Discover how Lord Ganesha got married and the crucial role of Narad Muni

कैसे हुई विघ्नहर्ता की शादी? जानिए नारद मुनि की महत्वपूर्ण भूमिका

भगवान गणेश (Lord Ganesha) को विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता के रूप में पूजा जाता है। गणपति बप्पा की कृपा से भक्तों के सभी संकट दूर हो जाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान गणेश का विवाह कैसे हुआ और इसमें देवर्षि नारद की क्या भूमिका थी? पौराणिक कथाओं में गणेश विवाह से जुड़ी कई रोचक बातें मिलती हैं, जो इस रहस्य को उजागर करती हैं। आइए जानते हैं कि भगवान गणेश की शादी कब और कैसे हुई। गणेश जी के विवाह में आई बाधा पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान गणेश (Lord Ganesha) के विवाह को लेकर एक रोचक कथा प्रचलित है। जब भगवान गणेश बड़े हुए, तो उनके विवाह को लेकर एक समस्या उत्पन्न हो गई। दरअसल, शिव-पार्वती के बड़े पुत्र होने के बावजूद गणेश जी का विवाह नहीं हो पा रहा था। इसकी मुख्य वजह यह थी कि उनके छोटे भाई भगवान कार्तिकेय विवाह में सबसे आगे रहना चाहते थे। भगवान कार्तिकेय (Lord Kartikeya) का मानना था कि पहले उन्हीं का विवाह होना चाहिए, क्योंकि वे बड़े पराक्रमी और तेजस्वी थे। इधर, देवताओं को भी यह चिंता सताने लगी कि यदि गणेश जी विवाह कर लेते हैं, तो वे हर कार्य में पहले पूजे जाने वाले देवता बन जाएंगे, जिससे बाकी देवताओं की महत्ता कम हो सकती है। नारद मुनि की भूमिका जब भगवान गणेश (Lord Ganesha) के विवाह को लेकर माता पार्वती चिंतित हुईं, तब देवर्षि नारद (Sage Narada) ने एक योजना बनाई। नारद मुनि हमेशा किसी न किसी लीला के सूत्रधार रहे हैं, और इस बार भी उन्होंने ऐसी ही एक युक्ति निकाली जिससे भगवान गणेश का विवाह संभव हो सके। नारद मुनि (Sage Narada) ने गणेश जी के माता-पिता को बताया कि गणपति को शीघ्र विवाह करना चाहिए, अन्यथा यह देवताओं और संसार के लिए अच्छा नहीं होगा। लेकिन समस्या यह थी कि कार्तिकेय पहले विवाह करना चाहते थे। तब एक शर्त रखी गई कि जो भी संपूर्ण ब्रह्मांड की सबसे पहले परिक्रमा करेगा, उसका विवाह पहले होगा। गणेश जी की बुद्धिमानी और विवाह भगवान कार्तिकेय(Lord Kartikeya) ने तुरंत अपना वाहन मोर लिया और पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा के लिए निकल पड़े। लेकिन भगवान गणेश का वाहन मूषक (चूहा) था, जो तेज गति से ब्रह्मांड की परिक्रमा करने में असमर्थ था। ऐसे में गणेश जी ने अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए माता पार्वती और भगवान शिव की सात बार परिक्रमा कर ली। उन्होंने यह तर्क दिया कि माता-पिता ही संपूर्ण ब्रह्मांड हैं और उनकी परिक्रमा करने से ही संपूर्ण ब्रह्मांड की परिक्रमा हो जाती है। उनकी इस बुद्धिमानी से देवगण और ऋषि-मुनि प्रसन्न हुए और निर्णय लिया कि गणेश जी का विवाह पहले होगा। गणेश जी की दो पत्नियां – ऋद्धि और सिद्धि भगवान गणेश (Lord Ganesha) के विवाह के लिए प्रजापति विश्वरथ की दो पुत्रियों ऋद्धि और सिद्धि को चुना गया। ऋद्धि और सिद्धि बुद्धि, समृद्धि और सफलता की प्रतीक मानी जाती हैं। विवाह के पश्चात भगवान गणेश को दो पुत्र रत्नों की प्राप्ति हुई – शुभ और लाभ। इसे भी पढ़ें:- कब और कहां लेंगे भगवान विष्णु कल्कि का अवतार? गणेश विवाह का महत्व भगवान गणेश (Lord Ganesha) के विवाह की कथा हमें यह सिखाती है कि केवल शारीरिक बल ही नहीं, बल्कि बुद्धि और विवेक से भी हर समस्या का समाधान किया जा सकता है। यही कारण है कि भगवान गणेश को बुद्धि, ज्ञान और विवेक का देवता माना जाता है। गणेश जी के विवाह के बाद से ही उनका पूजन सबसे पहले करने की परंपरा शुरू हुई। आज भी किसी भी शुभ कार्य या विवाह से पहले गणपति की पूजा की जाती है, ताकि सभी बाधाएं दूर हों और कार्य निर्विघ्न संपन्न हो। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Ganesha #GaneshMarriage #VighnahartaWedding #NaradMuniRole #GaneshKatha #HinduMythology #GanpatiStory #ShivaParvati #DivineMarriage #MythologicalTales #GaneshBhakti

