Jagannath Rath Yatra 2025

जगन्नाथ रथ यात्रा 2025: इंद्रद्युम्न सरोवर से आएगा पवित्र जल, गुंडिचा मंदिर में होगी विशेष सफाई

पुरी में होने वाली भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा से पहले, गुंडिचा मंदिर की सफाई के लिए लाया जाएगा इंद्रद्युम्न सरोवर का जल। यह परंपरा चैतन्य महाप्रभु की गुंडिचा मरजना लीला से जुड़ी है, जो भक्तों को आत्मशुद्धि और सेवा का संदेश देती है। हर वर्ष पुरी में भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath), बलभद्र एवं देवी सुभद्रा की भव्य रथ यात्रा आयोजित की जाती है। इसके पहले, यात्रा की पवित्रता  शुभारंभ सुनिश्चित करने के लिए गुंडिचा मंदिर की सफाई के समय इंद्रद्युम्न सरोवर से जल लाया जाता है। यह केवल एक पवित्र अनुष्ठान नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और पुरातात्विक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। राजा इंद्रद्युम्न द्वारा मूर्तियों की स्थापना प्राचीन काल में मलवा क्षेत्र के राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के गहरे भक्त थे। एक रात उन्हें स्वप्न में भगवान विष्णु के दर्शन हुए और भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों की स्थापना का आदेश मिला। इसके पश्चात, राजा इंद्रद्युम्न ने पुरी में भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों की स्थापना करवाई। मान्यता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर देह त्यागा, तब उनका अंतिम संस्कार किया गया, लेकिन उनका हृदय अग्नि में भी नहीं जला। इसे पांडवों ने एक नदी में प्रवाहित कर दिया। बाद में यह दिव्य ब्रह्म पदार्थ एक लकड़ी के लठ्ठे के रूप में राजा इंद्रद्युम्न को प्राप्त हुआ। उन्होंने इसी ब्रह्म तत्व को भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों में प्रतिष्ठित किया। यह ब्रह्म तत्व आज भी परंपरा के अनुसार पुरानी मूर्तियों से निकालकर नई मूर्तियों में प्रतिष्ठापित किया जाता है जब मूर्तियों का नवीनीकरण होता है। भगवान विष्णु ने दिया था राजा इंद्रद्युम्न को विशेष वरदान ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु ने राजा इंद्रद्युम्न को एक दिव्य वरदान दिया था। उन्होंने कहा था कि, “मैं हर वर्ष तुम्हारे द्वारा स्थापित इस तीर्थ के समीप निवास करूंगा। जो भी श्रद्धालु विधिपूर्वक इस तीर्थ में स्नान करेगा और सात दिनों तक भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath), बलभद्र और माता सुभद्रा के दर्शन करेगा, उसे मेरी विशेष कृपा प्राप्त होगी।” यह वरदान न केवल इस तीर्थ की महत्ता को दर्शाता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि आज तक यहां की धार्मिक परंपराएं क्यों इतनी जीवंत और महत्वपूर्ण बनी हुई हैं। इसे भी पढ़ें:- हारसिंगार के चमत्कारी उपाय: घर लाएं सुख, शांति और समृद्धि इंद्रद्युम्न सरोवर का पौराणिक महत्व इंद्रद्युम्न सरोवर की पवित्रता के पीछे एक ऐतिहासिक और धार्मिक कथा जुड़ी है। मान्यता है कि राजा इंद्रद्युम्न ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया था, जिसमें उन्होंने हजारों गायें ब्राह्मणों को दान में दीं। इन गायों को जिस स्थान पर बांधा गया था, वहां उनके खुरों से ज़मीन में गहरे गड्ढे बन गए। समय के साथ ये गड्ढे जल से भर गए और एक सरोवर का रूप ले लिया। इस सरोवर में जमा हुआ जल और गोमूत्र इतना पवित्र माना गया कि राजा इंद्रद्युम्न ने अपने अश्वमेध यज्ञ में इसी जल का उपयोग किया। तभी से यह सरोवर एक तीर्थ की तरह पूज्य माना जाने लगा। इतना ही नहीं, एक बार रथ यात्रा से पूर्व जब गुंडिचा मंदिर को शुद्ध करना था, तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने इसी सरोवर से जल मंगवाकर मंदिर की पवित्रता का कार्य करवाया। तब से यह परंपरा चलती आ रही है और आज भी हर वर्ष रथ यात्रा से पहले गुंडिचा मंदिर की शुद्धि के लिए इसी सरोवर का जल प्रयोग में लाया जाता है। गुंडिचा मंदिर की सफाई गुंडिचा मंदिर, जहां रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath) परमपूज्य रूप से विराजमान रहते हैं, की सफाई रथ यात्रा से एक दिन पहले की जाती है। इसे ‘गुंडिचा मरजना’ कहा जाता है। इस अनुष्ठान के दौरान इंद्रद्युम्न सरोवर से जल लेकर मंदिर की सफाई की जाती है। चैतन्य महाप्रभु स्वयं यह कार्य करते थे, वे कई पात्रों में जल लेकर मंदिर को धोते, भजन, कीर्तन करते और मंदिर परिसर को पूरी भक्ति से शुद्ध करते थे। उनके काल में यह जल भक्तों को भी शेयर किया जाता था—कहीं छपते धूल से, कहीं चैतन्य महाप्रभु की भक्ति-आँसुओं से । Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Jagannath #jagannathrathyatra2025 #indradyumnalake #gundichatemple #purirathyatra #odishafestival #rathyatraupdates

