलाकर अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक मनाया जाता है। ज्येष्ठ माह में मासिक कार्तिगाई की तिथि वैदिक पंचांग के अनुसार 26 मई को ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि दोपहर 12:11 बजे तक रहेगी, जिसके बाद अमावस्या तिथि प्रारंभ होगी। इसी दिन सुबह 8:23 बजे से कृतिका नक्षत्र का योग भी आरंभ हो जाएगा। चूंकि मासिक कार्तिगाई (Masik Karthigai) व्रत कृतिका नक्षत्र के शुभ संयोग में मनाया जाता है, इसलिए इस वर्ष यह पावन पर्व 26 मई को ही विधिपूर्वक मनाया जाएगा। शुभ योग इस बार मासिक कार्तिगाई (Masik Karthigai) पर विशेष और दुर्लभ शोभन योग का संयोग बन रहा है। यह शुभ योग सुबह 7 बजकर 2 मिनट तक प्रभावी रहेगा। इसके अलावा, इसी दिन दोपहर 12 बजकर 11 मिनट से शिववास योग भी प्रारंभ हो जाएगा। मान्यता है कि शिववास योग के दौरान भगवान शिव )Lord Shiva) कैलाश पर्वत पर माता गौरी (Mata Gauri) के साथ विराजमान रहते हैं। ऐसे में इस योग में शिव की पूजा और आराधना करने से भक्तों को इच्छित फल की प्राप्ति होती है। मासिक कार्तिगाई का धार्मिक महत्व मासिक कार्तिगाई (Masik Karthigai) पर्व का विशेष महत्व है, क्योंकि यह दिन भगवान शिव (Lord Shiva) और भगवान मुरुगन (Lord Murugan)  की पूजा के लिए समर्पित होता है। कहा जाता है कि इस दिन दीप जलाने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और अज्ञानता का नाश होता है। यह पर्व आत्मिक शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। मासिक कार्तिगाई कथा  पौराणिक मान्यता के अनुसार, मासिक कार्तिगाई (Masik Karthigai) का दिन भगवान मुरुगन (Lord Murugan)  के जन्म से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि भगवान शिव (Lord Shiva) की तीसरी आंख से इसी दिन भगवान मुरुगन का प्राकट्य हुआ था। वे छह विभिन्न रूपों में प्रकट हुए और छह अप्सराओं ने उनका पालन-पोषण किया। बाद में देवी पार्वती ने इन छह स्वरूपों को एकाकार कर एक बालक का रूप प्रदान किया। इसी कारण भगवान मुरुगन को ‘षण्मुख’ या ‘शनमुघम’ कहा जाता है, जिसका अर्थ होता है—छह मुखों वाले देवता। इसे भी पढ़ें:- क्यों देवी यमुना कहलाती हैं ‘कालिंदी’? जानिए भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी इस दिव्य कथा पूजन विधि मासिक कार्तिगाई (Masik Karthigai)  के दिन भगवान शिव और भगवान मुरुगन (Lord Murugan)  की पूजा विधि इस प्रकार है: प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। फिर पूजा स्थल पर उत्तर-पूर्व दिशा में भगवान शिव और भगवान मुरुगन की तस्वीर स्थापित करें। भगवान शिव को जल, दूध, बेलपत्र और धूप-दीप अर्पित करें। भगवान मुरुगन को विशेष रूप से फूल, फल और पंचामृत चढ़ाएं। इसके पश्चात दोनों देवी-देवताओं के मंत्रों का जाप करें और श्रद्धा से उनकी आरती करें। आरती के बाद प्रसाद सभी में बांटें। इस दिन घर में धूप और कपूर जलाने से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है। साथ ही, दान-पुण्य करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Masik Karthigai #MasikKarthigai2025 #KarthigaiFestival #TamilFestival #HinduFestivals2025 #KarthigaiDeepam #SpiritualCelebration #TamilTradition #PoojaVidhi #KarthigaiSignificance #26May2025Festival

