Lord Ram’s Untold Stories & Life Lessons

राम नवमी 2020: भगवान राम के जीवन की अनसुनी कहानियां और प्रेरणादायक संदेश

राम नवमी (Ram Navami) हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जो भगवान राम (Lord Ram) के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह त्योहार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाता है। भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में जाना जाता है, और उनकी पूजा करने से भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। राम नवमी के दिन भगवान राम की पूजा करने से उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है। इस लेख में हम आपको भगवान राम के बारे में कुछ सुनी-अनसुनी कथाएं बता रहे हैं, जो उनके जीवन और उनके संदेशों को और भी गहराई से समझने में मदद करेंगी। भगवान राम का जन्म भगवान राम का जन्म अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के यहां हुआ था। उनका जन्म चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हुआ था, जिसे राम नवमी के रूप में मनाया जाता है। भगवान राम के जन्म के समय अयोध्या में खुशियों का माहौल था, और सभी लोग उनके जन्म का जश्न मना रहे थे। भगवान राम और हनुमान जी की मित्रता भगवान राम और हनुमान जी की मित्रता एक अनोखी मित्रता थी। हनुमान जी भगवान राम के परम भक्त थे, और उन्होंने भगवान राम की सेवा में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। हनुमान जी ने भगवान राम की खोज में लंका तक का सफर तय किया और माता सीता को रावण के चंगुल से मुक्त कराने में मदद की। भगवान राम और लक्ष्मण की भाईचारे की मिसाल भगवान राम और लक्ष्मण की भाईचारे की मिसाल आज भी दी जाती है। लक्ष्मण भगवान राम के छोटे भाई थे, और उन्होंने भगवान राम की सेवा में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। लक्ष्मण ने भगवान राम के साथ वनवास के दौरान कई कठिनाइयों का सामना किया और उनकी रक्षा की। भगवान राम और सीता माता का प्रेम भगवान राम (Lord Ram) और सीता माता का प्रेम एक आदर्श प्रेम की मिसाल है। सीता माता ने भगवान राम के साथ वनवास के दौरान कई कठिनाइयों का सामना किया और उनके साथ हर परिस्थिति में खड़ी रहीं। सीता माता ने भगवान राम के प्रति अपनी निष्ठा और प्रेम को कभी नहीं छोड़ा। भगवान राम और रावण का युद्ध भगवान राम और रावण का युद्ध एक महाकाव्य युद्ध था, जिसमें भगवान राम ने रावण का वध किया और धर्म की स्थापना की। रावण एक बहुत ही शक्तिशाली राक्षस था, जिसने माता सीता का अपहरण कर लिया था। भगवान राम ने रावण का वध करके माता सीता को मुक्त कराया और धर्म की स्थापना की। इसे भी पढ़ें:-  भगवान राम के जन्मोत्सव पर होगा भव्य आयोजन भगवान राम का राज्याभिषेक भगवान राम (Lord Ram) का राज्याभिषेक एक महत्वपूर्ण घटना थी, जिसमें भगवान राम को अयोध्या का राजा बनाया गया। भगवान राम ने अपने राज्याभिषेक के बाद अयोध्या में धर्म और न्याय की स्थापना की और अपने प्रजा का पालन-पोषण किया। भगवान राम के संदेश भगवान राम के संदेश आज भी हमारे जीवन के लिए प्रेरणादायक हैं। भगवान राम ने धर्म, न्याय, और सत्य के मार्ग पर चलने का संदेश दिया। उन्होंने हमें यह सिखाया कि हमें हर परिस्थिति में धर्म और न्याय का साथ देना चाहिए। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Ram Navami #RamNavami2024 #LordRam #Ramayana #RamNavami #HinduFestival #BhagwanRam #RamKatha #RamBhakti #RamMandir #Spirituality

