जय राष्ट्र न्यूज रिपोर्टर वेबसाइट | 06 जनवरी 2026 | कृषि संवाददाता
भारत ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। देश ने चीन को पीछे छोड़ते हुए दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक बनने का गौरव प्राप्त कर लिया है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 5 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में इसकी घोषणा की। 2025 में भारत का चावल उत्पादन 150.18 मिलियन टन तक पहुंच गया, जबकि चीन का उत्पादन 145.28 मिलियन टन रहा। यह पहली बार है जब भारत ने चावल उत्पादन में चीन को पीछे छोड़ा है। यह खबर न केवल भारतीय किसानों के लिए गर्व की बात है, बल्कि वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है।
चावल भारत की कृषि अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है। करोड़ों लोग चावल पर निर्भर हैं, और यह देश की खाद्य सुरक्षा की रीढ़ है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने चावल उत्पादन में तेजी से प्रगति की है। लेकिन चीन को पछाड़ना एक बड़ी मील का पत्थर है। आइए जानते हैं कि यह कैसे संभव हुआ, इसके पीछे क्या कारण हैं, और इसका क्या असर पड़ेगा।
चावल उत्पादन का इतिहास: भारत और चीन की तुलना
चावल उत्पादन में चीन लंबे समय से दुनिया का лидер रहा है। 2020 तक चीन का सालाना उत्पादन लगभग 210 मिलियन टन paddy (कच्चा चावल) था, जबकि भारत का 180 मिलियन टन के आसपास। लेकिन milled rice (प्रोसेस्ड चावल) में भी चीन आगे था। हालांकि, भारत ने धीरे-धीरे अपनी उत्पादकता बढ़ाई। 2024-25 के फसल वर्ष में भारत का उत्पादन 150.18 मिलियन टन milled rice तक पहुंच गया, जो चीन के 145.28 मिलियन टन से अधिक है।
यह बदलाव अचानक नहीं हुआ। भारत सरकार की नीतियां, वैज्ञानिक अनुसंधान और किसानों की मेहनत का नतीजा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पिछले 11 वर्षों में भारत ने 3,236 उच्च उपज वाली फसल किस्में विकसित की हैं, जो 1969 से 2014 तक की कुल 3,969 से अधिक हैं। ये किस्में जलवायु परिवर्तन के खिलाफ मजबूत हैं और अधिक उत्पादन देती हैं।
चीन में चावल उत्पादन स्थिर रहा, लेकिन भारत ने नई तकनीकों से आगे निकल गया। चीन की कुछ समस्याएं जैसे भूमि प्रदूषण और जल संकट ने भी इसमें भूमिका निभाई हो सकती है, लेकिन मुख्य कारण भारत की प्रगति है।
कैसे हुआ यह चमत्कार? मुख्य कारण
भारत के चावल उत्पादन में वृद्धि के पीछे कई कारक हैं। सबसे महत्वपूर्ण है उच्च उपज वाली बीज किस्मों का विकास। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा, “यह मील का पत्थर उच्च उपज वाले बीज किस्मों और कृषि विज्ञान में प्रगति से संभव हुआ है। भारत अब वैश्विक चावल बाजारों का प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन चुका है।”
5 जनवरी को मंत्री ने 184 नई फसल किस्मों का अनावरण किया, जो 25 विभिन्न फसलों से संबंधित हैं। इनमें 122 अनाज, 6 दालें, 13 तिलहन, 11 चारा फसलें, 6 गन्ना किस्में, 24 कपास किस्में, और जूट व तंबाकू की एक-एक किस्म शामिल हैं। ये किस्में उत्पादकता बढ़ाने, गुणवत्ता सुधारने और किसानों की आय बढ़ाने के लिए डिजाइन की गई हैं।
चावल की कुछ प्रमुख नई किस्में हैं:
- PB126: यह 123 दिनों में पक जाती है, रोग प्रतिरोधी है और कम पानी की जरूरत पड़ती है।
- PR131 और PB121: पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में लोकप्रिय, ये उच्च उत्पादन देती हैं और पानी की बचत करती हैं।