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Chanakya Niti

Chanakya Niti: इन पांच वर्गों का करें सम्मान, वरना रूठ जाएंगी मां लक्ष्मी

भारतीय इतिहास में चाणक्य एक ऐसा नाम हैं जिन्हें राजनीति, कूटनीति, अर्थशास्त्र और जीवन के व्यवहारिक ज्ञान का सर्वोच्च ज्ञाता माना जाता है। आचार्य चाणक्य ने अपनी नीति (Chanakya Niti) शास्त्र के माध्यम से जीवन के अनेक पहलुओं को सरल भाषा में समझाया है। उनकी कही गई बातें आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी हजारों वर्ष पहले थीं। चाणक्य नीति में उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि यदि व्यक्ति कुछ खास लोगों के साथ दुर्व्यवहार करता है, तो उसके जीवन से मां लक्ष्मी यानी धन की देवी रूठ सकती हैं। चाणक्य (Chanakya) के अनुसार, जीवन में सफलता, समृद्धि और सुख प्राप्त करने के लिए न केवल मेहनत बल्कि अच्छे आचरण की भी आवश्यकता होती है। यदि व्यक्ति धन अर्जित कर भी ले, लेकिन उसका व्यवहार अनुचित हो, तो वह धन स्थायी नहीं रहता। आइए जानते हैं कि किन लोगों से बुरा व्यवहार करने पर मां लक्ष्मी (Maa Laxmi) का वास हमारे घर में नहीं होता। 1. गुरु और शिक्षकों से दुर्व्यवहार चाणक्य नीति (Chanakya Niti) के अनुसार गुरु, शिक्षक या मार्गदर्शक का स्थान अत्यंत पूजनीय होता है। गुरु हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं, हमें सही दिशा दिखाते चाणक्य के अनुसार, जो लोग अपने गुरुओं या बुजुर्गों का अनादर करते हैं या उन्हें कष्ट पहुँचाने की कोशिश करते हैं, उनसे मां लक्ष्मी दूर हो जाती हैं। ऐसे लोगों को कठिन परिश्रम के बावजूद धन की प्राप्ति नहीं होती, और यदि धन आता भी है तो वह व्यर्थ कार्यों में खर्च हो जाता है। गुरु का अपमान करना स्वयं ज्ञान और लक्ष्मी दोनों को खो देने के समान होता है। 2. माता-पिता और बुजुर्गों का अनादर माता-पिता और घर के बुजुर्गों को चाणक्य ने ईश्वर तुल्य माना है। जो संतान अपने माता-पिता का सम्मान नहीं करती, उनका अनादर करती है, उनके साथ दुर्व्यवहार करती है, उनके प्रति कर्तव्यों की अवहेलना करती है, ऐसे व्यक्ति पर देवी लक्ष्मी कभी कृपा नहीं करतीं। मां-बाप का आशीर्वाद ही वास्तविक समृद्धि की कुंजी होती है। 3. गाय और अन्य निरीह प्राणियों को कष्ट देना चाणक्य नीति (Chanakya Niti) में यह भी उल्लेख किया गया है कि जो व्यक्ति गाय, कुत्ते, बिल्ली, पक्षियों जैसे निरीह जीवों को तकलीफ पहुंचाता है, उनके साथ अमानवीय व्यवहार करता है, वह व्यक्ति पाप का भागी बनता है। जो व्यक्ति अपने भीतर करुणा और दया का भाव रखते हैं, उन पर मां लक्ष्मी सदैव मेहरबान रहती हैं। इसीलिए हमें जानवरों के प्रति कभी भी निर्दयता या क्रूरता नहीं दिखानी चाहिए, चाहे वह अनजाने में ही क्यों न हो। इसे भी पढ़ें:- क्यों देवी यमुना कहलाती हैं ‘कालिंदी’? जानिए भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी इस दिव्य कथा 4. स्त्रियों का अपमान चाणक्य ने महिलाओं के सम्मान को समाज और परिवार की उन्नति से जोड़ा है। जो व्यक्ति स्त्रियों का अपमान करता है, उन्हें अपशब्द कहता है या उन्हें नीचा दिखाता है, उसका जीवन सदैव कष्टों से भरा होता है। स्त्री केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि संपूर्ण सृजन शक्ति की प्रतिनिधि होती है। उनके अपमान से देवी लक्ष्मी रूठ जाती हैं और दुर्भाग्य घर में प्रवेश कर जाता है। 5. गरीब और असहाय लोगों के साथ दुर्व्यवहार जो लोग आर्थिक रूप से कमजोर हैं या किसी भी कारण से असहाय हैं, उनके साथ सहानुभूति और करुणा से व्यवहार करना हमारा कर्तव्य है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति ऐसे लोगों का अपमान करता है, उनका मज़ाक उड़ाता है या उन्हें तिरस्कार की दृष्टि से देखता है, तो मां लक्ष्मी उनसे मुख मोड़ लेती हैं। आचार्य चाणक्य के अनुसार, दान और सेवा धन की स्थिरता के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। जो व्यक्ति गरीबों का आदर करते हैं और उनकी सहायता करते हैं, उन पर मां लक्ष्मी (Maa Laxmi) सदैव कृपा बनाए रखती हैं। Latest News in Hindi Today Hindi News Chanakya Niti #ChanakyaNiti #HinduWisdom #LakshmiBlessings #RespectInLife #AncientIndianTeachings #WealthAttraction #SpiritualSuccess #VedicKnowledge #LifeLessons #IndianCulture