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Baba Vanga predictions

बाबा वेंगा: एक अंधी महिला जिसकी रहस्यमयी भविष्यवाणियां आज भी कर रही हैं हैरान

बुल्गारिया की भविष्यवक्ता बाबा वेंगा ने विश्व की कई बड़ी घटनाओं की भविष्यवाणी की थी, जिनमें से कई सच साबित हुई हैं। जानिए कौन थीं ये दिव्य दृष्टि वाली महिला और कैसे उनकी बातों को आज भी लोग मानते हैं भविष्य का संकेत। विश्व में कई रहस्यमयी हस्तियों ने अपनी भविष्यवाणियों के जरिए लोगों को चौंकाया है, लेकिन जब बात बाबा वेंगा (Baba Vanga) की होती है, तो उनका नाम हमेशा सबसे ऊपर आता है। ये एक ऐसी भविष्यवक्ता थीं, जिनकी कई भविष्यवाणियां आज तक सच साबित हो चुकी हैं। उनके अनुयायी आज भी यह मानते हैं कि वे दिव्य दृष्टि से युक्त थीं और उन्होंने विश्व के भविष्य को पहले ही देख लिया था। कौन थीं बाबा वेंगा? बाबा वेंगा (Baba Vanga) का वास्तविक नाम वांगेलिया पांडेवा दिमित्रोवा था और उनका जन्म 31 जनवरी 1911 को बुल्गारिया में हुआ था। उनका शुरुआती जीवन साधारण था, लेकिन 12 वर्ष की उम्र में आए एक भयंकर तूफान ने उनकी पूरी जिंदगी की दिशा ही बदल दी। उस तूफान के दौरान उनकी आंखों में रेत चली गई, जिससे वे पूरी तरह से नेत्रहीन हो गईं।कहा जाता है कि अंधत्व के बाद उन्हें दिव्य ज्ञान की  प्राप्ति हुई और वे भविष्य को देखने की शक्ति प्राप्त कर बैठीं। उनके अनुयायियों का मानना है कि वे न केवल मनुष्यों का भाग्य बता सकती थीं, बल्कि आने वाले वैश्विक संकटों, आपदाओं और घटनाओं की भी भविष्यवाणी करती थीं। बाबा वेंगा की प्रमुख भविष्यवाणियां यह माना जाता है कि बाबा वेंगा (Baba Vanga) की कई भविष्यवाणियां अब तक सच साबित हो चुकी हैं। इनमें द्वितीय विश्व युद्ध की भविष्यवाणी, सोवियत संघ के विघटन, 9/11 का आतंकी हमला, प्रिंसेस डायना की मृत्यु और 2004 में हिंद महासागर में आई विनाशकारी सुनामी जैसी घटनाएं शामिल हैं।इन घटनाओं की सटीक भविष्यवाणी ने पूरी दुनिया को हैरानी में डाल दिया था। वहीं, साल 2025 को लेकर जापान के एक अन्य भविष्यवक्ता बाबा वेंगा रियो तत्सुकी ने आशंका जताई है कि इस वर्ष जापान किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा का सामना कर सकता है। वर्तमान समय में प्रासंगिकता बाबा वेंगा ने भविष्य के वर्षों को लेकर कई चौंकाने वाली भविष्यवाणियां की हैं। उनकी एक भविष्यवाणी के अनुसार, आने वाले समय में एक ऐसा वायरस सामने आएगा, जो लोगों की उम्र को असामान्य रूप से तेजी से बढ़ाने लगेगा। यह वायरस लोगों को कम उम्र में ही बुढ़ापे की अवस्था में पहुंचा देगा, जिससे युवावस्था में ही बुजुर्गों जैसी बीमारियां होने लगेंगी। बाबा वेंगा के अनुसार, वर्ष 2084 से पृथ्वी पर प्रकृति में बड़े बदलाव शुरू होंगे और प्रकृति स्वयं को फिर से पुनर्जीवित करने लगेगी। लेकिन 2088 तक एक जानलेवा वायरस का आगमन होगा, जो उम्र बढ़ाने की गति को अत्यंत तेज कर देगा। यह वायरस 2097 तक सक्रिय रहेगा, जिसके बाद इसका अंत हो जाएगा। इसके बाद 2111 तक मानव शरीर में तकनीकी बदलाव इतनी तेजी से होंगे कि लोग रोबोट जैसे व्यवहार करने लगेंगे। इस भविष्यवाणी की झलक हिन्दू धर्मग्रंथों (Baba Vanga) में भी देखी जा सकती है। विष्णु पुराण में कहा गया है कि जैसे-जैसे कलियुग आगे बढ़ेगा, मनुष्य की आयु घटती जाएगी। यह भी उल्लेख है कि कलियुग के अंतिम चरण में पुरुष मात्र 9-10 वर्ष की उम्र में और महिलाएं 6-7 वर्ष की आयु में ही संतान प्राप्त करने में सक्षम हो जाएंगी। इसे भी पढ़ें:- हारसिंगार के चमत्कारी उपाय: घर लाएं सुख, शांति और समृद्धि  कम उम्र में ही लोगों के बाल सफेद होने लगेंगे धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कम उम्र में ही लोगों के बाल सफेद होने लगेंगे, आंखों की बनावट छोटी हो जाएगी और देखने की क्षमता कमजोर पड़ जाएगी। इसके अलावा, व्यक्ति की लंबाई भी सामान्य से काफी कम हो जाएगी। विष्णु पुराण में यह भी बताया गया है कि कलियुग में लोग शरीर पर अलग-अलग चिन्ह और टैटू बनवाने लगेंगे, जिसका प्रभाव उनकी आयु और शरीर पर साफ दिखेगा। इस प्रकार बाबा वेंगा की भविष्यवाणियां और हिन्दू धर्मग्रंथों की भविष्य दृष्टि दोनों ही आने वाले समय को लेकर गंभीर संकेत देते हैं, जो विज्ञान, स्वास्थ्य और मानव शरीर पर गहरा प्रभाव डाल सकते हैं। Latest News in Hindi Today Hindi news Baba Vanga #babaVanga #predictions2025 #blindprophet #mysticwoman #futurevisions #babaVangaTruth #prophecies

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Baba Barfani Appears from Ice

बर्फ से प्रकट हुए भोलेनाथ: किस भाग्यशाली को सबसे पहले हुए बाबा बर्फानी के दर्शन?