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Yudhishthira's chariot

महाभारत का सबसे रहस्यमय रथ: युधिष्ठिर का वह दिव्य वाहन जो हवा में तैरता था

महाभारत (Mahabharat) के युद्ध में अर्जुन के रथ को अक्सर सबसे श्रेष्ठ माना जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि युधिष्ठिर का रथ उससे भी अधिक विशेष था? यह रथ जमीन पर नहीं, बल्कि हवा में तैरता था, इसकी पीछे की कहानी बेहद रोचक और आश्चर्यजनक है। युधिष्ठिर का दिव्य रथ महाभारत (Mahabharat) के युद्ध में प्रत्येक पांडव के पास अपना एक विशेष रथ था, जो उनके व्यक्तित्व और धर्म के अनुरूप था। अर्जुन के रथ का निर्माण स्वयं देवराज इंद्र ने करवाया था, और उस पर भगवान श्रीकृष्ण सारथी बने थे। लेकिन युधिष्ठिर का रथ इससे भी अद्भुत था। उनका रथ जमीन से कुछ इंच ऊपर हवा में तैरता रहता था, जिससे वह कभी भी धरती के दोषों से प्रभावित नहीं होता था। धर्मराज का रथ क्यों था इतना विशेष? युधिष्ठिर (Yudhishthira) को “धर्मराज” कहा जाता था क्योंकि वे सत्य और न्याय के सबसे बड़े पालक थे। उनके जीवन का हर कार्य धर्म के अनुसार था। ऐसा माना जाता है कि उनके रथ का हवा में तैरना उनके धर्मपरायण जीवन का प्रतीक था। जिस प्रकार युधिष्ठिर कभी भी अधर्म के मार्ग पर नहीं चले, उसी प्रकार उनका रथ भी कभी अधर्म को स्पर्श नहीं करता था। इसे भी पढ़ें:- जहाँ रक्तबीज का वध करके अंतर्ध्यान हुईं थीं माँ काली, नवरात्रि में दर्शन से पूरी होती हैं मनोकामनाएँ दुर्योधन ने पूछा था सवाल महाभारत (Mahabharat) के युद्ध से पहले जब दुर्योधन और अर्जुन दोनों श्रीकृष्ण की सेना लेने के लिए द्वारका पहुँचे, तब दुर्योधन ने युधिष्ठिर के रथ के बारे में एक सवाल पूछा था। उसने देखा कि युधिष्ठिर का रथ जमीन को छूता ही नहीं है, जबकि अन्य सभी के रथ सामान्य थे। दुर्योधन के पूछने पर श्रीकृष्ण ने बताया कि युधिष्ठिर के रथ का यह विशेष गुण उनके धर्म के कारण है। युधिष्ठिर का रथ भी जमीन पर आ गया कुरुक्षेत्र के युद्ध में एक समय ऐसा भी आया जब युधिष्ठिर (Yudhishthira) का रथ, जो अब तक अन्य रथों से ऊंचा था, जमीन पर आ गिरा। महाभारत युद्ध के दौरान जब पांडव गुरु द्रोण को पराजित करने में असफल रहे, तो उन्होंने एक चाल चली। उन्होंने यह अफवाह फैला दी कि द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा की मृत्यु हो चुकी है। असल में, पांडवों ने अश्वत्थामा नामक एक हाथी को मार दिया था और द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा को युद्ध क्षेत्र से दूर उलझा दिया था। जब यह झूठी खबर गुरु द्रोण तक पहुंची, तो वे अत्यंत व्याकुल हो गए। हालांकि, उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि उनका वीर पुत्र मारा जा सकता है। सत्य जानने के लिए उन्होंने युधिष्ठिर से प्रश्न किया, क्योंकि उनकी सत्यनिष्ठा के लिए वे प्रसिद्ध थे। भाइयों के दबाव में आकर युधिष्ठिर ने कहा, “अश्वत्थामा मारा गया,” लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा, “हाथी अश्वत्थामा मारा गया है, न कि आपका पुत्र।” परंतु इस महत्वपूर्ण सत्य को ढोल-नगाड़ों की गूंज में दबा दिया गया, जिससे द्रोणाचार्य केवल पहले भाग को ही सुन सके और शोक में डूब गए। छल से मारे गए गुरु द्रोण युधिष्ठिर (Mahabharat) की बात सुनते ही द्रोणाचार्य को आघात लगा और वह अस्त्र-शस्त्र छोड़कर रथ से नीचे उतर आए. तभी राजा द्रुपद के बेटे धृष्टद्युम्न ने कौरवों और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य का सिर धड़ से अलग कर दिया. इस तरह पांडवों ने छल से गुरु द्रोण को मारा था. चूंकि इस छल में युधिष्ठिर भी भागीदार थे, इसलिए उनका रथ उसी क्षण जमीन से छू गया और साधारण रथ की तरह हवा में उड़ने के बजाय धरती पर चलने लगा। इसी गलती के परिणामस्वरूप धर्मराज युधिष्ठिर को स्वर्ग जाने से पहले नरक के दर्शन भी करने पड़े। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Mahabharat #MahabharataMystery #YudhishthiraChariot #FloatingChariot #DivineVehicle #MahabharataSecrets #AncientIndia #Mythology #HinduEpics #VedicWisdom #MahabharataFacts

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Maa Lakshmi

इन 5 छोटे जीवों का घर में हो रहा है आगमन, तो समझलें लक्ष्मी जी आ रही हैं आपके घर 

प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, कुछ जीवों (Creature) का घर में आना शुभ संकेत माना जाता है। इन्हें देखकर न सिर्फ खुश होना चाहिए, बल्कि इनका सम्मान भी करना चाहिए, क्योंकि ये धन और सुख-समृद्धि लाने वाले माने जाते हैं। आइए जानते हैं कौन से हैं ये शुभ जीव? लक्ष्मी जी आ रही हैं आपके घर  1. छिपकली– धनवर्षा का संकेत शास्त्रों में छिपकली को बेहद शुभ माना गया है। अगर घर में छिपकली दिखाई दे, खासकर अगर वह आपके शरीर पर गिर जाए, तो यह बहुत ही शुभ संकेत माना जाता है। कहते हैं कि इससे धन लाभ होता है और लक्ष्मी जी की कृपा बनी रहती है। 2. तोता – समृद्धि का प्रतीक शकुन शास्त्र के अनुसार, घर में तोते का आना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसे भगवान कुबेर का प्रतीक माना जाता है। जब तोता घर में प्रवेश करता है, तो यह सुख-समृद्धि और खुशहाली का संकेत होता है। कहा जाता है कि तोता अपने साथ सकारात्मक समाचार लेकर आता है। 3. चींटी – मेहनत का फल मिलता है चींटियों का घर में आना भी शुभ माना जाता है, खासकर अगर वे लाल चींटियां हों। मान्यता है कि चींटियों को शक्कर डालने से मां लक्ष्मी (Maa Lakshmi) प्रसन्न होती हैं इसके साथ ही, ऐसा माना जाता है कि तोते के आगमन से घर में धन-संपत्ति में वृद्धि होती है। 4. तितली – सुख-शांति का संदेश तितली का घर में प्रवेश करना बहुत ही शुभ माना जाता है। इसे सौभाग्य और खुशियों का प्रतीक माना जाता है। अगर तितली आपके सिर के ऊपर से गुजर जाए, तो यह बहुत ही शुभ संकेत होता है। 5. गौरैया (चिड़िया) – खुशखबरी लाती है गौरैया का घर में आना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि अगर गौरैया आपके घर में घोंसला बना ले, तो वहां सुख-समृद्धि आती है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। इसे भी पढ़ें:- जहाँ रक्तबीज का वध करके अंतर्ध्यान हुईं थीं माँ काली, नवरात्रि में दर्शन से पूरी होती हैं मनोकामनाएँ क्या करें जब ये जीव दिखें? नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Maa Lakshmi #GoddessLakshmi #LuckySigns #HomeProsperity #WealthAttracting #SpiritualSigns #VastuTips #PositiveEnergy #GoodLuck #LakshmiBlessings #FortuneSigns

