Solah Shringar before Mukhagni

मुखाग्नि से पहले क्यों किया जाता है सुहागिन स्त्री का सोलह श्रृंगार?

भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म में जीवन के हर चरण से जुड़ी गहरी मान्यताएं और परंपराएं देखने को मिलती हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक, हर एक पड़ाव विशेष रीति-रिवाजों और विधियों से जुड़ा होता है। इन्हीं परंपराओं में एक गूढ़ और भावनात्मक परंपरा है, सुहागिन स्त्री के अंतिम संस्कार से पहले उसका ‘सोलह श्रृंगार’ (Solah Shringar) करना। यह परंपरा भले ही कई लोगों को अजीब लगती हो, लेकिन इसके पीछे न केवल धार्मिक कारण हैं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक पहलू भी छिपे हुए हैं। आइए जानते हैं कि अंतिम संस्कार से पहले सुहागिन स्त्रियों का सोलह श्रृंगार क्यों किया जाता है और इसका क्या महत्व है। क्या होता है सोलह श्रृंगार? हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए सोलह श्रृंगार (Solah Shringar) सौंदर्य और सौभाग्य का प्रतीक होता है। इसमें सिंदूर, बिंदी, काजल, चूड़ियां, बिछुए, पायल, नथ, मांग टीका, कर्णफूल, अँगूठी, हार, गजरा, आलता, कंघी, वस्त्र (साड़ी या सुहाग के रंगों में), और मेहंदी शामिल होती है। यह श्रृंगार केवल सजने-संवरने के लिए नहीं होता, बल्कि यह एक स्त्री के विवाहित जीवन की सामाजिक पहचान भी होता है। मृत्यु के बाद क्यों किया जाता है श्रृंगार? 1. अखंड सौभाग्यवती का सम्मान भारतीय परंपरा में यदि किसी महिला की मृत्यु उसके पति के जीवनकाल में होती है, तो उसे “अखंड सौभाग्यवती” कहा जाता है। यह स्थिति शुभ मानी जाती है, और ऐसी महिला को उच्च सम्मान के साथ अंतिम विदाई देने की परंपरा है। सोलह शृंगार इस बात का प्रतीक होता है कि उसने अपने वैवाहिक जीवन को पूर्णता और सौभाग्य के साथ जिया है। 2. देवी स्वरूप के रूप में विदाई भारतीय संस्कृति में नारी को देवी का रूप माना गया है, और सुहागिन महिला को विशेष रूप से मां लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। मृत्यु के समय उसे सोलह शृंगार देकर विदा करना, मानो किसी देवी को उसकी दिव्य यात्रा के लिए सजाना हो। यह परंपरा महिला के पूजनीय और शक्ति स्वरूप के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है। 3. पति के प्रति प्रेम और समर्पण की अभिव्यक्ति सोलह शृंगार (Solah Shringar) केवल सौंदर्य का प्रतीक नहीं, बल्कि स्त्री के पति के प्रति प्रेम, निष्ठा और समर्पण की भावना का प्रतीक भी होता है। माना जाता है कि यह श्रृंगार उस अटूट बंधन की याद दिलाता है, जो पति-पत्नी के बीच मृत्यु के बाद भी बना रहता है। 4. शुभता और सौभाग्य का प्रतीक जहां मृत्यु को सामान्यतः दुखद घटना माना जाता है, वहीं एक सुहागिन महिला की मृत्यु को कुछ परंपराओं में शुभता से भी जोड़ा जाता है। सोलह शृंगार के माध्यम से यह भाव व्यक्त किया जाता है कि वह स्त्री जीवन के सभी सौभाग्य लेकर जा रही है और अपने पीछे परिवार को आशीर्वाद देकर जा रही है। 5. गरिमामयी अंतिम विदाई एक सुहागिन महिला अपने जीवन के हर मांगलिक अवसर पर सजती-संवरती रही होती है। उसकी अंतिम यात्रा को भी गरिमा देने के लिए उसे उसी प्रकार से सजाया जाता है। यह उसकी आत्मा को सम्मानपूर्वक विदाई देने की एक भावपूर्ण प्रक्रिया होती है, जिसमें परिवारजन उसे प्रेम और श्रद्धा के साथ विदा करते हैं। इसे भी पढ़ें:- हारसिंगार के चमत्कारी उपाय: घर लाएं सुख, शांति और समृद्धि धार्मिक मान्यता धार्मिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो हिंदू धर्म में मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि एक नई यात्रा की शुरुआत माना गया है। ऐसा माना जाता है कि मृत आत्मा अपने रूप में शरीर को कुछ समय तक देखती है। ऐसे में यदि सुहागिन स्त्री को बिना श्रृंगार के विदा किया जाए तो उसकी आत्मा को संतोष नहीं मिलता।कुछ पौराणिक ग्रंथों और शास्त्रों में यह भी उल्लेख मिलता है कि पति के जीवित रहते हुए, उसकी पत्नी को विधवा की तरह विदा करना उचित नहीं होता। इसलिए, जब तक पति जीवित हो, स्त्री का सौभाग्य यथावत माना जाता है, भले ही उसकी मृत्यु हो चुकी हो। इसलिए उसे सौभाग्यवती के रूप में विदा किया जाता है। Latest News in Hindi Today Hindi news  #SolahShringar #MukhagniRitual #HinduTradition #SuhaginRituals #LastRitesIndia #IndianCulture #FuneralCustoms #HinduBeliefs

