Ashadha Purnima 2025

आषाढ़ पूर्णिमा 2025: पुण्य, व्रत और श्रद्धा का पावन अवसर

आषाढ़ पूर्णिमा हिंदू धर्म में धार्मिक एवं आध्यात्मिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण तिथि मानी जाती है। इसे गुरु पूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा, सत्यनारायण पूजन का दिन और गोपद्म व्रत (गोपद्म उपवास) का अवसर भी कहा जाता है। आओ इस वर्ष की तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजन-व्रत-कर्म की सम्पूर्ण जानकारी जानते हैं। आषाढ़ पूर्णिमा कब है – तिथि एवं समापन दृक पंचांग के अनुसार, वर्ष 2025 में आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि का आरंभ 10 जुलाई को तड़के 1 बजकर 36 मिनट पर होगा और इसका समापन 11 जुलाई को सुबह 2 बजकर 06 मिनट पर होगा। चूंकि उदया तिथि और चंद्रोदय दोनों 10 जुलाई को ही पड़ रहे हैं, इसलिए इस दिन को ही आषाढ़ पूर्णिमा और गुरु पूर्णिमा के रूप में मान्यता दी गई है। 10 जुलाई को ही होंगे व्रत, स्नान और दान इस वर्ष आषाढ़ पूर्णिमा का व्रत, पवित्र स्नान और दान—all धार्मिक कृत्य—10 जुलाई, गुरुवार को ही संपन्न किए जाएंगे। पंचांग के अनुसार, जब पूर्णिमा तिथि का सूर्योदय और चंद्रोदय एक ही दिन में होते हैं, तो व्रत और सभी पुण्य कार्य उसी दिन किए जाते हैं। ऐसे में 10 जुलाई को श्रद्धालुओं को व्रत रखने के साथ-साथ गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान कर दान करने की परंपरा निभानी चाहिए। शुभ मुहूर्त – स्नान, दान और पूजा के लिए समय आषाढ़ पूर्णिमा (गोपद्म) के दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:10 बजे से लेकर 4:50 बजे तक रहेगा। शास्त्रों में इस समय को स्नान और पूजा के लिए सर्वोत्तम माना गया है। इस समय पवित्र नदियों में स्नान करना विशेष फलदायी होता है। यदि इस अवधि में स्नान करना संभव न हो तो सूर्योदय के बाद भी स्नान कर सकते हैं। इस दिन का अभिजीत मुहूर्त, जो किसी भी शुभ कार्य के लिए सर्वोत्तम माना जाता है, दोपहर 11:59 बजे से लेकर 12:54 बजे तक रहेगा। इस अवधि में आप पूजा, व्रत संकल्प, दान या अन्य पुण्य कार्य कर सकते हैं। रात्रि समय का निशिता मुहूर्त, जो रात्रि में पूजा-अर्चना के लिए उपयुक्त होता है, रात 12:06 बजे से 12:47 बजे तक रहेगा। इस समय भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना करने से विशेष कृपा प्राप्त होती है। आषाढ़ पूर्णिमा 2025: चंद्रोदय का समय और भद्रा की स्थिति इस वर्ष आषाढ़ पूर्णिमा के दिन, यानी 10 जुलाई 2025 को, चंद्रमा का उदय शाम 7 बजकर 20 मिनट पर होगा। जो श्रद्धालु इस दिन व्रत रखते हैं, उन्हें चंद्रमा के पूर्ण रूप से आकाश में उदित होने के बाद चंद्र पूजन और अर्घ्य अर्पण करना चाहिए। माना जाता है कि चंद्रमा की रोशनी में अर्घ्य देने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है। वहीं, भद्रा काल की बात करें तो आषाढ़ पूर्णिमा के दिन भद्रा सुबह 5:31 बजे से दोपहर 1:55 बजे तक रहेगी। हालांकि यह भद्रा पाताल लोक में रहेगी, इसलिए इसका कोई अशुभ प्रभाव नहीं पड़ेगा। इस दौरान पूजा-पाठ, व्रत, स्नान और दान आदि सभी धार्मिक कार्य बिना किसी विघ्न के किए जा सकते हैं। इसे भी पढ़ें:- मुखाग्नि से पहले क्यों किया जाता है सुहागिन स्त्री का सोलह श्रृंगार? आषाढ़ पूर्णिमा का आध्यात्मिक महत्व आषाढ़ पूर्णिमा (गोपद्म) का दिन आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन सत्यनारायण भगवान का व्रत और पूजन करने से घर में सुख-शांति और सौहार्द बना रहता है। रात्रि के समय माता लक्ष्मी की विधिवत आराधना करने से घर में धन, वैभव और समृद्धि में वृद्धि होती है। साथ ही, इस दिन चंद्रमा की पूजा करने से मानसिक शांति प्राप्त होती है और कुंडली में मौजूद चंद्र दोष का प्रभाव भी कम होता है। यह तिथि गुरु पूर्णिमा के रूप में भी जानी जाती है, क्योंकि इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। इसी कारण इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है और गुरुओं की पूजा कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। इसके अतिरिक्त, आषाढ़ पूर्णिमा पर कोकिला व्रत रखने की परंपरा है, जो विशेष रूप से महिलाओं द्वारा किया जाता है। इस दिन गौरी व्रत का समापन भी होता है, जो विवाहित स्त्रियों द्वारा सौभाग्य और परिवार की मंगलकामना के लिए रखा जाता है। इस प्रकार, आषाढ़ पूर्णिमा धार्मिक अनुष्ठानों और अध्यात्म के लिए अत्यंत पुण्यदायी दिन माना जाता है। Latest News in Hindi Today Hindi news गोपद्म #AshadhaPurnima2025 #GuruPurnima2025 #FullMoonVrat #SpiritualSignificance #HinduFestivals #AshadhaMonth #ReligiousRituals #PurnimaCelebration

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Patal Bhuvaneshwar

पाताल भूवनेश्वर गुफा मंदिर: कलियुग के अंत का रहस्यमय संकेत और ब्रह्मांड की गुप्त शक्ति

