रमजान में तरावीह नमाज का क्या है महत्व: जानिए क्यों है यह इबादत खास

Importance of Taraweeh in Ramadan

रमजान (Ramadan) का पवित्र महीना मुसलमानों के लिए इबादत, रहमत और मगफिरत का समय होता है। यह महीना न केवल रोजे रखने का होता है, बल्कि इसमें नमाज, कुरान तिलावत और दूसरे इबादतों का विशेष महत्व होता है। रमजान के दौरान तरावीह की नमाज का विशेष स्थान है। यह नमाज रमजान की रातों में पढ़ी जाती है और इसे पूरे महीने नियमित रूप से अदा किया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि तरावीह की नमाज क्यों पढ़ी जाती है और इसका क्या महत्व है? आइए, इसके बारे में जानते हैं।

रमजान: इस्लाम का पवित्र महीना

इस्लाम धर्म में रमजान (Ramadan) का महीना बेहद पवित्र माना जाता है। इस दौरान लोग रोजा रखते हैं और खुदा की इबादत करते हैं। भारत में इस साल रमजान 2 मार्च से शुरू हो चुका है। इस्लामी कैलेंडर के अनुसार, रमजान साल का नौवां महीना होता है, जिसे खास महत्व दिया जाता है। पूरे महीने रोजे रखे जाते हैं, और जब शव्वाल के महीने का चांद नजर आता है, तो पहली तारीख को ईद-उल-फितर का त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है।

रमजान के दौरान किए गए अच्छे कामों का 70 गुना ज्यादा सवाब (पुण्य) मिलता है। इस महीने हर मुस्लिम को पांच वक्त की नमाज पढ़नी जरूरी होती है, लेकिन इसके अलावा तरावीह की नमाज भी पढ़ना सुन्नत माना जाता है। यह नमाज ईशा के बाद और वित्र से पहले पढ़ी जाती है। तरावीह की नमाज से अल्लाह के प्रति आस्था और गहरी होती है, जिससे व्यक्ति को अधिक सवाब मिलता है।

तरावीह नमाज क्या है?

तरावीह (Taraweeh) शब्द अरबी भाषा के शब्द “तरवीह” से लिया गया है, जिसका अर्थ है “आराम करना” या “विश्राम करना”। यह नमाज रमजान के महीने में रात के समय पढ़ी जाती है और इसमें लंबी किरात (कुरान की आयतें पढ़ना) के बाद छोटे-छोटे विराम लिए जाते हैं। तरावीह की नमाज ईशा की नमाज के बाद पढ़ी जाती है और इसमें आमतौर पर 8 या 20 रकात होती हैं। यह नमाज जमात के साथ मस्जिद में पढ़ी जाती है, हालांकि इसे अकेले भी पढ़ा जा सकता है।

रमजान में तरावीह पढ़ना क्यों जरूरी है?

मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना कारी इसहाक गोरा ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि रमजान (Ramadan) मुसलमानों के लिए बेहद पवित्र महीना है, जिसकी महिमा कुरान और हदीसों में वर्णित है। इस महीने में किए गए हर नेक काम का सवाब (पुण्य) 70 गुना बढ़ा दिया जाता है।

रमजान के दौरान रोजे रखना हर बालिग मुसलमान के लिए अनिवार्य (फर्ज) माना गया है। जहां तक नमाज की बात है, तो रमजान में भी उतनी ही नमाज पढ़ी जाती है, जितनी आम दिनों में पढ़ी जाती है। नमाज हर मुसलमान पर फर्ज होती है, और इसे छोड़ने पर गुनाह माना जाता है।

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नमाज से पहले तरावीह पढ़ना क्यों जरूरी है?

रमजान (Ramadan) के दौरान नमाज के साथ एक खास इबादत जुड़ जाती है, जिसे तरावीह कहा जाता है। यह नमाज ईशा के बाद और वित्र से पहले अदा की जाती है। इसे विभिन्न इस्लामी परंपराओं में सुन्नत-ए-मुवक्किदा माना गया है, यानी इसे पढ़ना बेहद जरूरी है, और अधिकतर इस्लामी विद्वान भी इस पर सहमत हैं।

रमजान का महीना पवित्र होता है, और इस दौरान किए गए हर अच्छे काम का सवाब 70 गुना बढ़ा दिया जाता है। इस महीने लोग दान (जकात) देते हैं, जिससे जरूरतमंदों की मदद की जा सके। रमजान की आध्यात्मिकता (रूहानियत) इतनी गहरी होती है कि इसका प्रभाव अन्य धर्मों के लोगों पर भी पड़ता है।

जो लोग तरावीह नहीं पढ़ते, उनके बारे में अलग-अलग विचार हैं, लेकिन इस्लाम में जो चीज फर्ज कर दी गई है, उसे पूरा करना जरूरी होता है। इसे न मानने पर व्यक्ति गुनहगार माना जाता है।

तरावीह नमाज कैसे पढ़ें?

तरावीह (Taraweeh) की नमाज ईशा की नमाज के बाद पढ़ी जाती है। इसमें हर दो रकात के बाद थोड़ा विराम लिया जाता है, जिसमें तस्बीह, दुआ या कुरान की तिलावत की जा सकती है। तरावीह की नमाज को 8 या 20 रकात के रूप में पढ़ा जा सकता है, जो अलग-अलग मसलक (सुन्नी, हनफी, शाफई आदि) के अनुसार भिन्न हो सकता है।

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