हिंदू धर्म में भगवान शिव (Lord Shiva) के रूप को लेकर कई रहस्यमयी और चमत्कारी कथाएं प्रचलित हैं। उन्हीं में से एक है बाबा बर्फानी, यानी अमरनाथ धाम में स्थित बर्फ से निर्मित स्वयंभू शिवलिंग की अद्भुत महिमा। हर साल लाखों श्रद्धालु कठिन पर्वतीय मार्गों को पार कर इस चमत्कारी गुफा तक पहुंचते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस गुफा के बारे में सबसे पहले किसने जाना था? किस भाग्यशाली को भगवान शिव के बर्फ से बने इस अद्भुत रूप के सबसे पहले दर्शन हुए थे? इस सवाल का जवाब जितना रहस्यमय है, उतनी ही प्रेरणादायक है उससे जुड़ी प्राचीन कथा। सदियों पुरानी यह कथा बताती है कि कैसे एक साधारण गड़रिये को अमरनाथ की रहस्यमयी गुफा और स्वयंभू शिवलिंग के पहले दर्शन हुए। जानिए उस अद्भुत खोज की पूरी कहानी, जिसने एक तीर्थस्थल को जन्म दिया। अमरनाथ यात्रा का महत्व​ अमरनाथ यात्रा (AmarnathYatra) के दौरान श्रद्धालु हर साल लाखों श्रद्धालु कठिन पर्वतीय मार्गों को पार कर इस चमत्कारी गुफा तक पहुंचते हैं और बाबा बर्फानी के दर्शन करते हैं। बड़ी बात यह कि जहां यह पवित्र शिवलिंग प्राकृतिक रूप से हिम से स्वयं उत्पन्न होता है। यह शिवलिंग अमरनाथ गुफा के भीतर स्थित है। गौर करने वाली बात यह कि इसकी आकृति चंद्रमा के घटने-बढ़ने के अनुसार बदलती रहती है। आपको बता दें कि अमरनाथ गुफा को ‘अमरेश्वर’ भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि यहां दर्शन करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस गुफा में हिम से केवल शिवलिंग ही नहीं, बल्कि माता पार्वती और भगवान गणेश की आकृति भी बनती है, जिससे यह स्थान हिंदू आस्था का अत्यंत पावन और विशिष्ट तीर्थ बन जाता है। कारण यही लोग देश के कोने कोने से लाखों श्रद्धालु दर्शन करने हेतु यहाँ पहुँचते हैं।   सबसे पहले दर्शन किसे हुए थे? ऐसे में बड़ा सवाल यह कि इस गुफा सबसे पहले दर्शन किसे हुए थे? तो पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अमरनाथ गुफा के सबसे पहले दर्शन महर्षि भृगु ने किए थे। एक कथा के अनुसार जब कभी कश्मीर की घाटी पूरी तरह जलमग्न होने वाली थी, तब महर्षि कश्यप ने नदियों और झीलों के माध्यम से पानी को बाहर निकालने का प्रयास किया। उसी समय महर्षि भृगु हिमालय क्षेत्र की यात्रा पर निकले हुए थे और उन्हें एक शांत स्थान की तलाश थी जहां वे ध्यान और तपस्या कर सकें। इस खोज में वे अमरनाथ (AmarnathYatra) की गुफा तक पहुंचे, जहां उन्हें हिम से निर्मित भगवान शिव (Lord Shiva) के स्वरूप बाबा बर्फानी के दर्शन हुए। तभी से यह गुफा एक पवित्र तीर्थ स्थल के रूप में प्रसिद्ध हो गई और आज भी हर वर्ष हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं। इसे भी पढ़ें:- रुद्राक्ष पहनने पर भी नहीं मिल रहा लाभ? हो सकती हैं ये आम गलतियां अन्य लोककथा  एक अन्य लोककथा के मुताबिक, अमरनाथ गुफा का पहला दर्शन लगभग 15वीं सदी में बूटा मलिक नाम के एक चरवाहे ने किया था। मान्यता है कि एक दिन बूटा मलिक को एक साधु मिला, जिसने उसे कोयलों से भरा एक थैला दिया। जब वह अपने घर पहुंचा और थैला खोला, तो कोयलों की जगह उसमें सोने के सिक्के निकले। यह देखकर वह आश्चर्यचकित हो गया और उस साधु की खोज में वापस गया। उसी दौरान वह अमरनाथ की गुफा तक पहुंचा, जहां उसे हिम से निर्मित शिवलिंग के दर्शन हुए। ऐसा माना जाता है कि तभी से अमरनाथ यात्रा (AmarnathYatra) की परंपरा शुरू हुई। इसके अलावा, ‘राजतरंगिणी’ जैसे प्राचीन ग्रंथों में भी अमरेश्वर शिवलिंग का उल्लेख मिलता है। इन उल्लेखों के अनुसार, 11वीं शताब्दी में कश्मीर की रानी सूर्यमती ने अमरनाथ मंदिर में त्रिशूल और अन्य पवित्र चिह्न अर्पित किए थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि अमरनाथ गुफा का धार्मिक महत्व प्राचीन काल से ही रहा है। अमरनाथ गुफा के दर्शन कर भक्तगण खुद को धन्य समझते हैं।  Latest News in Hindi Today Hindi news AmarnathYatra #bababarfani, #amarnathyatra2025, #lordshiva, #icelingam, #divinedarshan, #amarnathcave, #shivlingappearance

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Birth of Maa Durga

मां दुर्गा का जन्म: अधर्म के अंत और धर्म की स्थापना की दिव्य गाथा

हिंदू धर्म में देवी दुर्गा को शक्ति, साहस, और धर्म की रक्षक के रूप में पूजा जाता है। उनका जन्म केवल एक देवी के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी शक्ति के रूप में हुआ था जो सृष्टि से अधर्म और असुरता को समाप्त करने के लिए अवतरित हुईं। मां दुर्गा का जन्म एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और दार्शनिक संदेश है- जब अधर्म अपने चरम पर होता है, तब सृष्टि में संतुलन स्थापित करने के लिए देवी (मां दुर्गा) स्वयं प्रकट होती हैं। राक्षसों के अत्याचार से त्रस्त देवताओं ने जब कोई उपाय न देखा, तब सभी देवताओं की शक्तियों से जन्मी महाशक्ति देवी दुर्गा। नौ दिनों के भीषण युद्ध के बाद देवी ने महिषासुर का वध कर सृष्टि में पुनः शांति स्थापित की। महिषासुर वध की कथा: देवी दुर्गा का दिव्य जन्म हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, एक बार रंभासुर नामक राक्षस ने एक महिषी (भैंस रूपी स्त्री) से विवाह किया। उनके पुत्र का नाम पड़ा महिषासुर, जिसका अर्थ है “भैंस का पुत्र”। जन्म से ही वह अलौकिक शक्तियों से युक्त था। जैसे-जैसे वह बड़ा हुआ, उसने राक्षसों का राजा बनना तय किया और अमरता प्राप्त करने के लिए ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने हेतु कठोर तपस्या शुरू कर दी। महिषासुर ने वर्षों तक एक पैर पर खड़े होकर तप किया। उसकी तपस्या की शक्ति तीनों लोकों तक फैल गई। अंततः ब्रह्मा जी उसके सामने प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा। महिषासुर ने कहा, “मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि मुझे कोई पुरुष या देवता न मार सके, केवल कोई स्त्री ही मेरा वध कर सके।” ब्रह्मा जी ने यह वरदान दे दिया। वरदान पाकर महिषासुर अहंकारी हो गया और देवताओं पर हमला कर दिया। देवताओं के सारे अस्त्र-शस्त्र उसकी ताकत के सामने बेअसर साबित हुए। उसने इंद्रलोक पर अधिकार कर लिया और स्वयं को तीनों लोकों का स्वामी घोषित कर दिया। इससे संपूर्ण सृष्टि में भय का माहौल छा गया। जब देवी दुर्गा अमरावती पहुंचीं, तो उनके गर्जन से पर्वत हिल गए देवताओं ने ब्रह्मा, विष्णु और महादेव के साथ मिलकर एक स्त्री शक्ति की रचना की, जिसमें सभी देवताओं की शक्तियों का समावेश था। इसी शक्ति से देवी दुर्गा का जन्म हुआ। उन्हें शक्तिशाली अस्त्र-शस्त्रों से सज्जित किया गया और हिमालय ने उन्हें शेर की सवारी दी। जब देवी दुर्गा अमरावती पहुंचीं, तो उनके गर्जन से पर्वत हिल गए। महिषासुर ने इसे मजाक समझा और विवाह का प्रस्ताव भिजवाया। देवी ने उत्तर दिया, “मैं महादेवी हूं और महादेव मेरे पति हैं। मैं तुम्हें चेतावनी देती हूं कि अमरावती छोड़ दो, अन्यथा मैं तुम्हारा विनाश करूंगी।” क्रोधित होकर महिषासुर ने अपने योद्धाओं को भेजा, लेकिन देवी ने सभी को पराजित कर दिया। अंत में खुद महिषासुर देवी से युद्ध करने आया। नौ दिनों तक युद्ध चला, जिसमें महिषासुर बार-बार रूप बदलता रहा- कभी शेर, कभी हाथी, और अंत में भैंस बन गया। लेकिन देवी ने अंततः उसे चक्र से काट कर मार डाला। इसी तरह देवी दुर्गा ने महिषासुर के आतंक से तीनों लोकों को निजात दिलाई। तभी से उन्हें ‘महिषासुर मर्दिनी’ के नाम से जाना जाता है और नवरात्रि के नौ दिनों तक उनकी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इसे भी पढ़ें:- रुद्राक्ष पहनने पर भी नहीं मिल रहा लाभ? हो सकती हैं ये आम गलतियां देवी दुर्गा का दिव्य स्वरूप मां दुर्गा का रूप अद्वितीय और अतुलनीय था। उनका शरीर सभी देवताओं के तेज से निर्मित था। भगवान शिव ने उन्हें त्रिशूल दिया, विष्णु ने चक्र, अग्नि देव ने शक्ति, वायु देव ने धनुष और बाण, इंद्र ने वज्र, यम ने गदा और वरुण ने शंख प्रदान किया। सारा ब्रह्मांड उनकी शक्ति और सौंदर्य से चमत्कृत था। देवी दुर्गा सिंह पर सवार होकर युद्ध भूमि में पहुंचीं और महिषासुर से भीषण संग्राम किया। नौ दिनों तक चले इस युद्ध के अंत में, मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया।  दुर्गा का नाम और स्वरूप ‘दुर्गा’ शब्द का अर्थ है- जो कष्टों और संकटों का नाश करती हैं। उन्हें त्रिनेत्रधारी, दशभुजा और शक्तिस्वरूपा के रूप में जाना जाता है। उनके नौ रूप: शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री, नवरात्रि के नौ दिनों में पूजे जाते हैं। Latest News in Hindi Today Hindi news मां दुर्गा #maaDurga #birthOfDurga #endOfEvil #riseOfDharma #shakti #hinduMythology #navratri

