पंजाब इस समय भीषण बाढ़ की मार झेल रहा है। लगातार हो रही भारी वर्षा और पहाड़ी इलाकों से छोड़े गए अतिरिक्त पानी के कारण नदियाँ उफान पर हैं। कई जिलों के सैकड़ों गाँव पानी में डूब चुके हैं। गाँव की गलियाँ, खेत और घर जलमग्न हो गए हैं। लोग सुरक्षित स्थानों की तलाश में अपने घर छोड़ने को मजबूर हैं।
फसलों और पशुधन पर भारी असर
पंजाब, जिसे देश का अन्नदाता कहा जाता है, आज फसल बर्बादी के गहरे संकट से जूझ रहा है। धान और मक्का जैसी प्रमुख फसलें पानी में पूरी तरह डूब गई हैं। किसानों की मेहनत और सालभर की कमाई एक ही झटके में खत्म हो गई। साथ ही, हज़ारों मवेशियों और पोल्ट्री को भी बाढ़ ने प्रभावित किया है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर और गहरा असर पड़ा है।
जनहानि और पलायन
कई लोगों की मौत की खबरें सामने आई हैं और हजारों परिवार बेघर हो गए हैं। राहत शिविरों में शरण लेने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। महिलाएँ, बच्चे और बुज़ुर्ग सबसे अधिक प्रभावित हैं। स्वास्थ्य सेवाओं और साफ पीने के पानी की कमी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।
राहत और बचाव कार्य
राज्य सरकार और प्रशासनिक टीमें लगातार राहत और बचाव कार्य में जुटी हुई हैं। एनडीआरएफ और स्थानीय स्वयंसेवी संगठन नावों और ट्रैक्टरों की मदद से लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचा रहे हैं। कई जगहों पर अस्थायी शिविर, भोजन वितरण केंद्र और चिकित्सा सुविधाएँ भी स्थापित की गई हैं।
राजनीतिक बहस और भविष्य की चुनौती
बाढ़ ने न केवल पंजाब की आर्थिक स्थिति को झकझोरा है, बल्कि राजनीतिक हलकों में भी बहस छेड़ दी है। सरकार पर पर्याप्त तैयारी न करने के आरोप लग रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि समय रहते बाँधों और तटबंधों की मरम्मत की जाती और जल निकासी की व्यवस्था सुधारी जाती, तो नुकसान कम हो सकता था।
सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं
पंजाब की यह बाढ़ सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि चेतावनी भी है कि हमें जल प्रबंधन और आपदा नियंत्रण की योजनाओं को और मज़बूत करना होगा। आज सबसे बड़ी ज़रूरत है कि प्रभावित परिवारों को तुरंत राहत मिले और भविष्य में ऐसी त्रासदी को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएँ।