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Kuldevi and Kuldevata

क्या आप जानते हैं आपके कुलदेवी-देवता कौन हैं?

भारतीय संस्कृति में कुलदेवी (Kuldevi) और कुलदेवता का विशेष स्थान है। ये वे दिव्य शक्तियाँ हैं जो पीढ़ियों से किसी कुल या वंश की रक्षा करती आई हैं। हर जाति, समाज या गोत्र की अपनी एक कुलदेवी या कुलदेवता होते हैं, जिन्हें परिवार की परंपराओं के अनुसार पूजा जाता है। ऐसा माना जाता है कि कुलदेवी-देवता की कृपा से परिवार में सुख, समृद्धि और उन्नति बनी रहती है, वहीं अगर इनकी उपेक्षा की जाए तो जीवन में बाधाएं, अशांति और कष्ट आ सकते हैं। लेकिन आज के बदलते समय में बहुत से लोग यह नहीं जानते कि उनके कुलदेवी या कुलदेवता (Kuldevta) कौन हैं, या उन्हें कैसे पूजा जाए। कई बार यह जानकारी बुजुर्गों के जाने के साथ ही परिवार में खत्म हो जाती है। आइए जानते हैं कि कैसे आप अपने कुलदेवी-देवता की पहचान कर सकते हैं, और किन बातों का ध्यान रखकर आप उनकी कृपा प्राप्त कर सकते हैं। इस तरह लगाएं अपने कुलदेवी-देवता का पतायदि आपको अपने कुलदेवी (Kuldevi) या कुलदेवता (Kuldevta) की जानकारी नहीं है, तो आप अपने गोत्र के माध्यम से इसका पता लगा सकते हैं। हर गोत्र से संबंधित एक विशिष्ट देवी या देवता होते हैं। इसके लिए आप किसी विद्वान ज्योतिषाचार्य या पंडित से मार्गदर्शन ले सकते हैं। इसके अलावा, अपने परिवार के बुजुर्गों से भी इस विषय में जानकारी प्राप्त की जा सकती है, क्योंकि वे पीढ़ियों से चली आ रही पूजा-पद्धति से परिचित होते हैं। यदि परिवार में कोई बुजुर्ग जीवित नहीं हैं, तो यह जानने का प्रयास करें कि आपके कुल या वंश की मुख्य पूजा कहां और किस स्थान पर होती है। यह जानकारी भी आपको आपके कुलदेवी-देवता की पहचान करने में मदद कर सकती है। कैसे जानें कौन हैं आपके कुलदेवी-देवता? कई परिवारों के पारंपरिक पुरोहित या पंडित होते हैं जो पीढ़ियों से परिवार की पूजा करते आए हैं। वे आपके कुलदेवता या कुलदेवी के बारे में जानकारी दे सकते हैं, साथ ही यह भी बता सकते हैं कि उनकी पूजा कब और कैसे करनी चाहिए। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां कुलदेवी-देवता को नाराज करने वाले कार्य अपने कुलदेवी (Kuldevi) या कुलदेवता की पूजा-अर्चना कभी भी बंद न करें और उन्हें भूलने की भूल न करें। ऐसा करने से उनकी कृपा आपसे दूर हो सकती है, जिससे जीवन में अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ और परेशानियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। पूजा के समय अपने कुलदेवी-देवता का मन ही मन स्मरण अवश्य करें। यदि आपको उनके नाम याद न हों, तो आप उस स्थान का नाम लेकर भी उनकी पूजा कर सकते हैं, जहाँ वे विराजमान हैं। इसके अलावा, यदि आपके कुलदेवी-देवता किसी अन्य स्थान पर स्थित हैं, तो समय-समय पर वहां जाकर उनके दर्शन करना और आशीर्वाद लेना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Kuldevi #Kuldevi #Kuldevata #FamilyDeity #HinduTradition #SpiritualHeritage #AncestralGod