भारत अपनी आध्यात्मिक विरासत और अनगिनत रहस्यमय स्थलों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित पाताल भूवनेश्वर गुफा मंदिर भी ऐसा ही एक अद्भुत धार्मिक स्थल है, जो न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि इसे कलियुग के अंत का संकेतक भी माना जाता है। यह मंदिर अपने अंदर ब्रह्मांड के गहरे रहस्यों को समेटे हुए है और भक्तों के लिए एक अनोखी आध्यात्मिक अनुभूति का माध्यम है।  पाताल भूवनेश्वर गुफा मंदिर का परिचय पाताल भुवनेश्वर मंदिर उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित है, जो गंगोलीहाट से करीब 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक प्राचीन और रहस्यमयी भूमिगत गुफा मंदिर है। यह मंदिर अपनी रहस्यमयी बनावट और पौराणिक मान्यताओं के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। गुफा की लंबाई लगभग 160 मीटर और गहराई करीब 90 फीट है, जिसमें प्रवेश करने के लिए एक तंग और संकरा रास्ता पार करना होता है। कलियुग के अंत का संकेत पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पाताल भूवनेश्वर मंदिर (Patal Bhuvaneshwar Temple) में छिपे प्रतीक और संरचनाएं कलियुग के अंत का संकेत देती हैं। मंदिर में प्रवेश करते ही प्रवेश द्वार पर शेषनाग की विशाल आकृति नजर आती है, जिनके बारे में स्थानीय मान्यता है कि उनके फन पर ही पूरी पृथ्वी टिकी हुई है। यहाँ एक प्रचलित धारणा यह भी है कि यह स्थान स्वयं भगवान शिव का निवास स्थान रहा है। गुफा के अंदर प्राकृतिक रूप से निर्मित चट्टानी संरचनाएँ और रहस्यमय आकृतियाँ सनातन धर्म की प्राचीन मान्यताओं और पौराणिक कथाओं को साकार करती प्रतीत होती हैं, जो इस स्थान को और भी रहस्यमय बना देती हैं। गुफा के अंदर की अनोखी विशेषताएं गुफा के भीतर बनी प्राकृतिक आकृतियों को भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक रूप में माना जाता है। जनश्रुति है कि इसी स्थान पर भगवान शिव ने भगवान गणेश का सिर काटा था और यहीं सप्तऋषियों ने कठोर तपस्या की थी। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि इस गुफा में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास है, जिनकी आकृतियाँ चट्टानों में स्पष्ट रूप से नजर आती हैं। गुफा के एक हिस्से को यमराज के न्याय दरबार के रूप में जाना जाता है, जहाँ आत्माओं के पाप और पुण्य का लेखा-जोखा किया जाता है। इसके अलावा, एक विशेष चट्टान पर कल्पवृक्ष की आकृति भी उकेरी हुई है, जिसे सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग का प्रतीक माना जाता है। रहस्यमय और अद्भुत कथाएं पाताल भुवनेश्वर मंदिर (Patal Bhuvaneshwar Temple) से जुड़ी कुछ रहस्य ऐसी हैं, जिन्हें विज्ञान भी नहीं समझा सका। मान्यता है कि इस गुफा में स्वर्ग, नरक, मोक्ष और पाप के चार द्वार स्थित हैं। यहां शेषनाग की एक विशाल प्राकृतिक आकृति भी दिखाई देती है, जिसके फनों पर पृथ्वी टिकी हुई मानी जाती है। इस मंदिर की खासियत यह है कि यहां एक साथ 33 देवी-देवताओं के दर्शन होते हैं। गुफा के भीतर भगवान गणेश का सिर भी मौजूद है, जिस पर ब्रह्म कमल की पवित्र बूंदें टपकती रहती हैं। साथ ही यहां एक शिवलिंग भी स्थापित है, जो निरंतर आकार में बढ़ रहा है। ऐसी मान्यता है कि जिस दिन यह शिवलिंग गुफा की छत से टकरा जाएगा, उस दिन दुनिया का अंत हो जाएगा। इसे भी पढ़ें:- शिव-शनि की पूजा से कटते हैं सारे ग्रहदोष कैसे पहुंचें पाताल भूवनेश्वर मंदिर? अगर आप पाताल भुवनेश्वर मंदिर (Patal Bhuvaneshwar Temple) के दर्शन करने की योजना बना रहे हैं तो जान लें कि वहां तक पहुंचने का रास्ता काफी कठिन है। गुफा में आसानी से प्रवेश करने के लिए दोनों ओर लोहे की चैन लगाई गई है। लेकिन श्रद्धालुओं का कहना है कि जिस तरह गुफा में प्रवेश करना चुनौतीपूर्ण है, उसी तरह बाहर निकलना भी उतना ही मुश्किल होता है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित यह मंदिर पर्वतीय क्षेत्र में है। नजदीकी रेलवे स्टेशन काठगोदाम है, जबकि हवाई मार्ग से सबसे नजदीकी हवाई अड्डा पिथौरागढ़ है। मंदिर तक पहुंचने के लिए पहाड़ी रास्तों से होकर जाना होता है, जो प्राकृतिक दृश्यों से भरे हुए हैं। Latest News in Hindi Today Hindi Patal Bhuvaneshwar Temple #patalbhuvaneshwar #kaliyugaend #mysterytemple #hindumythology #cosmicpower #hiddenindia #cavetemple #spiritualindia

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Sawan Saturday

सावन का शनिवार: शिव-शनि की पूजा से कटते हैं सारे ग्रहदोष

हिंदू धर्म में सावन माह को अत्यंत पवित्र और शुभ माना गया है। यह महीना भगवान शिव को समर्पित होता है और पूरे भारत में विशेष रूप से उत्तर भारत में सावन के सोमवार को व्रत, पूजा और रुद्राभिषेक का विशेष महत्व होता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि सावन (Sawan) के शनिवार भी उतने ही फलदायी माने गए हैं, विशेषकर शनि दोष, साढ़ेसाती और कालसर्प दोष जैसे प्रभावों को शांत करने के लिए। स्कन्द पुराण में वर्णित है कि सावन महीने के शनिवार को भगवान शिव और शनिदेव की संयुक्त पूजा करने से शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या और अन्य दोष शांत होते हैं। श्रद्धा और विधिपूर्वक की गई यह पूजा जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाती है। इस परंपरा का उल्लेख स्कन्द पुराण में मिलता है, जिसमें भगवान शिव और शनिदेव की संयुक्त पूजा से संबंधित रहस्य और लाभ बताए गए हैं। स्कन्द पुराण का संदर्भ प्राचीन हिंदू ग्रंथ स्कन्द पुराण, जो कि सबसे बड़े पुराणों में गिना जाता है, उसमें यह बताया गया है कि सावन के महीने में शनिवार के दिन भगवान शिव और शनिदेव की संयुक्त आराधना करने से जन्मपत्रिका में मौजूद कई दोष दूर होते हैं। शनि ग्रह को न्याय का देवता कहा गया है, जो मनुष्य को उसके कर्मों के आधार पर फल देते हैं। वहीं भगवान शिव, (Lord Shiva) त्रिपुरांतक और संहारकर्ता होने के साथ-साथ करुणा और क्षमा के भी प्रतीक हैं। सावन में शनि और शिव की संयुक्त पूजा का महत्व हिंदू मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव (Lord Shiva) को शनिदेव का गुरु माना गया है। यही कारण है कि शिवजी ने शनिदेव को कर्मों के आधार पर न्याय देने का दायित्व सौंपा था। ऐसे में श्रावण मास (Sawan) के दौरान जो भी भक्त शिव के साथ-साथ शनिदेव की आराधना करता है, उसे विशेष शुभ फलों की प्राप्ति होती है। यह भी मान्यता है कि भगवान शिव के अवतार—पिप्पलाद, भैरव और रुद्र रूप में हनुमान जी की पूजा करने से शनिदेव के अशुभ प्रभाव से सुरक्षा मिलती है। शास्त्रों में वर्णित है कि पीपल के वृक्ष के शीर्ष भाग में भगवान शिव (Lord Shiva) का निवास होता है, और इसी वृक्ष में शनिदेव भी वास करते हैं। इसलिए सावन के महीने में दोनों देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पीपल के पेड़ की पूजा का विशेष महत्व है। लिंग पुराण के अनुसार, शनिवार के दिन पीपल को स्पर्श करने से आयु में वृद्धि होती है। इस दिन भक्तों को प्रातःकाल स्नान करके पीपल के वृक्ष को नमस्कार करना चाहिए, फिर दोनों हाथों से वृक्ष को छूकर 108 बार “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करना चाहिए। ऐसा करने से अकाल मृत्यु से रक्षा होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इसे भी पढ़ें:- Govt Warns Online Shoppers: सरकार की यह सलाह नहीं मानने पर अपना सबकुछ गँवा सकते हैं ऑनलाइन शॉपिंग करने वाले श्रावण शनिवार को शनि देव की पूजा और दान का महत्व श्रावण मास (Sawan) के किसी भी शनिवार को जब भक्त शनिदेव की विशेष पूजा करते हैं, तो जीवन में शनि से जुड़ी बाधाएं और कष्टों का निवारण होता है। इस दिन किसी शनि मंदिर में जाकर शनिदेव की प्रतिमा का तिल के तेल से अभिषेक करना शुभ माना जाता है। इसके पश्चात उन्हें नीले रंग के पुष्प और शमी के पत्ते अर्पित करें। पूजा के दौरान शनिदेव को तेल का दीपक और धूप दिखाकर श्रद्धा से प्रणाम करें। भक्त शनिदेव को उड़द की दाल और चावल से बनी खिचड़ी का भोग भी अर्पित करते हैं। पूजा पूर्ण होने के बाद एक काले कपड़े में उड़द की दाल, काले तिल, खाने का तेल और कुछ धन राशि रखकर किसी योग्य ब्राह्मण को दान देना अत्यंत फलदायी माना गया है। इसके अतिरिक्त अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार जूते-चप्पल, पलंग अथवा बिछावन जैसे वस्त्र या सामग्री भी दान की जा सकती है। शिवपुराण की शतरुद्र संहिता में वर्णित है कि शनिदेव की पूजा के पश्चात विश्वामित्र, पिप्पलाद मुनि तथा उनके पिता गाधि ऋषि का ध्यान कर उन्हें श्रद्धापूर्वक प्रणाम करना चाहिए। ऐसा करने से शनिदेव की कृपा बनी रहती है और जीवन में शनि दोष का प्रभाव कम हो जाता है। Latest News in Hindi Today Hindi Sawan #sawansaturday #shivshanipuja #grahdoshremedy #shanidevblessings #lordshivapuja

