Shatavari benefits

प्राकृतिक तरीके से महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य को बेहतर बनाने इस तरह के फायदेमंद है शतावरी

महिलाओं की रिप्रोडक्टिव हेल्थ यानी प्रजनन स्वास्थ्य उनके शारीरिक, मानसिक और सामान्य स्वास्थ्य से संबंधित है। इनमें रिप्रोडक्टिव सिस्टम का स्वास्थ्य, मेंस्ट्रुअल हेल्थ, प्रेग्नेंसी, कंट्रासेप्शन, सेक्शुअल हेल्थ आदि शामिल है। महिलाओं के लिए अपनी रिप्रोडक्टिव हेल्थ का ध्यान रखना बहुत जरूरी है। इसके लिए महिलाओं के लिए जागरूक रहना चाहिए और उनके लिए रेगुलर हेल्थ चेक-अप कराना और हेल्दी लाइफस्टाइल को अपनाना भी जरूरी है। इसके लिए कुछ प्लांट भी फायदेमंद हो सकते हैं। ऐसा ही एक प्लांट है शतावरी (Shatavari), जिसे सब्जी के रूप में खाया जाता है। आयुर्वेदिक मेडिसिन में महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य के लिए वरदान माना गया है। आइए महिलाओं की रिप्रोडक्टिव हेल्थ के लिए शतावरी (Shatavari for women’s reproductive health) के बारे में। महिलाओं की रिप्रोडक्टिव हेल्थ के लिए शतावरी(Shatavari for women’s reproductive health): पाएं जानकारी हेल्थलाइन (Healthline) के अनुसार शतावरी (Shatavari) को अस्परगस ऑफिसिनैलिस (Asparagus officinalis) भी कहा जाता है। यह एक सब्जी है जो सफेद, हरे और पर्पल रंग में मिलती है। इसका प्रयोग कई तरह की डिशेस बनाने में किया जाता है। महिलाओं की रिप्रोडक्टिव हेल्थ के लिए शतावरी (Shatavari for women’s reproductive health) के फायदे इस प्रकार हैं: हॉर्मोनल बैलेंस : ऐसा माना गया है कि शतावरी (Shatavari) यानी अस्परगस ऑफिसिनैलिस फीमेल रिप्रोडक्टिव हॉर्मोन्स को रेगुलेट और बैलेंस करने के लिए फायदेमंद है। इसके साथ ही यह भी पाया गया है कि अनियमित पीरियड्स और पॉलीसिस्टिक ओवेरी सिंड्रोम्स जैसी समस्याओं के लिए यह फायदेमंद है। फर्टिलिटी शतावरी (Shatavari) ओवेरी के कार्यों को सुधारने के लिए भी जाना जाता है यानी वो फर्टिलिटी को सपोर्ट करने में फायदेमंद है। इसके साथ ही इससे एग्स की गुणवत्ता भी सुधरती है।  स्ट्रेस को करे कम शतावरी (Shatavari) यानी अस्परगस ऑफिसिनैलिस (Asparagus officinalis) को हमारे मेंटल हेल्थ के लिए भी लाभदायक पाया गया है। इससे स्ट्रेस कम होने में मदद मिलती है। ऐसा पाया गया है कि चिंता और स्ट्रेस से महिलाओं की रिप्रोडक्टिव पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इसका इस्तेमाल एंडोमेट्रियोसिस, दर्दनाक पीरियड्स और मेनोपॉज के लक्षणों को दूर करने में भी किया जा सकता है। इसे भी पढ़ें: सत्तू शरबत: शरीर को मजबूत और स्वस्थ बनाने में फायदेमंद है यह देसी टॉनिक पोस्टपार्टम फायदे महिलाओं की रिप्रोडक्टिव हेल्थ के लिए शतावरी (Shatavari for women’s reproductive health)  के फायदे पोस्टपार्टम सपोर्ट से भी जुड़े हुए हैं। स्तनपान कराने वाली महिलाओं में शतावरी (Shatavari) मिल्क प्रोडक्शन को बढ़ाने में मदद करती है और इससे पोस्टपार्टम के लक्षण भी दूर होते हैं। यह तो थे महिलाओं की रिप्रोडक्टिव हेल्थ के लिए शतावरी (Shatavari for women’s reproductive health) के फायदे। लेकिन, इस बात का ध्यान रखें कि किसी भी चीज के कुछ साइड इफेक्ट्स भी हो सकते हैं। शतावरी (Shatavari) यानी अस्परगस ऑफिसिनैलिस (Asparagus officinalis) के बारे में भी अभी और रिसर्च की जानी जरूरी है। इसका सेवन करने से पहले डॉक्टर की सलाह अवश्य लें और इसके साइड-इफेक्ट्स के बारे में भी जान लें। अपनी मर्जी से किसी भी चीज का सेवन करना हानिकारक सिद्ध हो सकता है। नोट:- यहां दी गई जानकारी केवल रिसर्च के आधार पर दी गई है। लेकिन अगर आप किसी भी शारीरिक समस्या से परेशान हैं, तो अपने हेल्थ एक्सपर्ट से सलाह लेना न भूलें। Latest News in Hindi Today Hindi news Shatavari #shatavari #womenshealth #reproductivehealth #naturalremedies #hormonebalance #ayurveda #fertilitybooster

