विरोध और मतभेद के बीच महाराष्ट्र में पास हुआ ‘लोक सुरक्षा विधेयक’: वामपंथी संगठनों पर शिकंजा, विपक्ष ने जताई शंका

Maharashtra Passes Public Security

महाराष्ट्र विधानसभा ने राजनीतिक विरोध और वैचारिक मतभेद के बीच बहुप्रतीक्षित ‘महाराष्ट्र लोक सुरक्षा विधेयक, 2025’ (Maharashtra Public Security Bill) को बहुमत से पास कर दिया है। यह विधेयक राज्य में वामपंथी उग्रवाद, माओवादी विचारधारा और सरकार विरोधी चरमपंथी गतिविधियों पर सख्त कार्रवाई के उद्देश्य से लाया गया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis) द्वारा पेश किए गए इस बिल को लेकर जहां सत्ता पक्ष इसे राज्य की सुरक्षा के लिए आवश्यक बता रहा है, वहीं विपक्ष इसे लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन का नया रास्ता बता रहा है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis) ने विधानसभा में लोक सुरक्षा विधेयक (Maharashtra Public Security Bill) पेश करते हुए कहा कि गडचिरोली और कोकण जैसे जिले शहरी और ग्रामीण नक्सलवाद से प्रभावित हैं, जो राज्य की कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं। उन्होंने कहा, “यह विधेयक उन संगठनों पर सख्ती से कार्रवाई करेगा जो गुरिल्ला युद्ध और हिंसक विचारधारा के जरिए सामाजिक अस्थिरता फैलाना चाहते हैं।” सीएम फडणवीस (Devendra Fadnavis) ने यह भी बताया किया कि यह कानून UAPA (Unlawful Activities Prevention Act) जैसी केंद्रीय कानूनी व्यवस्थाओं की खामियों को पूरा करेगा, जो केवल आतंकवाद तक सीमित हैं। यह नया विधेयक चरमपंथी संगठनों की वैचारिक और संगठित गतिविधियों पर भी शिकंजा कसने का काम करेगा। 

विधेयक में संशोधन के लिए आम जनता से मिले थे 12,500 सुझाव 

बता दें कि महाराष्ट्र लोक सुरक्षा विधेयक, 2025′ (Maharashtra Public Security Bill) पहली बार जुलाई 2024 के मानसून सत्र में विधानसभा में प्रस्तुत किया गया था। उस समय विधेयक में ‘व्यक्ति और संगठन’ जैसे शब्दों के कारण यह विवादों में घिर गया था। विपक्ष ने सरकार पर आरोप लगाया कि यह विधेयक असहमति जताने वाले आम नागरिकों को भी निशाना बना सकता है। इसी के चलते विधेयक को एक संयुक्त समिति के पास भेजा गया। इस समिति में जयंत पाटिल, नाना पटोले, जितेंद्र आव्हाड, भास्कर जाधव और अंबादास दानवे जैसे वरिष्ठ विपक्षी नेता शामिल थे। समिति को इस विधेयक को लेकर आम जनता से 12,500 सुझाव प्राप्त हुए। समिति की सिफारिशों के आधार पर विधेयक में तीन अहम संशोधन किए गए। पहला- ‘व्यक्ति और संगठन’ शब्द हटाकर केवल ‘चरमपंथी विचारधारा वाले संगठन’ रखा गया। दूसरा- निगरानी के लिए हाईकोर्ट जज की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय सलाहकार बोर्ड गठित करने का प्रावधान किया गया। तीसरा- जांच की जिम्मेदारी सब-इंस्पेक्टर की जगह अब डीएसपी स्तर के अधिकारियों को दी जाएगी। सरकार ने विधेयक को लेकर पत्रकार संगठनों से भी संवाद कर यह भरोसा दिलाने की कोशिश की है कि यह कानून मीडिया की स्वतंत्रता या अभिव्यक्ति के अधिकारों को किसी भी तरह से प्रभावित नहीं करेगा। फडणवीस ने कहा कि सरकार किसी भी लोकतांत्रिक विचारधारा या आलोचना को दबाने की मंशा नहीं रखती।

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विपक्ष की आशंकाएं और विरोध बरकरार

हालांकि, विपक्षी दलों ने संशोधन के बावजूद इस विधेयक को लेकर अपनी गंभीर शंकाएं और आपत्तियां दर्ज की हैं। एनसीपी विधायक भास्कर जाधव ने विधेयक को लेकर सवाल किया कि अगर यह कानून राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए इतना जरूरी है, तो दूसरे भाजपा शासित राज्यों में इसे क्यों नहीं लाया गया? इसे लाने का मतलब सरकार के खिलाफ उठने वाली आवाज को दबाना है। वहीं जयंत पाटिल ने कुछ संशोधनों का स्वागत किया, लेकिन कहा कि “फडणवीस (Devendra Fadnavis) ध्यान रखें, पी चिदंबरम जिस कानून (PMLA) को लाए थे, वही बाद में उनके खिलाफ लागू हुआ।” एनसीपी विधायक नितिन राऊत ने भी विधयेक को लेकर आशंका जताई कि इस कानून का इस्तेमाल भविष्य में लोकतांत्रिक आंदोलनों, धरनों या मोर्चों पर लागू हो सकता है। उन्होंने कहा, “भीमा कोरेगांव मामले में ‘अर्बन नक्सल’ जैसे शब्दों का दुरुपयोग हुआ था। ऐसा न हो कि यह कानून भी राजनीति का हथियार बन जाए।”  राऊत ने सरकार से यह स्पष्ट करने की मांग की कि ‘चरमपंथी’ और ‘वामपंथी’ की परिभाषा क्या होगी। उन्होंने कहा कि राज्य का हर जागरूक नागरिक नक्सलवाद के खिलाफ है, लेकिन कानून का दायरा स्पष्ट होना चाहिए। विपक्ष के इन तमाम विरोध के बाद भी महाराष्ट्र लोक सुरक्षा विधेयक अब कानून बन गया है। सरकार इसे राज्य की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक मजबूत हथियार मान रही है। अब आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह कानून वास्तव में शांति स्थापित करता है या असहमति को दबाने का माध्यम बनता है।

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