Mahakal Ujjain

उज्जैन में क्यों निकलती है महाकाल की सवारी? जानिए सदियों पुरानी परंपरा और उसका धार्मिक रहस्य

धार्मिक नगरी उज्जैन को प्राचीन काल से ही शिव की नगरी के रूप में जाना जाता है। यहां स्थित श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग को बारह ज्योतिर्लिंगों में सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त है। सावन के पावन महीने में जब पूरी धरती शिवमय हो जाती है, तब उज्जैन में महाकाल की सवारी एक ऐसा अद्भुत आयोजन होता है, जिसे देखने और अनुभव करने के लिए लाखों श्रद्धालु देश-विदेश से उमड़ पड़ते हैं। पर क्या आपने कभी सोचा है कि इस महाकाल की सवारी का धार्मिक महत्व क्या है? क्यों भगवान स्वयं नगर भ्रमण पर निकलते हैं? आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक परंपरा और उसकी आस्था से जुड़ी गहराई को। महाकाल की सवारी क्या है? महाकाल की सवारी उज्जैन (Mahakal Ujjain) में सावन और भाद्रपद के विशेष सोमवारों को निकलने वाली एक पवित्र धार्मिक शोभायात्रा है। इस सवारी में भगवान महाकाल अपने विविध स्वरूपों—मनमहेश, चंद्रमौलेश्वर, भूतनाथ आदि—में नगर भ्रमण करते हैं। यह सवारी महाकाल मंदिर से निकलकर नगर के प्रमुख मार्गों से होते हुए रामघाट तक जाती है, जहां शिप्रा नदी में भगवान का अभिषेक किया जाता है। महाकाल की सवारी 2025: जानिए कब-कब निकलेंगी भव्य शोभायात्राएं  सावन मास में भगवान महाकाल की सवारी हर सोमवार को निकाली जाती है। वर्ष 2025 में यह सवारियां निम्नलिखित तिथियों को उज्जैन (Ujjain) नगर में श्रद्धा और भव्यता के साथ निकाली जाएंगी: महाकाल की सवारी का ऐतिहासिक महत्व (Mahakal Ki Sawari History) सावन और भाद्रपद के पावन महीनों में निकलने वाली महाकाल की यह विशेष सवारी एक प्राचीन धार्मिक परंपरा का हिस्सा है, जो आज भी पूरे श्रद्धा और विधि-विधान से निभाई जाती है। इतिहास के अनुसार, इस सवारी को भव्य रूप देने का श्रेय राजा भोज को जाता है। उनके शासनकाल में महाकाल की सवारी में नए रथों और हाथियों को सम्मिलित कर इसे एक राजसी शोभायात्रा का रूप दिया गया था। तब से यह परंपरा निरंतर चली आ रही है और प्रत्येक वर्ष लाखों श्रद्धालु इस दिव्य आयोजन में भाग लेते हैं। महाकाल की सवारी का आध्यात्मिक महत्व (Mahakal Sawari Significance) महाकाल की सवारी को अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजन माना जाता है। इस अवसर पर भगवान महाकाल को रथ पर विराजमान कर नगर भ्रमण कराया जाता है। सवारी के दौरान भक्तगण ऊँचे स्वर में “जय महाकाल” के नारे लगाते हैं और ढोल-नगाड़ों की गूंज से पूरा वातावरण शिवमय हो जाता है। इस भव्य यात्रा में तलवारबाज, घुड़सवार और अखाड़ों के साधु-संत भी भाग लेते हैं। यह सवारी महाकाल की शक्ति, साकार स्वरूप और नगर पर उनकी कृपा का प्रतीक मानी जाती है। धार्मिक ग्रंथों में भी इस परंपरा का उल्लेख मिलता है, जो इसकी प्राचीनता और महत्व को प्रमाणित करता है। इसे भी पढ़ें:- सावन 2025: क्यों प्रिय है महादेव को बेलपत्र? जानिए इसके पीछे छिपी पौराणिक कथा और महत्व सावन में क्यों होती है सवारी? सावन का महीना भगवान शिव (Lord Shiva) को अत्यंत प्रिय है। इस मास में की गई शिव उपासना, व्रत, अभिषेक और पूजन का फल अत्यधिक होता है। सावन के सोमवार और महाकाल की सवारी का संयोग भक्तों के लिए एक दुर्लभ अवसर होता है, जब वे स्वयं महाकाल के नगर भ्रमण और दर्शन का पुण्य प्राप्त करते हैं। यह विश्वास है कि महाकाल की सवारी में सम्मिलित होने से कष्टों का नाश, पापों से मुक्ति और कुल की उन्नति होती है। यही कारण है कि यह सवारी हर वर्ष भव्य रूप से श्रद्धा और उत्साह के साथ निकाली जाती है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news  #MahakalKiSawari #UjjainMahakal #LordShivaProcession #Sawan2025 #MahakalDarshan #SpiritualIndia