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Devshayani Ekadashi 2025

देवशयनी एकादशी 2025: किस्मत को जगाने वाला पर्व, जानिए कब, कहां और क्यों जलाएं दीपक

वैदिक पंचांग के अनुसार, आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ 5 जुलाई 2025 को शाम 6 बजकर 58 मिनट पर होगा, जबकि इसका समापन 6 जुलाई की रात 9 बजकर 14 मिनट पर होगा। चूंकि हिन्दू धर्म में तिथि की गणना सूर्योदय से होती है, इसलिए देवशयनी एकादशी (Devshayani Ekadashi) 6 जुलाई को मनाई जाएगी। इस दिन श्रद्धालु उपवास रखेंगे और भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा करेंगे। व्रत का पारण 7 जुलाई की सुबह 5:29 से 8:16 बजे के बीच किया जाएगा। पारण से पूर्व स्नान-ध्यान कर विधिवत पूजन करें और अन्न, वस्त्र या धन का दान करके व्रत का समापन करें। देवशयनी एकादशी: शुभ योग ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन अनेक शुभ योगों का संयोग बन रहा है। इस तिथि पर साध्य योग रात 9 बजकर 27 मिनट तक प्रभावी रहेगा, जिसके बाद शुभ योग आरंभ होगा। इन पावन योगों में लक्ष्मी-नारायण की आराधना करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इसके अतिरिक्त इस दिन त्रिपुष्कर योग और रवि योग का संयोग भी बन रहा है, जो इसे और अधिक फलदायी बनाते हैं। इन योगों में किया गया व्रत और पूजन साधक को विशेष आध्यात्मिक लाभ एवं कार्यों में सफलता प्रदान करता है। घर में दीपक जलाने के 5 प्रमुख स्थान तुलसी के समीप दीपदान तुलसी का पौधा भगवान विष्णु (Lord Vishnu) को अत्यंत प्रिय है। देवशयनी एकादशी (Devshayani Ekadashi)की संध्या के समय तुलसी के पास गाय के शुद्ध घी से दीपक जलाने की परंपरा है। मान्यता है कि इससे मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और घर में समृद्धि व धन-संपत्ति का वास होता है। मुख्य द्वार पर दीप जलाना इस दिन घर के प्रवेश द्वार के दोनों ओर दीपक प्रज्वलित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। यह उपाय घर की नकारात्मकता को दूर करता है और वातावरण को शुद्ध करता है, जिससे घर में सुख और शांति बनी रहती है। पूजा स्थल में अखंड दीप भगवान विष्णु (Lord Vishnu) और मां लक्ष्मी की मूर्तियों या चित्रों के समक्ष अखंड दीपक जलाने का विधान है। यह दीपक पूरी रात जलना चाहिए। ऐसा करने से भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है और परिवार को सौभाग्य की प्राप्ति होती है। पीपल के नीचे दीपदान पीपल के वृक्ष में देवताओं और पितरों का वास माना जाता है। इस पवित्र दिन सूर्यास्त के बाद पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाना श्रेयस्कर होता है। इससे पितृदोष शांत होता है और पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है। रसोई में दीपक जलाएं  रसोई को देवी अन्नपूर्णा का स्थान माना गया है। इसलिए रसोई में भी दीपक जलाना शुभ होता है। मान्यता है कि इससे घर में अन्न और धन की कभी कमी नहीं होती और गृह लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। इसे भी पढ़ें:- Govt Warns Online Shoppers: सरकार की यह सलाह नहीं मानने पर अपना सबकुछ गँवा सकते हैं ऑनलाइन शॉपिंग करने वाले पूजा-विधि  देवशयनी एकादशी (Devshayani Ekadashi) के दिन भगवान विष्णु की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है और इस व्रत की पूजा विधि बेहद सरल है। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर में पूजा स्थल को साफ-सुथरा कर लें और वहां भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। इसके बाद देसी घी या गाय के घी का दीपक जलाएं। पूजा में तुलसी पत्र, हरे पुष्प, पंचामृत, फल और मीठी वस्तुएं अर्पित करें।  व्रत के दौरान पुण्य लाभ की दृष्टि से अन्न, वस्त्र, दीपक या अन्य आवश्यक वस्तुएं जरूरतमंदों को दान करें। चूंकि इस दिन से चातुर्मास की शुरुआत होती है, अतः इस अवधि में मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश आदि वर्जित माने जाते हैं। इसलिए संयमित जीवनशैली अपनाना और नियमों का पालन करना आवश्यक होता है। रात्रि में विशेष पूजा विधान के तहत भगवान विष्णु को पीले वस्त्र और पीली चीजें जैसे चने की दाल या केले अर्पित करें। फिर मंत्रों का जाप करें और आरती करें। पूजा के अंत में यह विशेष मंत्र बोलना चाहिए “सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत्सुप्तं भवेदिदम्, विबुद्धे त्वयि बुद्धं च जगत्सर्वं चराचरम्।” इस मंत्र का भाव यह है कि जब भगवान जगन्नाथ विश्राम करते हैं तो पूरा जगत विश्राम करता है, और जब वे जागते हैं तो सृष्टि भी जागृत हो जाती है। Latest News in Hindi Today Hindi Devshayani Ekadashi #devshayaniekadashi2025 #ekadashirituals #hindufestival #diwalighting #vishnu #auspiciousday #spiritualawakening