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हर किसी को उपहार में न दें भगवद् गीता

हर किसी को उपहार में न दें भगवद् गीता, वरना हो सकता है आध्यात्मिक अनादर

भगवद् गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि आत्मबोध और कर्म का गूढ़ ज्ञान है। इसलिए इसे उपहार में देने से पहले यह समझना जरूरी है कि क्या सामने वाला व्यक्ति इसके महत्व और मर्यादा को समझता है या नहीं। हिंदू धर्मग्रंथों में श्रीमद् भगवद् गीता (Bhagavad Gita) को अत्यंत पवित्र और गूढ़ ग्रंथ माना गया है। यह ग्रंथ न केवल जीवन के कर्म-सिद्धांतों को समझाता है, बल्कि व्यक्ति को धर्म, कर्तव्य और मोक्ष के मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी देता है। भगवद् गीता वह दिव्य संवाद है जो स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को दिया था, और जो आज भी हर जीवन की दिशा तय करने में सक्षम है। शास्त्रों के अनुसार भगवद् गीता को यूं ही किसी को भी उपहार में देना उचित नहीं माना जाता अक्सर देखा जाता है कि लोग धार्मिक भावनाओं से प्रेरित होकर भगवद् गीता (Bhagavad Gita) को गिफ्ट के रूप में दे देते हैं। कोई परीक्षा पास करता है, नया व्यवसाय शुरू करता है, नया घर लेता है या कोई धार्मिक कार्य होता है इन अवसरों पर गीता देना सामान्य परंपरा बन गई है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि शास्त्रों के अनुसार भगवद् गीता को यूं ही किसी को भी उपहार में देना उचित नहीं माना जाता? जी हां, इसके पीछे आध्यात्मिक और कर्म के गहरे सिद्धांत जुड़े हुए हैं। इन चीज़ों का दान सोच-समझकर करें स्कंद पुराण में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि अपात्र को दान देना वर्जित माना गया है। सरल शब्दों में कहा जाए तो भगवद् गीता, रामायण, वेद, पुराण जैसे पवित्र ग्रंथ या देवी-देवताओं की मूर्तियां और तस्वीरें उन लोगों को नहीं देनी चाहिए जो इनकी उचित देखभाल न कर सकें या जो इनका सम्मानपूर्वक उपयोग न कर पाएं। भगवद् गीता (Bhagavad Gita) और भगवान की मूर्ति अत्यंत पूजनीय मानी जाती हैं, इसलिए इन्हें केवल उन्हीं व्यक्तियों को उपहार में देना चाहिए जो धार्मिक, सात्विक प्रवृत्ति के हों और जिनका आचरण शुद्ध हो। विशेष रूप से यह ध्यान रखना चाहिए कि वह व्यक्ति मांस और मदिरा का सेवन न करता हो, क्योंकि ऐसी आदतें भगवान के प्रति अनादर मानी जाती हैं। धार्मिक मान्यता है कि भगवान ऐसे स्थान पर निवास नहीं करते जहाँ राक्षसी प्रवृत्ति या अपवित्रता का वातावरण हो। क्यों नहीं देना चाहिए गीता हर किसी को? धार्मिक ग्रंथों जैसे स्कंद पुराण आदि में दान की महत्ता का विस्तार से वर्णन मिलता है। उपहार देना भी एक प्रकार का पुण्य कर्म माना गया है, लेकिन धार्मिक ग्रंथों जैसे भगवद् गीता (Bhagavad Gita) को गिफ्ट में देना हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं होता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि जिसे दिया जा रहा है वह व्यक्ति कैसा है। यदि वह धार्मिक प्रवृत्ति का, सत्कर्म करने वाला और भगवान के प्रति श्रद्धा रखने वाला हो, तो उसे भगवद् गीता, देवी-देवताओं की मूर्तियां या धार्मिक पुस्तकें भेंट करना उचित और फलदायक माना जाता है। इसे भी पढ़ें:- रुद्राक्ष पहनने पर भी नहीं मिल रहा लाभ? हो सकती हैं ये आम गलतियां किस अवसर पर दें भगवद् गीता? समझें सही समय और महत्व कॉलेज में प्रवेश या नई शिक्षा की शुरुआत: युवा मन को सही दिशा और सोच देने के लिए गीता का ज्ञान अत्यंत उपयोगी होता है। क्या करें अगर किसी को देना हो गीता? यदि आप किसी को भगवद् गीता (Bhagavad Gita) देना चाहते हैं, तो पहले यह सुनिश्चित करें कि वह व्यक्ति इसके महत्व को समझता हो और उसका आदर करता हो। साथ ही गीता के साथ यह भी समझाएं कि यह ग्रंथ केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और जीवन सुधार का साधन है। इसके साथ गीता का उद्देश्य, भाव और उपयोग का तरीका बताना अत्यंत आवश्यक है। Latest News in Hindi Today Hindi news Bhagavad Gita #bhagavadgita #spiritualawareness #hinduscriptures #gifttips #spiritualrespect