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Kanwar Yatra

कांवड़ क्यों रखा जाता है कंधे पर? जानिए रावण और शिवभक्ति से जुड़ी पौराणिक कथा

सावन माह में उत्तर भारत की सड़कें उस भक्ति और श्रद्धा की दौड़ से गूंजती हैं, जब लाखों शिवभक्त कांवड़ यात्रा पर निकलते हैं। हाथ में नहीं, बल्कि कंधे पर कांवड़ उठाए हुए। इस यात्रा की धार्मिक परंपरा तो स्पष्ट है—गंगा जल लेकर शिवलिंग पर अर्पित करना—लेकिन कांवड़ कंधे पर क्यों रखी जाती है? क्या इसमें कोई खास रहस्य छिपा है? रोचक रूप से, इसका संबंध मिलता है महर्षि अगस्त्य और लंकापति रावण से जुड़ी एक पौराणिक कथा से। आइये जानते हैं इस रहस्य की गहराई। कांवड़ यात्रा क्या है? कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) एक ऐसी पवित्र परंपरा है, जो सीधे भगवान शिव (Lord Shiva) की भक्ति से जुड़ी हुई है। यह यात्रा उन्हें प्रसन्न करने के उद्देश्य से की जाती है। यह केवल श्रद्धा की नहीं, बल्कि संयम, सहनशीलता और सामूहिक एकता की भी यात्रा है। कांवड़ यात्रा के माध्यम से व्यक्ति न केवल शारीरिक रूप से, बल्कि मानसिक और आत्मिक रूप से भी शुद्ध होता है। इस दौरान कांवड़िए मांस-मदिरा से पूरी तरह दूर रहते हैं और सात्विक जीवनशैली अपनाते हैं। तामसिक भोजन का त्याग किया जाता है और हर गतिविधि में अनुशासन का पालन होता है। कांवड़ यात्रा के ये 10 दिन किसी तपस्या से कम नहीं होते, जो न केवल भक्ति का मार्ग दिखाते हैं, बल्कि जीवन में संयम और साधना का महत्व भी सिखाते हैं। कांवड़ कौन और क्यों कंधे पर रखी जाती है? कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) भगवान शिव के प्रति गहरी आस्था और समर्पण का प्रतीक मानी जाती है। कांवड़ को कंधे पर उठाकर चलना भक्तों के लिए एक प्रकार की तपस्या और आत्मानुशासन का रूप है। इस दौरान वे तमाम शारीरिक कष्टों और थकावट को सहते हैं, लेकिन उनकी भक्ति में कोई कमी नहीं आती। यह प्रतीक है उस दृढ़ निष्ठा का, जो यह दर्शाता है कि शिवभक्त अपने ईष्टदेव के लिए हर प्रकार की चुनौती और कठिनाई का साहसपूर्वक सामना कर सकते हैं। पौराणिक रहस्य: रावण, अगस्त्य और कांवड़ कांवड़ यात्रा की उत्पत्ति से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं हैं, जिनमें सबसे प्रसिद्ध कथा लंकाधिपति रावण की मानी जाती है। रावण को भगवान शिव का अत्यंत भक्त बताया गया है। एक बार उसने शिव को प्रभावित करने के लिए कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास किया, जिससे शिवजी कुपित हो गए। अपनी भूल का एहसास होने पर रावण ने उन्हें प्रसन्न करने के लिए गंगाजल से अभिषेक करने का संकल्प लिया। ऐसा कहा जाता है कि रावण ही वह पहला भक्त था, जिसने गंगाजल को एक विशेष विधि से कांवड़ में भरकर लाया था और उसे कंधे पर उठाकर शिवजी तक पहुंचाया था। उसी परंपरा को निभाते हुए आज भी लाखों श्रद्धालु सावन मास में कांवड़ अपने कंधे पर लेकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। धार्मिक महत्व: ऐसा विश्वास किया जाता है कि कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) से जीवन के सभी पाप समाप्त हो जाते हैं। जब भक्त पवित्र गंगाजल को कांवड़ में भरकर अपने कंधों पर उठाकर चलते हैं, इसलिए कांवड़ यात्रा को एक आध्यात्मिक तपस्या का रूप माना जाता है, जिसके माध्यम से व्यक्ति अपने पापों का प्रायश्चित करता है। इस यात्रा से शिवभक्तों को भगवान शिव की विशेष अनुकंपा प्राप्त होती है। साथ ही उनके जीवन में सकारात्मकता, मानसिक शांति और आत्मिक विकास की अनुभूति होती है। यह पावन यात्रा मोक्ष की ओर अग्रसर होने का भी एक साधन मानी जाती है। इसे भी पढ़ें:- मुखाग्नि से पहले क्यों किया जाता है सुहागिन स्त्री का सोलह श्रृंगार? संकल्प और सेवा — कांवड़ यात्रा का सार कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) सिर्फ धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि स्वेच्छा के अनुसार किए गए तप, संयमित जीवन और दया-भावयुक्त सेवा का प्रतीक है: नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news  #KanwarYatra2025 #Sawan2025 #BolBam #HarHarMahadev #LordShiva #ShivBhakti #GangaJal