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Blood Goddess

जब देश की हर महिला थी खून की कमी से जूझती, तब प्रकट हुईं रहस्यमयी रक्तदेवी

भारतवर्ष में देवी-देवताओं की कहानियां सिर्फ आस्था नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति के गहरे संकेत भी देती हैं। एक ऐसी ही रहस्यमयी कथा जुड़ी है उस देवी से, जो तब प्रकट हुईं जब देश की अधिकांश महिलाएं “खून की कमी” यानी एनीमिया जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं। कहा जाता है कि इस देवी का प्राकट्य न केवल आध्यात्मिक रूप से चमत्कारी था, बल्कि सामाजिक और स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी क्रांतिकारी। अस्सी के दशक तक शुक्रवार का दिन खास तौर पर महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता था, क्योंकि उस समय यह दिन संतोषी माता की पूजा का था। शुक्रवार को महिलाएं पूरे विश्वास और श्रद्धा के साथ व्रत रखती, संतोषी माता की कथा सुनतीं और गुड़ चना का प्रसाद चढ़ाती थीं। व्रत खोलने से पहले प्रसाद को बड़े मन से ग्रहण किया जाता था और पूरे दिन घर में कोई भी झगड़ा या विवाद नहीं होता था। यह परंपरा पूरी श्रद्धा और अनुशासन के साथ निभाई जाती थी। धार्मिक आस्था में तर्क और विज्ञान की जगह नहीं होती संतोषी माता (Santoshi Mata) का उल्लेख किसी भी प्राचीन पुराण में नहीं मिलता, न ही वेदों में उनका नाम आता है, क्योंकि वेदों में केवल कुछ मुख्य देवताओं का ही वर्णन है। संतोषी माता का प्रचार-प्रसार करीब 1960 के दशक के मध्य से शुरू हुआ था। माना जाता है कि यह पूजा खासकर हिंदी भाषी प्रदेशों में किसी स्थानीय देवी की पूजा से प्रेरित हो सकती है। कुछ लोगों का कहना है कि संतोषी माता का यह उत्सव पश्चिम बंगाल से आया होगा, लेकिन बंगाली पूजा में आमतौर पर भव्य और रसयुक्त व्यंजन चढ़ाए जाते हैं, इसलिए गुड़ चना जैसे सादे प्रसाद का चढ़ावा वहां कम माना जाता है। धार्मिक आस्था में तर्क और विज्ञान की जगह नहीं होती, इसलिए इस सरल और सस्ते प्रसाद को भी इसकी विशेषता के रूप में देखा जाता है। बनी ‘रक्तदेवी’ की मंदिर कुछ लोग यह कहते हैं कि उस समय देश की औसत महिलाओं में खून में आयरन की कमी एक सामान्य समस्या थी, जिसे समाज ने स्वीकार भी किया था। उस दौर में हालात और भी खराब थे क्योंकि महिलाएं पहले अपने पूरे परिवार को खाना खिलाती थीं और खुद के लिए खाने को एक तरह से आशीर्वाद मानती थीं। जो लोग धर्म और विज्ञान को जोड़कर देखते हैं, उनका कहना है कि आयरन बढ़ाने के लिए आज भी गुड़ और चना से बेहतर प्राकृतिक उपाय कोई नहीं हो सकता। इसी कारण से संतोषी माता (Santoshi Mata) की पूजा और उनका प्रचार तेजी से बढ़ा। संतोषी माता से वैष्णो देवी तक: धार्मिक आस्था का बदलता रूप हम ऐसे देश के निवासी हैं जहाँ देवी-देवताओं पर आस्था के लिए किसी तर्क की जरूरत नहीं होती। जैसे ही कहीं यह खबर फैलती है कि किसी मूर्ति ने दूध पिया है, पूरा देश इसे आजमाने लगता है और हर कोई दावा करता है कि उसने भी वही किया है, यह हम सबने कई बार देखा है। देश में संतोषी माता (Santoshi Mata) की पूजा का प्रचार जबरदस्त हुआ। करीब 50 साल पहले, 30 मई 1975 को ‘जय संतोषी माता’ नामक फिल्म रिलीज हुई, जिसका बजट लगभग 5 से 12 लाख रुपये था। यह फिल्म कमाल की कमाई कर गई, और विभिन्न स्रोतों के अनुसार, इसने 5 से 25 करोड़ रुपये तक की कमाई की। उस समय यह फिल्म शोले के बाद सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में से एक बनी। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय आज भी देश के कई हिस्सों में संतोषी माता के मंदिर मौजूद हैं वरिष्ठ पत्रकार और धर्म विशेषज्ञ इष्टदेव सांकृत्यायन का मानना है कि संतोषी माता का उद्भव शायद किसी स्थानीय देवी की लोकप्रियता से प्रेरित था। उन्होंने यह भी कहा कि संतोषी माता के प्रसार के बाद शुक्रवार का दिन वैभव लक्ष्मी को समर्पित हो गया, जिनकी पूजा और स्वरूप संतोषी माता से काफी मिलता-जुलता है। उनके अनुसार, “जब तक संतोष नहीं आएगा, तब तक समृद्धि नहीं आएगी। इसलिए संतोष का संदेश देने के लिए ही इस देवी की पूजा का प्रचार हुआ होगा।” आज भी देश के कई हिस्सों में संतोषी माता के मंदिर मौजूद हैं, जहाँ श्रद्धालु उनकी पूजा करते हैं। 1984 में दूरदर्शन के देशभर में प्रसारित होने के बाद धीरे-धीरे संतोषी माता का प्रचार कम होने लगा। इसी दौरान संचार और यातायात के बेहतर होने के साथ-साथ वैष्णो देवी की लोकप्रियता बढ़ने लगी। टी-सीरीज के गुलशन कुमार ने वैष्णो माता के कई वीडियो कैसेट जारी किए, और फिल्मों के माध्यम से भी उनका प्रचार व्यापक हुआ। इससे वैष्णो माता की भक्तों की संख्या तेजी से बढ़ी और उनकी मनोकामनाएं पूरी होने लगीं। Latest News in Hindi Today Hindi news #bloodgoddess #anemiaawareness #womenshealth #mystery #divineintervention #indianmythology #healing #spiritualpower

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