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Kalimath Temple

कालीमठ मंदिर: जहाँ रक्तबीज का वध करके अंतर्ध्यान हुईं थीं माँ काली, नवरात्रि में दर्शन से पूरी होती हैं मनोकामनाएँ

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित कालीमठ मंदिर (Kalimath Temple) एक प्राचीन और रहस्यमयी शक्तिपीठ है। नवरात्रि के पावन अवसर पर इस मंदिर में दर्शन करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं तथा जीवन से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। कालीमठ सिद्ध शक्तिपीठ को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं, जिनका उल्लेख स्कंद पुराण सहित अन्य ग्रंथों में भी मिलता है। मान्यता है कि जब धरती पर रक्तबीज और शुंभ-निशुंभ का अत्याचार बढ़ गया था, तब इंद्र सहित सभी देवताओं ने मां शक्ति की आराधना की। देवताओं की तपस्या से प्रसन्न होकर माता प्रकट हुईं। जब उन्होंने दैत्यों के उत्पात के बारे में सुना, तो उनका क्रोध इतना प्रबल हुआ कि उनका स्वरूप काला पड़ गया। इसके बाद माता ने रक्तबीज और शुंभ-निशुंभ का संहार करने के लिए कालीशिला में 12 वर्ष की कन्या के रूप में अवतार लिया। कालीशिला कालीमठ मंदिर से लगभग 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। मान्यता है कि इस पवित्र शिला पर माता के चरणों के निशान आज भी विद्यमान हैं, जिनकी श्रद्धालु भक्त आस्था के साथ पूजा-अर्चना करते हैं। माँ काली और रक्तबीज वध की पौराणिक कथा माता काली के कालीशिला में प्रकट होने के बाद उनका रक्तबीज के साथ भयंकर युद्ध हुआ। पौराणिक कथाओं के अनुसार, रक्तबीज (Raktabija) को यह वरदान प्राप्त था कि उसकी रक्त की हर बूंद से एक नया रक्तबीज उत्पन्न होगा। इसे रोकने के लिए माता काली ने उसकी रक्त बूंदों को धरती पर गिरने से पहले ही पान करना शुरू कर दिया। अंततः माता काली ने जिस स्थान पर रक्तबीज का संहार किया, वह स्थान रक्तबीज शिला के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह पवित्र शिला कालीमठ से कुछ दूरी पर स्थित है और श्रद्धालु यहां आकर देवी की शक्ति का स्मरण करते हुए पूजा-अर्चना करते हैं। कालीमठ में अंतर्ध्यान हुई देवी मां “रक्त बीज वधे देवि चण्ड मुण्ड विनाशिनि।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।।” पौराणिक कथाओं के अनुसार, रक्तबीज (Raktabija) का वध करने के बाद माता काली ने शुंभ-निशुंभ का भी संहार किया, जिससे देवताओं को भय से मुक्ति मिली। हालांकि, इन दैत्यों का वध करने के बाद भी माता काली का क्रोध शांत नहीं हुआ। उनका रौद्र रूप देखकर देवता भयभीत हो गए और उन्होंने भगवान शिव से सहायता की प्रार्थना की। भगवान शिव, देवी के क्रोध को शांत करने के लिए उनके मार्ग में लेट गए। जैसे ही माता काली ने शिव को अपने चरणों के नीचे देखा, उनका क्रोध शांत हो गया और वे तुरंत अंतर्ध्यान हो गईं। मान्यता है कि देवी काली जिस स्थान पर अंतर्ध्यान हुईं, वही कालीमठ मंदिर (Kalimath Temple) के रूप में प्रसिद्ध हुआ। यहां देवी की कोई मूर्ति स्थापित नहीं है। इसके बजाय, देवी की ऊर्जा और शक्ति का पूजन एक पवित्र कुंड में यंत्र रूप में किया जाता है। श्रद्धालु इस दिव्य स्थान पर आकर देवी की कृपा प्राप्त करने के लिए श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजा-अर्चना करते हैं। इसे भी पढ़ें:- प्रेमानंद जी महाराज: गुरु दक्षिणा का सही अर्थ और महत्व नवरात्रि (Navratri) में करें कालीमठ के दर्शन नवरात्रि (Navratri) के पावन अवसर पर कालीमठ मंदिर (Kalimath Temple) के दर्शन करना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। मां काली अपने भक्तों की हर सच्ची मनोकामना पूरी करती हैं। यह स्थान उन साधकों के लिए भी अत्यंत पवित्र है, जो तंत्र-मंत्र या ध्यान साधना के माध्यम से आध्यात्मिक उन्नति की कामना करते हैं। नवरात्रि के दौरान यहां दर्शन करने से आत्मिक शुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। कालीमठ कैसे पहुंचें? नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Kalimath Temple #KalimathTemple #MaaKali #NavratriDarshan #KalimathUttarakhand #ShaktiPeeth #KaliMata #HinduTemple #SpiritualJourney #DivineBlessings #ReligiousTourism