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Sawan Somvar Vrat 2025

Sawan Somvar Vrat 2025: शिवलिंग पर अर्पित करें ये 11 चीजें, होगी हर मनोकामना पूरी

सावन का महीना भगवान शिव (Lord Shiva) की आराधना का सबसे पावन समय होता है। इस माह में प्रत्येक सोमवार को व्रत और पूजन का विशेष महत्व है, जिसे “सावन सोमवार व्रत” कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से व्रत और पूजा करने से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों को मनचाहा वरदान देते हैं। विशेष रूप से सावन सोमवार को शिवलिंग (Shivling) पर कुछ खास वस्तुएं चढ़ाने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं और दुर्भाग्य दूर होकर किस्मत चमकने लगती है। आइए जानते हैं, शिवलिंग पर कौन-कौन सी चीजें चढ़ानी चाहिए और उनका आध्यात्मिक महत्व क्या है— शिवलिंग पर अर्पित करें ये 11 चीजें 1. गंगाजल – पवित्रता और शुद्धि का प्रतीक गंगाजल को भगवान शिव का सबसे प्रिय जल माना जाता है। इसे शिवलिंग पर अर्पित करने से जीवन की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और मन एवं शरीर की शुद्धि होती है। 2. दूध – आरोग्यता और संतुलन का प्रतीक शिवलिंग पर दूध अर्पित करने से स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां दूर होती हैं और मानसिक शांति प्राप्त होती है। यह क्रोध और तनाव को भी शांत करता है। 3. बेलपत्र – शिव का विशेष प्रिय बेलपत्र को त्रिदेवों का प्रतीक माना गया है। इसे शिवलिंग पर चढ़ाने से पुण्य की प्राप्ति होती है और सभी प्रकार की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। ध्यान रखें कि बेलपत्र ताजे और साफ हों। 4. भस्म – वैराग्य और तपस्या का चिन्ह शिव भस्मधारी हैं, इसलिए उन्हें भस्म अर्पण करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इससे सांसारिक बंधनों से मुक्ति मिलती है और आत्मिक शांति प्राप्त होती है। 5. धतूरा और आक – संकटों से रक्षा धतूरा और आक के फूल शिवलिंग पर चढ़ाने से जीवन में आ रही बाधाएं और रोग दूर होते हैं। यह उपाय शत्रुओं से रक्षा और मानसिक शक्ति बढ़ाने में सहायक होता है। 6. शहद – मधुरता और प्रेम का प्रतीक शहद शिवलिंग पर अर्पित करने से जीवन में सौहार्द, प्रेम और पारिवारिक शांति बनी रहती है। यह रिश्तों को मधुर बनाने वाला उपाय है। 7. सफेद पुष्प – सौम्यता का प्रतीक भगवान शिव को श्वेत पुष्प अत्यंत प्रिय होते हैं। कमल, कनेर और कुंद के फूल अर्पित करने से मानसिक शुद्धता और ईश्वर कृपा प्राप्त होती है। 8. फल और ताजे भोग – सुख और समृद्धि का माध्यम शिवलिंग पर मौसमी फल और मिठाई अर्पित करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है। खासतौर पर नारियल, केला और मिश्री शिवजी को अर्पित करना शुभ माना जाता है। 9. पंचामृत – पांच तत्वों का संतुलन पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर) से शिवलिंग का अभिषेक करने से जीवन के पंचतत्व संतुलित होते हैं। यह उपाय सौभाग्य और दीर्घायु की प्राप्ति में सहायक होता है। 10. अक्षत और रोली – समर्पण का प्रतीक शुद्ध अक्षत (कच्चे चावल) और रोली से तिलक करने से पूजा का पूरक रूप बनता है। इससे शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। 11. केसर – विवाह में सफलता यदि कोई कन्या योग्य वर की प्राप्ति की इच्छा रखती है, तो शिवलिंग पर केसर मिश्रित जल चढ़ाना अत्यंत लाभकारी होता है। यह उपाय वैवाहिक जीवन में सुख और सौभाग्य लाता है। पूजा विधि का विशेष ध्यान रखें शिवलिंग पर ये सभी सामग्री अर्पित करते समय “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करते रहें। पूजन पूर्व दिशा की ओर मुख करके करें और पूरे विधिविधान से श्रद्धा और संयम के साथ यह अनुष्ठान करें। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां व्रत रखने के नियम: नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news  #Sawan2025 #SawanSomvar #ShivBhakti #Mahadev #ShivlingPuja #SomvarVrat #LordShiva #ShivaWorship #SawanVratTips #HarHarMahadev #SawanSomvarVrat2025