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Krishna Janmashtami 2025

मासिक कृष्ण जन्माष्टमी 2025: 20 मई को लड्डू गोपाल की आराधना का शुभ दिन, जानें व्रत की तिथि, महत्व और पूजा की सही विधि

भगवान श्रीकृष्ण (Lord Krishna) के भक्तों के लिए मासिक कृष्ण जन्माष्टमी (Masik Krishna Janmashtami) एक अत्यंत शुभ और पावन अवसर होता है। यह तिथि हर माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है और इसे ‘मासिक कृष्ण जन्माष्टमी’ कहा जाता है। मई माह में आने वाली मासिक जन्माष्टमी विशेष रूप से फलदायी मानी जा रही है, क्योंकि इस दिन योगों का सुंदर संयोग बन रहा है, जो उपासना और व्रत को अत्यधिक प्रभावशाली बनाते हैं। इस दिन श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण का व्रत रखते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं और रात्रि में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाते हैं। मान्यता है कि मासिक जन्माष्टमी व्रत रखने से व्यक्ति को श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है और जीवन के समस्त संकटों से मुक्ति मिलती है। मासिक कृष्ण जन्माष्टमी 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का आरंभ 20 मई को सुबह 5:51 बजे से होगा और यह 21 मई को सुबह 4:55 बजे तक चलेगी। मासिक कृष्ण जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण (Lord Krishna) की पूजा विशेष रूप से रात के निशीथ काल में की जाती है। इसी कारण व्रत और पूजन की सभी विधियां 20 मई को ही सम्पन्न की जाएंगी। पूजा का श्रेष्ठ मुहूर्त रात 11:57 बजे से 12:38 बजे तक का रहेगा, जिसे श्रीकृष्ण के प्राकट्य का सबसे पावन समय माना जाता है। मासिक जन्माष्टमी का धार्मिक महत्व हालांकि मासिक जन्माष्टमी को वैष्णव या भाद्रपद माह में आने वाली मुख्य जन्माष्टमी की तरह भव्य रूप से नहीं मनाया जाता, फिर भी इसका धार्मिक दृष्टिकोण से विशेष महत्व होता है। यह तिथि उन भक्तों के लिए विशेष होती है जो हर महीने कृष्ण की विशेष आराधना करना चाहते हैं। श्रीकृष्ण विष्णु के आठवें अवतार माने जाते हैं, और मासिक जन्माष्टमी पर उनका व्रत करने से मन को शांति, जीवन में सकारात्मकता और आत्मबल की प्राप्ति होती है। शुभ योग ज्योतिषीय दृष्टिकोण से इस बार मासिक कृष्ण जन्माष्टमी पर कई शुभ संयोग बन रहे हैं, जिनमें दुर्लभ इंद्र योग और शिववास योग प्रमुख हैं। ये दोनों योग 20 मई की रात 2:50 बजे तक प्रभावी रहेंगे। ऐसी मान्यता है कि इंद्र योग के दौरान भगवान श्रीकृष्ण (Lord Krishna) की उपासना करने से भक्त को मनचाहा फल प्राप्त होता है और उसके जीवन में शुभ कार्यों में सफलता सुनिश्चित होती है। वहीं शिववास योग में राधा रानी के साथ श्रीकृष्ण की आराधना करने से जीवन की सभी समस्याओं से मुक्ति मिलती है। इसके अतिरिक्त, इस दिन धनिष्ठा और शतभिषा नक्षत्र का संयोग भी पूजन को और अधिक मंगलकारी बनाता है। इसे भी पढ़ें:- क्यों देवी यमुना कहलाती हैं ‘कालिंदी’? जानिए भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी इस दिव्य कथा लड्डू गोपाल की पूजा विधि मासिक कृष्ण जन्माष्टमी (Masik Krishna Janmashtami) के दिन भक्त प्रातःकाल स्नान कर शुद्ध होकर भगवान श्रीकृष्ण (Lord Krishna) का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेते हैं। फिर पूजा की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर लड्डू गोपाल की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसके बाद उन्हें पंचामृत और गंगाजल मिश्रित जल से स्नान कराया जाता है। स्नान के पश्चात लड्डू गोपाल को नए वस्त्र पहनाकर सुंदर श्रृंगार किया जाता है। उनके समक्ष घी का दीपक प्रज्वलित कर विधिवत पूजन किया जाता है। माखन-मिश्री में तुलसी डालकर भगवान को भोग अर्पित किया जाता है। अंत में मंत्र जाप कर लड्डू गोपाल की आरती की जाती है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Masik Krishna Janmashtami #KrishnaJanmashtami2025 #LadduGopalPuja #MasikJanmashtami #KrishnaBhakti #JanmashtamiVrat #20May2025 #PujaVidhi #HinduFestival2025 #SpiritualIndia #VratMahatva