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Chaitra Navratri

चैत्र नवरात्रि 2025: जौ न उगने पर क्या होता है? जानें इसके पीछे छिपे शुभ-अशुभ संकेत और वैज्ञानिक कारण

चैत्र नवरात्रि (Chaitra Navratri) के पहले दिन घटस्थापना के साथ ही जौ बोने की परंपरा हिंदू धर्म में सदियों से चली आ रही है। यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि एक शुभ संकेतक भी है। मान्यता है कि नवरात्रि में बोए गए जौ के अंकुरण से घर की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और भाग्य का पता चलता है। लेकिन क्या होता है जब जौ नहीं उगते? क्या यह अशुभ संकेत देता है? आइए जानें इसके पीछे छिपे गहरे रहस्य और वैज्ञानिक व धार्मिक महत्व को। नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव नवरात्रि (Navratri) के दौरान यदि जौ ठीक से नहीं उगते हैं, तो इसका मुख्य कारण घर या पूजा स्थल पर नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव हो सकता है। यह नकारात्मक ऊर्जा विभिन्न कारणों से उत्पन्न हो सकती है, जैसे घर में वास्तु दोष, बुरी नजर या अन्य प्रकार की बाधाएं। जब किसी स्थान पर नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव होता है, तो आध्यात्मिक शक्ति कमजोर हो जाती है, जिससे जौ का अंकुरण सही तरीके से नहीं हो पाता। इस स्थिति को अशुभ संकेत के रूप में माना जाता है। आर्थिक परेशानियां जौ का अंकुरण समृद्धि और उर्वरता का प्रतीक होता है। नवरात्रि के दौरान यदि जौ ठीक से नहीं उगते, तो यह आर्थिक समस्याओं का संकेत हो सकता है। मान्यता है कि जिन घरों में नवरात्रि के समय जौ सही तरीके से नहीं उगते, वहां भविष्य में आर्थिक संकट आ सकता है। यह स्थिति घर के आर्थिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है और धन संबंधी समस्याओं का जन्म ले सकती है। ग्रह दोष ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, नवरात्रि में जौ का ठीक से न उगना ग्रहों के दोष के कारण हो सकता है। विशेष रूप से शनि, राहु या केतु के अशुभ प्रभाव के कारण यह स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इन ग्रहों की प्रतिकूल स्थिति घर में सुख, शांति और समृद्धि की कमी ला सकती है, जिससे जौ का अंकुरण सही से नहीं हो पाता। इसके अलावा, पितृ दोष भी जौ के सही से न उगने का कारण बन सकता है। स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां ज्योतिष और वास्तु शास्त्र के अनुसार, यदि जौ ठीक से नहीं उगते हैं, तो यह परिवार के स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं का संकेत हो सकता है। इस स्थिति को देखा गया है कि यदि जौ न उगें, तो यह परिवार के किसी सदस्य की सेहत में खराबी का संकेत हो सकता है, विशेष रूप से उन लोगों के लिए जिनकी तबियत पहले से ठीक नहीं है। यह चेतावनी देता है कि परिवार के सदस्य किसी शारीरिक या मानसिक बीमारी का सामना कर सकते हैं। इसे भी पढ़ें:- चैती छठ महापर्व 2025: सूर्य देव की पूजा और उपवास का पवित्र अवसर घर में क्लेश और मानसिक तनाव नवरात्रि (Navratri) में जौ का ठीक से न उगना पारिवारिक क्लेश, मानसिक तनाव और मानसिक असंतुलन का भी संकेत हो सकता है। यह स्थिति घर में झगड़ों और समस्याओं को जन्म दे सकती है। जब जौ ठीक से अंकुरित नहीं होते, तो यह घर में नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव को दर्शाता है, जो परिवार के बीच मनमुटाव और क्लेश का कारण बन सकता है। नवरात्रि में जौ न उगने पर उपाय पंडित आचार्य उदित नारायण त्रिपाठी के अनुसार, अगर नवरात्रि (Chaitra Navratri) के दौरान जौ सही से न उगें, तो कुछ उपायों को अपनाकर इस समस्या का समाधान किया जा सकता है। सबसे पहले, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि नवरात्रि के दौरान पूजा और व्रत को सही विधि से संपन्न किया जाए। इसके साथ ही, कन्या पूजन करना भी एक प्रभावी उपाय माना जाता है। कन्या पूजन से माता रानी की विशेष कृपा प्राप्त होती है, जो घर में सुख, शांति और समृद्धि का संचार करती है। इस विधि से न केवल जौ का अंकुरण सही से हो सकता है, बल्कि यह अन्य कई शुभ परिणाम भी ला सकता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Chaitra Navratri #ChaitraNavratri2025 #NavratriRituals #BarleyGrowth #JauSignificance #NavratriAstrology #HinduFestivals #SpiritualMeaning #AuspiciousOmens #ScientificFacts #HinduTraditions