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Sawan 2025 First Monday

सावन 2025: पहले सोमवार पर शिववास और शुभ योगों का महासंगम

सावन, जिसे श्रावण मास भी कहा जाता है, हिंदू पंचांग का वह पवित्र महीना है जिसमें भगवान शिव (Lord Shiva) की पूजा-उपासना का विशेष महत्व होता है। वर्ष 2025 में सावन का आरंभ 11 जुलाई से हो रहा है और यह माह 9 अगस्त तक चलता है । सावन के दौरान हर सोमवार को रहा गया व्रत सावन सोमवार व्रत —आस्था में विश्वास रखने वाले भक्तों के लिए दोगुने लाभ का स्रोत माना जाता है। सावन सोमवार 2025: शुभ मुहूर्त की जानकारी वैदिक पंचांग के अनुसार, सावन मास का पहला सोमवार कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को पड़ेगा। सरल भाषा में कहें तो 14 जुलाई को रात 11 बजकर 59 मिनट तक चतुर्दशी तिथि रहेगी। इसी कारण 14 जुलाई को ही सावन का पहला सोमवार और संकष्टी चतुर्थी दोनों पड़ रही हैं। सावन सोमवार 2025: विशेष योग और उनका महत्व ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, सावन (Sawan) का पहला सोमवार कई खास और दुर्लभ योगों से युक्त होगा। इस दिन शाम 4 बजकर 14 मिनट तक आयुष्मान योग रहेगा, जिसके बाद सौभाग्य योग का प्रारंभ होगा। इसके साथ ही इस दिन शिववास योग का भी संयोग बन रहा है, जो पूरी रात रहेगा। इस दौरान भगवान शिव पहले कैलाश पर्वत पर माता पार्वती संग विराजमान होंगे, फिर नंदी पर सवार होंगे। ऐसी मान्यता है कि इन योगों में भगवान शिव (Lord Shiva) की आराधना करने से साधक को सामान्य दिनों की तुलना में दोगुना फल प्राप्त होता है। सावन का आध्यात्मिक महत्व श्रावण (Sawan) मास भगवान शिव का प्रिय महीना है और इस दौरान देवी पार्वती की काव्यात्मक महिमा भी विशेष रूप से गायी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी महीने माता पार्वती ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को पत्नी रूप में प्राप्त किया था, जिससे श्रावण मास की भोलेनाथ के प्रति भक्ति और भी दृढ़ हुई। समुद्र मंथन में उत्पन्न विष ‘हलाहल’ को पीकर संसार की रक्षा करने वाले शिव को सच्चा पूजक श्रावण के सोमवारों पर निरंतर जलाभिषेक, बेल पत्र चढ़ाना और रुद्राभिषेक जैसी विधियां करते हैं, जिससे पुण्य और चमत्कारिक फल अर्जित होता है। सावन 2025 के सोमवार और विशेष योग 14 जुलाई 2025 – पहला सोमवार सावन (Sawan) का पहला सोमवार धनिष्ठा नक्षत्र में आ रहा है। इस दिन आयुष्मान योग का निर्माण होगा। साथ ही गणेश चतुर्थी का विशेष संयोग भी बन रहा है, जिससे शिव-गणेश की एक साथ पूजा का अवसर मिलेगा। 