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Yuyutsu in Mahabharata

महाभारत युद्ध के बाद जीवित रहने वाला कौरव: युयुत्सु की अनसुनी कहानी

महाभारत (Mahabharata) का महाकाव्य भारतीय संस्कृति और इतिहास का एक अहम हिस्सा है। यह कथा न केवल धर्म, न्याय और कर्तव्य के बारे में है, बल्कि इसमें मानवीय भावनाओं, संघर्ष और जीवन के गहरे सबक भी छिपे हैं। महाभारत के युद्ध में कौरवों और पांडवों के बीच भीषण संग्राम हुआ, जिसमें अधिकांश कौरव मारे गए। लेकिन क्या आप जानते हैं कि धृतराष्ट्र (Dhritarashtra) की एक संतान ऐसी भी थी, जो इस युद्ध के बाद भी जीवित रही? आइए, जानते हैं उस कौरव की कथा, जिसने महाभारत के युद्ध में अपनी जान बचाई और आगे चलकर एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। धृतराष्ट्र की संतान: कौरवों का परिचय धृतराष्ट्र,( Dhritarashtra) हस्तिनापुर के महाराज विचित्रवीर्य के पुत्र थे, लेकिन जन्म से ही अंधे होने के कारण वे राजगद्दी पर नहीं बैठ सके। उनकी पत्नी गांधारी से उन्हें 100 पुत्र और एक पुत्री प्राप्त हुईं, जिन्हें कौरव के नाम से जाना जाता है। इनमें सबसे बड़े पुत्र दुर्योधन थे, जो कौरवों के नेता बने। महाभारत के युद्ध में कौरवों की ओर से लड़ने वाले अधिकांश योद्धा युद्ध में मारे गए, लेकिन धृतराष्ट्र की एक संतान ऐसी थी, जो इस युद्ध के बाद भी जीवित रही। कौरवों का 101वां भाई कौन था? धृतराष्ट्र (Dhritarashtra) और गांधारी के 100 पुत्रों के अलावा, उनका एक और पुत्र था, जिसका जन्म गांधारी की दासी सुगाधा से हुआ था। इस पुत्र का नाम युयुत्सु (Yuyutsu) था, जो दुर्योधन का सौतेला भाई था। युयुत्सु (Yuyutsu) को भी वैसे ही शिक्षित और पाला गया जैसा कि धृतराष्ट्र के अन्य पुत्रों को, लेकिन दुर्योधन ने कभी उसे अपना भाई नहीं माना और न ही उसे सम्मान दिया। इस कारण युयुत्सु कौरवों से अधिक पांडवों के प्रति झुकाव रखते थे और अंततः महाभारत युद्ध में उन्होंने पांडवों का साथ दिया। युयुत्सु का निर्णय: पांडवों का साथ जब कुरुक्षेत्र युद्ध की घोषणा हुई, तब युयुत्सु (Yuyutsu) ने इसे रोकने की पूरी कोशिश की, लेकिन यह संभव नहीं हो सका। शुरुआत में वे कौरवों की ओर थे, लेकिन जब