सरकार ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि इन नई किस्मों को जल्द से जल्द किसानों तक पहुंचाया जाए। इसके अलावा, कृषि अनुसंधान में निवेश बढ़ाया गया है। भारत ने पश्चिमी बाजारों से वैध रूप से इन किस्मों को लाइसेंस लिया है, जबकि चीन पर जासूसी और बौद्धिक संपदा चोरी के आरोप लगते रहे हैं।
पूर्वी भारत में ‘ग्रीन रिवोल्यूशन इन ईस्टर्न इंडिया’ पहल चल रही है। असम, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में सब्सिडी, प्रोत्साहन और उच्च गुणवत्ता वाले खाद दिए जा रहे हैं। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) के वाइस चांसलर डॉ. सतबीर सिंह गोसल ने कहा कि पंजाब की सफलता को पूर्वी भारत में दोहराया जा रहा है। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि इससे पानी की कमी और पराली जलाने जैसी पर्यावरणीय समस्याएं हो सकती हैं।
PAU बाढ़ सहनशील चावल किस्में विकसित कर रहा है, जो पूर्वी क्षेत्रों की बाढ़ वाली जमीनों के लिए उपयोगी होंगी। ये प्रयास जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद करेंगे।
आर्थिक और वैश्विक प्रभाव
यह उपलब्धि भारत की अर्थव्यवस्था के लिए वरदान है। भारत अब चावल का निर्यातक बन चुका है। 2024-25 में कृषि निर्यात रिकॉर्ड 450,840 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जिसमें चावल का हिस्सा लगभग 24% है, यानी 105,720 करोड़ रुपये। भारत 172 देशों को चावल निर्यात कर रहा है। पिछले दशक में निर्यात दोगुना होकर 20 मिलियन टन से अधिक हो गया है।
वैश्विक स्तर पर, यह खाद्य सुरक्षा को मजबूत करेगा। मंत्री चौहान ने कहा, “भारत की गोदाम भरे हुए हैं, और हम दुनिया को चावल सप्लाई कर रहे हैं।” जलवायु संकट और खाद्य असुरक्षा के दौर में भारत की भूमिका बढ़ेगी। निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा, और कृषि अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।
किसानों की आय बढ़ेगी। नई किस्में कम पानी और कम लागत में अधिक उत्पादन देंगी। सरकार आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत के लक्ष्य की ओर बढ़ रही है। दालों और तिलहनों में आत्मनिर्भरता के लिए भी प्रयास हो रहे हैं, ताकि आयात कम हो।
चुनौतियां और भविष्य की योजनाएं
सफलता के साथ चुनौतियां भी हैं। बढ़ते उत्पादन से पानी की कमी हो सकती है। पंजाब और हरियाणा में भूजल स्तर गिर रहा है। पराली जलाने से प्रदूषण बढ़ता है। पूर्वी भारत में बाढ़ और सूखे की समस्या है। इसलिए, सतत कृषि पर जोर देना जरूरी है।
सरकार की योजना है कि दालों और तिलहनों पर फोकस किया जाए। वैज्ञानिकों को निर्देश दिए गए हैं कि आयात निर्भरता कम करने के लिए काम करें। जलवायु सहनशील बीजों से कृषि में क्रांति आएगी।
भविष्य में भारत चावल उत्पादन को 200 मिलियन टन तक ले जाने का लक्ष्य रख सकता है। निर्यात बढ़ाकर विदेशी मुद्रा कमाई जाएगी। किसानों को ट्रेनिंग, सब्सिडी और बाजार पहुंच प्रदान की जाएगी।
निष्कर्ष: गर्व का पल
भारत का चीन को चावल उत्पादन में पछाड़ना एक बड़ी जीत है। यह किसानों की मेहनत, वैज्ञानिकों की बुद्धिमत्ता और सरकार की नीतियों का परिणाम है। इससे देश आत्मनिर्भर बनेगा और दुनिया में अपनी जगह मजबूत करेगा। लेकिन सतत विकास पर ध्यान देना जरूरी है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इसका लाभ उठा सकें।
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