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Discover how Harsingar can bring happines

हारसिंगार के चमत्कारी उपाय: घर लाएं सुख, शांति और समृद्धि

भारतवर्ष में अनेक फूलों को धार्मिक, आयुर्वेदिक और वास्तुशास्त्र में विशेष स्थान प्राप्त है। इन्हीं में से एक है हारसिंगार (Harsingar), जिसे पारिजात या शैफालिका के नाम से भी जाना जाता है। पारिजात यानी हारसिंगार का पौधा न केवल आयुर्वेद में गुणकारी है, बल्कि धार्मिक दृष्टि से भी इसका महत्व अत्यधिक है। जानिए इससे जुड़े कुछ ऐसे सरल उपाय जो दूर कर सकते हैं जीवन की कई परेशानियां। यह फूल न केवल अपनी सुंदरता और सुगंध के लिए जाना जाता है, बल्कि इसके आध्यात्मिक और औषधीय गुण भी इसे विशेष बनाते हैं। आइए जानते हैं हारसिंगार से जुड़े कुछ ऐसे चमत्कारी उपाय, जो आपकी कई तरह की परेशानियों को दूर कर सकते हैं। हारसिंगार का पौधा घर में लगाने से क्या होते हैं लाभ? वास्तु शास्त्र के अनुसार, हारसिंगार (Harsingar) का पौधा घर के उत्तर-पूर्व दिशा में लगाना शुभ माना जाता है। ऐसा करने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और घर में सुख-शांति बनी रहती है। यह पौधा घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और देवी-देवताओं की कृपा बनी रहती है। हरसिंगार से कार्यक्षेत्र में मिलेगी तरक्की नौकरी या व्यापार में सफलता पाने के लिए हरसिंगार (Harsingar) के फूलों को विशेष रूप से प्रभावशाली माना गया है। मान्यता है कि यदि हरसिंगार के 21 फूल लेकर उन्हें लाल कपड़े में बांधकर घर या व्यापार स्थल के पूजा स्थान पर माता लक्ष्मी के समीप रखा जाए, तो इससे व्यापार में प्रगति होती है और नौकरी में भी बेहतर अवसर प्राप्त होते हैं। यह उपाय न केवल करियर में सकारात्मक बदलाव लाता है, बल्कि यदि कोई रुकावट या समस्या आ रही हो, तो उसे भी दूर करने में मदद करता है। आर्थिक तंगी से छुटकारा पाने के लिए उपाय यदि कोई व्यक्ति आर्थिक तंगी या पैसों की कमी से जूझ रहा है, तो हरसिंगार (Harsingar) से जुड़ा यह उपाय लाभकारी सिद्ध हो सकता है। इसके लिए हरसिंगार के पौधे की जड़ का एक छोटा-सा टुकड़ा लें और उसे घर में उस स्थान पर रखें जहां आप धन-संपत्ति या पैसे रखते हैं। ऐसा करने से धीरे-धीरे आर्थिक समस्याएं कम होने लगती हैं और घर में धन की स्थिरता आने लगती है। विवाह में आ रही बाधाएं होंगी दूर यदि किसी व्यक्ति के विवाह में लगातार रुकावटें आ रही हैं, तो पारिजात से जुड़ा यह सरल उपाय लाभकारी हो सकता है। मंगलवार के दिन पारिजात के फूलों को हल्दी की गांठ के साथ नारंगी कपड़े में बांध लें और इसे अपने घर के मंदिर में माता गौरी की प्रतिमा या चित्र के सामने अर्पित करें। ऐसा विधिपूर्वक करने से विवाह की संभावनाएं मजबूत होती हैं और शीघ्र विवाह के योग बनने लगते हैं। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय नौकरी में तरक्की पाने के लिए करें हरसिंगार का यह उपाय अगर लगातार प्रयासों के बावजूद भी नौकरी में पदोन्नति (Harsingar) नहीं मिल रही है, तो मंगलवार के दिन यह उपाय लाभकारी हो सकता है। हरसिंगार के फूलों का एक गुच्छा लें और उसे लाल कपड़े में सावधानीपूर्वक लपेटकर माता लक्ष्मी के मंदिर में अर्पित करें। हरसिंगार से जुड़ी धार्मिक मान्यता जहां सामान्यतः किसी भी फूल के जमीन पर गिरने के बाद उसे पूजा में उपयोग नहीं किया जाता, वहीं हरसिंगार के फूलों को विशेष महत्व प्राप्त है। केवल वे फूल जो अपने आप पेड़ से टूटकर गिरते हैं, पूजा के लिए स्वीकार्य माने जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हरसिंगार का जन्म समुद्र मंथन के दौरान हुआ था और इंद्रदेव ने इसे स्वर्गलोक में स्थापित किया था। इसी वजह से इसे स्वर्ग से धरती पर आया एक पवित्र और दिव्य पौधा माना जाता है। ऐसा भी कहा जाता है कि जिस घर में हरसिंगार का पौधा होता है, वहां माँ लक्ष्मी का स्थायी वास बना रहता है और उस घर में सुख-शांति तथा समृद्धि बनी रहती है। Latest News in Hindi Today Hindi news Harsingar #harsingar #spiritualplant #vastutips #peaceandprosperity #miracleplant #naturalremedies

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Explore why Lord Jagannath's idol is incomplete

रहस्यपूर्ण मूर्ति और रथ यात्रा की आस्था: क्यों भगवान जगन्नाथ की मूर्ति अधूरी है?