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Guru Dakshina Meaning & Importance

प्रेमानंद जी महाराज: गुरु दक्षिणा का सही अर्थ और महत्व

गुरु-शिष्य परंपरा भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता का एक अभिन्न अंग रही है। गुरु को ईश्वर के समान माना जाता है, क्योंकि वे ही शिष्य को अज्ञानता के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाते हैं। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर शिष्य अपने गुरु को गुरु दक्षिणा देकर उनका आभार व्यक्त करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गुरु को सबसे अच्छी गुरु दक्षिणा क्या दे? प्रेमानंद जी महाराज, जो एक प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु और विचारक हैं, इस विषय पर गहन ज्ञान और सीख प्रदान करते हैं। उनके अनुसार, गुरु दक्षिणा (Guru Dakshina) केवल धन या भौतिक वस्तुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आंतरिक भावना और समर्पण से जुड़ी हुई है। गुरु दक्षिणा का वास्तविक अर्थ प्रेमानंद जी महाराज (Premanand Ji Maharaj) के अनुसार, गुरु दक्षिणा का वास्तविक अर्थ केवल धन या भौतिक वस्तुओं का दान नहीं है। गुरु दक्षिणा का मूल उद्देश्य गुरु के प्रति कृतज्ञता और समर्पण की भावना को व्यक्त करना है। गुरु शिष्य को ज्ञान, अनुशासन और आध्यात्मिकता का मार्ग दिखाते हैं, और शिष्य का कर्तव्य है कि वह इस ज्ञान को अपने जीवन में उतारे और उसे दूसरों तक पहुंचाए। गुरु दक्षिणा का सही अर्थ है गुरु के दिए हुए ज्ञान को अपने जीवन में लागू करना और उसे समाज के कल्याण के लिए उपयोग करना। गुरु दक्षिणा के रूप में क्या दें? इसे भी पढ़ें:- सीएम योगी ने अपने तीसरे टर्म को लेकर कही यह बड़ी बात, मचा सियासी हड़कंप  गुरु दक्षिणा का आध्यात्मिक महत्व प्रेमानंद जी महाराज (Premanand Ji Maharaj) के अनुसार, गुरु दक्षिणा (Guru Dakshina) का आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। गुरु दक्षिणा केवल एक रस्म नहीं है, बल्कि यह शिष्य के जीवन में आंतरिक परिवर्तन लाने का एक साधन है। गुरु दक्षिणा देने का उद्देश्य शिष्य को आत्मनिरीक्षण करने और अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रेरित करना है। गुरु दक्षिणा के माध्यम से शिष्य अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है और उनके आशीर्वाद को प्राप्त करता है। गुरु की इच्छा यह है कि शिष्य भगवत प्राप्ति के मार्ग पर चले। उन्होंने जो नाम दिया है, उसका नाम जप करें। यदि शिष्य गुरु के बताए मार्ग पर नहीं चलेंगे, तो गुरु प्रसन्न नहीं होंगे। गुरु की प्रसन्नता मन, वचन और कर्म से उनकी आज्ञा का पालन करने में है। गुरु की आज्ञा का पालन करना सबसे बड़ी सेवा है। गुरु की आज्ञा सभी के लिए एक ही है: भजन करो, अच्छे आचरण अपनाओ और भगवान को प्राप्त करो। गुरु दक्षिणा और आधुनिक समय आधुनिक समय में गुरु दक्षिणा (Guru Dakshina) का अर्थ बदल गया है। आजकल लोग गुरु दक्षिणा को केवल धन या भौतिक वस्तुओं तक सीमित मानते हैं। लेकिन प्रेमानंद जी महाराज (Premanand Ji Maharaj) के अनुसार, गुरु दक्षिणा का वास्तविक अर्थ आंतरिक भावना और समर्पण से जुड़ा हुआ है। गुरु दक्षिणा के रूप में धन या भौतिक वस्तुएं देना गलत नहीं है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। शिष्य को गुरु के प्रति अपनी भक्ति और समर्पण को व्यक्त करना चाहिए और उनके दिए हुए ज्ञान को अपने जीवन में उतारना चाहिए। शिष्य अपने गुरु के प्रति अपनी भक्ति और समर्पण को व्यक्त करता है और उनके आशीर्वाद को प्राप्त करता है। Latest News in Hindi Today Hindi News Premanand Ji Maharaj #PremanandJiMaharaj #GuruDakshina #SpiritualWisdom #HinduTradition #VedicTeachings #GuruShishyaBond #SpiritualGuide #IndianWisdom #PremanandMaharaj #DakshinaSignificance

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Raksha Sutra Bandhne ke Niyam

Raksha Sutra Bandhne ke Niyam: कितने दिनों तक रखना चाहिए कलावा? 