युद्ध का पहला दिन आया, तो युधिष्ठिर ने घोषणा की कि यह धर्मयुद्ध है, और जो भी धर्म का पक्ष लेना चाहता है, वह अपनी सेना बदल सकता है। युधिष्ठिर की इस बात को सुनकर युयुत्सु (Yuyutsu) ने सत्य और धर्म का साथ देने का निर्णय लिया। उन्होंने कौरवों की सेना छोड़कर पांडवों की सेना में शामिल होने का फैसला किया। उनके इस फैसले से दुर्योधन बहुत क्रोधित हुआ, लेकिन युयुत्सु ने धर्म के मार्ग को चुना और पांडवों के साथ युद्ध में शामिल हुए। युद्ध में युयुत्सु की भूमिका युयुत्सु (Yuyutsu) अत्यंत बुद्धिमान और कुशल प्रबंधक थे। उनकी इस क्षमता को देखते हुए पांडवों ने उन्हें सीधा युद्ध करने के बजाय सैन्य प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी। वे पांडवों की सेना के लिए भोजन, पानी और हथियारों की व्यवस्था करने का कार्य संभालते थे, जिससे युद्ध के दौरान सैन्य जरूरतों को पूरा किया जा सके। इसे भी पढ़ें:- कल्कि अवतार: कब और कहां लेंगे भगवान विष्णु कल्कि का अवतार? युद्ध के बाद युयुत्सु का जीवन महाभारत (Mahabharata) के युद्ध के बाद, जब पांडवों ने हस्तिनापुर का शासन संभाला, तो युयुत्सु ने भी उनके शासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। युधिष्ठिर ने युयुत्सु को अपना सलाहकार और मंत्री बनाया। युयुत्सु की न्यायप्रियता और बुद्धिमत्ता ने उन्हें पांडवों के शासन में एक विश्वसनीय सहयोगी बना दिया। उन्होंने हस्तिनापुर के पुनर्निर्माण और प्रजा के कल्याण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। युयुत्सु का चरित्र और सीख युयुत्सु (Yuyutsu) का चरित्र महाभारत (Mahabharata) की कथा में एक महत्वपूर्ण सीख देता है। वे इस बात का उदाहरण हैं कि न्याय और धर्म का साथ देना कितना महत्वपूर्ण है, चाहे उसके लिए अपने परिवार या समाज के विरुद्ध ही क्यों न जाना पड़े। युयुत्सु ने दिखाया कि सही और गलत के बीच फर्क करना और धर्म के मार्ग पर चलना ही मनुष्य का सबसे बड़ा कर्तव्य है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Mahabharata #Mahabharata #KurukshetraWar #Yuyutsu #Kauravas #MahabharatFacts #HinduMythology #DharmYudh #EpicStories #AncientIndia #MahabharatSecrets