21 जुलाई 2025 – दूसरा सोमवार इस दिन चंद्रमा रोहिणी नक्षत्र में वृषभ राशि में स्थित रहेंगे। ऐसे में गौरी योग के साथ-साथ कामिका एकादशी का भी संयोग है। इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग और वृद्धि योग का निर्माण होगा, जिससे भगवान शिव (Lord Shiva) और विष्णु दोनों की कृपा प्राप्त होगी। सुख, समृद्धि और मनोकामना पूर्ति का उत्तम समय रहेगा। 28 जुलाई 2025 – तीसरा सोमवार इस दिन चंद्रमा पूर्वाफाल्गुनी और उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में भ्रमण करेगा तथा सिंह राशि में रहेगा। इससे अत्यंत शुभ धन योग बनेगा। इसके अतिरिक्त मंगल का गोचर होने से भगवान शिव की उपासना के माध्यम से मंगल दोष और कालसर्प दोष के प्रभाव को कम करने का सुनहरा अवसर रहेगा। इस दिन वृद्ध चतुर्थी का योग भी रहेगा। 4 अगस्त 2025 – चौथा सोमवार सावन का अंतिम सोमवार भी अत्यंत शुभ रहेगा। इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग, ब्रह्म योग और इंद्र योग का दुर्लभ संगम होगा। चंद्रमा अनुराधा और चित्रा नक्षत्र में स्थित रहकर वृश्चिक राशि में संचार करेगा। इस दिन भगवान शिव की पूजा से जीवन के हर क्षेत्र में सिद्धि और सफलता का मार्ग प्रशस्त होगा। इसे भी पढ़ें:- मुखाग्नि से पहले क्यों किया जाता है सुहागिन स्त्री का सोलह श्रृंगार? पूजा व व्रत विधि सावन (Sawan) के सोमवार को भगवान शिव की विशेष पूजा विधि से आराधना करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थल को साफ करें और गंगाजल छिड़क कर उसे पवित्र करें। फिर भगवान शिव की मूर्ति या शिवलिंग स्थापित करें और प्रतिदिन गंगाजल से उनका अभिषेक करें। शिवलिंग पर सबसे पहले बेलपत्र अर्पित करें, फिर फूल चढ़ाएं और सफेद चंदन का लेप करें। इसके बाद घी का दीपक प्रज्वलित करें। महिलाएं इस दिन माता पार्वती का श्रृंगार करें। फिर “श्री शिवाय नमस्तुभ्यं” मंत्र का 108 बार जप करें। जो भक्त सावन सोमवार का व्रत कर रहे हों, वे सोमवार व्रत की कथा का पाठ करें और अंत में भगवान शिव और माता पार्वती की आरती करें। व्रत रखने वाले केवल एक बार भोजन करें और वह भी सात्विक होना चाहिए। इस दिन मन, वचन और कर्म से किसी को आहत न करें, तभी व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है। Latest News in Hindi Today Hindi news Sawan #sawan2025 #sawansomwar #shivvas #auspiciousyogas #shravanmonth #sawanpuja #hindufestival2025

