धार्मिक नगरी उज्जैन को प्राचीन काल से ही शिव की नगरी के रूप में जाना जाता है। यहां स्थित श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग को बारह ज्योतिर्लिंगों में सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त है। सावन के पावन महीने में जब पूरी धरती शिवमय हो जाती है, तब उज्जैन में महाकाल की सवारी एक ऐसा अद्भुत आयोजन होता है, जिसे देखने और अनुभव करने के लिए लाखों श्रद्धालु देश-विदेश से उमड़ पड़ते हैं। पर क्या आपने कभी सोचा है कि इस महाकाल की सवारी का धार्मिक महत्व क्या है? क्यों भगवान स्वयं नगर भ्रमण पर निकलते हैं? आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक परंपरा और उसकी आस्था से जुड़ी गहराई को।
महाकाल की सवारी क्या है?
महाकाल की सवारी उज्जैन (Mahakal Ujjain) में सावन और भाद्रपद के विशेष सोमवारों को निकलने वाली एक पवित्र धार्मिक शोभायात्रा है। इस सवारी में भगवान महाकाल अपने विविध स्वरूपों—मनमहेश, चंद्रमौलेश्वर, भूतनाथ आदि—में नगर भ्रमण करते हैं। यह सवारी महाकाल मंदिर से निकलकर नगर के प्रमुख मार्गों से होते हुए रामघाट तक जाती है, जहां शिप्रा नदी में भगवान का अभिषेक किया जाता है।
महाकाल की सवारी 2025: जानिए कब-कब निकलेंगी भव्य शोभायात्राएं
सावन मास में भगवान महाकाल की सवारी हर सोमवार को निकाली जाती है। वर्ष 2025 में यह सवारियां निम्नलिखित तिथियों को उज्जैन (Ujjain) नगर में श्रद्धा और भव्यता के साथ निकाली जाएंगी:
- पहली सवारी – 14 जुलाई 2025
- दूसरी सवारी – 21 जुलाई 2025
- तीसरी सवारी – 28 जुलाई 2025
- चौथी सवारी – 4 अगस्त 2025
- पांचवीं सवारी – 11 अगस्त 2025
- छठी और अंतिम सवारी – 18 अगस्त 2025
महाकाल की सवारी का ऐतिहासिक महत्व (Mahakal Ki Sawari History)
सावन और भाद्रपद के पावन महीनों में निकलने वाली महाकाल की यह विशेष सवारी एक प्राचीन धार्मिक परंपरा का हिस्सा है, जो आज भी पूरे श्रद्धा और विधि-विधान से निभाई जाती है। इतिहास के अनुसार, इस सवारी को भव्य रूप देने का श्रेय राजा भोज को जाता है। उनके शासनकाल में महाकाल की सवारी में नए रथों और हाथियों को सम्मिलित कर इसे एक राजसी शोभायात्रा का रूप दिया गया था। तब से यह परंपरा निरंतर चली आ रही है और प्रत्येक वर्ष लाखों श्रद्धालु इस दिव्य आयोजन में भाग लेते हैं।
महाकाल की सवारी का आध्यात्मिक महत्व (Mahakal Sawari Significance)
महाकाल की सवारी को अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजन माना जाता है। इस अवसर पर भगवान महाकाल को रथ पर विराजमान कर नगर भ्रमण कराया जाता है। सवारी के दौरान भक्तगण ऊँचे स्वर में “जय महाकाल” के नारे लगाते हैं और ढोल-नगाड़ों की गूंज से पूरा वातावरण शिवमय हो जाता है। इस भव्य यात्रा में तलवारबाज, घुड़सवार और अखाड़ों के साधु-संत भी भाग लेते हैं। यह सवारी महाकाल की शक्ति, साकार स्वरूप और नगर पर उनकी कृपा का प्रतीक मानी जाती है। धार्मिक ग्रंथों में भी इस परंपरा का उल्लेख मिलता है, जो इसकी प्राचीनता और महत्व को प्रमाणित करता है।
इसे भी पढ़ें:- सावन 2025: क्यों प्रिय है महादेव को बेलपत्र? जानिए इसके पीछे छिपी पौराणिक कथा और महत्व
सावन में क्यों होती है सवारी?
सावन का महीना भगवान शिव (Lord Shiva) को अत्यंत प्रिय है। इस मास में की गई शिव उपासना, व्रत, अभिषेक और पूजन का फल अत्यधिक होता है। सावन के सोमवार और महाकाल की सवारी का संयोग भक्तों के लिए एक दुर्लभ अवसर होता है, जब वे स्वयं महाकाल के नगर भ्रमण और दर्शन का पुण्य प्राप्त करते हैं।
यह विश्वास है कि महाकाल की सवारी में सम्मिलित होने से कष्टों का नाश, पापों से मुक्ति और कुल की उन्नति होती है। यही कारण है कि यह सवारी हर वर्ष भव्य रूप से श्रद्धा और उत्साह के साथ निकाली जाती है।
नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें।
Latest News in Hindi Today Hindi news
#MahakalKiSawari #UjjainMahakal #LordShivaProcession #Sawan2025 #MahakalDarshan #SpiritualIndia