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Lakshmi's vahan,

उल्लू कैसे बना मां लक्ष्मी का वाहन: जानिए क्या है पौराणिक कहानी

हिंदू धर्म में देवी-देवताओं के वाहनों का विशेष महत्व है। ये वाहन न केवल देवताओं की शक्ति और प्रभाव को दर्शाते हैं, बल्कि उनके चरित्र और गुणों को भी प्रकट करते हैं। मां लक्ष्मी, (Maa Lakshmi) जो धन, समृद्धि और सौभाग्य की देवी हैं, उनका वाहन उल्लू (Owl) है। यह बात अक्सर लोगों को आश्चर्यचकित करती है कि आखिर उल्लू जैसा पक्षी मां लक्ष्मी का वाहन कैसे बन गया। इसके पीछे एक पौराणिक कथा और गहरा रहस्य छिपा है। आइए जानते हैं कि उल्लू कैसे मां लक्ष्मी का वाहन बना और इसका क्या महत्व है। उल्लू और मां लक्ष्मी की पौराणिक कथा पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार मां लक्ष्मी (Maa Lakshmi) ने यह निर्णय लिया कि वह अपने लिए एक वाहन चुनेंगी। उन्होंने सभी जानवरों को अपने पास आने का आमंत्रण दिया और यह शर्त रखी कि जो जानवर कार्तिक अमावस्या के दिन सबसे पहले उनके पास पहुंचेगा, वही उनका वाहन बनेगा। सभी जानवर इस अवसर का लाभ उठाने के लिए उत्सुक थे, क्योंकि मां लक्ष्मी का वाहन बनना एक बहुत बड़ा सम्मान था। कार्तिक अमावस्या के दिन, सभी जानवर मां लक्ष्मी के पास पहुंचने के लिए तैयार हो गए। गरुड़, हंस, सिंह, नंदी और अन्य जानवरों ने सोचा कि वे सबसे पहले पहुंचकर मां लक्ष्मी का वाहन बन जाएंगे। लेकिन उल्लू, जो अक्सर रात में ही सक्रिय रहता है, ने इस दिन एक अलग रणनीति बनाई। मां लक्ष्मी ने धरती पर एक उल्लू को देखा। उल्लू (Owl) रात के अंधेरे में भी अच्छी तरह देख सकता है और वह बहुत चालाक और बुद्धिमान भी होता है। तब से उल्लू मां लक्ष्मी का वाहन है और उनके साथ रहता है। उल्लू का महत्व और प्रतीकात्मकता उल्लू (Owl) को मां लक्ष्मी का वाहन बनाने के पीछे कई प्रतीकात्मक कारण हैं। उल्लू को बुद्धिमान और चालाक पक्षी माना जाता है। यह रात के अंधेरे में भी देख सकता है, जो अंधकार में प्रकाश की ओर ले जाने का प्रतीक है। मां लक्ष्मी धन और समृद्धि की देवी हैं और उनका उल्लू पर सवार होना यह दर्शाता है कि धन और समृद्धि को प्राप्त करने के लिए बुद्धिमत्ता और चालाकी की आवश्यकता होती है। उल्लू को अक्सर अंधविश्वास और डर का प्रतीक माना जाता है, लेकिन हिंदू धर्म में इसका विपरीत महत्व है। उल्लू मां लक्ष्मी (Maa Lakshmi) के साथ रहकर यह संदेश देता है कि धन और समृद्धि को प्राप्त करने के लिए अंधविश्वास से दूर रहना चाहिए और बुद्धिमत्ता से काम लेना चाहिए। उल्लू का मां लक्ष्मी का वाहन बनना यह भी दर्शाता है कि धन और समृद्धि को सही तरीके से प्रबंधित करने के लिए बुद्धिमत्ता और सतर्कता की आवश्यकता होती है। इसे भी पढ़ें:- कब से शुरू हो रहे हैं नवरात्र, जानें मां दुर्गा के आगमन का संकेत उल्लू की पूजा और महत्व हिंदू धर्म में उल्लू को मां लक्ष्मी (Maa Lakshmi का वाहन मानकर उसकी पूजा की जाती है। कई लोग मां लक्ष्मी की पूजा के दौरान उल्लू की मूर्ति या चित्र भी रखते हैं। मान्यता है कि उल्लू की पूजा करने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और धन और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। उल्लू की पूजा करने के लिए लोग उसकी मूर्ति या चित्र को मां लक्ष्मी के साथ स्थापित करते हैं और उसे फूल, अक्षत और मिठाई अर्पित करते हैं। उल्लू की पूजा करने से मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और घर में धन और समृद्धि का वास होता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Maa Lakshmi #MaaLakshmi #LakshmiVahan #UlluStory #HinduMythology #LakshmiPuran #WealthSymbol #MythologicalTales #HinduGods #SpiritualWisdom #ReligiousLegends

