घर-घर सजी पान-सुपारी की थालियां, दशहरे पर निभाई जाती बुंदेलखंड की अनोखी परंपरा

बुंदेलखंड में दशहरा पर घर-घर सजती पान की दुकानें छतरपुर सहित ग्रामीण अंचलों में कायम है दशहरे की अनूठी परंपरा, मेल-मिलाप और भाईचारे का पर्व छतरपुर (मध्यप्रदेश)। बुंदेलखंड की धरती अपनी परंपराओं, लोक संस्कृति और अनोखे रीति-रिवाजों के लिए जानी जाती है। यहां दशहरा केवल रावण दहन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्व सामाजिक एकता, मेल-मिलाप और लोकनृत्य का अनोखा संगम भी है। छतरपुर और आसपास के ग्रामीण अंचलों में आज भी दशहरे पर घर-घर पान की थाल सजाने और लौंग भेंट करने की सदियों पुरानी परंपरा उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।

देवी-देवताओं को चढ़ाया जाता है “वीरा” दशहरे की शुरुआत गांव के मंदिरों और घरों में देवी-देवताओं की पूजा से होती है। ग्रामीण अपने घरों में विशेष थालियां सजाते हैं, जिनमें पान, सुपारी और पूजन सामग्री रखी जाती है। इसे “वीरा” कहा जाता है। मान्यता है कि देवी-देवताओं को यह अर्पण करने से गांव में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है। स्थानीय ग्रामीण रामसिंह बताते हैं, “हमारे पुरखे भी यही परंपरा निभाते आए हैं। पहले तो पूरा गांव मिलकर देवताओं के सामने वीरा सजाता था। आज भी वही तरीका चल रहा है।”

घर-घर सजी थालियां, पान-सुपारी से होता है स्वागत पूजन-अर्चना के बाद गांव की महिलाएं और बच्चे थालियां लेकर घर-घर जाते हैं। हर घर में पान और सुपारी से सजी थाल रखी होती है। महिलाएं घर के सदस्यों को तिलक लगाती हैं, गले मिलती हैं और पान खिलाकर शुभकामनाएं देती हैं। गांव की महिला ममता कुशवाहा बताती हैं, “बुंदेलखंड की यह सबसे प्यारी परंपरा है। हम जब एक-दूसरे के घर जाते हैं तो लगता है जैसे पूरा गांव एक परिवार है।”

महिलाओं को “लौंग” देने का रिवाज इस दिन महिलाओं को लौंग भेंट करने की परंपरा भी खास मायने रखती है। इसे सौभाग्य और शुभता का प्रतीक माना जाता है। घर-घर जाकर महिलाएं लौंग ग्रहण करती हैं और इसे पूजा में भी इस्तेमाल करती हैं। स्थानीय बुजुर्ग सावित्री देवी कहती हैं, “लौंग देना और लेना केवल रस्म नहीं है, यह अपनत्व और आशीर्वाद का प्रतीक है। दशहरा का महत्व इसी से और बढ़ जाता है।”

गांव के बीचों-बीच गूंजता है “बुंदेली दीवाली नृत्य” शाम होते ही गांव के बीचों-बीच बड़ी संख्या में लोग एकत्रित होते हैं। डीजे और ढोल-नगाड़ों की थाप पर “बुंदेली दीवाली नृत्य” शुरू होता है। बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग मिलकर झूमते-गाते हैं। यह नृत्य दशहरे की रात गांव को उत्सव के रंग में डूबो देता है। युवक रवि अहिरवार बताते हैं, “हम हर साल इस दिन का इंतजार करते हैं। यहां सिर्फ नृत्य नहीं होता, बल्कि पूरा गांव एक साथ जश्न मनाता है। यही हमारी असली दीवाली है।”

सामाजिक एकता और भाईचारे की मिसाल यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। इसमें मेल-जोल, भाईचारा और सामाजिक एकता की झलक साफ दिखाई देती है। दशहरे का यह अनूठा रूप गांव में रिश्तों को मजबूत करता है और लोगों को जोड़ता है।


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