महाराष्ट्र, गोवा और कर्नाटक में मनाए जाने वाले सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह त्योहार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है, जो हिंदू नववर्ष (Hindu New Year) की शुरुआत का प्रतीक है। यह त्योहार न केवल नए साल की शुरुआत का प्रतीक है, बल्कि इसमें ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व भी छिपा है। आइए जानते हैं कि गुढी पाडवा क्यों मनाया जाता है, इसका इतिहास क्या है और इसका क्या महत्व है।
गुढी पाडवा का शुभ मुहूर्त
ज्योतिषीय गणना के अनुसार, चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 29 मार्च को शाम 4:27 बजे शुरू होकर 30 मार्च को दोपहर 12:49 बजे समाप्त होगी। सनातन धर्म में उदया तिथि को मान्यता दी जाती है, इसलिए गुड़ी पड़वा (Gudi Padwa) का पर्व 30 मार्च को मनाया जाएगा।
गुढी पाडवा पर विशेष योगों का संयोग
गुढी पाडवा (Gudi Padwa) के दिन इंद्र योग बन रहा है, जो शाम 5:54 बजे तक रहेगा। इस योग में किए गए शुभ कार्य सफल होते हैं और ब्रह्म देव का आशीर्वाद प्राप्त होता है। साथ ही, इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहा है, जो 30 मार्च को शाम 4:35 बजे से शुरू होकर 31 मार्च की सुबह 6:12 बजे तक रहेगा। ज्योतिष में सर्वार्थ सिद्धि योग को शुभ कार्यों के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है।
इसके अलावा गुढी पाडवा के दिन पंचक का प्रभाव सुबह 6:13 बजे से शाम 4:35 बजे तक रहेगा। साथ ही, इस दिन बव, बालव और कौलव करण भी बन रहे हैं, जो इसे और अधिक महत्वपूर्ण बना देते हैं।
गुढी पाडवा का इतिहास
गुढी पाडवा (Gudi Padwa) दो शब्दों से मिलकर बना है—’गुड़ी’ का अर्थ ध्वज (फहराया जाने वाला पताका) है, जबकि ‘पड़वा’ संस्कृत शब्द ‘प्रतिपदा’ से लिया गया है, जो चंद्र मास के पहले दिन को दर्शाता है।
गुढी पाडवा (Gudi Padwa) का इतिहास बहुत पुराना है और यह त्योहार कई ऐतिहासिक एवं पौराणिक घटनाओं से जुड़ा हुआ है। रामायण से संबंधित एक कथा के अनुसार, इस दिन भगवान राम ने लंका के राजा रावण को पराजित कर अयोध्या वापसी की थी। अयोध्या वासियों ने भगवान राम का भव्य स्वागत किया और इसी के साथ नए वर्ष की शुरुआत हुई। इसके अलावा, यह त्योहार शालिवाहन शक के प्रारंभ का प्रतीक भी माना जाता है। कहा जाता है कि इस दिन सम्राट शालिवाहन ने अपने शत्रुओं को पराजित कर नए साम्राज्य की स्थापना की थी। वहीं, हिंदू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, गुड़ी पड़वा के दिन ही भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की थी। इसलिए इसे नए साल (New Year) की शुरुआत के रूप में मनाया जाता है।
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गुढी पाडवा कैसे मनाया जाता है?
इस दिन की शुरुआत पारंपरिक स्नान और पूजा-अर्चना से होती है। लोग सुबह जल्दी उठकर अपने घरों की सफाई और सजावट करते हैं, नए कपड़े पहनते हैं और घर के दरवाजे पर विशेष गुड़ी ध्वज स्थापित करते हैं। ऐसा माना जाता है कि यह ध्वज समृद्धि का प्रतीक है और बुराई पर अच्छाई की जीत दर्शाता है।
गुढी ध्वज को रंगीन रेशमी दुपट्टे से बनाया जाता है, जिसे बांस की छड़ी पर बांधा जाता है। इसके ऊपरी सिरे पर नीम के पत्ते, आम्र पुष्प और शक्कर की माला (साखर गाठी) लगाई जाती है। इसके साथ ही, उल्टे रखे कलश को इस ध्वज पर स्थापित किया जाता है, जो विजय का प्रतीक माना जाता है। पूजा के बाद, इस गुड़ी को घर के बाहर ऊंचे स्थान पर फहराया जाता है।
परंपरागत रूप से, इस दिन लोग विशेष व्यंजन तैयार करते हैं, जिनमें कड़वे नीम के पत्ते और मीठे गुड़ का प्रयोग किया जाता है, जो जीवन में सुख-दुख के संतुलन का प्रतीक होता है।
नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें।
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