मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद (Shri Krishna Janmabhoomi and Shahi Idgah dispute) एक बार फिर चर्चा में है। इस बार वजह बनी है इलाहाबाद हाई कोर्ट का एक महत्वपूर्ण फैसला, जिसमें अदालत ने हिंदू पक्ष की उस अर्जी को खारिज कर दिया है जिसमें उन्होंने मस्जिद को विवादित ढांचा घोषित करने की मांग की थी। इस निर्णय से जहां मुस्लिम पक्ष को बड़ी राहत मिली है, वहीं हिंदू पक्ष अब इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में चुनौती देने की तैयारी कर रहा है। यह मामला संवेदनशील धार्मिक भावनाओं और ऐतिहासिक विवाद से जुड़ा होने के कारण राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित कर रहा है।
क्या थी याचिका?
हिंदू पक्ष की ओर से यह याचिका वकील महेंद्र प्रताप सिंह ने दायर की थी, जो खुद इस मुकदमे में वादी हैं। उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट (Allahabad High Court) में सूट नंबर 13 के अंतर्गत एक एप्लीकेशन (A-44) दाखिल की थी, जिसमें उन्होंने मांग की थी कि शाही ईदगाह मस्जिद (Shahi Idgah Mosque) को अदालत की सभी कार्यवाहियों में विवादित ढांचा के रूप में संबोधित किया जाए। इस आवेदन में कोर्ट के स्टेनोग्राफर को निर्देश देने की भी अपील की गई थी कि जब तक मुकदमे की सुनवाई पूरी नहीं हो जाती, तब तक मस्जिद का उल्लेख केवल विवादित ढांचे के रूप में किया जाए। लेकिन अदालत ने इस प्रार्थना पत्र को अस्वीकार कर दिया।
मुस्लिम पक्ष को मिली राहत
हाई कोर्ट (High Court) के इस फैसले से मुस्लिम पक्ष को बड़ी राहत मिली है। मुस्लिम पक्ष की ओर से इस आवेदन पर लिखित आपत्ति भी दायर की गई थी, जिसमें इस मांग को असंवैधानिक और न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने वाली बताया गया। अदालत ने यह स्वीकार करते हुए याचिका खारिज कर दी कि इस स्तर पर मस्जिद को विवादित ढांचा घोषित करना उचित नहीं है।
अब सुप्रीम कोर्ट में अपील की तैयारी
हिंदू पक्ष के वकील महेंद्र प्रताप सिंह ने फैसले के बाद मीडिया से बात करते हुए बताया कि वे कोर्ट के डिटेल्ड ऑर्डर का अध्ययन करने के बाद इस मामले को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में ले जाएंगे। उन्होंने दावा किया कि उनका लक्ष्य केवल ऐतिहासिक तथ्यों की सत्यता को न्यायिक रूप से स्थापित करना है और उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है।
श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह विवाद
यह विवाद भारत के सबसे पुराने और संवेदनशील धार्मिक विवादों में से एक माना जाता है। मथुरा में स्थित 11 एकड़ भूमि को लेकर यह विवाद है, जिसमें से 2.37 एकड़ जमीन पर शाही ईदगाह मस्जिद (Shahi Idgah Mosque) स्थित है और शेष हिस्सा श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट के पास है। हिंदू पक्ष का दावा है कि मुगल शासक औरंगजेब ने 1669-70 में प्राचीन केशवदेव मंदिर को नष्ट कर इस मस्जिद का निर्माण करवाया था। उनका कहना है कि यही वह स्थान है जहां भगवान श्रीकृष्ण (Lord Shri Krishna) का जन्म हुआ था। इसलिए वे चाहते हैं कि मस्जिद को हटाकर उस स्थान को पूरी तरह से मंदिर के रूप में पुनर्स्थापित किया जाए। वहीं मुस्लिम पक्ष इस दावे को नकारता है। उनका कहना है कि मस्जिद का निर्माण पूरी तरह वैध और कानूनी रूप से मान्य है और वह जमीन उन्हें किसी विवाद के तहत नहीं दी गई थी।
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ऐतिहासिक और कानूनी संदर्भ
यह मामला पहली बार 1968 में सुर्खियों में आया था, जब श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट और शाही ईदगाह ट्रस्ट के बीच एक समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत दोनों पक्षों ने अपने-अपने अधिकारों को मान्यता दी थी और विवाद खत्म करने का प्रयास किया गया था। लेकिन हाल के वर्षों में इस समझौते को चुनौती (Shri Krishna Janmabhoomi and Shahi Idgah dispute) दी जा रही है और कई नए मुकदमे दायर किए गए हैं। 2020 के बाद से कई नए याचिकाकर्ताओं ने अदालत में यह मांग की है कि पुराने समझौते को रद्द कर मंदिर भूमि को पूरी तरह से हिंदू ट्रस्ट (Hindi Trust) को सौंपा जाए।
इलाहाबाद हाई कोर्ट (Allahabad High Court) द्वारा याचिका A-44 को खारिज किए जाने से यह स्पष्ट है कि अदालत फिलहाल कोई पूर्वग्रह या भावनात्मक आधार पर फैसला नहीं लेना चाहती। यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की ओर बढ़ रहा है, जहां इसे संविधान, इतिहास और कानून के परिप्रेक्ष्य में देखा जाएगा। ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर न्यायपालिका की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि यह न केवल न्याय सुनिश्चित करती है बल्कि सामाजिक सौहार्द को भी बनाए रखने में अहम योगदान देती है। आने वाले समय में यह देखना रोचक होगा कि सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) इस ऐतिहासिक विवाद पर क्या रुख अपनाता है।
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