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Chaiti Chhath Puja

चैती छठ पूजा: इन आवश्यक सामग्रियों के बिना अधूरी है व्रत की पूर्णता

भारत में हर एक त्यौहार का महत्व होता है और उसे बड़ी श्रद्धा और विधिपूर्वक मनाया जाता है। इसी तरह चैती छठ पूजा (Chaiti Chhath Puja), जो विशेष रूप से उत्तर भारत, खासकर बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और मध्य प्रदेश में बड़े धूमधाम से मनाई जाती है, बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह पर्व खासकर सूर्य देवता (Lord Sun) की पूजा के लिए प्रसिद्ध है, जिसमें व्रति 36 घंटे का उपवास रखते हुए सूर्यास्त और सूर्योदय के समय सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करते हैं। इस पूजा के दौरान कुछ विशेष पूजा सामग्री का होना जरूरी है, बिना इन चीजों के छठ पूजा का व्रत अधूरा माना जाता है। आइए जानते हैं वह कौन सी सामग्री है, जो इस पूजा के लिए आवश्यक होती है और बिना जिनके यह व्रत पूरा नहीं होता। चैती छठ पूजा की विशेष पूजा सामग्री चैती छठ पूजा (Chaiti Chhath Puja) में व्रति विशेष रूप से सूर्योदय और सूर्यास्त के समय सूर्य देवता (Lord Sun) को अर्घ्य अर्पित करते हैं। इसके लिए कुछ खास पूजा सामग्री का होना अनिवार्य है। इन चीजों को एक विशेष टोकरी (ठीया) में सजाया जाता है, जिसमें व्रति सूरज देवता को अर्पित करते हैं। चैती छठ पूजा (Chaiti Chhath Puja) को विधिपूर्वक संपन्न करने के लिए कुछ विशेष पूजा सामग्री की आवश्यकता होती है, जिसे पूजा स्थल पर सुसज्जित किया जाता है। सबसे पहले, पूजा सामग्री रखने के लिए एक साफ थाली का होना जरूरी है। पूजा स्थल पर दीपक जलाने के लिए मिट्टी के दीए लगाए जाते हैं, जो पूजा की पवित्रता को बढ़ाते हैं। साथ ही, खाजा, गुड़, और अदरक का पौधा भी पूजा में शामिल किया जाता है। चावल, आटा, और जल पूजा के दौरान अर्पित किए जाते हैं। इसके अलावा, शहद, गंगाजल, और चंदन का भी विशेष महत्व होता है। सिंदूर, धूपबत्ती, कुमकुम, और कपूर का उपयोग वातावरण को शुद्ध और पूजा को विशेष बनाता है। बांस या पीतल का सूप और दूध तथा जल के लिए गिलास पूजा में जरूरी होते हैं। ऋतुफल, कलावा, सुपारी, फूल, और माला भी पूजा में अर्पित किए जाते हैं। अंत में, तांबे का कलश और बड़ी टोकरी का उपयोग प्रसाद रखने के लिए किया जाता है। इन सभी सामग्रियों का उपयोग पूजा की विधि के अनुसार सूर्य देवता (Lord Sun) की पूजा में किया जाता है। प्रसाद की सामग्री चैती छठ पूजा (Chaiti Chhath Puja) के दौरान विशेष प्रसाद तैयार किया जाता है, जो सूर्य देवता को अर्पित किया जाता है। इस प्रसाद में कुछ खास चीजें शामिल होती हैं, जो पूजा की पवित्रता और नियमों के अनुरूप होती हैं। प्रसाद में आमतौर पर लड्डू, हल्दी, नाशपाती, और पत्ते लगे हुए ईख शामिल होते हैं। इसके अलावा, दूध, तेल, बाती, नारियल, शरीफा, और दूध से बनी मिठाइयाँ भी प्रमुख रूप से रखी जाती हैं। इसके साथ ही, बड़ा नींबू, सिंघाड़ा, सुथनी, शकरकंदी, मूली, बैंगन, केले, और गेहूं को भी प्रसाद के रूप में उपयोग किया जाता है। इन सभी चीजों का विशेष महत्व होता है और ये सूर्य देवता के आशीर्वाद को प्राप्त करने में मदद करती हैं। इसे भी पढ़ें:- चैती छठ महापर्व 2025: सूर्य देव की पूजा और उपवास का पवित्र अवसर चैती छठ पूजा के दौरान इन नियमों का पालन करें चैती छठ पूजा के दौरान सफाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए और व्रत के सभी नियमों का सख्ती से पालन करना चाहिए, ताकि पूजा सही तरीके से संपन्न हो सके। पूजा के समय घर के सभी सदस्य सात्विक आहार ग्रहण करें। नहाय-खाय के दिन से लेकर सूर्योदय के अर्घ्य तक लहसुन और प्याज का सेवन पूरी तरह से मना है। व्रति को प्रसाद खुद बनाना चाहिए, यदि वह इसे बनाने में सक्षम नहीं हैं, तो किसी न किसी रूप में मदद अवश्य करें। प्रसाद तैयार करते समय स्वच्छता और शुद्धता का खास ध्यान रखें। यह सुनिश्चित करें कि छठ पूजा से जुड़े सभी प्रसाद मिट्टी के चूल्हे पर ही तैयार किए जाएं। पूजा के दौरान सुई का उपयोग कपड़ों में नहीं करना चाहिए और पूजा में बांस से बनी सूप और टोकरी का ही प्रयोग करें। इसके अलावा, व्रति पूजा के समय जमीन पर चटाई बिछाकर ही सोएं। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Chaiti Chhath Puja #ChaitiChhath #ChhathPuja2024 #ChhathVrat #SunGodWorship #ChhathFestivals #HinduRituals #ChhathSamagri #ChhathPujaItems #ChhathMahima #FestiveRituals