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Sawan 2025

सावन 2025 में लगाएं ये पौधे, मिलेगी भोलेनाथ की कृपा

हिंदू पंचांग के अनुसार, सावन का महीना भगवान शिव की भक्ति और कृपा प्राप्ति के लिए विशेष महत्व रखता है। यह माह पूरे वर्ष में सबसे पवित्र महीनों में एक माना जाता है, जिसमें शिव भक्त पूरे समर्पण और श्रद्धा से उपवास, पूजा, जलाभिषेक और व्रत करते हैं। सावन के महीने में शिवलिंग पर जल चढ़ाने, बेलपत्र अर्पित करने के साथ-साथ कुछ खास पौधे लगाने की भी परंपरा है, जिन्हें धर्म, आयुर्वेद और वास्तु तीनों दृष्टिकोण से बेहद शुभ और कल्याणकारी माना गया है। आइए जानते हैं सावन 2025 (Sawan) में कौन-कौन से पौधे लगाने से न केवल बिगड़े काम बन सकते हैं, बल्कि भगवान शिव की कृपा भी आप पर बनी रहती है। 1. बेल का पौधा (Bel Tree) भगवान शिव (Lord Shiva) को बेल के पत्ते (बिल्व पत्र) अत्यंत प्रिय माने जाते हैं। तीन पत्तियों वाला बेल पत्र शिवलिंग पर अर्पित करने से भोलेनाथ शीघ्र प्रसन्न होते हैं। सावन माह (Sawan) में घर के आंगन या बगीचे में बेल का पौधा लगाना अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है कि इसे लगाने से घर से दरिद्रता दूर होती है और सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। वास्तु शास्त्र भी इसे शुभ मानता है, क्योंकि यह घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ाता है। 2. तुलसी का पौधा (Tulsi Plant) हिंदू धर्म में तुलसी को अत्यंत पवित्र और देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। भले ही तुलसी के पत्ते सीधे भगवान शिव को अर्पित नहीं किए जाते, लेकिन घर में तुलसी का पौधा लगाने से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। सावन के महीने में तुलसी का पौधा लगाकर नियमित रूप से उसकी पूजा करने से घर में सुख-शांति और धन-समृद्धि का वास होता है। 3. धतूरे का पौधा धतूरा उन प्रिय पुष्पों में से एक है जिन्हें भगवान शिव को अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, सावन के पावन महीने में शिवलिंग पर धतूरा चढ़ाने से भगवान भोलेनाथ अत्यंत प्रसन्न होते हैं। यदि आप अपने घर में धतूरे का पौधा लगाते हैं, तो यह शिव कृपा का प्रतीक माना जाता है। यह पौधा न केवल आर्थिक समृद्धि लाता है, बल्कि शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने में भी सहायक होता है। 4. आक का पौधा (मदार) भगवान शिव को आक का पौधा विशेष रूप से प्रिय है, विशेषकर इसके सफेद फूल। सावन के महीने में आक का पौधा रोपण करना शुभ माना जाता है। इसे घर में लगाने से महादेव की कृपा बनी रहती है, जिससे परिवार में धन-धान्य में वृद्धि होती है। आक के फूल और पत्ते शिवलिंग पर चढ़ाने से शिवजी प्रसन्न होते हैं और भक्त की इच्छाएं पूर्ण करते हैं। 5. शमी का पौधा (Shami Tree) शमी का पौधा भगवान शिव (Lord Shiva) के साथ-साथ शनिदेव को भी अत्यंत प्रिय है। इसे घर में लगाने से नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं और वातावरण में शांति बनी रहती है। सावन के पावन महीने में शमी का पौधा लगाने से शिवजी की कृपा तो मिलती ही है, साथ ही शनिदेव का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है। मान्यता है कि इससे धन से जुड़ी समस्याएं दूर होती हैं और आर्थिक स्थिति में सुधार आता है। इसे भी पढ़ें:- मुखाग्नि से पहले क्यों किया जाता है सुहागिन स्त्री का सोलह श्रृंगार? घर में सकारात्मकता लाने वाला पौधा भगवान शिव को बेलपत्र अत्यंत प्रिय हैं। यदि आप महादेव की विशेष कृपा पाना चाहते हैं, तो सावन के महीने में अपने घर में बेलपत्र का पौधा अवश्य लगाएं और नियमित रूप से उसकी पूजा करें। इसके बाद शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बेलपत्र का पौधा लगाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और शिवजी को अर्पित करने पर भक्त को उत्तम फल प्राप्त होते हैं। इस पौधे को घर की उत्तर या दक्षिण दिशा में लगाना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। हर इच्छा होगी पूरी सनातन धर्म में शमी के पौधे को अत्यंत पावन और फलदायी माना गया है। सावन (Sawan) के पवित्र माह में यदि इस पौधे को घर में लगाया जाए, तो परिवार के सभी सदस्यों पर भगवान शिव की विशेष कृपा बनी रहती है। इससे घर में सुख-शांति बनी रहती है और नकारात्मकता दूर होती है। पूजा के समय महादेव को शमी की पत्तियां अर्पित करने से वे प्रसन्न होते हैं और भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Shiva #sawan2025 #lordshiva #sacredplants #shivbhakti #hindufestivals #plantforpositivity #shivpooja