इस वर्ष रथ यात्रा शुक्रवार 27 जून 2025 को पुरी (ओड़िशा, भारत) में बड़े ही भव्य और पारंपरिक तरीके से आयोजित की जाएगी। नगरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर से प्रभु जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन देवी शुभद्रा को विशाल, सजधज वाले रथों पर बैठाकर लगभग 3 किमी दूर गुँडिचा मंदिर तक ले जाया जाता है। यह यात्रा श्रद्धा और भक्ति का ऐसा प्रतीक है, जिसमें हजारों भक्त रथ खींचने और प्रभु के दर्शन करने का सौभाग्य पाते हैं ।  क्यों अधूरी मूर्तियों की मानवरचना? पौराणिक कथाओं के अनुसार, पुरी के राजा इंद्रद्युम्न को एक रात स्वप्न में भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath) ने दर्शन दिए और कहा कि उन्हें समुद्र किनारे एक विशेष लकड़ी का लट्ठा मिलेगा, जिससे उन्हें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियाँ बनवानी होंगी। इसके लिए देवताओं ने विश्वकर्मा से प्रार्थना की कि वे इन दिव्य मूर्तियों का निर्माण करें। विश्वकर्मा एक सामान्य कारीगर के रूप में राजा के दरबार में आए और मूर्तियों को गुप्त रूप से बनाने की एक शर्त रखी, जब तक मूर्तियाँ पूरी तरह से बनकर तैयार न हो जाएं, तब तक कोई भी व्यक्ति कमरे में प्रवेश नहीं करेगा। राजा ने इस शर्त को स्वीकार कर लिया। जैसे ही राजा ने भीतर प्रवेश किया, विश्वकर्मा अंतर्ध्यान हो गए और मूर्तियाँ अधूरी रह गईं मूर्ति निर्माण का कार्य आरंभ हुआ। दिन बीतते गए, लेकिन मूर्तियाँ पूरी नहीं हुईं। करीब एक महीना बीत जाने के बाद, राजा की उत्सुकता और बेचैनी इतनी बढ़ गई कि उन्होंने शर्त को भुलाकर कमरे का द्वार खोल दिया। जैसे ही राजा ने भीतर प्रवेश किया, विश्वकर्मा अंतर्ध्यान हो गए और मूर्तियाँ अधूरी रह गईं, उनमें हाथ और पैर नहीं थे। राजा को अपने अधीर निर्णय पर गहरा पछतावा हुआ। उन्होंने कई कारीगरों से मूर्तियों को पूर्ण करवाने की कोशिश की, लेकिन कोई भी उन्हें पूरा नहीं कर सका। अंततः राजा ने इन्हीं अधूरी मूर्तियों को मंदिर में प्रतिष्ठित करवा दिया। तब से लेकर आज तक, भगवान जगन्नाथ की वही अधूरी, लेकिन दिव्य मूर्तियाँ पूजित होती हैं। भगवान जगन्नाथ की बड़ी आंखों से जुड़ी मार्मिक कथा भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath) की बड़ी-बड़ी गोल आंखों के पीछे एक गहन और भावनात्मक कथा जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण द्वारका में निवास कर रहे थे, तब एक दिन माता रोहिणी वहां के लोगों को वृंदावन की रासलीलाओं की कथा सुना रही थीं। उस समय श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा जी चुपचाप दरवाजे के पास खड़े होकर उस कथा को सुन रहे थे। यह कथा इतनी भावपूर्ण और प्रेम से भरी हुई थी कि उसे सुनते-सुनते तीनों ही भाई-बहन भावनाओं में डूब गए और आश्चर्य तथा भक्ति से उनकी आंखें फैल गईं। उसी क्षण नारद मुनि वहां पहुंचे और जब उन्होंने भगवान का यह रूप देखा तो वे अत्यंत भावुक हो गए। उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि यह अद्भुत और दिव्य रूप सभी भक्तों को भी देखने को मिले। भगवान ने नारद की प्रार्थना को स्वीकार किया और इस भावमय स्वरूप को स्थायी रूप में धारण कर लिया। तभी से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां इसी रूप में बनाई जाती हैं—बड़ी गोल आंखों और साधारण, बिना अंगों के शरीर के साथ। यह स्वरूप केवल एक कथा नहीं, बल्कि भगवान की करुणा, प्रेम और भक्तों के प्रति उनकी गहराई से जुड़ी संवेदनशीलता का प्रतीक भी है। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय भक्तों की श्रद्धा से निर्मित भगवान जगन्नाथ का दिव्य नेत्ररूप एक अन्य कथा के अनुसार, जब भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath) राजा इंद्रद्युम्न के राज्य में प्रकट हुए, तब उनके स्वरूप को देखकर वहां उपस्थित सभी लोग आश्चर्य और श्रद्धा से भर गए। उनकी आंखें भगवान के प्रति असीम भक्ति से इतनी फैल गईं कि भगवान ने भी भक्तों की इस भावना का सम्मान करते हुए अपनी आंखें उसी तरह बड़ी कर लीं। यह दर्शाता है कि भगवान अपने भक्तों की भावनाओं को आत्मसात कर लेते हैं और उसी अनुरूप अपना रूप भी बदल लेते हैं। भक्तों का यह भी विश्वास है कि भगवान की ये विशाल आंखें इस बात का संकेत हैं कि वे हर समय अपने भक्तों पर दृष्टि बनाए रखते हैं। कुछ मान्यताओं के अनुसार, मूर्तिकारों ने जानबूझकर भगवान की आंखें बड़ी बनाई थीं ताकि जैसे ही कोई भक्त उनकी मूर्ति देखे, उसके भीतर श्रद्धा जाग उठे। इसके अलावा, यह भी माना जाता है कि भगवान जगन्नाथ की दृष्टि नेत्र रोगों से पीड़ित लोगों के लिए वरदान स्वरूप है और इससे उन्हें लाभ मिलता है। इस प्रकार, भगवान जगन्नाथ की आंखें केवल एक भौतिक अंग नहीं हैं, बल्कि वे भक्तों के प्रति प्रेम, समर्पण और चमत्कार की जीवंत प्रतीक हैं। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Jagannath #jagannathrathyatra2025 #incompleteidol #lordjagannath #hindumystery #puriodisha

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Discover the 3 key mistakes that can stop Goddess Lakshmi's blessings.

