मां दुर्गा का जन्म: अधर्म के अंत और धर्म की स्थापना की दिव्य गाथा
हिंदू धर्म में देवी दुर्गा को शक्ति, साहस, और धर्म की रक्षक के रूप में पूजा जाता है। उनका जन्म केवल एक देवी के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी शक्ति के रूप में हुआ था जो सृष्टि से अधर्म और असुरता को समाप्त करने के लिए अवतरित हुईं। मां दुर्गा का जन्म एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और दार्शनिक संदेश है- जब अधर्म अपने चरम पर होता है, तब सृष्टि में संतुलन स्थापित करने के लिए देवी (मां दुर्गा) स्वयं प्रकट होती हैं। राक्षसों के अत्याचार से त्रस्त देवताओं ने जब कोई उपाय न देखा, तब सभी देवताओं की शक्तियों से जन्मी महाशक्ति देवी दुर्गा। नौ दिनों के भीषण युद्ध के बाद देवी ने महिषासुर का वध कर सृष्टि में पुनः शांति स्थापित की। महिषासुर वध की कथा: देवी दुर्गा का दिव्य जन्म हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, एक बार रंभासुर नामक राक्षस ने एक महिषी (भैंस रूपी स्त्री) से विवाह किया। उनके पुत्र का नाम पड़ा महिषासुर, जिसका अर्थ है “भैंस का पुत्र”। जन्म से ही वह अलौकिक शक्तियों से युक्त था। जैसे-जैसे वह बड़ा हुआ, उसने राक्षसों का राजा बनना तय किया और अमरता प्राप्त करने के लिए ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने हेतु कठोर तपस्या शुरू कर दी। महिषासुर ने वर्षों तक एक पैर पर खड़े होकर तप किया। उसकी तपस्या की शक्ति तीनों लोकों तक फैल गई। अंततः ब्रह्मा जी उसके सामने प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा। महिषासुर ने कहा, “मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि मुझे कोई पुरुष या देवता न मार सके, केवल कोई स्त्री ही मेरा वध कर सके।” ब्रह्मा जी ने यह वरदान दे दिया। वरदान पाकर महिषासुर अहंकारी हो गया और देवताओं पर हमला कर दिया। देवताओं के सारे अस्त्र-शस्त्र उसकी ताकत के सामने बेअसर साबित हुए। उसने इंद्रलोक पर अधिकार कर लिया और स्वयं को तीनों लोकों का स्वामी घोषित कर दिया। इससे संपूर्ण सृष्टि में भय का माहौल छा गया। जब देवी दुर्गा अमरावती पहुंचीं, तो उनके गर्जन से पर्वत हिल गए देवताओं ने ब्रह्मा, विष्णु और महादेव के साथ मिलकर एक स्त्री शक्ति की रचना की, जिसमें सभी देवताओं की शक्तियों का समावेश था। इसी शक्ति से देवी दुर्गा का जन्म हुआ। उन्हें शक्तिशाली अस्त्र-शस्त्रों से सज्जित किया गया और हिमालय ने उन्हें शेर की सवारी दी। जब देवी दुर्गा अमरावती पहुंचीं, तो उनके गर्जन से पर्वत हिल गए। महिषासुर ने इसे मजाक समझा और विवाह का प्रस्ताव भिजवाया। देवी ने उत्तर दिया, “मैं महादेवी हूं और महादेव मेरे पति हैं। मैं तुम्हें चेतावनी देती हूं कि अमरावती छोड़ दो, अन्यथा मैं तुम्हारा विनाश करूंगी।” क्रोधित होकर महिषासुर ने अपने योद्धाओं को भेजा, लेकिन देवी ने सभी को पराजित कर दिया। अंत में खुद महिषासुर देवी से युद्ध करने आया। नौ दिनों तक युद्ध चला, जिसमें महिषासुर बार-बार रूप बदलता रहा- कभी शेर, कभी हाथी, और अंत में भैंस बन गया। लेकिन देवी ने अंततः उसे चक्र से काट कर मार डाला। इसी तरह देवी दुर्गा ने महिषासुर के आतंक से तीनों लोकों को निजात दिलाई। तभी से उन्हें ‘महिषासुर मर्दिनी’ के नाम से जाना जाता है और नवरात्रि के नौ दिनों तक उनकी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इसे भी पढ़ें:- रुद्राक्ष पहनने पर भी नहीं मिल रहा लाभ? हो सकती हैं ये आम गलतियां देवी दुर्गा का दिव्य स्वरूप मां दुर्गा का रूप अद्वितीय और अतुलनीय था। उनका शरीर सभी देवताओं के तेज से निर्मित था। भगवान शिव ने उन्हें त्रिशूल दिया, विष्णु ने चक्र, अग्नि देव ने शक्ति, वायु देव ने धनुष और बाण, इंद्र ने वज्र, यम ने गदा और वरुण ने शंख प्रदान किया। सारा ब्रह्मांड उनकी शक्ति और सौंदर्य से चमत्कृत था। देवी दुर्गा सिंह पर सवार होकर युद्ध भूमि में पहुंचीं और महिषासुर से भीषण संग्राम किया। नौ दिनों तक चले इस युद्ध के अंत में, मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया। दुर्गा का नाम और स्वरूप ‘दुर्गा’ शब्द का अर्थ है- जो कष्टों और संकटों का नाश करती हैं। उन्हें त्रिनेत्रधारी, दशभुजा और शक्तिस्वरूपा के रूप में जाना जाता है। उनके नौ रूप: शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री, नवरात्रि के नौ दिनों में पूजे जाते हैं। Latest News in Hindi Today Hindi news मां दुर्गा #maaDurga #birthOfDurga #endOfEvil #riseOfDharma #shakti #hinduMythology #navratri