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Sankashti Chaturthi 2025

संकष्टी चतुर्थी 2025: सिद्ध योग, अमृत सिद्धि योग और रवि योग का महासंयोग, गणपति आराधना से होंगे जीवन के संकट दूर

इस बार की संकष्टी चतुर्थी (Sankashti Chaturthi) बेहद खास मानी जा रही है क्योंकि इस पावन तिथि पर सिद्ध योग समेत कई शुभ और दुर्लभ संयोग बन रहे हैं। गणेश उपासकों और श्रद्धालुओं के लिए यह सुनहरा अवसर है, जब वे भगवान श्रीगणेश (Lord Ganesha) की आराधना कर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। ज्योतिषाचार्य मानते हैं कि इन विशेष योगों में की गई पूजा न केवल कष्टों को दूर करती है, बल्कि जीवन में उन्नति, समृद्धि और मानसिक शांति भी प्रदान करती है। एकदंत संकष्टी चतुर्थी पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का आरंभ 16 मई 2025 को प्रातः 4:02 बजे होगा और यह तिथि 17 मई को प्रातः 5:13 बजे समाप्त होगी। चूंकि सनातन धर्म में उदया तिथि को प्रमुखता दी जाती है, इसलिए इस बार एकदंत संकष्टी चतुर्थी (Sankashti Chaturthi) 16 मई को श्रद्धा एवं भक्ति के साथ मनाई जाएगी। संकष्टी चतुर्थी का महत्व संकष्टी चतुर्थी (Sankashti Chaturthi) को विघ्नहर्ता और संकटमोचक श्रीगणेश (Lord Ganesha) को समर्पित किया गया है। ‘संकष्टी’ का अर्थ होता है ‘संकटों को हरने वाली’। इस दिन व्रत रखने और श्रीगणेश की विधिवत पूजा करने से जीवन के सभी कष्टों और बाधाओं का नाश होता है। विशेष रूप से इस दिन चंद्र दर्शन के बाद व्रत खोला जाता है, और भगवान गणेश से सुख-शांति, समृद्धि और सफलता की कामना की जाती है। इस बार बन रहे शुभ योग शिववास योगइस वर्ष ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर एक अत्यंत दुर्लभ और शुभ शिववास योग बन रहा है, जो संपूर्ण रात्रि तक प्रभावी रहेगा। यह योग 17 मई को प्रातः 5:13 बजे तक रहेगा। इस शुभ अवधि में भगवान शिव, कैलाश पर्वत पर माता पार्वती के साथ विराजमान रहेंगे, जिससे यह समय आध्यात्मिक साधना और ईश्वर आराधना के लिए अत्यंत फलदायी माना जा रहा है। इसे भी पढ़ें:- क्यों देवी यमुना कहलाती हैं ‘कालिंदी’? जानिए भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी इस दिव्य कथा सिद्ध योगइस चतुर्थी तिथि पर सिद्ध योग का भी संयोग बन रहा है, जो 16 मई को सुबह 7:15 बजे तक प्रभावी रहेगा। सिद्ध योग को सभी कार्यों में सफलता दिलाने वाला योग माना जाता है। इस पावन समय में यदि श्रद्धा से भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की जाए, तो जीवन के शुभ कार्यों में निश्चित ही सफलता प्राप्त होती है। कैसे प्राप्त करें संकष्टी चतुर्थी का पूर्ण लाभ नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Sankashti Chaturthi #SankashtiChaturthi2025 #GaneshChaturthi #SankashtiVrat #GanpatiBlessings #RaviYoga #SiddhaYoga #AmritSiddhiYoga #GanpatiPuja #HinduFestivals2025 #RemoveObstacles

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