न करें ये 3 गलती, नहीं मिलेगी मां लक्ष्मी की कृपा

हमारे शास्त्रों में मां लक्ष्मी को धन, वैभव और समृद्धि की देवी माना गया है। मां लक्ष्मी जहां भी निवास करती हैं, वहां दरिद्रता, दुःख और अशांति कभी ठहर नहीं सकते। लेकिन मां लक्ष्मी बहुत चंचला मानी जाती हैं, वो किसी भी स्थान पर अधिक समय तक नहीं रुकतीं, अगर उन्हें प्रसन्न रखने के नियमों का पालन न किया जाए। यही कारण है कि वास्तुशास्त्र और पुराणों में मां लक्ष्मी की कृपा को पाने के लिए कुछ विशेष कार्यों से बचने की सलाह दी गई है। अगर आप चाहते हैं कि आपके घर में लक्ष्मी स्थायी रूप से निवास करें, तो आपको कुछ गलत आदतों और व्यवहारों से बचना चाहिए। सुबह देर तक सोना, झूठ बोलना और गंदगी में रहना ये तीन आदतें कर सकती हैं लक्ष्मी माता को नाराज़। जानिए कौन-से काम तुरंत छोड़ना जरूरी है ताकि घर में बनी रहे समृद्धि और सुख-शांति। यहां हम बता रहे हैं ऐसे 3 काम जिन्हें करने से मां लक्ष्मी (maa lakshmi) रुष्ट हो सकती हैं, और इसके परिणामस्वरूप आपके जीवन में धन की कमी, आर्थिक तंगी और अशांति आ सकती है। 1. सुबह देर तक सोना धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्ममुहूर्त में उठना न केवल स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी शुभ होता है। मां लक्ष्मी को सुबह जल्दी उठने वाले व्यक्ति प्रिय होते हैं। यदि कोई व्यक्ति सूर्योदय के बाद भी सोता रहता है या आलस्यवश देर तक बिस्तर पर रहता है। या फिर सुबह उठने से कतराता है। तो ऐसा माना जाता है कि मां लक्ष्मी ऐसे शख्स के घर से रुष्ट होकर चली जाती हैं। और माँ लक्ष्मी के रूठने से उसे आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है। ऐसे में यदि उसे माँ लक्ष्मी को रुष्ट होने से बचाना है तो,  2. शुक्रवार को बाल और नाखून काटना माना जाता है अशुभ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शुक्रवार को शरीर से जुड़ी कुछ क्रियाएं जैसे बाल कटवाना, शेविंग करना या नाखून काटना वर्जित मानी जाती हैं। यह दिन मां लक्ष्मी को समर्पित माना गया है, जो शुद्धता और सौम्यता की प्रतीक हैं। ऐसे में बाल या नाखून काटना देवी लक्ष्मी का अनादर माना जाता है, जिससे धन संबंधी समस्याएं और आय में रुकावट आने की संभावना बढ़ जाती है। यदि किसी वजह से यह कार्य करना अत्यंत आवश्यक हो, तो कोशिश करें कि पूजा-पाठ या संध्या के बाद यह न करें। थोड़ी सी सावधानी आपके जीवन में मां लक्ष्मी (maa lakshmi) की कृपा बनाए रखने में सहायक हो सकती है। संभव हो तो शुक्रवार के दिन बाल कटवाने, शेविंग करने अथवा नाखून काटने से बचें।  इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय 3. शुक्रवार को झाड़ू-पोंछा लगाने से पहले जान लें ये बात धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शुक्रवार के दिन विशेष रूप से झाड़ू लगाने या घर की सफाई करते समय सावधानी बरतनी चाहिए। ऐसा कहा जाता है कि शुक्रवार को विशेषकर शाम के समय झाड़ू लगाने से मां लक्ष्मी (maa lakshmi) का घर से वास समाप्त हो सकता है, क्योंकि झाड़ू को स्वयं लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। इस दिन झाड़ू को पैर से छूना या रात के समय उसका उपयोग करना भी अशुभ माना जाता है। अगर सफाई जरूरी हो, तो उसे सुबह के पहले पहर में कर लेना चाहिए और झाड़ू-पोंछा करने के बाद उसे ढककर किसी एकांत स्थान पर रखना शुभ माना जाता है। ऐसा करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और धन-संपत्ति में वृद्धि होती है। Latest News in Hindi Today Hindi news maa lakshmi #goddesslakshmi #wealthtips #hindubeliefs #lakshmiblessings #spiritualmistakes

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Rudraksha benefits

रुद्राक्ष पहनने पर भी नहीं मिल रहा लाभ? हो सकती हैं ये आम गलतियां

हिंदू धर्म में रुद्राक्ष को अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली माना गया है। यह केवल एक बीज नहीं बल्कि भगवान शिव का आशीर्वाद माना जाता है। शास्त्रों में रुद्राक्ष को धारण करने से मानसिक शांति, आत्मबल, और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होने की बात कही गई है। रुद्राक्ष धारण करने से व्यक्ति को कई लाभ प्राप्त होते हैं। यह न केवल मन की शांति प्रदान करता है, बल्कि एकाग्रता को भी बढ़ाता है। यदि इसे विधि-विधान और नियमों का पालन करते हुए पहना जाए, तो यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर रखता है और मन में बुरे विचार नहीं आने देता। रुद्राक्ष पहनने वाले व्यक्ति पर भगवान शिव (Lord Shiva) की विशेष कृपा बनी रहती है और उसे अशुभ ग्रहों के प्रभाव से भी राहत मिल सकती है। मान्यता है कि सही नियमों का पालन करते हुए रुद्राक्ष पहनने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। लेकिन बहुत से लोग यह शिकायत करते हैं कि रुद्राक्ष पहनने के बावजूद उन्हें अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा। इसका मुख्य कारण है – पहनने में की गई छोटी लेकिन प्रभावशाली गलतियां। आइए जानते हैं वे कौन-सी गलतियां हैं जिनकी वजह से रुद्राक्ष का प्रभाव कम हो जाता है। 1. रुद्राक्ष को बिना शुद्ध किए पहन लेना रुद्राक्ष खरीदते ही उसे पहन लेना सबसे आम गलती है। शास्त्रों के अनुसार, रुद्राक्ष को धारण करने से पहले गंगाजल, गाय के दूध या शुद्ध जल से शुद्ध करना चाहिए। उसके बाद शिव (Lord Shiva) मंत्र “ॐ नमः शिवाय” या “ॐ ह्रीं नमः” का जाप करके इसका अभिषेक करना चाहिए। 2. गलत माला का उपयोग करना रुद्राक्ष (Rudraksha) को हमेशा रेशम के धागे, चांदी, सोने या पंचधातु की माला में धारण करना चाहिए। कई लोग प्लास्टिक या लोहे की चैन में रुद्राक्ष पहनते हैं, जिससे इसकी ऊर्जा बाधित होती है। इसके अलावा, माला को शुद्ध और पवित्र रखना भी जरूरी है। 3. रुद्राक्ष की संख्या और मुख का चयन रुद्राक्ष कई प्रकार के होते हैं – 1 मुख से लेकर 21 मुख तक। हर मुख का अपना विशेष प्रभाव और फल होता है। कई बार लोग बिना ज्योतिषीय सलाह के किसी भी प्रकार का रुद्राक्ष पहन लेते हैं, जो लाभ के बजाय हानि भी पहुंचा सकता है। जैसे, 3 मुख रुद्राक्ष अग्नि तत्व का प्रतीक है, जबकि 5 मुख को सामान्य रूप से हर कोई पहन सकता है। 4. रुद्राक्ष पहनकर गलत आचरण करना रुद्राक्ष (Rudraksha) धारण करने के बाद मांस और मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए। साथ ही रुद्राक्ष पहनकर श्मशान या किसी ऐसे स्थान पर जाने से बचें जहां किसी की मृत्यु हुई हो। ऐसे स्थानों पर जाने से रुद्राक्ष की सकारात्मक ऊर्जा प्रभावित होती है और इसके उल्टे प्रभाव भी देखने को मिल सकते हैं। 5. सोते समय या स्नान करते समय पहनना रात को सोते समय या शौचालय जाते वक्त रुद्राक्ष धारण नहीं करना चाहिए। इन समयों में इसे उतारकर किसी पवित्र और स्वच्छ स्थान, जैसे मंदिर में, रखना चाहिए। रुद्राक्ष को धारण करने से पहले स्नान करना जरूरी है और इसे पहनते समय “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप करना चाहिए। इन नियमों का पालन करने से रुद्राक्ष के सम्पूर्ण लाभ प्राप्त होते हैं। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय 6. टूटा या दरार वाला रुद्राक्ष पहनना यदि रुद्राक्ष (Rudraksha) टूट गया है, उस पर दरार आ गई है या उसका धागा खुल गया है, तो उसे तुरंत उतार देना चाहिए। टूटे हुए रुद्राक्ष को पहनना अपशकुन माना जाता है और यह नकारात्मक ऊर्जा का कारण बन सकता है। रुद्राक्ष धारण से जुड़ी महत्वपूर्ण सावधानियां रुद्राक्ष (Rudraksha) को हमेशा स्वच्छ हाथों से ही छूना चाहिए। इसे गंदे हाथों से छूने से इसकी पवित्रता प्रभावित हो सकती है। साथ ही, अपना पहना हुआ रुद्राक्ष किसी और को नहीं देना चाहिए, क्योंकि इससे इसकी ऊर्जा कमजोर हो सकती है। गर्भवती महिलाओं को रुद्राक्ष धारण करने से परहेज करना चाहिए, क्योंकि इसमें अत्यधिक ऊर्जा होती है, जो गर्भस्थ शिशु के लिए हानिकारक हो सकती है। Latest News in Hindi Today Hindi news Rudraksha #rudraksha #spiritualhealing #rudrakshabenefits #rudrakshamistakes #vedicremedies