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Chaiti Chhath Mahaparv 2025

चैती छठ महापर्व 2025: सूर्य देव की पूजा और उपवास का पवित्र अवसर

भारत में छठ पूजा (Chhath Puja) का महत्व अत्यधिक है, और इसे विशेष रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, और देश के विभिन्न हिस्सों में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। हालांकि, छठ पूजा का मुख्य पर्व कार्तिक मास में मनाया जाता है, वहीं चैती छठ पूजा भी बहुत श्रद्धा और धूमधाम से मनाई जाती है। चैती छठ विशेष रूप से वसंत ऋतु में मनाई जाती है, और यह खासकर उत्तर भारत में मनाई जाती है। इस साल चैती छठ महापर्व (Chhath Puja) का आयोजन 2025 में बहुत धूमधाम से होने जा रहा है। इस लेख में हम चैती छठ पूजा की तिथियों, महत्व, और मुहूर्त के बारे में विस्तार से जानेंगे। चैती छठ पूजा का महत्व चैती छठ पूजा (Chhath Puja) का आयोजन मुख्य रूप से सूर्य देव (Lord Sun) की पूजा के लिए किया जाता है। यह पूजा विशेष रूप से व्रति द्वारा सूर्यदेव और चंद्रदेव की आराधना के रूप में की जाती है। यह पर्व विशेष रूप से महिलाएँ अपने परिवार की सुख-समृद्धि, संतान सुख, और अपने घर के सभी सदस्य की भलाई के लिए करती हैं। चैती छठ का आयोजन वसंत ऋतु में होता है और यह हिंदू पंचांग के चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन व्रति अपने परिवार के सुख और समृद्धि के लिए सूर्योदय से पहले उबटन, स्नान, और फिर सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित करते हैं। चैती छठ 2025 की तिथियाँ चैती छठ पूजा 2025: महत्वपूर्ण तिथियां और मुहूर्त चैती छठ (Chaiti Chhath) महापर्व 2025 का आयोजन मंगलवार, 1 अप्रैल से शुरू हो चुका है। पंचांग के अनुसार, यह पर्व चैत्र शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से प्रारंभ होकर सप्तमी तिथि को समाप्त होता है। इस दिन से व्रति अपने घरों में नहाय-खाय का आयोजन करते हैं, जिसमें कद्दू, चना दाल और अरवा चावल का सात्विक भोजन तैयार किया जाता है। आइए जानते हैं चैती छठ की महत्वपूर्ण तिथियां और मुहूर्त: 1. खरना (Kharna) – 2 अप्रैल 2025 (बुधवार) खरना पूजा चैती छठ के दूसरे दिन होती है। यह दिन व्रति के लिए खास महत्व रखता है, क्योंकि इस दिन से छठ पूजा की मुख्य शुरुआत होती है। खरना के दिन व्रति दिनभर उपवासी रहते हैं और शाम को गुड़ की खीर का प्रसाद बनाते हैं। इसके बाद व्रति संतान सुख और परिवार की समृद्धि के लिए सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित करते हैं। खरना के साथ ही 36 घंटे के निर्जला उपवास की शुरुआत हो जाती है, जो अगले दिन सूर्यास्त और फिर सूर्योदय अर्घ्य तक जारी रहता है। इसे भी पढ़ें:- प्रेमानंद जी महाराज: गुरु दक्षिणा का सही अर्थ और महत्व 2. सूर्यास्त अर्घ्य – 3 अप्रैल 2025 (शुक्रवार) सूर्यास्त के समय सूर्य देवता (Lord Sun) को अर्घ्य अर्पित करना एक अहम हिस्सा होता है। इस दिन व्रति नदी या जलाशय के किनारे जाकर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करते हैं। यह समय विशेष रूप से परिवार के लिए सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य की कामना का होता है। 3. सूर्योदय अर्घ्य – 4 अप्रैल 2025 (शनिवार) चैती छठ (Chaiti Chhath) का मुख्य दिन सूर्योदय अर्घ्य का होता है। इस दिन व्रति सूर्योदय से पहले नदी या तालाब के किनारे जाकर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करते हैं। व्रति इस दिन अपने 36 घंटे के उपवास का समापन करते हैं और परिवार की भलाई के लिए सूर्य देव (Lord Sun) का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह दिन विशेष रूप से सूर्य पूजा और परिवार के लिए आशीर्वाद लेने का होता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Chhath Puja #ChaitiChhath2025 #ChhathPuja #SunGodWorship #ChhathFestival #ChhathVrat #SuryaPuja #ChhathRituals #ChhathMahaparv #Devotion #FestivalsOfIndia