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miraculous Shakambhari Mata Temple

राजस्थान में स्थित शाकंभरी माता का चमत्कारी मंदिर: जहां आस्था बनती है शक्ति का प्रतीक

राजस्थान के सीकर जिले में स्थित शाकंभरी देवी का मंदिर न केवल धार्मिक विश्वास का केंद्र है, बल्कि चमत्कारिक अनुभवों और रहस्यमयी घटनाओं का भी साक्षी है। कहते हैं, यहां जो भी भक्त सच्चे दिल से अपनी इच्छा प्रकट करता है, उसकी हर मुराद अवश्य पूरी होती है। राजस्थान की रेतीली धरती पर जहां एक ओर वीरता और इतिहास की कहानियां बिखरी पड़ी हैं, वहीं दूसरी ओर श्रद्धा और आस्था के केंद्र भी उतने ही शक्तिशाली हैं। इन्हीं में से एक है, शाकंभरी माता का मंदिर, जो न केवल अपनी आध्यात्मिक शक्ति के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि अपने रहस्यमयी इतिहास और चमत्कारी अनुभवों के लिए भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। कहां स्थित है यह मंदिर? शाकंभरी माता (Shakambhari Mata) का यह अद्भुत और चमत्कारी मंदिर राजस्थान के सीकर ज़िले के उदयपुरवाटी क्षेत्र में स्थित है, जो प्रसिद्ध खाटू श्याम जी मंदिर के पास और लोहार्गल तीर्थ क्षेत्र के नजदीक पड़ता है। शाकंभरी माता का यह दिव्य मंदिर 2500 वर्षों से भी अधिक प्राचीन माना जाता है। इसका ऐतिहासिक संबंध चौहान वंश के शासकों से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि इस मंदिर की स्थापना चौहान राजाओं ने ही करवाई थी। प्राचीन काल में सांभर झील के आसपास का इलाका चौहान वंश की राजधानी के रूप में प्रसिद्ध था। यह मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित है, जहां तक पहुंचने के लिए भक्तों को कई सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। कहा जाता है कि जैसे-जैसे कोई श्रद्धालु सीढ़ियां चढ़ता है, उसकी सभी चिंताएं पीछे छूटती जाती हैं और मन मां के चरणों में रम जाता है। कौन हैं शाकंभरी माता? शाकंभरी माता (Shakambhari Mata) को मां दुर्गा का ही एक रूप माना जाता है। संस्कृत शब्द ‘शाक’ का अर्थ होता है सब्जियां या शाकाहारी भोजन और ‘भरणी’ का अर्थ है भरण-पोषण करने वाली। शाकंभरी देवी वही हैं जिन्होंने अपने भक्तों को भयंकर अकाल के समय में शाक, फल, कंद-मूल और वनस्पतियों से जीवनदान दिया था। इसलिए उन्हें “वन की देवी” और “भोजन दायिनी” भी कहा जाता है। सांभर झील से जुड़ा चमत्कार  मान्यता है कि मां शाकंभरी ने कभी सांभर क्षेत्र के जंगलों को चांदी के खेतों में बदल दिया था। इससे लोगों में लोभ और संघर्ष बढ़ने लगा, और आपसी कलह उत्पन्न हो गई। जब यह वरदान लोगों के लिए संकट का कारण बन गया, तो सभी ने देवी से प्रार्थना की। तब माता ने कृपा कर चांदी को नमक में परिवर्तित कर दिया, जिससे आज की सांभर झील अस्तित्व में आई।  इसे भी पढ़ें:- मुखाग्नि से पहले क्यों किया जाता है सुहागिन स्त्री का सोलह श्रृंगार? यहां अन्न-जल की कभी नहीं होती कमी शाकंभरी माता (Shakambhari Mata) मंदिर को लेकर क्षेत्र में कई मान्यताएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि जो भक्त सच्चे मन से यहां मां के दर्शन करता है, उसके सारे दुःख दूर हो जाते हैं। विशेष मान्यता है कि यदि कोई श्रद्धालु मां के दरबार में सात परिक्रमा करता है, तो उसके घर में कभी भी अन्न और जल की कमी नहीं होती। नवरात्रि के पावन अवसर पर यहां भव्य मेले का आयोजन होता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु मां के दर्शन हेतु उमड़ते हैं। मां शाकंभरी देती हैं बिना मांगे वरदान देशभर के कोने-कोने से पहुंचे भक्तों का मानना है कि वे वर्षों से मां शाकंभरी (Shakambhari Mata) के दर्शन के लिए आते रहे हैं। कुछ श्रद्धालुओं का कहना है कि मां की कृपा से उन्हें बिना मांगे ही सब कुछ प्राप्त हो जाता है, और जब मनोकामना पूरी हो जाती है तो वे आकर प्रसाद अर्पित करते हैं। कई भक्त बताते हैं कि बचपन से ही उनका मां शाकंभरी के प्रति अटूट विश्वास रहा है और मां की कृपा से उनके सभी कार्य सफल होते हैं। हर वर्ष नवरात्रि के अवसर पर मां की विधिवत पूजा के साथ विशाल भंडारा आयोजित किया जाता है। वहीं, कुछ श्रद्धालु यहां से अखंड ज्योत लेकर अपने घरों में जगराता करते हैं। Latest News in Hindi Today Hindi news Shakambhari Mata #shakambharimata #rajasthantemple #miraculoustemple #shakambharidevi #divinepower #indiantemples #spiritualindia #templeofmiracles

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Garuda Purana Warning

गरुड़ पुराण की चेतावनी: मृतक की इन वस्तुओं का न करें उपयोग, वरना जीवन भर भुगतना पड़ सकता है पितृ दोष

हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद की प्रक्रिया को अत्यंत पवित्र और संवेदनशील माना गया है। अंतिम संस्कार से लेकर श्राद्धकर्म तक की सभी विधियाँ न केवल धार्मिक, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इसी विषय पर विस्तार से जानकारी मिलती है गरुड़ पुराण (Garud Puran) में, जो कि हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह पुराण न केवल मृत्यु के बाद की यात्रा, नरक-स्वर्ग के वर्णन और कर्मफल की व्याख्या करता है, बल्कि यह भी बताता है कि मृत व्यक्ति की किन वस्तुओं का उपयोग नहीं करना चाहिए। गरुड़ पुराण (Garud Puran) में स्पष्ट कहा गया है कि यदि किसी मृत व्यक्ति की कुछ विशेष वस्तुओं को जीवित लोग उपयोग में लाते हैं, तो उन्हें पितृ दोष का सामना करना पड़ सकता है। हिंदू धर्मग्रंथ गरुड़ पुराण में बताया गया है कि मृत्यु के बाद किन वस्तुओं का उपयोग वर्जित है। इन नियमों का पालन न करने पर घर में अशांति, आर्थिक तंगी और रोगों का डेरा बन सकता है। आइए विस्तार से जानें कि वो कौन-सी वस्तुएं हैं जिन्हें भूलकर भी मृत व्यक्ति के बाद इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। 1. मृतक के वस्त्र (कपड़े) धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मृत व्यक्ति के कपड़ों में उसकी ऊर्जा शेष रहती है, इसलिए इन्हें पहनना अशुभ माना जाता है। गरुड़ पुराण में स्पष्ट रूप से ऐसे वस्त्रों के प्रयोग से बचने की सलाह दी गई है। ऐसे में सबसे उचित यह होता है कि इन कपड़ों को किसी जरूरतमंद या गरीब व्यक्ति को दान कर दिया जाए, जिससे न केवल पुण्य की प्राप्ति होती है बल्कि मृतात्मा को भी शांति मिलती है। 2. मृतक की चप्पल और जूते गरुड़ पुराण (Garud Puran) के अनुसार, मृत व्यक्ति के जूतों का इस्तेमाल करने से जीवन में पितृ दोष उत्पन्न हो सकता है। यह माना जाता है कि ऐसी वस्तुएं मृतात्मा से जुड़ी ऊर्जा को संजोए रखती हैं, और उनका उपयोग करने से व्यक्ति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए मृतक के जूते या चप्पलों को पहनने से पूरी तरह बचना चाहिए। 3. बिछावन और तकिए मृत व्यक्ति का सोने का स्थान, जैसे उसका बिस्तर या तकिया, उसकी अंतिम ऊर्जा और इच्छाओं को अपने भीतर समेट लेता है। ऐसे स्थान पर सोना मानसिक अस्थिरता, भय और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का कारण बन सकता है। इसलिए इन वस्तुओं का त्याग करना ही उचित और सुरक्षित माना जाता है। 4. मृत व्यक्ति की तस्वीरों का अत्यधिक प्रदर्शन कई लोग अपने घरों में मृतक की तस्वीर को बड़े फ्रेम में लगाकर पूजा स्थल या बेडरूम में रखते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत व्यक्ति की तस्वीर को पूजा घर में रखना उचित नहीं होता क्योंकि इससे पितरों की आत्मा मोह में फंस सकती है और मुक्ति में बाधा आती है। उनकी तस्वीर को एक शांत स्थान पर सम्मानपूर्वक रखें, लेकिन उसकी पूजा न करें। 5. मृतक की अंगूठी या आभूषण यदि किसी मृत व्यक्ति ने अपने जीवन में कोई अंगूठी, हार या अन्य आभूषण धारण किए थे, तो उनका उपयोग बिना शुद्धिकरण के नहीं किया जाना चाहिए। चश्मा, घड़ी, अंगूठी जैसी धातु की वस्तुएं ऊर्जा को संचित करने की क्षमता रखती हैं। यदि ये वस्तुएं मृतक द्वारा पहनी गई हों, तो उनमें उसकी अधूरी इच्छाओं और जीवन ऊर्जा का प्रभाव बना रह सकता है। इन्हें पहनने से व्यक्ति के जीवन में बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं, साथ ही मानसिक भय और प्रगति में रुकावट का अनुभव हो सकता है। इसे भी पढ़ें:- मुखाग्नि से पहले क्यों किया जाता है सुहागिन स्त्री का सोलह श्रृंगार? पितृ दोष के लक्षण Latest News in Hindi Today Hindi news Garud Puran #garudapurana #pitrudosha #hinduism #afterdeathrituals #spiritualwarnings #hindureligion #ancestralcurse #ritualsinindia #dharma #hindubeliefs

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Dalai Lama Successor Selection Process

How Dalai Lama’s Successor Is Chosen After His Death: मौत के बाद चुना जाएगा दलाई लामा का उत्तराधिकारी, इस तरह होता है चुनाव