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Kanwar Yatra start date

कांवड़ यात्रा 2025: 11 जुलाई से शुरू होगी भोलेनाथ की भक्ति यात्रा

हर वर्ष की तरह इस बार भी सावन मास में भगवान शिव के भक्तों की आस्था का महापर्व ‘कांवड़ यात्रा’ 11 जुलाई 2025, शुक्रवार से आरंभ होगी। यह यात्रा श्रावण मास के पहले दिन यानी प्रतिपदा तिथि से प्रारंभ होती है और शिवरात्रि तक चलती है। इस दौरान लाखों श्रद्धालु गंगा जल लेकर अपने-अपने क्षेत्रों के शिव मंदिरों में जलाभिषेक करते हैं। सावन मास की तिथियां और शिवरात्रि पंचांग के अनुसार, 2025 में श्रावण मास की शुरुआत 11 जुलाई से होगी। इस महीने के प्रत्येक सोमवार को ‘सावन सोमवार’ का व्रत रखा जाता है, जो भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। इस वर्ष की श्रावण शिवरात्रि 15 जुलाई को मनाई जाएगी। सावन 2025 की शुरुआत और समाप्ति तिथिवैदिक पंचांग के अनुसार, सावन माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि 11 जुलाई को रात 2 बजकर 6 मिनट से शुरू होगी। यह तिथि 12 जुलाई की रात 2 बजकर 8 मिनट पर समाप्त होगी। इसलिए, सावन मास की शुरुआत 11 जुलाई से मानी जाएगी, जबकि यह माह 9 अगस्त को समाप्त होगा। कांवड़ यात्रा का धार्मिक महत्व कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) का संबंध समुद्र मंथन की कथा से जुड़ा है। मान्यता है कि जब समुद्र मंथन से निकले विष को भगवान शिव (Lord Shiva) ने ग्रहण किया, तब उनके गले में जलन हुई। इस जलन को शांत करने के लिए देवताओं ने गंगा जल से उनका अभिषेक किया। तब से यह परंपरा चली आ रही है कि श्रावण मास में भक्त गंगा जल लाकर शिवलिंग पर अर्पित करते हैं। कांवड़ यात्रा क्यों होती है कठिन?कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) को बेहद कठिन माना जाता है क्योंकि श्रद्धालुओं को सिर या कंधे पर भारी कांवड़, जिसमें गंगा जल भरा होता है, लेकर लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। इस यात्रा की शारीरिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, यात्रा से पहले अच्छे स्वास्थ्य का होना आवश्यक है। यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की सहायता के लिए कई कांवड़ यात्रा शिविर लगाए जाते हैं, जिन्हें सरकार, धार्मिक और सामाजिक संगठनों द्वारा संचालित किया जाता है। उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रियों पर हेलीकॉप्टर से पुष्पवर्षा भी की जाती है, जिससे उनकी हौसला-अफजाई होती है। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां जानिए कांवड़ यात्रा की शुरुआत कहाँ से होती हैकांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) की शुरुआत आमतौर पर हरिद्वार या गंगा नदी से जल भरने के बाद होती है। कांवड़िए गंगा नदी से पवित्र जल लेकर भगवान शिव (Lord Shiva) के मंदिर की ओर निकलते हैं। कई कांवड़िए इस दौरान पैदल सैकड़ों किलोमीटर की लंबी यात्रा करते हैं। कांवड़ यात्रा के कई मार्ग होते हैं, लेकिन सबसे प्रसिद्ध रास्ता हरिद्वार से देवघर तक जाता है। यात्रा इन मार्गों से होकर गुजरेगीकांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) के रास्ते में हरिद्वार, देहरादून, ऋषिकेश, हाथरस, बुलंदशहर, दिल्ली, गाजियाबाद, मेरठ, मुजफ्फरनगर, प्रयागराज, वाराणसी जैसे महत्वपूर्ण स्थानों पर कांवड़ यात्रा शिविर लगाए जाते हैं। पूरे सावन माह के दौरान कांवड़ यात्री “बम-बम भोले” और “जय शिव” के जयकारे लगाते हुए यात्रा करते हैं। यह यात्रा केवल एक धार्मिक तीर्थयात्रा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता, सद्भाव और भाईचारे का भी प्रतीक है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Kanwar Yatra #KanwarYatra2025 #BholeBaba #Sawan2025 #ShivBhakti #BolBam2025 #ShivYatra #HarHarMahadev

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