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Creator of Universe

ब्रह्मा जी ने कैसे की सृष्टि की रचना? जानिए क्या है पौराणिक कहानी

हिंदू धर्म के अनुसार, सृष्टि (Universe) की रचना का रहस्य भगवान ब्रह्मा से जुड़ा हुआ है। ब्रह्मा को सृष्टि का रचयिता (Creator of Universe) माना जाता है और उन्हें त्रिदेवों में से एक का स्थान प्राप्त है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना कैसे की थी? इसके पीछे की कथा न केवल रोचक है, बल्कि गहन दार्शनिक अर्थों से भरी हुई है। आइए, इस पौराणिक कथा को विस्तार से जानते हैं। प्रारंभ: शून्य से सृष्टि का आरंभ हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में केवल अंधकार और शून्य था। न कोई आकाश था, न धरती, न ही कोई जीवित प्राणी। इस अवस्था को “प्रलय” कहा जाता है। प्रलय के बाद, जब सृष्टि का निर्माण होना था, तब परमात्मा ने अपने निराकार रूप से साकार रूप धारण किया और ब्रह्मा के रूप में प्रकट हुए। ब्रह्मा जी को सृष्टि की रचना का दायित्व सौंपा गया। ब्रह्मा जी का प्रकटन पुराणों के अनुसार, ब्रह्मा जी एक कमल के फूल से प्रकट हुए, जो भगवान विष्णु की नाभि से निकला था। इस कमल को “नाभि कमल” कहा जाता है। ब्रह्मा जी ने इस कमल पर बैठकर सृष्टि की रचना का कार्य प्रारंभ किया। यह कमल ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है और इससे जुड़ी कथा ब्रह्मा के प्रकटन की महत्ता को दर्शाती है। सृष्टि की रचना का प्रक्रिया ब्रह्मा जी (Lord Brahma) ने सृष्टि की रचना के लिए सबसे पहले पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) का निर्माण किया। इन तत्वों के संयोजन से उन्होंने ब्रह्मांड (Universe) की रचना की। इसके बाद, उन्होंने समय की गणना के लिए युगों और कालचक्र की रचना की। ब्रह्मा जी ने सृष्टि को व्यवस्थित करने के लिए दस प्रजापतियों का निर्माण किया, जिन्हें उनके मानस पुत्र भी कहा जाता है। इन प्रजापतियों में मरीचि, अत्रि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वशिष्ठ, प्रचेता, भृगु और नारद शामिल हैं। इन प्रजापतियों ने ब्रह्मा जी की सहायता से विभिन्न प्राणियों और जीवों की रचना की। इसे भी पढ़ें:- कब से शुरू हो रहे हैं नवरात्र, जानें मां दुर्गा के आगमन का संकेत मनुष्य की उत्पत्ति ब्रह्मा जी (Lord Brahma) ने मनुष्य की रचना के लिए अपने शरीर से दो शक्तियों को प्रकट किया। पहली शक्ति थी “स्वायंभुव मनु”, जो पहले मनुष्य थे, और दूसरी शक्ति थी “शतरूपा”, जो पहली स्त्री थीं। इन दोनों से ही मनुष्य जाति का विस्तार हुआ। स्वायंभुव मनु और शतरूपा को आदि मानव के रूप में जाना जाता है, जिनसे संपूर्ण मानव जाति की उत्पत्ति हुई। वेदों की रचना ब्रह्मा जी (Lord Brahma) ने सृष्टि की रचना के साथ-साथ ज्ञान और धर्म की नींव रखने के लिए वेदों की भी रचना की। वेदों को “अपौरुषेय” माना जाता है, यानी इनकी रचना किसी मनुष्य द्वारा नहीं की गई थी। ब्रह्मा जी ने वेदों के माध्यम से मनुष्यों को धर्म, कर्म और जीवन के मार्ग का ज्ञान दिया। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद यह चार वेद हैं, जो ब्रह्मा जी द्वारा प्रकट किए गए। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Universe #BrahmaCreation #HinduMythology #UniverseCreation #PuranicStories #VedicWisdom #SanatanDharma #DivineCreation #IndianMythology #BrahmaPuran #HinduBeliefs

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