छह जुलाई 2025 को तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा 90 साल के हो जाएंगे। दलाई लामा का यह जन्मदिन कई मायनों में बेहद अलग और खास है, क्योंकि ऐसा माना जा रहा है कि वह इस मौके पर अपने उत्तराधिकारी (Dalai Lama’s Successor) की घोषणा कर सकते हैं। इस मौके पर दुनियाभर के तिब्बती धर्मगुरु हिमाचल में उनके मठ एकजुट हो रहे हैं। तिब्बती मान्यताओं के अनुसार दलाई लामा का कोई चुनाव नहीं होता, बल्कि उन्हें खोजा जाता (How Dalai Lama’s Successor Is Chosen After His Death) है। यह प्रक्रिया इतनी रहस्यमयी है कि इसके बारे में बहुत कम ही लोग जानते हैं। बता दें कि तिब्बती बौद्ध धर्म के मुताबिक जब वर्तमान दलाई लामा की मृत्यु होती है, इसके बाद उनका पुनर्जन्म होता है। दलाई लामा की मृत्यु से पहले कुछ वरिष्ठ बौद्ध भिक्षुओं को यह बताकर जाते हैं कि उनका पुनर्जन्म कहां होने वाला है। इसलिए जब वर्तमान दलाई लामा की मृत्यु होती है, इसके बाद भिक्षु उनकी तलाश शुरू कर देते हैं। तिब्बती बौद्धों का मानना ​​है कि दलाई लामा का पुनर्जन्म उनकी आध्यात्मिक विरासत को जारी रखने के लिए होता है। गौरतलब हो कि मौजूदा दलाई लामा (तेनजिन ग्यात्सो) 14वें दलाई लामा हैं। छह जुलाई को 90 वर्ष के हो जाएंगे।  दलाई लामा की मृत्यु के 9 महीने बाद जन्में बच्चे को ढूंढा (How Dalai Lama’s Successor Is Chosen After His Death) जाता है बता दें कि दलाई लामा की मृत्यु के 9 महीने बाद जन्में बच्चे को ढूंढा (Dalai Lama’s Successor) जाता है। तिब्बती मान्यता के अनुसार दलाई लामा अपनी मृत्यु से पहले कुछ संकेत देते हैं। नए दलाई लामा की खोज के दौरान वरिष्ठ लामा अपने ध्यान और प्रार्थना के माध्यम से प्राप्त संकेतों को समझने की कोशिश करते हैं। वे ल्हामो लात्सो नामक पवित्र झील के किनारे ध्यान करते हैं। जहाँ उन्हें किसी गांव का नाम, दिशा या कोई विशिष्ट दृश्य जैसे संकेतों की अनुभूति होती है। इन दिव्य संकेतों के आधार पर पुनर्जन्म लेने वाले बालक की तलाश शुरू की जाती (How Dalai Lama’s Successor Is Chosen After His Death) है। यह खोज कई वर्षों तक चल सकती है। इस बीच जब किसी बच्चे पर नए दलाई लामा होने का शक जाता है, उसे सीधे सर्वोच्च पद पर नहीं बैठा दिया जाता। बल्कि उसकी कठिन परीक्षा ली जाती है। सबसे पहले वरिष्ठ लामा उसके व्यवहार पर कड़ी नजर रखते हैं। इसके बाद उसे पुराने लामा की चीजों जैसे माला, छड़ी और कपड़ों की पहचान करने के लिए दिया जाता है। अगर बच्चा सही चुनाव करता है, तो फिर उसे बौद्ध लाकर विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। इसके बाद सालों तक उसे बौद्ध धर्म, संस्कृत, तिब्बती संस्कृति और दर्शन की शिक्षा दी जाती है। दलाई लामा ने इस साल प्रकाशित अपनी किताब ‘वॉइस फॉर द वॉइसलेस’ में बताया था कि “उनका उत्तराधिकारी चीन से बाहर स्वतंत्र दुनिया में जन्म लेगा।  मैं तिब्बती बौद्ध परंपराओं के उच्च लामाओं, तिब्बती जनता और तिब्बती बौद्ध धर्म का पालन करने वाले अन्य संबंधित लोगों से परामर्श (How Dalai Lama’s Successor Is Chosen After His Death) करूंगा खैर, इस बीच तिब्बती बौद्धों के आध्यात्मिक प्रमुख दलाई लामा ने बुधवार, 2 जुलाई को इस बात की पुष्टि कर दी कि दुनिया को अगला दलाई लामा मिलेगा। दरअसल, बुधवार को दलाई लामा ने वरिष्ठ बौद्ध भिक्षुओं से मुलाकात की और उसके बाद उन्होंने अपना बयान (Dalai Lama’s Successor) जारी किया। बयान में उन्होंने यह भी बताया कि अगले दलाई लामा का चुनाव कैसे होगा। उनके बयान के मुताबिक “24 सितंबर 2011 को, तिब्बती आध्यात्मिक परंपराओं के प्रमुखों की एक बैठक में, मैंने तिब्बत के भीतर और बाहर साथी तिब्बतियों, तिब्बती बौद्ध धर्म के अनुयायियों और तिब्बत- तिब्बतियों के साथ संबंध रखने वाले लोगों के सामने एक बयान दिया था कि क्या दलाई लामा की संस्था जारी रहनी चाहिए। मैंने कहा कि “1969 में ही, मैंने स्पष्ट कर दिया था कि संबंधित लोगों को यह निर्णय लेना चाहिए कि क्या दलाई लामा का पुनर्जन्म भविष्य में भी जारी रहना चाहिए?” मैंने यह भी कहा कि “जब मैं लगभग नब्बे वर्ष का हो जाऊंगा तो मैं तिब्बती बौद्ध परंपराओं के उच्च लामाओं, तिब्बती जनता और तिब्बती बौद्ध धर्म का पालन करने वाले अन्य संबंधित लोगों से परामर्श (How Dalai Lama’s Successor Is Chosen After His Death) करूंगा, ताकि यह फिर से मूल्यांकन किया जा सके कि दलाई लामा की संस्था जारी रहनी चाहिए या नहीं?”  इसे भी पढ़ें:- मुखाग्नि से पहले क्यों किया जाता है सुहागिन स्त्री का सोलह श्रृंगार? मैं इस बात को दोहराता हूं कि गैडेन फोडरंग ट्रस्ट के पास भविष्य के पुनर्जन्म को मान्यता देने का एकमात्र अधिकार है- दलाई लामा उन्होंने आगे कहा कि “भले इस मुद्दे पर मेरी कोई सार्वजनिक चर्चा नहीं हुई है, लेकिन पिछले 14 वर्षों में तिब्बत की आध्यात्मिक परंपराओं के नेताओं, निर्वासित तिब्बती संसद के सदस्यों, विशेष आम सभा की बैठक में भाग लेने वालों, केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के सदस्यों, गैर सरकारी संगठनों, हिमालयी क्षेत्र के बौद्धों, मेनलैंड चीन, मंगोलिया, रूसी संघ के बौद्ध गणराज्यों और सहित एशिया में बौद्धों ने मुझे वजह बताते हुए पत्र लिखा है और आग्रह किया है कि दलाई लामा की संस्था जारी (Dalai Lama’s Successor) रहे। विशेष रूप से, मुझे तिब्बत में तिब्बतियों से विभिन्न चैनलों के माध्यम से यही अपील करने वाले मैसेज हुए हैं। इन सभी अनुरोधों के अनुसार, मैं पुष्टि कर रहा हूं कि दलाई लामा की संस्था जारी रहेगी। वह प्रक्रिया जिसके द्वारा आने वाले दलाई लामा को खोजा जाएगा, 24 सितंबर 2011 के मेरे बयान में स्पष्ट रूप से स्थापित की गई है। इसमें कहा गया है कि ऐसा करने की जिम्मेदारी विशेष रूप से परमपावन दलाई लामा के ऑफिस, गैडेन फोडरंग ट्रस्ट के सदस्यों की (How Dalai Lama’s Successor Is Chosen After His Death) होगी। उन्हें तिब्बती बौद्ध परंपराओं के विभिन्न प्रमुखों और विश्वसनीय शपथ-बद्ध धर्म रक्षकों से परामर्श लेना चाहिए जो दलाई लामाओं की वंशावली से अविभाज्य रूप से जुड़े हुए हैं। उन्हें पिछली परंपरा के अनुसार खोज और पहचान की प्रक्रियाओं को पूरा करना चाहिए। चयन की बात पर उन्होंने कहा कि “मैं इस बात को दोहराता हूं कि गैडेन फोडरंग ट्रस्ट के पास भविष्य के पुनर्जन्म को मान्यता… Read More

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Solah Shringar before Mukhagni

मुखाग्नि से पहले क्यों किया जाता है सुहागिन स्त्री का सोलह श्रृंगार?

भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म में जीवन के हर चरण से जुड़ी गहरी मान्यताएं और परंपराएं देखने को मिलती हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक, हर एक पड़ाव विशेष रीति-रिवाजों और विधियों से जुड़ा होता है। इन्हीं परंपराओं में एक गूढ़ और भावनात्मक परंपरा है, सुहागिन स्त्री के अंतिम संस्कार से पहले उसका ‘सोलह श्रृंगार’ (Solah Shringar) करना। यह परंपरा भले ही कई लोगों को अजीब लगती हो, लेकिन इसके पीछे न केवल धार्मिक कारण हैं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक पहलू भी छिपे हुए हैं। आइए जानते हैं कि अंतिम संस्कार से पहले सुहागिन स्त्रियों का सोलह श्रृंगार क्यों किया जाता है और इसका क्या महत्व है। क्या होता है सोलह श्रृंगार? हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए सोलह श्रृंगार (Solah Shringar) सौंदर्य और सौभाग्य का प्रतीक होता है। इसमें सिंदूर, बिंदी, काजल, चूड़ियां, बिछुए, पायल, नथ, मांग टीका, कर्णफूल, अँगूठी, हार, गजरा, आलता, कंघी, वस्त्र (साड़ी या सुहाग के रंगों में), और मेहंदी शामिल होती है। यह श्रृंगार केवल सजने-संवरने के लिए नहीं होता, बल्कि यह एक स्त्री के विवाहित जीवन की सामाजिक पहचान भी होता है। मृत्यु के बाद क्यों किया जाता है श्रृंगार? 1. अखंड सौभाग्यवती का सम्मान भारतीय परंपरा में यदि किसी महिला की मृत्यु उसके पति के जीवनकाल में होती है, तो उसे “अखंड सौभाग्यवती” कहा जाता है। यह स्थिति शुभ मानी जाती है, और ऐसी महिला को उच्च सम्मान के साथ अंतिम विदाई देने की परंपरा है। सोलह शृंगार इस बात का प्रतीक होता है कि उसने अपने वैवाहिक जीवन को पूर्णता और सौभाग्य के साथ जिया है। 2. देवी स्वरूप के रूप में विदाई भारतीय संस्कृति में नारी को देवी का रूप माना गया है, और सुहागिन महिला को विशेष रूप से मां लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। मृत्यु के समय उसे सोलह शृंगार देकर विदा करना, मानो किसी देवी को उसकी दिव्य यात्रा के लिए सजाना हो। यह परंपरा महिला के पूजनीय और शक्ति स्वरूप के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है। 3. पति के प्रति प्रेम और समर्पण की अभिव्यक्ति सोलह शृंगार (Solah Shringar) केवल सौंदर्य का प्रतीक नहीं, बल्कि स्त्री के पति के प्रति प्रेम, निष्ठा और समर्पण की भावना का प्रतीक भी होता है। माना जाता है कि यह श्रृंगार उस अटूट बंधन की याद दिलाता है, जो पति-पत्नी के बीच मृत्यु के बाद भी बना रहता है। 4. शुभता और सौभाग्य का प्रतीक जहां मृत्यु को सामान्यतः दुखद घटना माना जाता है, वहीं एक सुहागिन महिला की मृत्यु को कुछ परंपराओं में शुभता से भी जोड़ा जाता है। सोलह शृंगार के माध्यम से यह भाव व्यक्त किया जाता है कि वह स्त्री जीवन के सभी सौभाग्य लेकर जा रही है और अपने पीछे परिवार को आशीर्वाद देकर जा रही है। 5. गरिमामयी अंतिम विदाई एक सुहागिन महिला अपने जीवन के हर मांगलिक अवसर पर सजती-संवरती रही होती है। उसकी अंतिम यात्रा को भी गरिमा देने के लिए उसे उसी प्रकार से सजाया जाता है। यह उसकी आत्मा को सम्मानपूर्वक विदाई देने की एक भावपूर्ण प्रक्रिया होती है, जिसमें परिवारजन उसे प्रेम और श्रद्धा के साथ विदा करते हैं। इसे भी पढ़ें:- हारसिंगार के चमत्कारी उपाय: घर लाएं सुख, शांति और समृद्धि धार्मिक मान्यता धार्मिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो हिंदू धर्म में मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि एक नई यात्रा की शुरुआत माना गया है। ऐसा माना जाता है कि मृत आत्मा अपने रूप में शरीर को कुछ समय तक देखती है। ऐसे में यदि सुहागिन स्त्री को बिना श्रृंगार के विदा किया जाए तो उसकी आत्मा को संतोष नहीं मिलता।कुछ पौराणिक ग्रंथों और शास्त्रों में यह भी उल्लेख मिलता है कि पति के जीवित रहते हुए, उसकी पत्नी को विधवा की तरह विदा करना उचित नहीं होता। इसलिए, जब तक पति जीवित हो, स्त्री का सौभाग्य यथावत माना जाता है, भले ही उसकी मृत्यु हो चुकी हो। इसलिए उसे सौभाग्यवती के रूप में विदा किया जाता है। Latest News in Hindi Today Hindi news  #SolahShringar #MukhagniRitual #HinduTradition #SuhaginRituals #LastRitesIndia #IndianCulture #FuneralCustoms #HinduBeliefs

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Discover how Lord Krishna received his magical flute

भगवान श्रीकृष्ण को कहां से मिली थी बांसुरी? भगवान शिव से जुड़ी है यह रहस्यमयी कथा

भारतीय संस्कृति में श्रीकृष्ण (Lord Krishna) को उनके अद्वितीय व्यक्तित्व, बाल लीलाओं और मधुर बांसुरी वादन के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। श्रीकृष्ण की बांसुरी न केवल प्रेम का प्रतीक है, बल्कि यह अध्यात्म, भक्ति और सौंदर्य की चरम अभिव्यक्ति भी मानी जाती है। जब भी भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण होता है, तो उनके अधरों पर सजी बांसुरी का चित्र स्वतः ही मन में उभर आता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि भगवान कृष्ण को यह बांसुरी किसने दी थी। इसके पीछे एक अत्यंत रोचक पौराणिक कथा है जो भगवान शिव से जुड़ी हुई है। श्रीकृष्ण की बांसुरी सिर्फ प्रेम का प्रतीक नहीं, बल्कि एक दिव्य उपहार है जो स्वयं भगवान शिव ने उन्हें भेंट किया था। जानिए इस पौराणिक कथा के माध्यम से कैसे यह बांसुरी श्रीकृष्ण के जीवन का अभिन्न अंग बनी। शिव से मिली थी बांसुरी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, समय-समय पर देवी-देवताओं ने पृथ्वी पर अवतार लिया। द्वापर युग में जब भगवान विष्णु ने अपने आठवें अवतार के रूप में श्रीकृष्ण रूप में जन्म लिया, तब सभी देवता उनसे मिलने पृथ्वी पर आए। इन्हीं में से एक थे देवों के देव महादेव। उन्होंने श्रीकृष्ण से भेंट करने का निश्चय किया और यह सोचने लगे कि ऐसा कौन-सा उपहार दें जो भगवान कृष्ण को अत्यंत प्रिय हो। तभी उन्हें याद आया कि उनके पास महान तपस्वी ऋषि दधीचि की हड्डियां संरक्षित हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, ऋषि दधीचि ने धर्म की रक्षा के लिए अपने शरीर का त्याग कर हड्डियों का दान किया था। महादेव ने उन्हीं पुण्य हड्डियों से एक बांसुरी बनाई और जब वे भगवान श्रीकृष्ण (Lord Krishna) से मिलने पृथ्वी पर आए, तब उन्होंने यह दिव्य बांसुरी उन्हें भेंट की। यही वह क्षण था जब भगवान श्रीकृष्ण को बांसुरी प्राप्त हुई, जो आगे चलकर उनके जीवन का अभिन्न अंग बन गई। मान्यता है कि श्रीकृष्ण का श्रृंगार बिना बांसुरी के अधूरा माना जाता है। यही कारण है कि आज भी श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र में बांसुरी को विशेष स्थान दिया जाता है।  श्रीकृष्ण की बांसुरी सिर्फ प्रेम का प्रतीक नहीं, बल्कि एक दिव्य उपहार है। रुके कार्यों में मिलेगी सफलता यदि आप अपने करियर या व्यवसाय में तरक्की की इच्छा रखते हैं, तो घर में बांसुरी रखना एक शुभ उपाय माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, बांसुरी को घर में रखने से कार्यों में आने वाली रुकावटें दूर होती हैं और बिगड़े हुए काम भी बनते हैं। इससे साधक को जीवन के हर क्षेत्र में सकारात्मक परिणाम मिलने लगते हैं। इसलिए यदि रुके हुए कार्यों को पूर्ण करना है तो घर में बांसुरी जरूर रखें। इसे भी पढ़ें:- हारसिंगार के चमत्कारी उपाय: घर लाएं सुख, शांति और समृद्धि घर में आएंगी खुशियां और शांति यदि आपके घर में कलह या पारिवारिक तनाव का माहौल है, तो बांसुरी को घर के मंदिर में स्थापित करना लाभकारी हो सकता है। ऐसा विश्वास है कि इस उपाय को श्रद्धा और विश्वास के साथ करने से पारिवारिक तनाव कम होता है और जीवन में सुख-शांति का संचार होता है। बांसुरी सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करती है और घर के वातावरण को मधुर बनाती है। घर के मंदिर में स्थापित करने से शांति बनी रहती है।  श्रीकृष्ण के जीवन में बांसुरी का महत्व भगवान श्रीकृष्ण (Lord Krishna) की बांसुरी केवल एक वाद्य यंत्र नहीं थी, वह ब्रजवासियों के लिए मोहित करने वाली ध्वनि थी, जो राधा सहित गोपियों के मन को मंत्रमुग्ध कर देती थी। श्रीमद्भागवत और अन्य पुराणों में वर्णन आता है कि जब श्रीकृष्ण बांसुरी बजाते थे, तो पशु-पक्षी, नदी, वृक्ष, पर्वत – सभी थम जाते थे। राधा और गोपियां उनके उस मधुर स्वरूप की ओर खिंच जाती थीं, जिसमें प्रेम, करुणा और आध्यात्मिक आनंद समाया होता था। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Krishna #lordkrishna #flutestory #lordshiva #krishnabansuri #hinduism #mythologyfacts #spiritualstory #indianmythology