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Gupt Navratri 2025

गुप्त नवरात्रि 2025: दस रहस्यमयी रूपों की होती है साधना, मिलती हैं अद्भुत सिद्धियां

श्रद्धा और साधना के पर्व गुप्त नवरात्रि का हिंदू धर्म में विशेष स्थान है। यह नवरात्रि वर्ष में दो बार माघ और आषाढ़ मास में पड़ती है। इस विशेष अवधि में देवी दुर्गा के दस गुप्त स्वरूपों की आराधना की जाती है, जिन्हें दश महाविद्याएं कहा जाता है। इस साल गुप्त नवरात्रि की शुरुआत 26 जून से हो रही है। इसी दिन सुबह 5:25 से 6:58 बजे के बीच घटस्थापना के लिए शुभ समय माना गया है। इस विशेष अवसर पर देशभर में मां दुर्गा की कृपा प्राप्त करने हेतु विधिवत पूजा-पाठ और अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। गुप्त नवरात्रि की पूजा विधियां शारदीय नवरात्रि जैसी ही होती हैं, लेकिन इनका महत्व गुप्त साधना और विशेष अनुष्ठानों में होता है। आपको बता दें कि साल में कुल चार नवरात्रि होती हैं, चैत्र, शारदीय और दो गुप्त नवरात्रि। जहां चैत्र और शारदीय नवरात्रि बड़े पैमाने पर सार्वजनिक रूप से मनाई जाती हैं, वहीं गुप्त नवरात्रियां विशेष रूप से तांत्रिक साधकों और आध्यात्मिक अनुयायियों द्वारा गुप्त रूप से मनाई जाती हैं। गुप्त नवरात्रि का महत्व गुप्त नवरात्रि साधकों के लिए वह समय होता है जब वे आंतरिक ऊर्जा जागरण, आत्मबल वृद्धि और सिद्धियों की प्राप्ति के लिए देवी के विशेष रूपों की साधना करते हैं। इन दिनों तांत्रिक क्रियाएं, यंत्र-साधना और बीज मंत्रों का जाप प्रमुख होता है। धार्मिक मान्यता है कि गुप्त नवरात्रि में साधना करने से मां दुर्गा शीघ्र प्रसन्न होती हैं और भक्त को भौतिक व आध्यात्मिक लाभ दोनों देती हैं। माना जाता है कि इस दौरान साधक को अलौकिक शक्तियां प्राप्त हो सकती हैं। कौन-सी हैं दस महाविद्याएं? दस महाविद्याएं मां दुर्गा के दस शक्तिशाली रूप हैं, जो अलग-अलग गुणों, शक्तियों और तांत्रिक रहस्यों की प्रतीक मानी जाती हैं। आइए जानते हैं इन दस महाविद्याओं के नाम और उनका महत्व 1. मां काली – यह मां पार्वती का उग्र और शक्तिशाली रूप हैं, जो संसार से बुराई और नकारात्मकता का अंत करती हैं। 2. मां तारा – ज्ञान, मुक्ति और करुणा की देवी हैं। यह अपने भक्तों के सभी दुखों को हर लेती हैं। 3. त्रिपुर सुंदरी – सौंदर्य, प्रेम और शक्ति की देवी मानी जाती हैं। यह सुख, समृद्धि और सौंदर्य की प्रतीक हैं। 4. मां भुवनेश्वरी – सम्पूर्ण सृष्टि की संचालिका हैं। यह संसार को संभालती और अपने भक्तों की रक्षा करती हैं। 5. मां छिन्नमस्ता – आत्म-बलिदान और आत्मज्ञान की देवी हैं। यह भक्तों को ज्ञान, शक्ति और मुक्ति प्रदान करती हैं। 6. त्रिपुर भैरवी – यह देवी शक्ति और विनाश की अधिष्ठात्री हैं, जो भय से मुक्ति दिलाकर साहस प्रदान करती हैं। 7. मां धूमावती – ज्ञान और रहस्य की देवी हैं। कथा है कि भूख लगने पर उन्होंने भगवान शिव का भक्षण कर लिया, जिससे उन्हें विधवा स्वरूप में रहना पड़ा। इसलिए इनकी पूजा विवाहित स्त्रियां नहीं करतीं। 8. बगलामुखी देवी – शत्रुनाशिनी देवी हैं। यह अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और उन्हें बाहरी खतरों से बचाती हैं। 9. मातंगी देवी – यह देवी विद्या, संगीत, कला और वाणी की अधिपति हैं। विद्यार्थी और कलाकार इनकी उपासना करते हैं। 10. कमलात्मिका (कमला) देवी – लक्ष्मी स्वरूपा देवी हैं, जो अपने भक्तों को धन, वैभव और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय इन बातों का रखें विशेष ख्याल Latest News in Hindi Today Hindi news  गुप्त नवरात्रि #guptnavratri2025 #secretnavratri #navratrisadhana #raresiddhis #goddessworship

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