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Chaitra Navratri

चैत्र नवरात्रि में इन 7 दिव्य मंत्रों से होगी धन की प्राप्ति

चैत्र नवरात्रि (Chaitra Navratri) का पावन पर्व हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है। यह समय मां दुर्गा (Maa Durga) की आराधना और आशीर्वाद पाने के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। इस दौरान कुछ विशेष मंत्रों का जाप करने से धन, सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं वे 7 चमत्कारी मंत्र जो आपको जीवनभर धनवान और खुशहाल बनाए रखेंगे। ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा।बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति॥  दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेष जन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।दारिद्र्य दुःख भयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकार करणाय सदार्द्रचित्ता॥ सर्वमङ्गल माङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥ शरणागत दीनार्तपरित्राण परायणे।सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥ सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति समन्विते।भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥ रोगानशेषानपहंसि तुष्टारुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।त्वामाश्रितानां न विपन्नराणांत्वामाश्रिता हि आश्रयतां प्रयान्ति॥ सर्वबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।एवमेव त्वया कार्यम् अस्मद् वैरि विनाशनम्॥ इसे भी पढ़ें:- प्रेमानंद जी महाराज: गुरु दक्षिणा का सही अर्थ और महत्व नवरात्रि में 9 देवियों के विशेष बीज मंत्र इस प्रकार हैं: दुर्गा सप्तशती पाठ चैत्र नवरात्रि (Chaitra Navratri) के दौरान दुर्गा सप्तशती का पाठ करना अत्यंत मंगलकारी माना जाता है। इस पवित्र ग्रंथ में 13 अध्याय और 700 श्लोक शामिल हैं, जो माता दुर्गा (Maa Durga) के तीन प्रमुख स्वरूपों का विवरण प्रस्तुत करते हैं। यदि कोई व्यक्ति नवरात्रि में संपूर्ण दुर्गा सप्तशती का पाठ करने में असमर्थ हो, तो केवल 7 विशेष मंत्रों का जाप करके भी मां दुर्गा की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त कर सकता है। Latest News in Hindi Today Hindi News Chaitra Navratri #ChaitraNavratri #Navratri2024 #DurgaPuja #DivineFeminine #ShaktiPower #SacredMantras #MantraMeditation #VedicWisdom #SpiritualGrowth

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Hanuman Jayanti 2025

हनुमान जयंती 2025: जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

हिंदू धर्म में हनुमान जयंती (Hanuman Jayanti) का विशेष महत्व है। यह त्योहार भगवान हनुमान के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। हनुमान जी को भक्ति, शक्ति, साहस और निष्ठा का प्रतीक माना जाता है। उनकी भक्ति और बलिदान की गाथाएं हर युग में प्रेरणा का स्रोत रही हैं। हनुमान जयंती हर साल चैत्र मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है।  हनुमान जयंती का महत्व हनुमान जयंती (Hanuman Jayanti) का पर्व पूरे देश में बड़े ही उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है। हनुमान जी को रामभक्त और संकटमोचन के रूप में जाना जाता है। उनकी पूजा करने से भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। हनुमान जी की पूजा विशेष रूप से मंगलवार और शनिवार को की जाती है, लेकिन हनुमान जयंती के दिन उनकी आराधना का विशेष महत्व होता है। हनुमान जयंती 2025  (Hanuman Jayanti 2025) की तिथि और मुहूर्त साल 2025 में हनुमान जयंती 12 अप्रैल, शनिवार को मनाई जाएगी। चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि 12 अप्रैल को सुबह 3:21 से शुरू होगी और 13 अप्रैल को शाम 05:21 पर समाप्त होगी। हनुमान जयंती, जो हनुमान जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है, राम नवमी के ठीक छह दिन बाद आती है। इस वर्ष राम नवमी 6 अप्रैल 2025 को मनाई जाएगी। हनुमान जयंती पूजा विधि हनुमान जयंती (Hanuman Jayanti) के दिन भक्त सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं। इसके बाद हनुमान जी की मूर्ति या चित्र को स्थापित करके उनकी पूजा की जाती है। पूजा में हनुमान जी को सिंदूर, चमेली का तेल, फूल, धूप, दीप और प्रसाद अर्पित किया जाता है। इस दिन हनुमान चालीसा और सुंदरकांड का पाठ करने का विशेष महत्व होता है। इसे भी पढ़ें:- प्रेमानंद जी महाराज: गुरु दक्षिणा का सही अर्थ और महत्व हनुमान जयंती के दिन क्या करें? हनुमान जयंती पर विशेष आयोजन हनुमान जयंती (Hanuman Jayanti) के दिन देश के प्रसिद्ध हनुमान मंदिरों में विशेष आयोजन किए जाते हैं। इनमें से कुछ प्रमुख मंदिर हैं: नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Hanuman Jayanti #HanumanJayanti2025 #HanumanJayanti #JaiShriRam #PujaVidhi #AuspiciousMuhurat #HanumanBhakti #SpiritualFestival #HinduFestivals #LordHanuman #HanumanChalisa

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Gaj Kesari Rajyoga 2025 Wealth & Luck for These Signs