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Signs Hanuman Ji Is Upset With You

क्या हनुमान जी आपसे नाराज़ हैं? जानें जीवन में मिलने वाले संकेत और समाधान

सनातन धर्म में भगवान हनुमान को संकटमोचन, अजर–अमर और महाशक्तिशाली देवता माना जाता है। वे कलियुग के जीवित और साक्षात् देवता हैं, जो सच्चे मन से स्मरण करने पर तुरंत प्रसन्न हो जाते हैं। लेकिन कई बार जीवन में ऐसे हालात बन जाते हैं, जब हम अनजाने में कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं जिससे बजरंगबली की कृपा हमसे दूर हो जाती है। हनुमान जी को यदि कोई व्यक्ति नाराज कर दे, तो उसका जीवन परेशानियों से भर सकता है। आइए जानते हैं वे कौन से संकेत हैं जो बताते हैं कि कहीं आपसे हनुमान जी नाराज़ तो नहीं। अगर आपके जीवन में बार-बार आ रहे हैं संकट, असफलता और डर, तो ये हो सकते हैं बजरंगबली की नाराज़गी के संकेत। जानें किन कार्यों से होती है नाराज़गी और कैसे पाएं हनुमान जी की कृपा। ऐसे सपने आने का अर्थ सपनों में क्रोधित हनुमान जी (Lord Hanuman) या गुस्साए बंदर का दिखाई देना इस बात का संकेत हो सकता है कि पवनपुत्र आपसे प्रसन्न नहीं हैं। यदि किसी व्यक्ति को नींद में हनुमान जी रोषयुक्त रूप में नजर आते हैं या बंदर क्रोध करते हुए दिखता है, तो यह माना जाता है कि बजरंगबली किसी बात से नाराज हैं और अपने भक्त को चेतावनी दे रहे हैं। जब मिलें ये संकते अगर आपके जीवन में अचानक कलह बढ़ जाए, घर में बार-बार झगड़े हों या लगातार आर्थिक हानि होने लगे, तो यह संकेत हो सकते हैं कि हनुमान जी की कृपा आपसे दूर हो गई है। इसी तरह यदि बार-बार आपके कामों में अड़चनें आने लगें और सफलता दूर हो जाए, तो यह भी बजरंगबली (Lord Hanuman) की नाराजगी का इशारा माना जाता है। ऐसे समय में आपको पूरी श्रद्धा के साथ हनुमान जी से क्षमा याचना करनी चाहिए और नियमपूर्वक उनकी पूजा व हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए। ऐसे काम जो बजरंगबली को कर सकते हैं नाराज अक्सर लोग यह सोचते हैं कि आखिर ऐसा क्या होता है जिससे बजरंगबली रुष्ट हो जाते हैं। दरअसल, कई बार इंसान अनजाने में या जानबूझकर ऐसी गलतियां कर बैठता है, जो हनुमान जी की साधना में बाधक होती हैं। हनुमान जी के भक्तों के लिए सात्विक जीवनशैली और ब्रह्मचर्य का पालन अत्यंत आवश्यक माना गया है। यदि कोई इन नियमों की अवहेलना करता है, तो पवनपुत्र की कृपा उससे दूर हो सकती है और वे अप्रसन्न हो सकते हैं। यदि आप मंगलवार का व्रत रखते हैं तो इस दिन भूलवश भी नमक का सेवन न करें। साथ ही, मंगलवार को मांसाहार या मदिरा जैसी चीजों से पूरी तरह परहेज करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से हनुमान जी की अप्रसन्नता का सामना करना पड़ सकता है। इसके बजाय प्रतिदिन श्रद्धा के साथ हनुमान चालीसा का पाठ करें और अपने व्यवहार में विनम्रता व सद्भाव बनाए रखें, ताकि पवनपुत्र की कृपा आप पर बनी रहे। इसे भी पढ़ें:- हारसिंगार के चमत्कारी उपाय: घर लाएं सुख, शांति और समृद्धि हनुमान जी को प्रसन्न करने के उपाय 1. हनुमान चालीसा का पाठ करें प्रतिदिन हनुमान चालीसा का श्रद्धा भाव से पाठ करें। विशेष रूप से मंगलवार और शनिवार को इसका विशेष महत्व होता है। 2. सुंदरकांड का पाठ यदि आप पर कोई विशेष संकट है, तो सुंदरकांड का पाठ करें। यह सभी बाधाओं को दूर करने वाला माना गया है। 3. हनुमान मंदिर में सेवा करें हनुमान जी (Lord Hanuman) के मंदिर में जाकर साफ-सफाई करना, दीप जलाना और राम नाम का जाप करना उनके कृपापात्र बनने का श्रेष्ठ उपाय है। 4. लाल वस्त्र और सिंदूर अर्पित करें हनुमान जी (Lord Hanuman) को सिंदूर, चमेली का तेल और लाल पुष्प बहुत प्रिय हैं। इन्हें अर्पित करने से वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं और इससे पवनपुत्र की कृपा आप पर बनी रहती है। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Hanuman #HanumanJi #SpiritualRemedies #HinduBeliefs #DivineSigns #Bhakti #HanumanBhakt #LifeObstacles #Spirituality #Remedies #Devotion

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