हिंदू धर्म में रक्षा सूत्र यानी कलावा (Kalava) बांधने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। यह सिर्फ एक धार्मिक धागा नहीं, बल्कि आस्था, सुरक्षा और शुभता का प्रतीक माना जाता है। इसे हाथ में बांधने से न केवल नकारात्मक शक्तियों से बचाव होता है, बल्कि यह व्यक्ति के जीवन में सुख, समृद्धि और शांति भी लाता है। परंतु, इसे कब बांधना चाहिए, कितने दिनों तक रखना उचित है और इसे खोलने के क्या नियम हैं? आइए जानते हैं रक्षा सूत्र से जुड़े नियम और इसकी धार्मिक मान्यताएं। रक्षा सूत्र (कलावा) क्या है? रक्षा सूत्र जिसे कलावा (Kalava) या मौली भी कहा जाता है जो एक पवित्र धागा होता है जिसे हिंदू धर्म में विशेष रूप से पूजा-पाठ, व्रत, अनुष्ठान और धार्मिक कार्यों के दौरान बांधा जाता है। इसे मुख्य रूप से लाल, पीले और काले रंग के धागों से बनाया जाता है। यह धागा भगवान की कृपा और आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है और इसे बांधने से व्यक्ति को नकारात्मक ऊर्जा और दुष्ट शक्तियों से रक्षा मिलती है। कलावा बांधने के नियम रक्षा सूत्र (Raksha Sutra) को बांधने से पहले और बाद में कुछ नियमों का पालन करना आवश्यक होता है। सही विधि से इसे धारण करने से शुभ फल प्राप्त होते हैं। 1. किस हाथ में बांधना चाहिए कलावा? 2. कौन-से दिन कलावा बांधना शुभ होता है? रक्षा सूत्र कितने दिनों तक पहनना चाहिए अक्सर लोग रक्षा सूत्र या कलावा (Kalava) बांधने के बाद इसे लंबे समय तक उतारना भूल जाते हैं। ज्योतिष के अनुसार, समय के साथ कलावे का रंग फीका पड़ने लगता है, जिससे उसकी ऊर्जा भी धीरे-धीरे कम हो जाती है और अंततः समाप्त हो जाती है। शास्त्रों के अनुसार, इसे अधिकतम 21 दिनों तक ही पहनना चाहिए, क्योंकि इस अवधि के बाद इसका रंग बदलने लगता है। जिस कलावे का रंग उतर जाए, उसे धारण नहीं करना चाहिए। कलावा बांधने से मिलने वाले लाभ रक्षा सूत्र (Raksha Sutra) को बांधने से कई आध्यात्मिक और वैज्ञानिक लाभ होते हैं। 1. बुरी नजर से बचाव कलावा बांधने से व्यक्ति पर बुरी नजर नहीं लगती और नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा होती है। 2. ग्रह दोषों का निवारण ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, रक्षा सूत्र धारण करने से शनि, राहु और केतु के बुरे प्रभाव कम होते हैं। 3. आत्मबल और आत्मविश्वास बढ़ता है इससे व्यक्ति को मानसिक और आत्मिक शक्ति मिलती है, जिससे वह जीवन की कठिनाइयों का सामना करने में सक्षम होता है। 4. स्वास्थ्य लाभ कलावा को सही तरीके से बांधने से रक्त संचार बेहतर होता है और यह स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डालता है। इसे भी पढ़ें:- इन 3 दिनों तक बंद रहते हैं कपाट, बंटता है अनोखा प्रसाद! कलावा बांधने की सही विधि रक्षा सूत्र (Raksha Sutra) को बांधते समय विशेष मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। यह मंत्र इस प्रकार है – “ॐ भद्रायै च विद्महे, भीमायै च धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात्।” इस मंत्र को बोलते हुए रक्षा सूत्र को बांधना चाहिए। इससे इसका प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है। रक्षा सूत्र को कब और कैसे खोलना चाहिए? नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Kalava #RakshaSutra #KalawaSignificance #HinduTradition #SacredThread #KalawaRules #SpiritualBeliefs #HinduCustoms #ThreadOfProtection #VedicRituals #KalawaWearing

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