2 अप्रैल 2025 का गजकेसरी राजयोग: इन राशियों के जीवन में आएगी धन-समृद्धि की बहार

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार 2 अप्रैल 2025 को एक दुर्लभ और शक्तिशाली गजकेसरी राजयोग (Gajakesari Yoga) बनने जा रहा है। यह योग गुरु (बृहस्पति) और चंद्रमा की वृषभ राशि में युति के कारण बनेगा, जो धन, समृद्धि और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि (Navratri) के पावन समय में बनने वाला यह योग कुछ विशेष राशियों के जातकों के लिए भाग्योदय लेकर आएगा। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सभी ग्रह समय-समय पर अपनी स्थिति बदलते रहते हैं, जिसका प्रभाव 12 राशियों पर अलग-अलग होता है। 2 अप्रैल को चंद्रमा भी वृष राशि में प्रवेश करेंगे। इन दोनों शुभ ग्रहों के मिलने से गजकेसरी राजयोग का निर्माण होगा, जो बेहद प्रभावशाली माना जाता है। इस योग के प्रभाव से कुछ राशियों के जीवन में बड़ा बदलाव आ सकता है। उन्हें न केवल धन-समृद्धि प्राप्त होगी, बल्कि सामाजिक क्षेत्र में भी सम्मान और सफलता मिलेगी।आइए जानते हैं कि किन राशियों को इसका सबसे अधिक लाभ मिलेगा और कैसे इस योग का पूरा फायदा उठाया जा सकता है। गजकेसरी राजयोग क्या है? गजकेसरी राजयोग (Gajakesari Yoga) वैदिक ज्योतिष के सबसे शुभ योगों में से एक है, जो गुरु और चंद्रमा के विशेष संयोग से बनता है। “गज” (हाथी) ज्ञान और स्थिरता का प्रतीक है, जबकि “केसरी” (सिंह) साहस और नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है। जब ये दोनों ग्रह कुंडली के केंद्र (1, 4, 7, 10वें भाव) में एक-दूसरे से संबंध बनाते हैं, तो यह योग निर्मित होता है। इस योग के प्रभाव से व्यक्ति को धन, यश, उच्च पद और मानसिक शांति प्राप्त होती है 15। 2 अप्रैल 2025 को क्यों है खास? 2 अप्रैल को गुरु और चंद्रमा दोनों वृषभ राशि में होंगे। वृषभ राशि शुक्र की राशि है, जो भौतिक सुख-सुविधाओं और आर्थिक समृद्धि से जुड़ी है। इस दिन नवरात्रि का भी पावन समय चल रहा होगा, जिससे इस योग की शक्ति और बढ़ जाएगी। ज्योतिषियों के अनुसार, यह योग विशेष रूप से वृषभ, कर्क, सिंह, मिथुन और मीन राशि के जातकों के लिए अत्यंत शुभ फलदायी होगा इन राशियों को मिलेगा अद्भुत लाभ 1. वृषभ राशि (Taurus) इस योग का सबसे अधिक लाभ वृषभ राशि (Zodiac Sign) के जातकों को मिलेगा, क्योंकि यह उनके लग्न भाव में बन रहा है। इस दौरान उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा और सामाजिक प्रतिष्ठा में भी वृद्धि होगी। व्यापार और नौकरी में उल्लेखनीय सफलता मिलने की संभावना है। विवाहित जातकों का दांपत्य जीवन सुखमय रहेगा, जबकि अविवाहितों को शादी के शुभ प्रस्ताव मिल सकते हैं। 2. कर्क राशि (Cancer) यह योग कर्क राशि (Zodiac Sign) के 11वें भाव (लाभ स्थान) में बन रहा है, जिससे आय के नए स्रोत खुलने की संभावना है। व्यापार में विस्तार और निवेश से अच्छा लाभ मिल सकता है। साथ ही, सामाजिक क्षेत्र में मान-सम्मान बढ़ेगा और राजनीति से जुड़े लोगों को भी सफलता मिलने के योग हैं। इसे भी पढ़ें:- प्रेमानंद जी महाराज: गुरु दक्षिणा का सही अर्थ और महत्व 3. सिंह राशि (Leo) सिंह राशि (Zodiac Sign) के कर्म भाव (10वें भाव) में बनने वाला यह योग करियर में उन्नति लाएगा।वैदिक शास्त्रों के अनुसार, 2 अप्रैल को गजकेसरी राजयोग बनने से आपके लिए शुभ मौके आ सकते हैं। जो लोग प्राइवेट या सरकारी नौकरी में हैं, उन्हें सैलरी बढ़ने और प्रमोशन मिलने की संभावना है। अगर आप नौकरी बदलने का सोच रहे हैं, तो समय आपके लिए सही रहेगा और आपको बेहतर सैलरी के साथ जॉब ऑफर मिल सकता है। वहीं, जो लोग बिजनेस कर रहे हैं, उन्हें अच्छा मुनाफा हो सकता है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। गजकेसरी राजयोग (Gajakesari Yoga) का पूरा लाभ कैसे उठाएं? नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Gajakesari Yoga #GajKesariRajyoga2025 #Astrology2025 #WealthLuck #ZodiacSigns #Horoscope2025 #MoneyLuck #RajyogaEffects #AprilAstrology #Fortune2025 #LuckyZodiac

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