जय राष्ट्र न्यूज़ | नई दिल्ली | 5 दिसंबर 2025
भारत ने अक्टूबर 2025 में रूस से कच्चे तेल का आयात मूल्य के हिसाब से 38 प्रतिशत और मात्रा के हिसाब से 31 प्रतिशत तक कम कर दिया। यह 2022 के यूक्रेन युद्ध के बाद से रूस पर सबसे ज़्यादा निर्भरता दिखाने वाले भारत के लिए अब तक की सबसे बड़ी एकमुश्त कटौती है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर में कुल क्रूड आयात में भी करीब 5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
रूस अभी भी भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता है, लेकिन उसका हिस्सा सितंबर 2025 के 40 प्रतिशत से घटकर अक्टूबर में करीब 35 प्रतिशत रह गया। दूसरी तरफ इराक, सऊदी अरब, UAE और अमेरिका से आयात में तेज़ उछाल देखा गया है।
पिछले तीन साल का ट्रेंड उलट गया
2022 के बाद से रूस भारत को औसतन 1.5 से 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल बेच रहा था। उस समय पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रूसी उराल ग्रेड क्रूड ब्रेंट से 20-30 डॉलर प्रति बैरल सस्ता मिल रहा था। भारतीय रिफाइनरियों (खासकर रिलायंस जामनगर और नायरा वाडिनार) ने इसका भरपूर फायदा उठाया था। लेकिन अक्टूबर 2025 में यह तस्वीर पूरी तरह बदल गई।
गिरावट के पांच बड़े कारण
- वैश्विक कीमतों में भारी गिरावट
ब्रेंट क्रूड दिसंबर 2025 की शुरुआत में 68-70 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में कारोबार कर रहा है। जब ब्रेंट ही 70 डॉलर पर है, तो रूसी तेल का डिस्काउंट महज़ 4-6 डॉलर रह गया है। इतना छोटा डिस्काउंट भारतीय रिफाइनरियों के लिए आकर्षक नहीं रहा। - शिपिंग और इंश्योरेंस की मुश्किलें
G7 देशों ने रूसी तेल पर 60 डॉलर प्रति बैरल की मूल्य सीमा लागू कर रखी है। इसके ऊपर बिकने वाले रूसी तेल के टैंकरों को पश्चिमी इंश्योरेंस और शिपिंग सुविधा नहीं मिलती। अक्टूबर में कई टैंकर बाल्टिक सागर और ब्लैक सी में फंस गए। भारतीय रिफाइनरियों ने जोखिम लेने से इनकार कर दिया। - अमेरिका का दबाव और रक्षा सौदे
अमेरिका ने पिछले छह महीनों में कई बार भारत को चेतावनी दी थी कि रूसी तेल पर अत्यधिक निर्भरता द्विपक्षीय रक्षा सहयोग (QUAD, iCET, COMCASA) को प्रभावित कर सकती है। उसी दौरान भारत ने अमेरिका से रिकॉर्ड 4.5 लाख बैरल प्रतिदिन क्रूड खरीदना शुरू किया। - घरेलू मांग में मौसमी सुस्ती
मानसून के बाद और दिवाली-छठ से पहले रिफाइनरियों ने भारी स्टॉक बना लिया था। अक्टूबर-नवंबर में डीजल-पेट्रोल की मांग सामान्य से 8-10 प्रतिशत कम रही। नतीजतन, नए ऑर्डर कम किए गए। - रणनीतिक विविधीकरण की नीति
प्रधानमंत्री कार्यालय और पेट्रोलियम मंत्रालय ने पिछले साल ही “ऊर्जा आत्मनिर्भरता 2047” रोडमैप तैयार किया था, जिसमें किसी एक देश से 30 प्रतिशत से ज़्यादा आयात न करने का लक्ष्य रखा गया है। अक्टूबर की कटौती उसी नीति का पहला बड़ा कदम है।
रिफाइनरियों पर क्या असर?
रिलायंस इंडस्ट्रीज़ और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन ने बताया कि रूसी भारी-खट्टा क्रूड (उराल) की जगह अब वे इराकी बसरा हेवी, सऊदी अरेबियन मीडियम और अमेरिकी WTI मिडलैंड क्रूड ले रहे हैं। इनमें सल्फर कम है और रिफाइनिंग मार्जिन 1.5-2 डॉलर प्रति बैरल बेहतर मिल रहा है।
नायरा एनर्जी (रूस की रोसनेफ्ट में हिस्सेदार) ने भी कहा कि वह अब स्पॉट मार्केट से मध्य-पूर्व का तेल खरीद रही है। रोसनेफ्ट से लंबे अनुबंध अभी भी जारी हैं, लेकिन मात्रा में 25-30 प्रतिशत की कटौती कर दी गई है।
अर्थव्यवस्था को फ़ायदा
- अक्टूबर में तेल आयात बिल पिछले साल के मुकाबले 2.8 अरब डॉलर कम रहा।
- चालू खाते का घाटा (CAD) इस तिमाही में GDP के 1.2 प्रतिशत तक सिमटने की उम्मीद।
- विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम हुआ।
भारत-रूस संबंधों पर असर?
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया है कि यह फैसला “100 प्रतिशत व्यावसायिक” है। रूस के साथ 15 अरब डॉलर का सालाना व्यापार लक्ष्य अभी भी बरकरार है। हाल ही में राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा में S-400 की अतिरिक्त रेजीमेंट, ब्रह्मोस मिसाइल निर्यात और न्यूक्लियर पावर प्लांट के समझौते हुए हैं। तेल की मात्रा कम होने से द्विपक्षीय संबंधों पर कोई ठेस नहीं पहुँची है।
आगे की राह: हरित ऊर्जा और विविधीकरण
सरकार ने 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा और 5 मिलियन टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य रखा है। इसी साल गुजरात और राजस्थान में 50 गीगावाट के सोलर पार्क और 30 गीगावाट के ग्रीन हाइड्रोजन हब को मंजूरी मिली है।
लेकिन अभी भी तेल भारत की कुल ऊर्जा मांग का 33 प्रतिशत पूरा करता है। इसलिए अगले 10-15 साल तक विविधीकरण ही एकमात्र रास्ता है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने पिछले हफ्ते कहा था,
“हमारा लक्ष्य है कि 2035 तक किसी एक देश से 25 प्रतिशत से ज़्यादा तेल न लें।”
निष्कर्ष
अक्टूबर 2025 की 38 प्रतिशत कटौती कोई अस्थायी घटना नहीं है। यह भारत की नई ऊर्जा रणनीति का पहला ठोस संकेत है। सस्ता तेल चाहिए, लेकिन सुरक्षित और विविध स्रोतों से। आने वाले महीनों में यदि वैश्विक कीमतें 65 डॉलर से नीचे चली गईं, तो फिर रूसी तेल की वापसी हो सकती है। लेकिन तब भी पुरानी मात्रा शायद ही लौटे।
भारत अब ऊर्जा के खेल में सिर्फ़ खरीदार नहीं, एक स्मार्ट रणनीतिकार बनकर उभरा है।
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